नारी- अस्मिता, संघर्ष और सशक्तीकरण

नारी- अस्मिता, संघर्ष और सशक्तीकरण 

            डाॅ. चन्दा कुमारी

सहायक प्राध्यापक, राजनीति- विज्ञान विभाग, के. एस.  कॉलेज.  दरभंगा (बिहार)

          भारतीय स्त्रीवाद का उत्स पश्चिम में नहीं है। भारत में उसकी लम्बी परम्परा रही है। भारतीय वाङ्‌मय में स्त्री की छवि देवी के रूप में और शक्ति के रूप में दिखायी गयी है। भारतीय नारीवादी विचारधारा परम्पराओं और पारिवारिक भावनात्मक सम्बन्धों से अपने को पूर्ण रूप से मुक्त कर देना नहीं चाहती। भारत की अपनी सांस्कृतिक दृष्टि है, जीवन- दृष्टि है। यहाँ हमने स्त्री को देवी का रूप तो दिया। जिन्दगी का यथार्थ यह है कि अक्सर वह देवी नहीं दासी बनकर जीती है। स्त्री की माँग यह है कि उसे सिर्फ दिल और दिमाग रखनेवाली मानवी समझ लें। यह सच है कि भारतीय नारीवादी दृष्टिकोण पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्थापित कई मूल्यों को चुनौती देता है, लेकिन मातृत्व, वात्सल्य और पारिवारिक रिश्ते नातों के मूल्यों का आदर करता है।

           भारतीय साहित्य में स्त्री- विमर्श की ओजस्वी धारा बौद्धकालीन थेरीगाथा से निकलकर भक्ति- आन्दोलन के सन्दर्भ में आलवार भक्तों में आन्दाल, बारहवीं सदी में कर्नाटक की अक्कमहादेवी, मराठी के महिला संत, मीराबाई, नवजागरण काल में पंडिता रमाबाई, ताराबाई शिन्दे, सीमंतिनी उपदेश की अज्ञात हिन्दू औरत से होकर वर्तमान स्त्री-मुक्ति आन्दोलन तक अविराम गति से उछलती मचलती, पुरुष सत्ता के चट्टानों से टकराती अपना अलग रास्ता तय करती आयी है। बौद्धकालीन थेरियों ने अपने विचारों की खुली और स्पष्ट अभिव्यक्ति करने का साहस दिखाया। अपने तमाम कर्तव्यों को बड़ी दक्षता और होशियारी से वे पूरा करती थीं। ये परिव्राजिकाएँ स्त्री स्वतन्त्रता की प्रारंभिक वक्ता थीं। पारिवारिक और सामाजिक जीवन में स्त्री- पुरुष सम्बन्ध के सम्यक स्वरूप पर महात्मा बुद्ध ने बल दिया था।

             कौटुम्बिक प्रबन्धन में स्त्री के प्रमुख स्थान को उन्होंने रेखांकित किया। आठवीं शताब्दी में आन्दाल और बारहवीं शताब्दी में अक्कमहादेवी की आवाज़ पुरुष की भोगासक्ति के खिलाफ़, पुरुष-सत्ता के खिलाफ़ उठी। दोनों ने परम्परागत सामाजिक रूढ़ियों को ठुकरा कर स्वतन्त्र राह अपना ली। आलवार सन्तों में अकेली महिला आन्दाल थी। आन्दाल में मार्गषी के सामूहिक त्योहार द्वारा महिलाओं में आध्यात्मिक जागरण लाकर भक्ति को एक सामूहिक आधार प्रदान किया। सारी मानव जाति के हितैषी, प्रेम और शक्ति के पक्षपाती बसवेश्वर द्वारा स्थापित अनुभव मंडप में अक्कमहादेवी को महान शिवशरणी का पद प्राप्त था। कन्नड़ वचन साहित्य में अक्कमहादेवी के वचनों के बारे में यह कहा जाता है-

'आद्यशिव शरणों के साठ वचनों का सार, 

मिले बसवण्णा के बीस वचनों में।

बसवण्णा के बीस वचनों का सार, 

मिले प्रभुदेव के दस वचनों में। 

प्रभुदेव के दस वचनों का सार, 

मिले अजगण्णा के पाँच वचनों में। 

अजगण्णा के पाँच वचनों का सार, 

मिले कूडल चन्नसंगय्या की (प्रिया) 

अक्क महादेवी के एक ही वचन में।'1

            अक्कमहादेवी का पति के अत्याचार के खिलाफ केशाम्बरा होकर शिवभक्ति के मार्ग पर निकल पड़ना स्त्री को गुलाम बनाये रखनेवाले पुरुषवर्चस्व के प्रति विद्रोह था। अक्कमहादेवी ने स्त्री के स्वतन्त्र अस्तित्व की खोज में परम्परागत सामाजिक मानसिकता को चुनौती दी। मराठी संत मुक्ताबाई ने आध्यात्मिक क्षेत्र में पुरुषवर्चस्व को ललकारा। संत जनाबाई ने अपने अभंगों में शूद्र जाति की होने के कारण उनके प्रति किये गये अन्यायों के प्रति तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सोलहवीं सदी में मीराबाई पुरुष- प्रधान सामंती ताकतों के खिलाफ़ अकेली खड़ी रही। उन्होंने भक्ति और प्रेम के मार्ग में स्त्री के स्वातन्त्र्य को स्थापित किया।

