कहानी
कंपनी ने जब किसी की एक न सुनी तो सारे मजदूर सड़क पर उतर आये। जीतन अपने दोनों बैसाखियों को काँख में दबाए हुए सबसे आगे चल रहा था। बाँकी लोग उनके पीछे नारे लगाते हुए चल रहे थे। उनमें से कई जीतन के तरह ही अपने हाथ या पैर गंवा चुके थे! कई ऐसे थे, जिनके परिजन मारे गए, पर किसी को कंपनी की ओर से उचित मुआवजा नहीं मिला। मजदूरों ने कंपनी के मालिक के सामने गुहार लगाई, भूख हड़ताल किया। पर सब नाकाम! इसीलिए आज ये सभी कंपनी के खिलाफ विद्रोह पर उतर आए थे।
"भाईयों! अब बहुत हो चुका, सबकुछ की एक हद होती है। आज हमलोग अपना अधिकार लेकर ही दम लेंगे।" जीतन पीछे मुड़ कर बोला। सभी ने हामी भरी। जीतन का मिजाज और बुलंद हो गया- "साला कंपनी वाला हमें क्या समझता है - कीड़ा- मकोड़ा.......आज दिखा ही देंगे कि हम क्या हैं?"
इतना सुनते ही हीरा लपक कर आगे हो आया- "भैया कंपनी ने हमें बरबाद कर दिया! घर उजड़ गया! खेती- पथारी चौपट हो गया! बाप- दादे की विरासत हाथ से निकल गयी!"
इस पर रोगहा से नहीं रहा गया। वह बोला- "हाँ रे हीरबा! कंपनी को जमीन देने में तो तेरा ही घर अगुवाया था। अब क्यों छाती फटती है?"
बात आगे बढ़ती उससे पहले जीतन ने उसे डपट लिया- "एगो हीरबा का घर थोड़े ही आगे था कंपनी को जमीन देने में। हम सभी सोचते थे कि कंपनी आएगी तो गाँव में खुशहाली होगी।" जीतन की बात सुनकर सब चुप।
पाँच साल पहले की उन बातों को कोई कैसे भूल सकता है,जब इस विध्वंस की भूमिका तैयार हुुुई ! उस दिन गाँव की कच्ची सड़क पर चमचमाती हुई कारें दौड़ने लगी थीं। लोग आपस में काना-फूसी करने लगे। पता चला कि सरकारी आदमी आए हैं, रतनपुर का उद्धार करने। सरकार ने रतनपुर की बदहाली दूर करने के लिए यहाँ स्टील प्लांट लगाने की योजना बनाई है। जमीन की तलाश हो रही है। वह दिन गाँव के युवकों के लिए किसी होली- दीवाली से कम न था। कंपनी आएगी तो खेती- पथारी के झंझट से मुक्ति मिलेगी। सबको गाँव में ही रोजगार मिलेगा। दिल्ली, पंजाब से छुट्टी। नयी सड़कें बनेंगी.....स्कूल.....काॅलेज.....शापिंग माॅल......फिर तो रतनपुर रतनपुर हो जाएगा!
लेकिन जहाँ नव -युवकों के मन में कंपनी के आने से लड्डू फूट रहे थे, वहीं बड़े- बुजुर्गों तथा छोटे- बड़े किसानों के घर मातम छाया हुआ था! वे कंपनी को हरगिज़ अपनी जमीन देना नहीं चाह रहे थे। कंपनी की लाख दलीलें भी उन्हें नहीं लुभा रही थी। जमीन ही तो उनके रोजी- रोजगार का एकमात्र साधन है। जमीन चली गयी तो वे क्या करेंगे! कहाँ जाएंगे! किसान इसी चिंता में गले जा रहे थे। आखिरकार वे भूख हड़ताल पर बैठ गए, लेकिन कोई लाभ नहीं! किसानों से उनकी जमीन लाठी हाथ ले ली गयी। बड़े किसान तो फिर भी ठीक थे, पर छोटे जोतदारों का सर्वस्व लुट गया! वे सड़क छाप हो गये!
