लघुकथा :
"मेरा पति मेरा देवता है"
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
मैं ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के परिसर स्थित पंजाब नेशनल बैंक में अपना खाता अपडेट कराने हेतु कतार में खड़-खड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहा था कि अचानक किसी महिला के रोने- बिलखने की आवाज सुनाई दी। मेरे साथ खड़े मित्र ने बताया कि बाहर सड़क पर किसी महिला को एक पुरुष पीट रहा है। मैं कतार से बाहर निकलकर उसे देखने गया। मेरे जैसे अनेक लोग वहाँ तमाशबीन बने आनंद ले रहे थे। महिला नवविवाहिता लग रही थी और पुरुष जिस अधिकार के साथ उसे पीट रहा था, समझते देर न लगी कि वह उसका पति है।
मुझे महिला की निरीहता पर दया आ गई। 'अवला जीवन हाय! तेरी यही कहानी....!' मैं अपने मित्र की मनाही के बावजूद उसे बचाने की कोशिश में वहाँ पहुँच गया। महिला अबतक काफी पिट चुकी थी। उसके दोनों गाल आरक्त हो गये थे। आंखों से आँसुओं की अविरल धारा प्रवाहित हो रही थी। कमाल यह था की महिला चुपचाप मार खा रही थी, बचाव को कोई चेष्टा नहीं कर रही थी। मानो पतिदेव के हाथों पिटने को अपनी नियति समझ ली हो। मैंने पुरुष का हाथ पकड़ते हुए कहा- "भाई क्या हुआ........तुम क्यों इसे पीटे जा रहे हो...? स्त्री पर हाथ उठाना घोर पाप है!"
पुरुष मेरी बात सुनकर थोड़ा सहम गया, परंतु महिला मुझपर कुपित हो गई। बोली- "भाई साहब आपकी क्या समस्या है! जाओ अपना काम करो न! पति- पत्नी के बीच की लड़ाई है। मेरा पति मुझे पीट रहा है.... आपको क्या दिक्कत है!"
महिला की बात सुनकर मैं शर्मिंदा हुआ। ऐसी ही महान भारतीय नारी को देखकर किसी ने कहा है- 'भला है बुरा है...जैसा भी है, मेरा पति मेरा देवता है!'
********************
0 Comments:
Post a Comment