           भारतीय नवजागरण के पुरोधाओं ने स्त्री-मुक्ति को अपने आन्दोलन का प्रमुख मुद्दा बनाया। सन् 1829 में सती-प्रथा रोकने का कानून लागू हो गया। ब्रह्म- समाज, आर्य समाज और प्रार्थना समाज के आन्दोलनों के परिणामस्वरूप स्त्री- शिक्षा का प्रसार हुआ और स्त्री के खिलाफ की जानेवाली कुरीतियों पर रोक लगी। विधवा-विवाह और अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन मिला। महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले और सावित्री फुले ने स्त्रियों को शिक्षित करने और उनको सामाजिक न्याय दिलाने के लिए आन्दोलन शुरू किये। स्वामी विवेकानन्द ने स्त्री की पूर्णता उसकी पूर्ण स्वतन्त्रता में माना (The idea of perfect womanhood is perfect independence) उन्होंने भारतीय स्त्रीत्व की महान प्रतीक के रूप में सीता के चरित्र का उल्लेख किया। मातृत्व को विवेकानन्द ने स्त्रीत्व की पहचान बताया। श्री शारदा देवी का उदाहरण देते हुए उन्होंने स्त्री मात्र को मातृशक्ति की प्रतीक माना। स्त्री शिक्षा एवं नारी जागरण के द्वारा ही भारत की प्रगति संभव है, यह उनकी मान्यता थी। उनकी राय में स्त्री की समस्याओं का समाधान ढूँढ निकालने की क्षमता स्वयं स्त्रियों में ही निहित है। पुरुषों को उसमें हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। "सर्वप्रथम स्त्री-जाति को सुशिक्षित बनाओ, फिर वे स्वयं कहेंगी कि उन्हें किन सुधारों की आवश्यकता है। तुम्हें उनके प्रत्येक कार्य में हस्तक्षेप करने का क्या अधिकार है?... स्त्री-जाति के प्रश्न को हल करने के लिए आगे बढ़नेवाले तुम हो कौन? क्या तुम हर एक विधवा, हर एक स्त्री के भाग्य विधाता साक्षात् भगवान हो? अलग हो जाओ। अपनी समस्याओं की पूर्ति वे स्वयं कर लेंगी।"2 आज के भारतीय स्त्री आन्दोलन में विवेकानन्द का यह कथन चरितार्थ होता हुआ हम पाते हैं।

           केरल के सन्त श्रीनारायण गुरु ने सामाजिक समता के सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप देते हुए अज्ञान और अशिक्षा को दूर करने के लिए कई व्यावहारिक कदम उठाये। उन्होंने संपत्ति पर स्त्री को अधिकार दिलाने के लिए अपने संगठन के द्वारा प्रयास किया। महिलाओं को एस.एन.डी.पी. संगठन में उचित स्थान दिया। विवाह संस्था का सरलीकरण कर उन्होंने स्त्री-पुरुष की समान भूमिका पर ज़ोर दिया। उन्होंने पिछड़े और पद- दलित समूहों की महिलाओं की शिक्षा एवं सांस्कृतिक विकास के लिए मन्दिरों और शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना के माध्यम से ऐतिहासिक कार्य किया। तमिलनाडु में पेरियार ने ब्राह्मणवादी एवं पुरुषवादी व्यवस्था से स्त्री को मुक्ति दिलाने और स्त्री के स्वाभिमान को बरकरार रखने के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया।