जीतन के पिता निरधन भी ऐसे ही छोटे किसान थे, जिनके पास बस चार कट्ठे की एक कोली (जमीन का छोटा टुकड़ा) बच गयी। डेढ़ बीघा जमीन पर कंपनी ने कब्जा जमा लिया। बदले में जीतन और उसके छोटे भाई शीतल को नौकरी मिल गयी।
जीतन गदगद था! घर की माली हालत सुधर गई, पर न जाने क्यों निरधन दिनों-दिन गलता जा रहा था। अब वह निठल्ले की भाँति इधर से उधर , इस दरबाजे से उस दरबाजे भटकता रहता था। बेटे को यह सब अच्छा न लगा। उसने सड़क किनारे एक कटघरे में पान, बीड़ी, सिगरेट की दुकान खोल कर निरधन को बैठा दिया। 'किस खेत में क्या बोना है? किस खेत में हल जाने की ताक है? कौन- सा खेत रोपनी के लिए तैयार है? किस खेेत में हाल नहीं हैै?' का हिसाब करने वाला निरधन अब बीड़ी और सिगरेट का हिसाब जोड़ने लगा।
देखते ही देखते पूरे गाँव की सूरत बदल गयी। रतनपुर रतनपुर न रहा!
सड़कें....बिजली......स्कूल....थाना........शापिंग मॉल....बस अड्डा ......क्या नहीं है यहाँ?
लेकिन किसे पता था कि विकास अपने साथ ही विनाश का बीज लिये आएगा! कंपनी की भट्ठी में विस्फोट होगा....सब कुछ जलकर खाक हो जाएगा! मजदूर जलकर मरेंगे......... अधजले को भट्ठी में झोंक दिया जाएगा.......जो बचेगा वह भी अपंग होकर?
कई मजदूरों के साथ शीतल भी जलकर खाक हो गया! जीतन को एक पाँव गंवानी पड़ी! महीनों अस्पताल में बीता। जहाँ उनके अनेक साथी थे। किसी के पैर नहीं थे तो किसी के हाथ!
कंपनी ने सबके ईलाज का पूरा खर्च उठाया। लगा कि फिर से नयी जिंदगी की शुरुआत की जा सकती है, पर यह सब भ्रम था। कंपनी ने अस्पताल से छूटते समय और लोगों को दो चीजें दीं - एक लोहे की बैसाखी और दूसरा एक बंद लिफाफा। उन्हें लगा था कि इसमें मुआवजे की राशि होगी! पर था
उसमें बर्खास्तगी का फरमान! कंपनी ने ईलाज के नाम पर मुआवजे की राशि काट ली थी।
मजदूरों को लगा कि कंपनी ने उन्हें बैसाखी के साथ ही भीख का कटोरा थमा कर बाहर निकाल दिया। घोर अन्याय! भीषण आक्रोश!! आंदोलन!!!
" स्टील प्लांट बंद करो! बंद करो!!
"हमारी जमीन वापस दो! वापस दो!!"
