राखी की लाज
क्या आपने कभी लगाया है गुलाल
अपने गालों पर अपने ही हाथों से!
मैंने कई बार रंगे हैं अपने गाल गुलालों से
डाले हैं रंगों के छींटे अपने वस्त्रों पर अपने हाथों
ताकि रह जाए भाभियों की लाज होली में........।
और मैंने इस बार बांधी राखियां
अपनी कलाई पर अपने ही हाथों।
बात यह नहीं कि बहनों ने नहीं भेजी हैं राखियां
वह कैसे भूल सकती हैं अमोल रिश्ते को
साल में एक बार तो आता भाई-बहन का पावन त्योहार।
बहनों ने बहुत प्यार से भेजी हैं सुन्दर- सुन्दर राखियां
थालियों में क्या खूब सजे हैं दीप...रोली...चंदन और फूल
वह नहीं भूली हैं मेरी पसंद की मिठाइयां
वह की हैं मेरे लिए लाख मन्नते......
मांगी हैं हजारों दुआएं......
वाट्सप के सहारे.............!
आभासी संसार में कितने खोखले हो गए हैं रिश्ते
आज किसी को वक्त नहीं अपनों के लिए
कोई सोचता ही नहीं कि
जीवन में बहुत बार नहीं आती हैं दिवाली...होलियां..
या त्योहार रक्षाबंधन का......।
मैंने इंतजार किया बहनों का शाम ढल जाने तक
पर सूनी रह गई राहें...
आखिरकार हम बाप- बेटों ने एक- दूसरों को बांध दी राखियां....
और बचा ली लाज बहनों की!
मैं जानता हूँ कि लोग इसे भी कह लेंगे अच्छी कविता।
पर उन्हें कैसे बताऊं कि
शब्दों का हर संयोजन
नहीं होती है बस कविता.....!
- डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
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