             सन् 1882 में मराठी में ताराबाई शिन्दे ने 'स्त्री-पुरुष तुलना' लिखकर पुरुष- सत्ता का तीखा विरोध प्रकट किया था। उन्होंने तत्कालीन समाज में स्त्री के संघर्ष और तनाव को वाणी देते हुए स्त्री- पक्ष का ज़ोरदार समर्थन किया। मर्द द्वारा तय किये गये मानदण्डों को ताराबाई ने झूठा ठहराया। लिंग-भेद के आधार पर स्त्री-पुरुष के अधिकारों में विभेदीकरण करना और दोहरा मानदण्ड अपनाकर स्त्री को पुरुष से अक्षम साबित करना-इन सारे कार्यों को उन्होंने जुल्म माना। सन् 1882 में ही एक अज्ञात हिन्दू औरत की लिखी 'सीमन्तिनी उपदेश' में स्त्री-चेतना का प्रबल स्वर है। यहाँ स्त्री के प्रति की जा रही बेइज्जती और बेकद्री की खुली शिकायत है। अज्ञात हिन्दू औरत परमेश्वर से फरियाद के बहाने 'मुद्दत से हिन्दियों के दिमाग में चल रही जहालत की अन्धेरी' का खुलासा करती है। उनका कहना है "उससे जुल्म की गर्द उड़ उड़ कर हमारे ऊपर पड़ती है। जैसे कोई मकान बहुत देर तक गर्द पड़ने से दब जाता है उसी माफ़िक हमारी हालत है। हम निकलने की ताकत नहीं रखती हैं। जैसे गन्ने का रस निकाल लेने से छिलका रह जाता है वैसे ही हमारी हालत है।"3 यहाँ स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज में स्त्री की हैसियत पर इस अज्ञात महिला ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया ईश्वर से फ़रियाद के बहाने व्यक्त की है। पुरुषों की गुलामी से भारतीय स्त्री की मुक्ति की कामना की अभिव्यक्ति इसमें हुई है। सन् 1870 में छपी नज़ीर अहमद की मिरात-उल-उरूस (गृहिणी दर्पण) में भी स्त्री- शिक्षा पर बल देते हुए लिखा है- "औरतों को खुदा ने जाहिल रहने के लिए नहीं बनाया। खुदा ने औरतों को इतनी सारी अक्ल दी है ज़रूर किसी बड़े काम के लिए दी है, यानी इल्म हासिल करने के लिए।"4 सन् 1882 में पंडिता रमाबाई ने 'स्त्री- धर्म नीति' लिखकर स्त्री को अतीत गौरव के यशोगान में अंधी होकर डूब न जाने की चेतावनी दी। तत्कालीन समाज में स्त्री की दशा की असलियत समझने के लिए स्त्री समूह को उन्होंने प्रेरित किया। गृहस्थी में चैन और संतोष स्त्री- पुरुष की आपसी भागीदारी से ही संभव है, पंडिता रमाबाई की ऐसी मान्यता है। 'हिन्दू-स्त्री का जीवन' में सामाजिक पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय स्त्री की स्थिति पर विचार किया गया है। मनुवादियों का उन्होंने विरोध किया। धर्म के नाम पर प्रचलित अनाचारों और आडम्बरों से दूर रहने की ज़रूरत पर उन्होंने ज़ोर दिया। स्त्रियों का धर्मांध न होने की प्रेरणा उनसे मिली।

            पहले विश्वयुद्ध के बाद गांधीजी ने आन्दोलन की बागडोर संभाली। स्वाधीनता आन्दोलन के साथ स्त्रियों में जागरूकता आयी। सरोजिनी नायडू, दुर्गाबाई देशमुख, कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसी स्त्रियों में गांधीजी ने स्वावलम्बन, स्वदेशी भावना और अन्यायों के प्रति अहिंसक प्रतिरोध करने का आत्मबल पैदा किया। गांधीजी स्त्री की क्षमताओं को मान्यता देते थे। उन्होंने कहा, "स्त्री पुरुष की साथिन है, जिसकी बौद्धिक क्षमताएँ पुरुष की बौद्धिक क्षमताओं से किसी तरह कम नहीं हैं। पुरुष की प्रवृत्तियों में, उन प्रवृत्तियों के प्रत्येक अंग और उपांग में भाग लेने का उसे अधिकार है और आज़ादी नथा स्वाधीनता का उसे उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों को है। जिस तरह पुरुष अपनी प्रवृत्ति के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान का अधिकारी माना गया है, उसी तरह स्त्री भी अपनी प्रवृत्ति के क्षेत्र में मानी जानी चाहिए।"5 स्त्री की क्षमता पहचानकर ही उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनको महत्त्वपूर्ण भूमिका दी। "उनके अनुसार स्वराज की विजय में भारत की स्त्रियों का उतना ही हिस्सा होना चाहिए जितना पुरुषों का। यह संभव है कि इस शांत लड़ाई में स्त्री- पुरुष से बाज़ी मार ले जाये और उसे कोसों पीछे छोड़ दें। हम जानते हैं कि धर्म के प्रति अपनी भक्ति में वह पुरुष से सदा आगे रही है। शांत और शालीनतापूर्वक तपस्या नारी- जाति का स्वभाव सिद्ध लक्षण है।"6 स्त्रियों के मुक्ति संघर्ष के लिए अहिंसा और सत्याग्रह के हथियार बहुत ही सार्थक सिद्ध हुए। पुरुष वर्चस्व की लक्ष्मण-रेखा लाँघकर काफी तादाद में स्त्रियों ने आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया बाद में 'चिपको आन्दोलन', 'नर्मदा बचाओ आन्दोलन', हाल ही ही में हुए नंदीग्राम के किसानों का आन्दोलन इन सब में गांधीवादी अहिंसात्मक प्रतिरोध के मार्ग को स्त्रियों ने अपनाया। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने भारतीय संविधान एवं हिन्दू कोड बिल के माध्यम से स्त्री पुरुष के समानाधिकारों को स्थापित करते हुए स्त्री के लिए युगों से वंचित उसके अधिकार दिलाये। मनुवाद का विरोध करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म में प्राप्त स्त्री स्वातन्त्र्य को अनुकरणीय बताया। भारतीय सन्दर्भ में स्त्री और दलितों के मुक्ति की उनकी जो परिकल्पना थी उससे वर्तमान स्त्री विमर्श और दलित विमर्श गहराई से प्रभावित है। वर्तमान भारत में विश्व मातृत्व की परिकल्पना को माँ अमृतानन्दमयी व्यावहारिक रूप दे रही हैं। पीड़ित मानवता की सेवा के उपलक्ष्य में अनेक योजनाएँ लागू करते हुए विश्वमातृत्व एवं वात्सल्य का परिचय दे रही है। विश्वशान्ति और पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने में उनका योगदान अनुपम है।

