शरदपूर्णिमा का माहात्म्य
शारदीय नवरात्र के चार दिन बाद शरद पूर्णिमा का शुभ आगमन का महत्त्व कई संदर्भों में है। एक तो यहाँ से सूर्यदेव नित्यप्रति दक्षिणायन हो जाते हैं। भौगोलिक तौर पर पृथ्वी से सूर्य की दूरी बढती चली जाती है और यहाँ से विधिवत शरद ऋतु प्रारंभ हो जाता है। धरती शस्यश्यामला होकर सज जाती है, और दूसरी ओर प्रकृति रसवंती हो जाती है। नवान्न से कृषकों का घर सुरभित हो जाता है। सरोवरों में कुमुदिनी चांद की चांदनी में नहाने लगती है। और ऐसा क्यों न हो जब गोपेश्वर ने अपनी बासुरी पर राग टेरकर गोपियनओं को सम्मोहित कर लिया हो और ये गोपिकाएँ अपने तमाम बंधनों को तोड़कर अपने प्रियतम से मिलने को आतुर हो गई हों।
इसी पवित्र रात में श्रीकृष्ण ने रास रचाया था, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध के कुल पांच अध्यायों (उनतीसवें से तैंतीसवें अध्याय) में किया गया है। प्रकृति की मनोरमता ने कृष्ण को रास के लिए उत्प्रेरित किया और उन्होंने अपनी बासुरी पर काम धुन टेर दिया।
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