नाटककार भवभूति :
महान् नाटककार महाकवि भवभूति ने तीन नाटक लिखे हैं-’महावीर-चरित’, ‘मालतीमाधव’ एवं ‘उत्तररामचरित’ । इन्होंने अपने नाटकों में अपना परिचय दिया है, जिससे ज्ञात होता है कि ब्राह्मण भवन्ति का निवासस्थान पद्मपुर (विदर्भ-आधुनिक बरार), गोत्र काश्यप, पिता नीलकण्ठ, माता जतुकर्णी और पितामह भट्टगोपाल थे। इनका असली नाम श्रीकण्ठ माना जाता है। विद्वानों का मत है कि प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिल भट्ट के शिष्य, जिनका नाम उम्वेक है वह भवभूति ही है।
महावीर चरित - रचनाक्रम में यह भवभूति का प्रथम नाटक है। इसमें 7 अंक हैं। इसमें प्रायः रामायण के पूर्वार्ध की कथा को उपनिवद्ध किया गया है। राम का विवाह, निर्वासन, सीता का हरण एवं राज्याभिषेक की कथा वर्णित है। रावण सीता की प्राप्ति के लिये प्रयास करता है, किन्तु विफल हो जाता है। राम धनुष को तोड़ते हैं और सीता का वरण कर लेते हैं। पराजित रावण परशुराम को राम के विरुद्ध उत्तेजित करता है और सूर्पणखा को मन्थरा के रूप में राम के अनिष्ट सम्पादन हेतु भेजता है। राम मिथला में है और मन्थरा राम के 14 वर्ष के वनवास की सूचना वहीं लाती है। अन्त में राम- रावण एवं मेघनाद का वध कर देता है।
'मालतीमाधव' एक प्रकरण है। प्रकरण की कथा कविकल्पना प्रसूत होती है। 10 अंक के इस प्रकरण में नायिका मालती एवं नायक माधव के प्रेम-विवाह का वर्णन है। मालती पद्मावती के राजा के मंत्री (भूरिवमु) की पुत्री है। भूरिवसु की विशेष इच्छा है कि वे अपनी पुत्री मालती का विवाह माधव के साथ कर दें जो उसके बाल्यकाल के मित्र देवरात का पुत्र है। मालती एवं माधव का मिलन एक शिवमन्दिर में होता है, जहाँ माधव का मित्र मकरन्द मालती की सखी मदन्तिका की रक्षा एक बाघ से करता है।
उत्तररामचरित-नाटक में 7 अंक हैं और राम के उत्तरचरित का वर्णन है। 'उत्तरचरित' का अर्थ है जीवन के उत्तरभाग में राम द्वारा अनुष्ठित क्रियायें । इसके अन्तर्गत रावणवध के पश्चात् होने वाले राज्या-भिषेक से लेकर सीतानिर्वासन तथा पुनः सीतासमागम तक की घटनायें हैं। राम के उत्तरचरित का जैसा चित्रण महाकवि ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।
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