महाभारत :
महाभारत भारतवर्ष का महाकाव्य तो है ही वह हमारी जाति का इतिहास-ग्रन्थ भी है। इसमें न केवल राजवंशों की शृंखला एवं तत्सम्बन्धी घटनाओं या राजनीति का ही विवेचन है, अपितु धर्म, अध्यात्म, दर्शन एवं जीवन से सम्बद्ध प्रत्येक समस्या एवं उसका समुचित समाधान इस विशाल-काय ग्रन्थ में मिलता है । भारतीय परम्परा के अनुसार 'महाभारत' के रवयिता वेदव्यास माने जाते हैं। इनका पूरा नाम है- कृष्णई पायन वेदव्यास । शरीर का वर्ण 'कृष्ण' (काला) होने के कारण इन्हें कृष्ण कहा गया है। यमुना नदी के एक द्वीप में इनका जन्म हुआ था अतः इनका द्वैपायन नाम हुआ और वेद के अभिप्राय का इन्होंने विस्तार (व्यास) किया अर्थात् 'महाभारत' में सरल भाषा के माध्यम से वेद के सूक्ष्मतत्त्वों का विस्तृत वर्णन किया है अतः वेदव्यास कहलाये । इनकी माता 'सत्यवती' थीं। 'दासराज' नामक मल्लाह ने वस्तुतः 'महाभारत' की बिखरी हुई सामग्री को व्यवस्थित करके 'महा-भारत' के प्रथम आकार को जन्म देने का यह प्रथम प्रयास था। इस ग्रन्य का रस 'वीर' है। इस जय को महाभारत में 'इतिहास' कहा गया है-'जयनामेतिहासोऽयम्' । महाभारत के विकास का दूसरा सोपान 'भारत' नाम से प्रसिद्ध है। जय के संग्रह अथवा रचना के पश्चात् जो भी महत्त्वपूर्ण नवीन सामग्री एकत्र हुई होगी, वह जय में जोड़ दी गई होगी। इस प्रकार परिवर्तित संस्करण को 'भारत' कहा गया होगा। इसी 'भारत’ को वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनाया था। इसमे उपाख्यानों को सम्मिलित नहीं किया गया था और इसका कलेवर 24 हजार इलोक था।
महाभारत । जैसा इसका नाम है यह 'भारत' से बड़ा (महा-महान) था। अर्थात् भारत को ही परिवर्धित करके ‘'महाभारत' का रूप दिया गया। इससे रचयिता मुनि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास थे, जिन्होंने तीन वर्ष के अविरत परिश्रम से इसकी रचना की'। इसमें एक लाख श्लोक थे। इसी महाभारत को सौति ने शौनक आदि ऋषियों को सुनाया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि महाभारत को तीन वक्ताओं ने तीन श्रोताओं को तीन बार क्रमशः 'जय', 'भारत' एव 'महाभारत' नाम से सुनाया था । महाभारत के उक्त तीनों रूप (जय, भारत, महाभारत) तीन संस्करण है, जिनमें काल-क्रम से एकत्र सामग्री का समावेश किया गया
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