डाॅ. कुसुम वियोगी रचित और संपादित कहानियों में दलित-चेतना

 (नोट - पंचम अध्याय के अंत में जोड़ें.....पृष्ठ- 145 पर)


डाॅ. कुसुम वियोगी रचित और संपादित कहानियों में दलित-चेतना :    

            हिन्दी कहानी के अनेकों उतार-चढ़ावों, तथाकथित आन्दोलनों से अलग दलित कहानी बदलते हुए सामाजिक परिदृश्य के यथार्थ चित्रण की एक विशिष्ट धारा के रूप में सामने आती है, जिसकी ओर हिन्दी समीक्षकों का ध्यान बहुत देर से गया है। हिन्दी कहानी में नई कहानी, अकहानी, समान्तर कहानी और फिर जनवादी कहानी... आदि पड़ावों से गुजरते हुए वर्तमान हिन्दी कहानी का रुझान उसे वैचारिक प्रतिबद्धता से जोड़ता है। यह एक बदलाव था हिन्दी कहानी के लिए जिसमें यथार्थवादी चित्रण और मध्यवर्गीय जिजीविषा का बहुत ही निकटता से सम्बन्ध प्रस्तुत हुआ था और पाठकों ने कहानी के कल्पना लोक और रोमानी मायावी संसार से मुक्त होकर एक ताजगी का अहसास महसूस किया था।

            इसी के साथ दलित चेतना की कहानियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की। आठवें दशक में यह उपस्थिति और अधिक तीव्रता से उभरी, लेकिन हिन्दी सम्पादकों और समीक्षकों के उपेक्षापूर्ण रवैए के कारण दलित रचनाएँ लगातार चर्चा से बाहर रहीं। दलित रचनाकारों के संघर्ष ने आखिर इस तिलस्म को तोड़ने में सफलता पाई। दलित कथाकार मोहनदास नैमिशराय की कहानियाँ जहाँ दलित पत्रिकाओं में छप रही थीं, वहीं 'गरिमा भारती', 'कुरुक्षेत्र', 'संचेतना', 'स्वतन्त्र भारत' में भी छपी। इसी प्रकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियाँ 'पंजाब केसरी', 'जनसत्ता' (चंडीगढ़ संस्करण), 'नवभारत', 'निष्कर्ष' आदि में छपकर एक विशाल पाठक वर्ग तक पहुँचने में सफल रहीं।

            नवें दशक में दलित कहानियों ने अपनी एक खास पहचान निर्मित की। हिन्दी साहित्य के लिए दलित साहित्य की चर्चा नई नहीं थी। हिन्दी की कई महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ मराठी दलित साहित्य पर अपने विशेषांक प्रकाशित कर चुकी थीं। हिन्दी पाठक दया पवार, बाबूराव बागूल, गंगाधर पानतावणे के नाम और उनकी रचनाओं से परिचित था। लेकिन हिन्दी दलित रचनाकारों से उन्हें परहेज था। हिन्दी दलित लेखक उनकी देहरी पर खड़े होकर दस्तक दे रहे थे। उन देहरियों पर जहाँ उनका प्रवेश निषेद्ध था। मराठी दलित साहित्य की चर्चा से उनकी महानता साहिष्णुता पर कोई आँच नहीं आती थी। हिन्दी दलित कथाकार उनके इस भ्रमजाल को छिन्न-भिन्न कर रहे थे। हिन्दी समाज की संकीर्णता, जाति भावना का ढका-दबा भ्रम उघाड़ रहे थे। इसीलिए हिन्दी सम्पादक इन 'अधकचरी' 'अपरिपक्व' रचनाओं को न छापना ही बेहतर मान रहे थे।

          हिन्दी दलित कथाकारों की जद्दोजहद की दस्तक पर दरवाजा खुला। 'हंस' (सं. राजेन्द्र यादव) ने उन्हें एक मंच दिया। नवें दशक में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, श्यौराजसिंह बेचैन, सूरजपाल चौहान, डॉ. सुशीला टाकभौरे आदि की कहानियाँ 'हंस' में छपीं।