           महादेवी वर्मा की 'श्रृंखला की कड़ियाँ' स्त्री-विमर्श की आक्रामकता और प्रगतिशीलता का महत्त्वपूर्ण बिन्दु है। इसके अतिरिक्त सन् 1930 और 1940 के बीच लिखे उनके रेखाचित्र संघर्षशील स्त्री जीवन के रंगों में रंगे हैं। उन्होंने पौराणिक काल के मिथकों के सन्दर्भ में तत्कालीन समय के सामाजिक, आर्थिक पहलुओं का विश्लेषण किया। महादेवी ने बौद्धिक और व्यावहारिक स्तर के विश्लेषण से निष्कर्ष निकाला कि परिवार और समाज में स्त्री की हैसियत का सीधा संबंध उसकी आर्थिक स्थिति से है। भारतीय स्त्री की गरिमा को स्वीकार करते हुए उन्होंने परिवार के भीतर स्त्री के प्रति की जानेवाली क्रूरताओं की ओर सतर्क रहने की चेतावनी स्त्री समूह को दी। प्रेम, ममता, वात्सल्य, करुणा और सेवा-भाव को उन्होंने पारिवारिक और सामाजिक प्रगति के मूल्यों के रूप में देखा। भारतीय स्त्री की महानता मातृत्व भाव में है, महादेवी ने इस तथ्य को रेखांकित किया। "स्त्री के विकास की चरम सीमा उसके मातृत्व में हो सकती है, परन्तु यह कर्तव्य उसे अपनी मानसिक तथा शारीरिक शक्तियों को तोलकर स्वेच्छा से स्वीकार करना चाहिए, परवश होकर नहीं।"7 'वे स्त्री को अपना व्यक्तित्व बनाये रखने के पक्ष में हैं।'8 महादेवी ने वैवाहिक जीवन को ठुकराया। इसके बावजूद उनका पूरा जीवन मातृत्व भाव से प्रेरित है। प्रकृति के सारे जीवजन्तु उनके अपने परिवार के अंग बन गये थे। समाज में हाशिये पर पड़े मामूली स्त्रियों और हताश दुखी लोगों को महादेवी ने मातृवात्सल्य से सहारा दिया। विवाह संस्था के दोहरे मानदण्डों का वे विरोध करती हैं। पुरुष के छूट और स्त्री के बंधन को वे मान नहीं सकतीं। 'घर और बाहर' स्त्री की उपस्थिति पर विचार करते हुए वे कहती हैं- विवाह करते ही सुखी गृहस्थी के स्वप्न सच्ची हथकड़ी-बेड़ी बनकर उनके हाथ-पैर ऐसे जकड़ देते।'9

