रघुवंश महाकाव्य
'रघुवंश' समग्र संस्कृत साहित्य में सर्वोत्कृष्ट महाकाव्य है, इस बात को विद्वान् एक स्वर से स्वीकार करते हैं। इसकी उत्कृष्टता के कारण ही कालिदास को 'रघुकार' कहा जाने लगा। रघुवंश में कुल 19 सर्ग हैं, जिनमें राम एवं उनके वंशजों का सर्वगुण-समन्वित चरित्र का वर्णन किया गया है। रघुवंश महाकाव्य का नामकरण दशरथ के पितामह 'रघु' के नाम पर हुआ है। प्रथम 3 सर्गों में रघु के पिता दिलीप का वर्णन, चौथे सर्ग में रघु की दिग्विजय का वर्णन है। पाँचवें सर्ग में 'बरतन्तु' नामक गुरु का शिष्य 'कौत्स' रघु के समीप गुरु के लिये घन माँगने आता है। धन प्राप्ति से सन्तुष्ट कौत्स के आशीर्वाद से रघु को 'अज' नामक पुत्र की प्राप्ति होती है। छठे सर्ग में अज-इन्दुमती स्वयंवर का वर्णन । सातवें सर्ग में अज को राज्य समर्पित करके रघु संन्यास लेते हैं। आठवें में वर्णित है- रघु की मृत्यु, अज को दशरथ नामक पुत्र की प्राप्ति, नारद की कोणा से गिरे हुए पुष्प से इन्दुमती की मृत्यु एवं अज का मार्मिक हृदय को पिघला देने वाला - विलाप । 9-12 सर्गों में दशरथ एवं राम की को कथा । तेरहवें सर्ग में राम विमान द्वारा सीता के साथ अयोध्या लौटते हैं। चौदहवें में राम-राज्य का प्रारम्भ, सीता पर चरित्र सम्बन्धी लांछन, गभिणी सीता का परित्याग, वाल्मीकि द्वारा राम की भर्त्सना, अयोध्या में अश्वमेघ यज्ञ का शुभारम्भ । पन्द्रहवें में लवकुश का जन्म, शत्रुघ्न के द्वारा मथुराबासी लवणासुर का वध, लवकुश का परिचय, पृथ्वी देवी के साथ सीता का चला जाना, तथा राम-लक्ष्मण आदि का दिवङ्गत होना वर्णित है। 16 से 18 वें सर्गों में राम के वंशजों (कुश से लेकर अग्निमित्र) का वर्णन है। रघुवंश में कुल 28 राजाओं का वर्णन है।
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