मजदूर सड़क पर उतर आये और नारे लगाते हुए कंपनी के मुख्य द्वार पर पहुंच गए। भीतर का तूफान और भी तेज हो गया। नारे की ध्वनि और भी तेज हो गयी। लेेेकिन सुनने वाला कोई न था। वे हारकर दरबाजे तोड़ने लगेे, तब मैनेजर साहब अपने अंगरक्षकों के साथ सामने आए और सफाई देने लगे- "विस्फोट के कारण कंपनी को करोड़ों का घाटा हुआ है! दोगे तुम लोग? तुम लोगों के ईलाज में लाखों रुपये खर्च हुए हैं। हिसाब दोगेे? यहाँ कंपनी की हालत पस्त है और तुम्हें अपनी जमीन की पड़ी है।"
"लेकिन हमें नौकरी से क्यों निकाल दिया गया?" जीतन गुुुुस्से से लाल होकर कहा। "और अगर निकालना ही है तो हमें उचित मुआवजा दो ....पेंशन दो।"
"अरे यार बात को समझो न, हम विकलांगों को नहीं रख सकते। यह कंपनी है कोई अतीमखाना नहीं है। तुम लोग अब कंपनी के लिए किसी काम केे नहीं हो। मुुुुआवजा भी नहीं मिल सकता, ईलाज में काफी खर्च हुए हैं।" मैनेजर ने दो टूक शब्दों में जवाब दिया।
"साला हमें भिखारी बना दिया!" जीतन का गुस्सा बेकाबू हो गया। उसने पूरी ताकत से दोनोंं बैसाखी उठाकर मैनेजर के सिर पर देे मारा।
मैनेजर वहीं ढेर! सिर दो टूक हो गया , जहाँ से खून की धारा बह निकली! इतने में दोनों पक्ष भिड़ गये। एक तरफ पुुुुलिस तो दूसरी ओर मजदूर। उस समय जीतन में गजब की फूूूर्ति आ गयी थी। उसने अपनी बैसाखियों से कई सिपाहियों के सिर फोड़ दिये।
अंततः मजदूरों पर मुुुुकदमा चला। अधिकांश को लूटपाट के जुर्म में सात साल की
सजा सुनाई गई। जीतन पर मैनेजर की हत्या का आरोप सिद्ध हो गया। अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई, वह भी सश्रम।संयोग से जेेेल जिस जमीन में बनाई गई थी, वह जीतन का ही था। जीतन अब अपने ही खेेेेत में कैदी के रूप में काम करने लगा-अवैैैैतनिक! उसके सारे सपने रेत से बने महल की भाँति भड़भड़़ा गया! उसने तो कंपनी के आने सेे अपने गाँव मेंं स्कूूूल, कालेज, अस्पताल और शांपिग माॅल का सपना देखा था। जेेेल के बारे में तो उसने कभी सोचा भी नहीं था!
उमेश कुमार शर्मा
युुवा रचनाकार
कंपनी ने जब किसी की एक न सुनी तो सारे मजदूर सड़क पर उतर आये। जीतन अपने दोनों बैसाखियों को काँख में दबाए हुए सबसे आगे चल रहा था। बाँकी लोग उनके पीछे नारे लगाते हुए चल रहे थे। उनमें से कई जीतन के तरह ही अपने हाथ या पैर गंवा चुके थे! कई ऐसे थे, जिनके परिजन मारे गए, पर किसी को कंपनी की ओर से उचित मुआवजा नहीं मिला। मजदूरों ने कंपनी के मालिक के सामने गुहार लगाई, भूख हड़ताल किया। पर सब नाकाम! इसीलिए आज ये सभी कंपनी के खिलाफ विद्रोह पर उतर आए थे।
"भाईयों! अब बहुत हो चुका, सबकुछ की एक हद होती है। आज हमलोग अपना अधिकार लेकर ही दम लेंगे।" जीतन पीछे मुड़ कर बोला। सभी ने हामी भरी। जीतन का मिजाज और बुलंद हो गया- "साला कंपनी वाला हमें क्या समझता है - कीड़ा- मकोड़ा.......आज दिखा ही देंगे कि हम क्या हैं?"
इतना सुनते ही हीरा लपक कर आगे हो आया- "भैया कंपनी ने हमें बरबाद कर दिया! घर उजड़ गया! खेती- पथारी चौपट हो गया! बाप- दादे की विरासत हाथ से निकल गयी!"
इस पर रोगहा से नहीं रहा गया। वह बोला- "हाँ रे हीरबा! कंपनी को जमीन देने में तो तेरा ही घर अगुवाया था। अब क्यों छाती फटती है?"