           मार्क्स और एंगिल्स की नारी विषयक कुछ सैद्धान्तिक मान्यताएँ भारत के सन्दर्भमें अधूरी पड़ जाती हैं। मार्क्सवादी नारीवाद में स्त्री के दमन का कारण निजी संपत्ति की स्थापना को माना जाता है। (विवाह के द्वारा स्त्री को निजी संपत्ति बनाया जाता है। एंगिल्स मानते हैं कि इतिहास में पहला वर्ग विरोध एक विवाह प्रथा के माध्यम से स्त्री पुरुष के बीच विकसित हुआ वर्ग विरोध है और पहला वर्ग अत्याचार स्त्री पर पुरुष का अत्याचार था। "With in the family the husband is the bourgeois and the wife represents the proletariate"10 मार्क्स ने शिशु के पालन पोषण को पहला श्रम विभाजन कहा। उनके अनुसार साम्यवादी समाज की स्थापना वर्ग- संघर्ष के द्वारा संभव है। स्त्री भी सर्वहारा वर्ग है। पुरुष अक्सर बुर्जाजी या मालिक का स्थान ग्रहण करता है। पुरुष और स्त्री के इस वर्ग संघर्ष की ओर मार्क्सवादी विचारक इशारा करते हैं। एंगिल्स और माओत्से तुंग के विचार इसमें महत्त्वपूर्ण हैं। परिवार में जो काम हैं जैसे खाना बनाना, बच्चों की परवरिश, अन्य गृहकार्य ये सब निजी काम हैं। परिवार एक तरह से निजीकरण है। इनको सार्वजनिक बनाने से इन समस्याओं के लिए समाधान हो सकर्ता है। कुछ लोग विवाह को संपत्ति पर अधिकार जमाने के प्रयास के रूप में भी देखते हैं। उनके अनुसार यह सार्वजनीकरण साम्यवादी व्यवस्था में ही संभव है। फ्रेडरिक एंगिल्स के अनुसार विवाह ही एक तरह की गुलामी व्यवस्था है। "एंगिल्स के अनुसार परिवार में संपत्ति का सम्बन्ध निजी संपत्ति अर्जित करने की धारणा के विकास के साथ शुरू हुआ तथा विरासत का सवाल अहम हो गया। एंगिल्स ने इस मान्यता का उपयोग मध्यवर्गीय परिवारों तथा श्रमिक वर्ग परिवारों में अन्तर करने के लिए किया। उनका कहना था कि श्रमिक वर्ग परिवारों के पास अपनी निजी जायदाद नहीं होती, इसलिए उनमें विरासत का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं था और न ही संपत्ति महिलाओं के उत्पीड़न का कारण बनती थी। ऐसा करते हुए उन्होंने न केवल लैंगिक आधार पर महिलाओं का श्रम- विभाजन करने की नीति को महिलाओं के उत्पीड़न का ज़रिया मानने की भूल की, अपितु गर्भ नियंत्रण की आवश्यकता, पितृसत्ता पूँजीवाद के अन्तर्गत स्त्री-श्रमशक्ति को संपत्ति मानना इत्यादि मुद्दे उठाकर निजी संपत्ति तथा विरासत को गड्डमड्ड कर दिया।"11

