हिन्दी गद्य के विकास में फोर्ट विलियम काॅलेज की भूमिका

 हिन्दी गद्य के विकास में फोर्ट विलियम काॅलेज की भूमिका


             फोर्ट विलियम काॅलेज की स्थापना लार्ड बेलेजली के समय (सन् 1800 ई०) में हुई। बेलेजली ने भारत आकर यह अनुभव किया कि कम्पनी के कर्मचारी केवल एक व्यापारिक संस्था के कर्मचारी नहीं, बल्कि अब एक सरकार के अधिकारी हैं। उनमें शिक्षा, जनभाषा- ज्ञान और सदाचरण की आवश्यकता है। अतः उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए जाॅन गिल क्राइस्ट की अध्यक्षता में उन्होंने 'ओरियंटल सैमिनरी की स्थापना की। बाद में यही संस्था फोर्ट विलियम काॅलेज के रूप में परिवर्तित हुई और गिलक्राइस्ट उसके हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। कालेज में गिलक्राइस्ट साहब ने हिन्दुस्तानी के नाम पर उर्दू को ही प्रोत्साहन दिया न कि लोक- प्रचलित खड़ी बोली हिन्दी को। वे हिन्दुस्तानी की तीन शैलियाँ मानते थे- 

         (1) दरबारी फारसी शैली (दी हाई कोर्ट आफ परशियन स्टाइल) 

        (2) मध्य या विशुद्ध हिन्दुस्ता.. शैली (वमिडिल आर जेतृयिन हिन्दुस्तानी स्टाइल) 

        (3) हिन्दवी या गमारू शैली (द बल्गर आर हिन्दवी) इनमें गिल क्राइस्ट ने मध्य या विशुद्ध हिन्दुस्तानी शैली को प्राथमिकता दी। इसमें उर्दू पारसी का बाहुल्य रहता था, पर उसका मूल ढाँचा हिन्दी पर ही आधारित था, जिसके कारण उनकी विशेष माँग पर 19 फरवरी सन् 1802 ई० में कालेज कौंसिल ने भाषा मुंशी के पद पर लल्लू जी लाल की नियुक्ति की। गिल क्राइस्ट ने हिन्दुस्तानी में पाठ्य पुस्तकों का अभाव देखकर प्रकाशन की एक योजना चलायी, जिसके अन्तर्गत सिंहासन बत्तीसी, बैताल पच्चीसी, शकुन्तला नाटक और माधवानल का उल्लेख मिलता है। फोर्ट विलियम कालेज का महत्त्व पुस्तकों के प्रकाशन तथा टाइप सम्बन्धी सुधारों के लिए अधिक है। 26 फरवरी सन् 1804 को गिलक्राइस्ट के त्याग पत्र देने से भाषायी दृष्टि से सुधार वर्षों तक नहीं हुआ बल्कि अधिकांश अंग्रेज अधिकारियों एवं विद्वानों द्वारा हिन्दी के महत्त्व को समझने के बावजूद भी वे उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखते रहे। टेलर रोयेबक, प्राइस आदि कालेज के परवर्ती अधिकारियों ने हिंदी शिक्षा के हास का संकेत भी किया है। टेलर के बाद प्राइस हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष हुए। वे अपने को हिन्दी प्रोफेसर कहते थे और हिन्दी और हिन्दुस्तानी में लिपि तथा शब्दों का मुख्य अन्तर मानते थे।


             'खड़ी बोली' शब्द फोर्ट विलियम कॉलेज (1800 ई.) की टकसाल से निकला है। सबसे पहले कॉलेज के भाखा-मुंशी लल्लूजी लाल और सदल मिश्र ने इसका प्रयोग किया। 'प्रेम सागर' में लल्लूजी लाल लिखते हैं- "संवत् 1860 में लल्लूजी लाल कवि ब्राह्मण गुजराती सहस्र अवदीच ने जिसका सार ले, यामिनी भाषा छोड़, दिल्ली-आगरे की 'खड़ी बोली' में कह, नाम प्रेमसागर धरा।" सदल मिश्र 'नासिकेतोपाख्यान' में कहते हैं- "अब संवत् 1860 में नासिकेतोपाख्यान को, जिसमें चन्द्रावली की कथा कही है, देववाणी से कोई समझ नहीं सकता, इसलिए खड़ी बोली में किया।" सन् 1804 में जान गिलक्रिस्त ने 'द हिन्दी-रोमन आर्थो एपिग्रैफिक' में 'खड़ी बोली' शब्द का प्रयोग किया है। हो सकता है-दिल्ली-आगरे की बोलचाल की भाषा को खड़ी बोली कहा जाता रहा हो ! लल्लूजी लाल और सदल मिश्र ने इसे वहीं से ले लिया हो।


             ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रशासनिक सुविधा के लिए सन् 1800 ई. में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। इसमें हिन्दी, मराठी, गुजराती, तमिल आदि देशीय भाषाओं में सामान्यतः पुस्तकें अनूदित होती थीं। हिन्दी या हिन्दुस्तानी के प्राध्यापक गिलक्रिस्त थे। उर्दू के लिए अलग मुंशी नियुक्त हुए और भाखा या हिन्दवी के लिए अलग। भाखा-मुशियों के रूप में लल्लूजी लाल और सदल मिश्र की नियुक्ति हुई।


             कॉलेज के इस प्रयास के सम्बन्ध में अंग्रेजों ने काफी गलतफहमी फैलायी। ग्रियर्सन ने 'दी मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिट्रेचर ऑफ हिन्दुस्तान' की भूमिका में लिखा है कि हिन्दी अंग्रेजों द्वारा आविष्कृत है। लल्लूजी लाल ने 'प्रेमसागर' में इसी का प्रयोग किया है। ग्रियर्सन खड़ी बोली को किसी की मातृभाषा नहीं स्वीकार करता। ग्रियर्सन का मानस भी तो उपनिवेशवादियों का ही मानस था। उसे इतना तो मालूम ही था कि भाषा का आविष्कार नहीं होता। कोई बोली ही विकसित होकर भाषा का रूप धारण करती है। यदि खड़ी बोली कोई भाषा न होती तो उसमें पुस्तकें लिखवाने का क्या तुक था ?


             फोर्ट विलियम कॉलेज के अधिकारियों की अपेक्षा श्री रामपुर के डैनिश मिशन के कैरे की दृष्टि अधिक पैनी और सूझबूझ अधिक गहरी थी। उसने अपनी बाइबिल के हिन्दी अनुवाद के चौथे संस्करण में लिखा है- "हम हिन्दुस्तान की उस बोली को हिन्दुई या हिन्दी समझते हैं जो मुख्यतः संस्कृत से बनी है और जो मुसलमानों के आने के पूर्व संपूर्ण हिन्दुस्तान में बोली जाती थी। यह अब भी बहुत व्यापक क्षेत्र में समझी जाती है।"


           लल्लूजी लाल के 'प्रेमसागर' की भाषा कथा-वार्ता के अनुरूप है। इसके शब्दरूप अनिश्चित, भाषा ब्रजी-रंजित, शैली पंडिताऊ है। सदल मिश्र के नासिकेतोपाख्यान पर ब्रजी और भोजपुरी का प्रभाव है। किन्तु सीधे संस्कृत से अनूदित होने के कारण हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप है।

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Milan Tomic

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