          नवें दशक में अनेक कथा-संकलन भी आए। डॉ. महीप सिंह द्वारा चयनित वार्षिक कथा-संकलनों में दलित कहानियाँ शामिल की गईं। डॉ. पुष्पपाल सिंह द्वारा सम्पादित कहानी-संकलन 'कहानी चयन 1996' में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'अम्मा' शामिल की गई। डॉ. एन. सिंह द्वारा सम्पादित दलित कहानी-संग्रह 'यातना की परछाइयाँ', डॉ. कुसुम वियोगी द्वारा सम्पादित 'समकालीन दलित कहानियाँ', मोहनदास नैमिशराय का कहानी-संग्रह 'आवाजें', सूरजपाल चौहान का 'हेरी कब आएगा', डॉ. देयानन्द बटोही का 'सुरंग', 'कफनखोर', 'यातनाओं के जंगल', डॉ. सुशीला टाकभौरे का 'टूटता वहम', ओमप्रकाश वाल्मीकि का 'सलाम' आदि कहानी-संग्रहों ने नवें दशक में दलित कहानी की यात्रा का एक अहम पड़ाव पार किया है।

          हिन्दी दलित कहानी की यह यात्रा सहज और सरल यात्रा नहीं है। लम्बी संघर्ष यात्रा है, जो सातवें दशक से नवें दशक तक काँटों पर चलते हुए लहूलुहान होकर भी अपने विस्फोटक तेवर की पहचान बनाने में सफल रही है। दलित कहानी ने समस्याओं से मुठभेड़ की है। अपने सर्जनात्मक, आक्रोशित स्वर को यथार्थ की भूमि पर खड़ा करके बदलाव के नए आयाम स्थापित किए हैं। यथार्थ की संघर्षपूर्ण स्थितियों, सामाजिक विषमताओं, भेदभाव, अन्तर्विरोधों को चित्रित करने की प्रवृत्ति उसने किसी दबाव या प्रतिक्रिया के तहत ग्रहण नहीं की है, बल्कि यह उसका अपना स्वाभाविक और वस्तुनिष्ठ स्वरूप है। आवेगपूर्ण विरोध के द्वारा परिवर्तन की पक्षधरता उसका जीवन-मूल्य है।

           इस यात्रा में जहाँ डॉ. श्यौराजसिंह बेचैन, सूरजपाल चौहान, जयप्रकाश कर्दम, डॉ. दयानन्द बटोही ने यथार्थपरक संवेदनशीलता और सामाजिक विमर्श की कहानियाँ लिखी हैं, वहीं डॉ. सुशीला टाकभौरे, रजतरानी मीनू, कावेरी, कुसुम मेघवाल दलित स्त्री की पीड़ा उकेरने में सफल हुई हैं।

          नवें दशक की दलित कहानी में जहाँ भारतीय गाँव में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था और सामन्ती व्यवस्था में पिसते दलितों की हाहाकार है, वहीं छोटे शहरों, महानगरों में बसे सरकारी नौकरियों में जीवन-निर्वाह करते अधिकारियों, कलकों, कर्मचारियों की व्यथा-कथाएँ हैं, साथ ही दलितों में उभरते आक्रोश, विरोध, संघर्ष की तीव्र चेतना छवि भी है जो बदलाव का संकेत है।

           दलित कथाकार अपने प्रामाणिक अनुभवों को कथा में पिरोकर गहन अनुभूति से जब प्रस्तुत करता है तो साहित्य की भूमिका भी स्पष्ट हो जाती है। मिसाल के तौर पर मोहनदास नैमिशराय की कहानी 'अपना गाँव' में सामन्ती व्यवस्था में दलित सिर्फ उपभोग की वस्तु हैं, उनका मान-सम्मान अर्थहीन है। कहानी के कथ्य में जो क्रमिक विकास है, वही दलित चेतना की विकास यात्रा भी है, और यह कहानी दलित सरोकारों और जिजीविषा की एक श्रेष्ठ और सशक्त कहानी है जो दलित आन्दोलन के प्रबल पक्ष को उजागर करती है। मोहनदास नैमिशराय इस कहानी को रिपोर्ताज नहीं बनने देते, बल्कि कथा-प्रवाह में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं। ग्रामीण जीवन के अन्तर्सम्बन्धों को यह कहानी विद्रूपता से प्रस्तुत करती है।