             एंगिल्स के विचार का खण्डन करती हुई सीमोन द बोउवार कहती है- "एंगेल्स ने औरत को कमज़ोरी की केवल ताम्र और लौह औज़ारों के विनियोजन के संबंध से उपजी माना। उन्होंने श्रम की क्षमता से अलग प्राकृतिक रूप से ही माँ बनने को विवश औरत की एक मौलिक और ठोस असुविधा की समस्या का महत्त्व नहीं समझा। पुरुष ने सिर्फ़ अपने श्रम को समझकर अतिक्रमण की अपनी क्षमता के द्वारा नये औज़ारों के माध्यम से नई-नई परियोजनाएँ खड़ी की हैं। तांबा और कासा जैसी धातुओं की खोज के बाद वह केवल घर के बगीचे तक सीमित नहीं रह गया। उसने बड़े खेतों का निर्माण करना शुरू किया। कार्य क्षेत्र का विस्तार और समृद्धि की नई परियोजनाओं में औरत को एक नगण्य उपकरण मात्र समझे जाने के कारण उसकी स्थिति दासी की होती गयी। पुरुष की सिर्फ़ इन परियोजनाओं के आधार पर औरत के दमन को व्याख्यायित करना अपर्याप्त होगा, क्योंकि श्रम के विभाजन से दो सेक्सों में एक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध भी तो संभव हो सकता था, तब फिर स्त्री और पुरुष के बीच ऐसा क्यों नहीं घटित हुआ? मैं सोचती हूँ कि पौरुषीय चेतना की तानाशाही ने हमेशा वस्तुपरक ढंग से अपनी प्रभुता स्थापित की। मानवीय चेतना में मौलिक रूप से अन्यता की कोटि अन्तर्निहित है। मनुष्य की मौलिक चाह दूसरों पर शासन करने की रहती है, अतः तांबे के औज़ारों की खोज के कारण औरत का दमन नहीं हुआ, बल्कि उसके दमन का मौलिक कारण मानवीय चेतना की अंतर्वर्ती संरचना है।"12 एंगिल्स के विचारों में एक और मौलिक कमी रह गयी। उन्होंने स्त्री-पुरुष के बीच के विरोध को वर्ग-संघर्ष की संज्ञा देनी चाही। यह ठीक है कि काफ़ी हद तक स्त्री- पुरुष का संघर्ष वर्ग-संघर्ष का ही प्रतिरूप लगता है किन्तु इन दोनों संघर्षों को एक ही रूप में रखना ठीक नहीं होगा। पहली बात तो यह है कि वर्ग-भेद का कोई जैविक आधार नहीं है। गुलाम अपनी गुलामी में भी अपने स्वामी के विरोध में अपने प्रति सचेत रहता है और सर्वहारा भी हमेशा विद्रोह की चेष्टा करता रहता है, वह हमेशा अपने शोषक के सामने एक धमकी भरी चुनौती की तरह उपस्थित होता है। सामूहिक जीवन में स्त्री और पुरुष का स्वार्थ रह गया। इन्हीं दिनों काश्तकारी महिला संगठन के महिला कार्यकर्ताओं को वामपंथी कार्यकर्ताओं की हिंसा का सामना करना पड़ा।'13 प्रभा खेतान का विचार है कि स्त्री के संघर्ष को वर्ग संघर्ष मानने की जो मान्यता रही है वह भारतीय सन्दर्भ में असफल रहा है। उनके अनुसार "यह भी सच है कि वर्गीय संघर्ष के नाम पर स्त्री के मुद्दे की उपेक्षा ही की गयी। स्त्री भी जुलूस में शामिल हुई और ठगी गयी।' 14 समकालीन स्त्री आन्दोलन में राजनीतिक दलों के दखल देने से, उनकी खींचातानी से भारतीय समाज पर इन आन्दोलनों का वांछित प्रभाव नहीं पड़ा। स्त्री शाक्तीकरण की वर्तमान सरकारी नीतियों पर इन आन्दोलनों का प्रभाव जरूर है। लेकिन पुरुषवादी सामन्ती मूल्यों की पकड़ से भारतीय स्त्रियों को मुक्ति दिलाने के लिए अब भी ठोस आन्दोलन की ज़रूरत है। समकालीन दौर में घरेलू हिंसा, स्त्रियों का यौन- शोषण, दहेज के कारण आत्महत्या जैसे स्त्रियों के प्रति होनेवाले अत्याचारों की संख्या बढ़ती जा रही है। आज पुरुष के कुकर्म से मासूम बालिकाएँ भी बच नहीं पा रही हैं। 'प्रगतिशील माननेवाले राजनीतिक दलों के आन्दोलनों में भी पुरुषसत्ता के कारण स्त्रियों को उचित स्थान नहीं मिलता, ऐसा स्त्री आन्दोलनकारियों का मानना है। उर्वशी बूटालिया ने लिखा है वामपंथी राजनीति जहाँ कुछ सफल हो गयी है वहाँ भी पितृसत्ता मौजूद है... केरल में जन-विज्ञान का इतना बड़ा और इतना अच्छा आन्दोलन है, लेकिन उसमें स्त्रियाँ नहीं हैं। उससे जुड़े लोगों ने मुझे बताया कि यह हमारी बहुत बड़ी असफलता है कि हम अपने आन्दोलन में स्त्रियों को नहीं ला पाये।'15 अक्सर राजनीतिक दल वोट जुटाने के लिए ही स्त्री समूह का उपयोग करते हैं। आम औरत को उसकी सक्षमता के बावजूद आगे आने नहीं देते। केवल अभिजात वर्ग की महिलाएँ ही हर क्षेत्र में नेता बनी हुई है। वृन्दा करात मानती हैं- "मौजूदा समय में महिलाओं के विकास के समक्ष जो रुकावटें हैं उनमें उदारीकरण, नई आर्थिक नीतियों के दुष्प्रभाव और सांप्रदायिकता के अलावा जाति- व्यवस्था प्रमुख हैं। आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक उत्पीड़न और भेदभाव तो हैं ही, लेकिन दुख की बात यह है कि आज़ादी के साठ सालों में जातिव्यवस्था और अधिक मज़बूत हुई है। यह महिलाओं की मुक्ति की राह में सबसे बड़ी अड़चन है। इसका फैलाव हम और भी देख रहे हैं और औरतें इससे सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। दलित औरतों पर तो अत्याचार हो ही रहे हैं, उन पर इसकी सबसे ज्यादा मार पड़ रही है। जाति व्यवस्था हर औरत को उसकी जाति के प्रतीक में कैद करके रखती है। हमारे देश का पूँजीवादी ढाँचा इस जातिवादी व्यवस्था को अपना कर ही आगे बढ़ा है। दुर्भाग्य यह है कि हम महिला-आन्दोलन में इस ओर अधिक ध्यान देने में सफल नहीं रहे हैं"16 राजनीतिक पार्टियाँ जाति का उपयोग करती हैं। जाति-व्यवस्था को रूढ़ बनाने में राजनीतिक पार्टियों की भूमिका रही है। आज पिछड़ी और निम्न वर्ग की स्त्रियों में उनके अधिकारों के प्रति सजगता लाने और उन्हें आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बनाकर सामाजिक क्रान्ति लाने की ज़रूरत है। स्वावलम्बन के द्वारा इस उपेक्षित स्त्री वर्ग में आत्मविश्वास का विकास संभव है। आत्मविश्वास के सहारे ही उन्हें बेहतर मनुष्य बना सकते हैं।