बात आगे बढ़ती उससे पहले जीतन ने उसे डपट लिया- "एगो हीरबा का घर थोड़े ही आगे था कंपनी को जमीन देने में। हम सभी सोचते थे कि कंपनी आएगी तो गाँव में खुशहाली होगी।" जीतन की बात सुनकर सब चुप।
पाँच साल पहले की उन बातों को कोई कैसे भूल सकता है,जब इस विध्वंस की भूमिका तैयार हुुुई ! उस दिन गाँव की कच्ची सड़क पर चमचमाती हुई कारें दौड़ने लगी थीं। लोग आपस में काना-फूसी करने लगे। पता चला कि सरकारी आदमी आए हैं, रतनपुर का उद्धार करने। सरकार ने रतनपुर की बदहाली दूर करने के लिए यहाँ स्टील प्लांट लगाने की योजना बनाई है। जमीन की तलाश हो रही है। वह दिन गाँव के युवकों के लिए किसी होली- दीवाली से कम न था। कंपनी आएगी तो खेती- पथारी के झंझट से मुक्ति मिलेगी। सबको गाँव में ही रोजगार मिलेगा। दिल्ली, पंजाब से छुट्टी। नयी सड़कें बनेंगी.....स्कूल.....काॅलेज.....शापिंग माॅल......फिर तो रतनपुर रतनपुर हो जाएगा!
लेकिन जहाँ नव -युवकों के मन में कंपनी के आने से लड्डू फूट रहे थे, वहीं बड़े- बुजुर्गों तथा छोटे- बड़े किसानों के घर मातम छाया हुआ था! वे कंपनी को हरगिज़ अपनी जमीन देना नहीं चाह रहे थे। कंपनी की लाख दलीलें भी उन्हें नहीं लुभा रही थी। जमीन ही तो उनके रोजी- रोजगार का एकमात्र साधन है। जमीन चली गयी तो वे क्या करेंगे! कहाँ जाएंगे! किसान इसी चिंता में गले जा रहे थे। आखिरकार वे भूख हड़ताल पर बैठ गए, लेकिन कोई लाभ नहीं! किसानों से उनकी जमीन लाठी हाथ ले ली गयी। बड़े किसान तो फिर भी ठीक थे, पर छोटे जोतदारों का सर्वस्व लुट गया! वे सड़क छाप हो गये!
जीतन के पिता निरधन भी ऐसे ही छोटे किसान थे, जिनके पास बस चार कट्ठे की एक कोली (जमीन का छोटा टुकड़ा) बच गयी। डेढ़ बीघा जमीन पर कंपनी ने कब्जा जमा लिया। बदले में जीतन और उसके छोटे भाई शीतल को नौकरी मिल गयी।
जीतन गदगद था! घर की माली हालत सुधर गई, पर न जाने क्यों निरधन दिनों-दिन गलता जा रहा था। अब वह निठल्ले की भाँति इधर से उधर , इस दरबाजे से उस दरबाजे भटकता रहता था। बेटे को यह सब अच्छा न लगा। उसने सड़क किनारे एक कटघरे में पान, बीड़ी, सिगरेट की दुकान खोल कर निरधन को बैठा दिया। 'किस खेत में क्या बोना है? किस खेत में हल जाने की ताक है? कौन- सा खेत रोपनी के लिए तैयार है? किस खेेत में हाल नहीं हैै?' का हिसाब करने वाला निरधन अब बीड़ी और सिगरेट का हिसाब जोड़ने लगा।
देखते ही देखते पूरे गाँव की सूरत बदल गयी। रतनपुर रतनपुर न रहा!
सड़कें....बिजली......स्कूल....थाना........शापिंग मॉल....बस अड्डा ......क्या नहीं है यहाँ?
लेकिन किसे पता था कि विकास अपने साथ ही विनाश का बीज लिये आएगा! कंपनी की भट्ठी में विस्फोट होगा....सब कुछ जलकर खाक हो जाएगा! मजदूर जलकर मरेंगे......... अधजले को भट्ठी में झोंक दिया जाएगा.......जो बचेगा वह भी अपंग होकर?
कई मजदूरों के साथ शीतल भी जलकर खाक हो गया! जीतन को एक पाँव गंवानी पड़ी! महीनों अस्पताल में बीता। जहाँ उनके अनेक साथी थे। किसी के पैर नहीं थे तो किसी के हाथ!
