शोध- सार :
स्त्री- विमर्श की भारतीय परंपरा : तब से अब तक
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी-विभाग, श्री राधा कृष्ण गोयनका महाविद्यालय, सीतामढ़ी (बिहार)
पुरुषों के समकक्ष स्त्रियों की सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समानता की मांग ही 'स्त्री-विमर्श' का केन्द्रीय उद्देश्य है। भारत जैसे देश में स्त्री को देवी कहकर संबोधित किया गया, परंतु मानवीय अधिकारों के लिए उसे निरंतर संघर्ष करना पड़ा है। सर्वत्र उसे शारीरिक और मानसिक हिंसा का शिकार बनाया गया। भारतीय संदर्भ में स्त्री-विमर्श भारत की प्रबुद्ध नारियों और विचारकों के गहन चिंतन की परिणति है, जिसका प्रमुख ध्येय सामंती सामाजिक व्यवस्था द्वारा स्थापित पराधीनता से स्त्री को आजाद करना है। एक तरफ सब मिलकर स्त्री को अपने संदर्भों में परिभाषित करने की चेष्टा कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर स्त्री इन रूढ़ होती छवियों से मुक्त होकर मानवीय धरातल पर स्थापित होने की कोशिश कर रही है। उसकी यही आकांक्षाएँ, चेष्टा और संघर्ष निरंतर उसे विमर्श के दायरे में केन्द्रित कर रहा है। स्त्री- विमर्श अपने भीतर अनवरत उन संवादों और बहसों को जन्म देता है, जहाँ सदियों से शोषित- पीड़ित स्त्री के मन की अभिव्यक्ति को स्वर मिला है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री को हमेशा 'अधीनस्थ' (सबाल्टर्न) की श्रेणी में रखा। पितृसत्तात्मक मूल्य स्त्री को समाज में दोयम दर्जे का मानते हुए, उसके मानवीय मूल्यों तथा अधिकारों का हनन करते हैं। स्त्री-विमर्श अपने भीतर इन्हीं पितृसत्तात्मक मूल्यों को ध्वस्त करते हुए सामाजिक न्याय, समता, स्वतंत्रता और बंधुता की पृष्ठभूमि का निर्माण करता है। इसमें एक ओर पुरुष वर्चस्व का तथा मनुवादी सोच का निषेध है, तो दूसरी ओर भारतीय जीवन मूल्यों की नवीन संदर्भों में पुनर्व्याख्या एवं पुनर्स्थापन की चेष्टा। स्त्री के अधिकारों का संघर्ष बहुत पुराना है। भारतीय साहित्य में इसकी परंपरा वैदिक काल से लेकर समकालीन युग तक अनवरत मिलती है। बौद्ध- जैन संघर्ष, भक्ति आंदोलन, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन, आधुनिक भारतीय नवजागरण एवं समकालीन स्त्री- मुक्ति आंदोलन का इसमें विशेष योगदान है। वैदिक काल में ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी, गार्गी और भारती, रामायण काल में वसिष्ठ की पत्नी अरुंधती, दशरथ की पत्नी कौसल्या, महाभारत काल में पांडवों की माता कुंती, द्रोणाचार्य की पत्नी गौतमी, बौद्ध-जैन काल में थेरियां और साध्वियां, भक्ति-आंदोलन के दौरान आंडाल, मीराबाई, राबिया और सहजोबाई तथा आधुनिक काल में पंडिता रमाबाई, सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, जानकी देवी, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा आदि स्त्री- अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष करती रही हैं। भारतीय स्त्री-विमर्श इन्हीं स्त्रियों के संघर्ष- चेतना से उद्भूत, उत्प्रेरित और ऊर्जस्वित है।
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