जयशंकर प्रसाद की कहानी- कला

 जयशंकर प्रसाद की कहानी- कला

             प्रेमचन्द युग के एक प्रतिभाशाली कथाकार के रूप में श्री जयशंकर प्रसाद का नाम लिया जाता है। उनके पांच कहानी- संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनके नाम हैं- ‘छाया’, ‘प्रतिध्यनि’, ‘आकाशदीप’, ‘आंधी’ और ‘इन्द्रजाल’। कुल मिलाकर 69 कहानियाँ इन संकलनों में संकलित की गई हैं। उनकी कहानियों में अनुभूति की तीव्रता, काव्यात्मकता, प्रेम- चित्रण, प्रकृति- निरूपण तथा कल्पना की प्रचुरता विद्यमान हैं। उनकी कुछ कहानियों में ऐतिहासिक देशकाल एवं वातावरण की सफल प्रस्तुति की गई है। अतीत- गौरव, स्वप्निल भावुकता एवं कल्पना की ऊंची उड़ान उनकी कहानियों की विशेषता मानी जा सकती है। प्रेम, करुणा, त्याग, बलिदान इनकी कहानियों के विषय हैं। उन्होंने उच्चकोटि के नारी- चरित्र अपनी कहानियों में प्रस्तुत किए हैं, जो अपने निश्छल प्रेम, बलिदान और त्याग से पाठकों पर अमिट छाप छोड़ते हैं। प्रसाद जी की प्रमुख कहानियाँ हैं- ‘पुरस्कार’, ‘इन्द्रजाल’, ‘आकाशदीप’, ‘ममता’, ‘मधुवा’, ‘देवरथ’, ‘बेड़ी’, ‘प्रतिध्वनि’, ‘आंधी’, ‘सालवती’ आदि।


            प्रसाद जी की पहली कहानी 'ग्राम' सन् 1911 ई. में 'इन्दु' में प्रकाशित हुई थी। उनकी कहानियों के कथानक प्रागैतिहासिक काल, वैदिक काल, उत्तर वैदिक काल तथा तत्कालीन समाज की समस्याओं से जुड़े हुए हैं। भले ही उनकी कहानियों के पात्र एवं घटनाएँ ऐतिहासिक न हों, परन्तु देशकाल एवं वातावरण का चित्रण वे इस प्रकार करते हैं कि कहानी में ऐतिहासिकता आ ही जाती है। कहानियों में प्रस्तुत सामाजिक मान्यताएँ, धार्मिक मान्यताएँ, राजनीतिक विचारधारा एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण प्रसाद जी हिन्दी के विशिष्ट कथाकार बन गए हैं। प्रसाद जी ने अतीत के जीवन मूल्यों का समर्थन किया और त्याग-बलिदान से युक्त पात्रों के चरित्र को उजागर करने में विशेषज्ञता प्राप्त कर ली। उनकी कहानियाँ निश्चय ही आदर्शवाद का समर्थन करती हैं। 'पुरस्कार' कहानी में नायिका 'मधूलिका' राष्ट्र की रक्षा करने के लिए अपने व्यक्तिगत प्रेम को तिलांजलि दे देती है। वे इसके माध्यम से यह सन्देश देना चाहते थे कि राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत प्रेम का बलिदान करना पड़े तो व्यक्ति को इसके लिए तैयार रहना चाहिए।


            प्रसाद की कहानियों की भाषा संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली से युक्त होती थी। उसमें आलंकारिता एवं काव्यात्मकता का समावेश होता था। भाषा में पात्रानुकूलता एवं अर्थव्यंजना पर उनका ध्यान विशेष रूप से केन्द्रित रहता था। उनकी कहानियों में प्रयुक्त भाषा का एक उदाहरण द्रष्टव्य है :

          "शीतकाल की रजनी, मेघों से भरा आकाश, जिसमें बिजली की दौड़-धूप। मधूलिका का छाजन टपक रहा था, ओढ़ने की कमी थी। वह ठिठुरकर एक कोने में बैठी थी।"


             भाषा के माध्यम से देशकाल एवं वातावरण को प्रस्तुत कर देने में भी वे सिद्धहस्त थे। पुरस्कार कहानी का एक दृश्य देखिए : 

          "कोशल का वह उत्सव प्रसिद्ध था। एक दिन के लिए महाराज को कृषक बनना पड़ता था। उस दिन इन्द्र- पूजन की धूमधाम होती। नगर निवासी पहाड़ी भूमि में आनन्द मनाते। प्रति वर्ष कृषि का यह महोत्सव उत्साह से सम्पन्न होता, दूसरे राज्यों से भी युवक राजकुमार इस उत्सव में बड़े चाव से आकर योग देते।"


           प्रसाद की कहानियाँ शैली-शिल्प, भाषा, विषय- वस्तु आदि के कारण अपने समय की अन्य कहानियों से बिल्कुल अलग थीं। इसीलिए उन जैसे अनेक कहानीकारों की कहानियों को 'प्रसाद संस्थान' की कहानी कहा गया। इनका स्वर सरस्वती' में छपने वाली कहानियों से नितान्त भिन्न था।


            प्रसाद की कहानियाँ सोद्देश्य होती थीं। प्रायः त्याग, बलिदान राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत प्रसाद की कहानियाँ आदर्शवादी होती थीं, तथा उनका उद्देश्य पाठकों को सन्देश देना होता था। अपने नवीन शैली और शिल्पगत भव्यता, भाषा एवं देशकाल के कारण प्रसाद जी हिन्दी के अप्रतिम कहानीकार के रूप में हमारे समक्ष आते हैं।

SHARE

Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

  • Image
  • Image
  • Image
  • Image
  • Image
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 Comments:

Post a Comment