बुद्धचरित :
अश्वघोष का द्वितीय महाकाव्य 'बुद्धचरित' है। इसमें 28 सर्ग थे, किन्तु केवल 17 सर्ग ही प्राप्त होते हैं, जिसमें 14 वें सर्ग, के 31 वें श्लोक तक का भाग अश्वघोषकृत माना जाता है। इस ग्रन्थ के 1- 14 सगों में बुद्ध के जन्म से लेकर बुद्धत्वप्राप्त तक का वर्णन है। इसके बाद के सर्गों में बौद्धधर्म की प्रशंसा, बुद्ध का अपने शिष्यों एवं पिता से समागम आदि का वर्णन है। संक्षिप्त कथानक इस प्रकार है-
राजा शुद्धोदन की रानी 'माया' लुम्बिनी नामक वन में विहार करने गई थीं। वहीं पुत्र का जन्म हुआ। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि यह बालक युवावस्था में विरक्त हो जायेगा। इस बालक का नाम सिद्धार्थ रख दिया गया । सिद्धार्थ का विवाह अतीव रूपवती युवती यशोधरा से किया गया, जिससे 'राहुल' नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई। यद्यपि राजाज्ञा से ऐसे शतशः प्रयत्न होते रहे कि राजकुमार को भोगविलास के वातावरण में रखा जाये, किन्तु अपनी क्रमिक तीन विहारयात्राओं में राजकुमार ने क्रमशः वृद्ध पुरुष, रोगी एवं शव को देखा। सारथी से यह ज्ञात होने पर कि 'सभी वृद्ध हो जाते हैं', 'सभी रोगाक्रान्त है' 'सभी मरणधर्मा हैं' राजकुमार अपने विषय में भी यही सोचकर अर्थात् निर्णय करके विरक्त होने लगे । चतुर्थ विहारयात्रा में सन्यासी को देखकर उसके समान स्वयं जन्म-मरण के चक्र से भयभीत होकर पूर्ण विरक्त हो गये तथा पिता के द्वारा संन्यास की अनु-मति न मिलने पर एक रात को छंदक नामक सारथी को लेकर कन्यक नामक घोड़े पर चढकर गृहत्याग कर दिया। सारथी और घोड़े को वापस कर दिया । अनेक तपस्वियों के सहवास, उपदेश एवं प्रक्रिया से सिद्धार्थ सन्तुष्ट न हुए । अनेक प्रलोभनों को ठुकराया । तपश्चर्या में प्रवृत्त हुए किन्तु सफलता न मिली। उन्होंने निश्चय किया कि शरीर, इन्द्रिय को कष्ट देने से मोक्ष नहीं मिलता । अन्त में ध्यान द्वारा उन्हें सफलता प्राप्त हुई; वे सर्वज्ञ हो गये; उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हो गया ।
'बुद्धचरित' के अनेक स्थल बड़े ही मामिक हैं, यथा-अन्तःपुरविहार, वृद्ध, रुग्ण एवं शव के दर्शन के समुपजात वैराग्य; श्रमणोपदेश, गृहत्याग, तपस्वियों से वार्ता, अन्तःपुर विलास, मार-पर।जय आदि। शृङ्गार, करुण एवं 'शान्तरस का उपयुक्त समावेश बुद्धचरित में किया गया है। राजकुमार-सिद्धार्थ विहार के लिए बाहर निकलते हैं। आबालवृद्धवनिता उनके दर्शन के लिए वेगपूर्वक चल पड़ते हैं। एक-लजीली युवती राजकुमार के दर्शन करने और उनकी रूपर।शि का नेत्रों द्वारा पान करने के लिए कितनी अधिक उतावली है। वह शीघ्र दौड़कर राजकुमार के पास पहुंच सकती है, किन्तु लज्जा उसके चरणों के वेग को कम कर देती है और जिन आभूषणों को उसने एकान्त में पहने थे शर्म के मारे उन्हें छिपा रही है। इस ग्रंथ में उत्सुकता, लज्जा, संकोच आदि प्रेमोचित भावनाओं का सरल एवं आकर्षक वर्णन है।
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