            स्त्री की इस लड़ाई में भारतीय महिला लेखन की अहं भूमिका रही है। समकालीनता के सन्दर्भ में भारतीय महिलाओं की जो सांस्कृतिक दृष्टि है वह एक साथ परम्परागत एवं नवीन मूल्यों के समन्वय से विकसित होती है। इसे नारी- विमर्श का भारतीय प्रतिरूप (Indian Model) कह सकते हैं। भारतीय नारीवाद की जो अवधारणा है उसे संपूर्ण भारतीय साहित्य में हम देख सकते हैं। समकालीन महिला उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों में मानवीय अधिकार और अस्मिता से जुड़े सवालों को उठाया है। स्त्री की समस्याओं को प्रामाणिक रूप से नज़दीकी और अंतरंगता से स्त्री ही अभिव्यक्त कर सकती है। हिन्दी में मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा, चित्रा मुद्गल, मृदुला गर्ग, चन्द्रकान्ता, ममता कालिया, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, मृणाल पांडे, राजी सेठ, सूर्यबाला, मेहरुन्निसा परवेज़, अलका सरावगी, गीतांजली श्री, नमिता सिंह, नासिरा शर्मा जैसी लेखिकाओं ने महिला लेखन के मोर्चे को संभाला है। वैसे ही मलयालम साहित्य की सरस्वती अम्मा, ललिताम्बिका अन्तर्जनम, राजलक्ष्मी, माधविकुट्टी, सारा जोसफ़, पी. वत्सला, ग्रेसी, के.बी. श्रीदेवी, चन्द्रमती, के. पी. सुधीरा जैसी लेखिकाओं ने स्त्री के संघर्ष को वाणी दी है। 'मित्रो मरजानी' की मित्रो, 'चाक' की सारंग, के. सरस्वती अम्मा के 'प्रेमभाजनम्' की नायिका बूनी पुरुषवर्चस्व को चुनौती देनेवाली पात्र हैं। ये उपन्यासकार स्त्री-चेतना का रेखांकन पारिवारिक ढाँचे के अन्दर करती हैं। ये नारी पात्र उस ढाँचे की सारी विसंगतियों को पहचानती हैं और उन विसंगतियों की सीमाओं को लाँघकर बाहर निकलती हैं। ये स्त्री पात्र परम्परा से हटकर खड़ी हो जाती हैं। पति की अहंवादिता की शिकार 'छिन्नमस्ता' की प्रिया अपनी अम्मा या भाभी की तरह दुखड़ा रोना नहीं चाहती। बेहतरीन तरीके से जीने का दृढ़ संकल्प करती है और अपनी ज़िन्दगी की बेबसी से ऊपर उठने की शक्ति अर्जित करती है। चन्द्रकान्ता का उपन्यास 'अर्थान्तर' तथाकथित संस्कारशील परिवार की दोहरी नीतियाँ, दाम्पत्य जीवन का खोखलापन और अस्तित्व हीनता की यंत्रणा सहती स्त्री के अन्तर्द्वद्व का यथार्थ प्रस्तुत करता है। ललिताम्बिका का उपन्यास 'अग्निसाक्षी' में भी देवकी मानम्पिल्ली अपने ससुराल में दोहरी नीतियों की शिकार बनी। देवकी मानम्पिल्ली नंपूतिरी इल्लम के अंदरूनी बंधनों से अपने को मुक्त करती है और समाज सेवा और स्वतन्त्रता आन्दोलन में अपने को लगा देती है। इस तरह उनके पूरे व्यक्तित्व का रूपान्तरण होता है। पुरुष प्रधान समाज की बुनियाद को वह हिला देती है। पुरुषों की अधीनता को अस्वीकार करती हुई, पुरुष सत्ता के तमाम बन्धनों से मुक्त होने की ऊर्जा देवकी मानम्पिल्ली अपने ससुराल के मनुवादी दकियानूसी परम्परावादी परिवेश से संघर्ष करती हुई अर्जित करती है। स्त्री मुक्ति का मुद्दा स्त्री को गुलामी की ज़ंजीरों से मुक्त कर स्वायत्तता प्रदान करने के महान अभियान से जुड़ा हुआ है। मन्नू भण्डारी का 'महाभोज', चित्रा मुद्गल का 'आवां', कमल कुमार का 'यह खबर नहीं', माधविकुट्टी की 'मानसी' जैसे उपन्यास महिला लेखन की राजनीतिक सजगता को उजागर करते हैं। ट्रेडयूनियन और पार्टी संगठनों के ढकोसलों का भण्डाफोड़ इन उपन्यासकारों ने किया है। स्त्री को उपभोग के पदार्थ के रूप में देखने की प्रवृत्ति पर 'कठगुलाब' की स्मिता, 'आवां' की नमिता और 'मानसी' की मानसी सवाल खड़ा करती है। महिला उपन्यासकारों ने स्त्री मन, मातृहृदय और स्त्री नियति को गहराई से परखा है। कृष्णा सोबती की 'ऐ लड़की' की माँ, 'चाक' की दादी, और सांरा जोसफ़ की 'आलाहा की बेटियाँ' की दादी अपने-अपने ढंग से मातृत्व की गरिमा को रेखांकित करती हैं। आवां की नमिता और निर्मला आम स्त्री और खास स्त्री की भूमिका अदा करती हैं। मैत्रेयी पुष्पा की 'अल्मा कबूतरी' की कदमाबाई और अल्मा समाज के हाशिये पर धकेली गयी स्त्री पात्र हैं। समाज के 'सूरजभानों' से बचने की राह खोजनेवाली अल्मा और पी. वत्सला के 'धान' उपन्यास की कुरूमाट्टी और मारा ऐसी आदिवासी औरतें हैं जो अपने समाजों में पुरुष वर्चस्व से लड़ रही हैं। 'धान' की मारा को प्रेमी मल्लन से शादी करने से मुखिया या मूप्पन रोकता है। अक्सर परिवार में हर मामले में लड़कियों की तुलना में लड़कों को तरजीह दी जाती है। मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास 'इदन्नमम्' की मन्दाकिनी की माँ गाँव के रतन यादव के साथ भाग जाती है। वह बेटी मन्दाकिनी को अपने पास रखना चाहती है, जिसके लिए उसने पुलिस का सहारा लिया है। मन्दाकिनी की दादी उसे छोड़ती नहीं। सारा जोसफ़ का उपन्यास 'माट्टात्ती' की लूसी की माँ ने उसे छोड़ दिया था। जब अविवाहिता चाची ने उसे पालने की जिम्मेदारी ली तो उसे काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ा। लड़की होने की बंदिशों के बीच में लूसी परेशान है। समाज में ऐसे कायदे कानून कायम हैं जो पुरुष और स्त्री के लिए विशेष भूमिका निर्धारित कर देते हैं। इसलिए सीमोन द बोउवार ने कहा कि औरत पैदा नहीं होती, बना दी जाती है। मैत्रेयी पुप्पा के 'विज़न' की अनु, गीतांजली श्री के 'तिरोहित' की नायिका अकेली अपनी ज़िन्दगी, स्वावलंबन की ज़िन्दगी अपनी इच्छा के मुताबिक जीने का निर्णय लेती है। जब औरत खुद अपना जीवन जीने का रास्ता चुन लेती है तो उसे जीने नहीं देते। उस पर पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ भी आँखें तरेरने लगती हैं। महिला उपन्यासकार भूमंडलीकरण के खतरों के प्रति सावधान हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति में मनुष्य की मानवीयता कहीं खो जाती है। भौतिक सुख की चकाचौंध में राह खो जाती है। चन्द्रकान्ता का 'बाकी सब खैरियत है', ममता कालिया का 'दौड़', कमल कुमार का 'यह खबर नहीं' जैसे उपन्यास उदाहरण हैं।