कंपनी ने सबके ईलाज का पूरा खर्च उठाया। लगा कि फिर से नयी जिंदगी की शुरुआत की जा सकती है, पर यह सब भ्रम था। कंपनी ने अस्पताल से छूटते समय और लोगों को दो चीजें दीं - एक लोहे की बैसाखी और दूसरा एक बंद लिफाफा। उन्हें लगा था कि इसमें मुआवजे की राशि होगी! पर था
उसमें बर्खास्तगी का फरमान! कंपनी ने ईलाज के नाम पर मुआवजे की राशि काट ली थी।
मजदूरों को लगा कि कंपनी ने उन्हें बैसाखी के साथ ही भीख का कटोरा थमा कर बाहर निकाल दिया। घोर अन्याय! भीषण आक्रोश!! आंदोलन!!!
" स्टील प्लांट बंद करो! बंद करो!!
"हमारी जमीन वापस दो! वापस दो!!"
मजदूर सड़क पर उतर आये और नारे लगाते हुए कंपनी के मुख्य द्वार पर पहुंच गए। भीतर का तूफान और भी तेज हो गया। नारे की ध्वनि और भी तेज हो गयी। लेेेकिन सुनने वाला कोई न था। वे हारकर दरबाजे तोड़ने लगेे, तब मैनेजर साहब अपने अंगरक्षकों के साथ सामने आए और सफाई देने लगे- "विस्फोट के कारण कंपनी को करोड़ों का घाटा हुआ है! दोगे तुम लोग? तुम लोगों के ईलाज में लाखों रुपये खर्च हुए हैं। हिसाब दोगेे? यहाँ कंपनी की हालत पस्त है और तुम्हें अपनी जमीन की पड़ी है।"
"लेकिन हमें नौकरी से क्यों निकाल दिया गया?" जीतन गुुुुस्से से लाल होकर कहा। "और अगर निकालना ही है तो हमें उचित मुआवजा दो ....पेंशन दो।"
"अरे यार बात को समझो न, हम विकलांगों को नहीं रख सकते। यह कंपनी है कोई अतीमखाना नहीं है। तुम लोग अब कंपनी के लिए किसी काम केे नहीं हो। मुुुुआवजा भी नहीं मिल सकता, ईलाज में काफी खर्च हुए हैं।" मैनेजर ने दो टूक शब्दों में जवाब दिया।
"साला हमें भिखारी बना दिया!" जीतन का गुस्सा बेकाबू हो गया। उसने पूरी ताकत से दोनोंं बैसाखी उठाकर मैनेजर के सिर पर देे मारा।
मैनेजर वहीं ढेर! सिर दो टूक हो गया , जहाँ से खून की धारा बह निकली! इतने में दोनों पक्ष भिड़ गये। एक तरफ पुुुुलिस तो दूसरी ओर मजदूर। उस समय जीतन में गजब की फूूूर्ति आ गयी थी। उसने अपनी बैसाखियों से कई सिपाहियों के सिर फोड़ दिये।
अंततः मजदूरों पर मुुुुकदमा चला। अधिकांश को लूटपाट के जुर्म में सात साल की
सजा सुनाई गई। जीतन पर मैनेजर की हत्या का आरोप सिद्ध हो गया। अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई, वह भी सश्रम।संयोग से जेेेल जिस जमीन में बनाई गई थी, वह जीतन का ही था। जीतन अब अपने ही खेेेेत में कैदी के रूप में काम करने लगा-अवैैैैतनिक! उसके सारे सपने रेत से बने महल की भाँति भड़भड़़ा गया! उसने तो कंपनी के आने सेे अपने गाँव मेंं स्कूूूल, कालेज, अस्पताल और शांपिग माॅल का सपना देखा था। जेेेल के बारे में तो उसने कभी सोचा भी नहीं था!
उमेश कुमार शर्मा
युुवा रचनाकार
Bahut sundar bhaijee
ReplyDeleteसुंदर लेखन
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