साहित्य में मौलकता के सवाल

साहित्य में मौलकता के सवाल

           कोई भी साहित्य अपने समय का बौद्धिक दस्तावेज होता है।यह वही दस्तावेज है, जिसमें समय अपना सत्य अंकित करता है। कालांतर में आगामी पीढ़ी उस सत्य की पड़ताल करती है। उसे परंपरा की कसौटी पर कसकर उसमें अंतर्निहित मौलिकता की तलाश करती है। पाश्चात्य विद्वान टी. एस. इलियट के हवाले से कहें तो 'साहित्य में परंपरा के साथ मौलिक प्रज्ञा का होना लाज़िमी है।' लेकिन यह मौलिकता तभी आती है, जब रचनाकार परंपरा को भलीभाँति जान लिया हो। उन्होंने यह भी बताया कि परंपरा  विरासत में नहीं मिलती है। इसका श्रमपूर्वक अर्जन करना पड़ता है। वर्तमान समय उत्तर- आधुनिकतावाद का है, जिसमें विद्वानों ने लेखक की मृत्यु की घोषणा कर दी है। लेखक की मृत्यु का अर्थ रचना के अस्तित्व का नाश नहीं है, वरन रचना में रचनाकार के वैयक्तिकता का विलोपन है। उत्तर- आधुनिकतावाद रचना और रचनाकार के अंतर्संबंध को अस्वीकार करता है। उनका मानना है कि साहित्य को रचनाकार के व्यक्तित्व से निरपेक्ष होकर देखना चाहिए। हालाँकि भारतीय साहित्य पर इसे लागू नहीं किया जा सकता। चूँकि यहाँ रचना में रचनाकार के व्यक्तित्व की छाया अवश्यंभावी निहित रहती है। यथा- 'रामचरितमानस' को तुलसी के व्यक्तित्व से निरपेक्ष होकर मूल्यांकित नहीं किया जा सकता। और न ही 'राम की शक्तिपूजा' को निराला के जीवन से पृथक करके देखा जा सकता है। अतएव, रचनाकार अपने बाह्य परिस्थितियों से जो ग्रहण करता है, उसे अपनी प्रतिभा की भट्ठी में गलाकर वही स्वरूप प्रदान करता है, जो उनके व्यक्तित्व की छाया के समानान्तर हो। इसलिए साहित्य सामाजिक अभिव्यक्ति से पूर्व वैयक्तिक उत्पादन है। 

          यह कहना न होगा कि नयी पीढ़ी के साहित्यकारों में मौलिक चिंतन का अभाव परिलक्षित होता है। चूँकि यह पीढ़ी अपने मस्तिष्क को स्पेस ही नहीं दे पाती है....ये बाहर से लिए गये कच्चे माल को अपने भीतर ठीक से पकने ही नहीं देते। उसमें सदैव कुछ रचने की व्याकुलता रहती है।  मौलिक चिंतन के अभाव के लिए हमारे देश के उच्च शिक्षण- संस्थान भी कम जिम्मेदार नहीं है। इन संस्थानों में पदासीन अधिकांश प्राध्यापकगण पुरानेपन से ग्रसित हैं। वे न स्वयं बाहर आते हैं, और न ही किसी को आने देना चाहते हैं। शिक्षकों की पुरानी पीढ़ी नवाचार विरोधी मानसिकता के शिकार हैं। इस कारण भी नवोदित साहित्यकार मौलिक चिंतन नहीं कर पाते। 

              भारतीय साहित्य बनाम हिन्दी साहित्य के साथ यह विडंबना रही है कि यहाँ गुणवत्तापूर्ण लेखन का अभाव रहा है। अधिकांश साहित्यिक कृतियाँ 'विचारों का अवार्शन' प्रतीत होता है। रचनाकार न परंपरा से परिचित है, न इतिहास से। न उनमें भाषा की समझ है न शिल्प की...बस लिखने के लिए लिखते जा रहे हैं। इस कारण सुधी पाठको को रचनात्मक प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। मौजूदा दौर में सोशल मीडिया ने सृजनात्मक खुजली को और तेज कर दिया है। हर आदमी कुछ न कुछ रचकर रातोंरात अमर हो जाना चाहता है। निश्चय ही ऐसे लोग रचने की शीघ्रता में साहित्य का अहित कर डालते हैं। उनका उद्देश्य परिवर्तन की चेतना जाग्रत करना न होकर साहित्यकार बनने की जिद्द है। ऐसे रचनाकारों से रचनात्मक मौलिकता की अपेक्षा करना व्यर्थ है। अब सवाल है कि क्या यह कला बस कला के लिए है। जीवन के स्पंदन से उसका कोई वास्ता नहीं है। पाश्चात्य विद्वान लोंजाइनस ने स्पष्ट कहा है कि 'एक उदात्त कृति का सृजन वही कर सकता है, जिसका व्यक्तित्व उदात्त हो। व्यक्तित्व को उदात्त बनाने के लिए श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन और चिंतन और मनन करना चाहिए। जिस प्रकार एक अपरिपक्व मां स्वस्थ संतान को उत्पन्न नहीं कर सकती, जिस प्रकार एक अविकसित वृक्ष सुस्वादु फल का उत्पादन नहीं कर सकता, ठीक उसी प्रकार एक अपरिपक्व बुद्धि वाला व्यक्ति मौलिक और कालजयी कृति का निर्माण नहीं कर सकता है। 

           

              

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Milan Tomic

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