            भारतीय स्त्री विमर्श का फलक बहुत की व्यापक है। वह अपने आप में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक विमर्श बन गया है। इसमें एक ओर मनुवादी पुरुष वर्चस्व का विरोध है तो दूसरी ओर भारतीय सांस्कृतिक परम्परा से उन विशिष्ट तत्वों का स्वीकार भी है जो मानवता के नव विकास के लिए उपयुक्त है। आज भारतीय नारी अपने अधिकारों एवं स्वायत्तता को पाने के लिए और सब तरह के शोषण से मुक्त होने के लिए संघर्षरत है।

सन्दर्भ- ग्रंथ सूची :

1. बसवमार्ग, एक दशक (संपा.) टी. जी. प्रभाशंकर प्रेमी, बसवा समिति बेंगलूर, प्रथम सं.-2005, पृ.80

2. स्वामी विवेकानन्द, भारतीय नारी, 19 वाँ सं., रामकृष्ण मठ, नागपुर, 2003, पृ.22

3. सामाजिक क्रान्ति के दस्तावेज, पृ. 1299

4. सरस्वती अम्मा रचनावली, डी.सी. बुक्स 2001, पृ.21

5. मेरे सपनों का भारत, 1995, पृ.238

6. यंग इण्डिया, 15-12-1929

7. महादेवी वर्मा, श्रृंखला की कड़ियाँ, तृतीय सं. 2001, लोक भारती, पृ.79

8. वही, पृ.67

9. Sushila Singh, Feminism, Theory, Criticism, Analysis, N.Delhi-1997, P.30

10. Frederich Engels, The origin of the Family, Private Property and the State, New York, International Publisher-1984, P.65-66

11. राधाकुमार, स्त्री संघर्ष का इतिहास, पृ.244

12. सीमोन द बोउवार, स्त्री उपेक्षिता, हिन्द पॉकेट बुक्स, 2004, पृ.46-47

13. प्रभा खेतान, भूमंडलीकरण के दबाव में नारीवाद, परिषद पत्रिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003 से मार्च 2004, पृ. 16

14. प्रभा खेतान, स्त्री विमर्श के अन्तर्विरोध, स्त्री अस्मिता, साहित्य और विचार धारा, सं. जगदीश चतुर्वेदी, सुधा सिंह, आनन्द प्रकाशन, कोलकाता 2004, पृ.360

15. उर्वशी बूटालिया, आज का स्त्री आन्दोलन, सं संज्ञा उपाध्याय, रमेश उपाध्याय, शब्द संधान, नयी दिल्ली - 63, 2004, पृ.43

16. वृन्दा करात, आउटलुक, 20, अगस्त 2007, पृ.35

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Milan Tomic

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