             अस्सी बरस का हरिया शोषण के खिलाफ उठ खड़ा होता है। अपनी बहू कबूतरी को जमींदार-पुत्र द्वारा नग्न घुमाए जाने से वह अवाक् तो हो जाता है, लेकिन उसके भीतर की खामोशी चीखने लगती है। अपने बेटे को शहर से बुलाता है। थाने में रिपोर्ट लिखाने गए लोगों पर पुलिस के टूटते कहर को वह सिर्फ देखता ही नहीं महसूस भी करता है। लेकिन हार नहीं मानता। बिरादरी की पंचायत में, जहाँ औरतें भी हैं, एक प्रस्ताव आता है कि बदले की भावना से उनकी औरत को भी नंगा घुमाएँ। लेकिन हरिया विरोध करता है। उसका विवेक उसे विरोध के लिए उकसाता है। कोई कहता है, 'फसल जला दो।' लेकिन मेहनतकश दलित विरोध करते हैं। 'अन्न को भी कोई तबाह करता है !' हरिया नया गाँव बसाने का प्रस्ताव रखता है, जिसे सभी मान लेते हैं। और एक नए गाँव 'अपना गाँव' का सपना अस्तित्व में आता है।

             मोहनदास नैमिशराय की कहानी 'हारे हुए लोग' दलितों को किराए का मकान मिलने में आनेवाली परेशानियों और जात-पाँत की भावना में उपजे तिरस्कार की कहानी है। दलित अधिकारी को नए शहर में आने पर किराए का मकान ढूँढ़ने में जिस पीड़ा और अपमान बोध से गुजरना पड़ता है, वह कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। रामनारायण द्विवेदी का यह कथन समूची व्यवस्था के नग्न रूप की कलई खोल देता है, ''अजी हमें क्या मतलब, आप कलट्टर भी हैं। नौकरी करने से आदमी की जात तो नहीं बदल जाती। रहता तो वही है।''57

           कुसुम वियोगी मोहनदास नैमिशराय की कहानियों पर टिप्प्णी करते हैं : ''आत्मकथा में जहाँ उनके सामने एक सीमित परिवेश था, कहानियों में यह परिवेश व्यापक हुआ है।''58

             आगे वे कहते हैं : ''दलितों की पीड़ा को व्यक्त कर देना मात्र इन कहानियों का लक्ष्य नहीं है बल्कि उनके भीतर सुलगता आक्रोश धीरे-धीरे विरोध में बदलता दिखाने के प्रति भी मोहनदास नैमिशराय सतर्क रहे हैं।''59

            दलित कथाकारों में सूरजपाल चौहान ने बहुत कम समय में अपनी पहचान स्थापित की है। 'साजिश' उनकी चर्चित कहानी है। इस कहानी में सरकारी तन्त्र में विद्यमान वर्ण-व्यवस्था के पोषक तत्त्व किस प्रकार दलित-विरोधी साजिश रचते हैं, इसका खुलासा बहुत ही सहज ढंग से हुआ है। नत्थू बैंक से लोन लेकर एक मेटाडोर खरीदना चाहता है। बैंक मैनेजर रामसहाय उसे सलाह देता है, ''ट्रांसपोर्ट के काम में कई प्रकार के लफड़े हैं, फिर तुझे इस काम का अनुभव भी नहीं है। यह काम तो बड़े-बड़े व्यापारियों का है।''60

           ''तो साहब आप ही बताइए मैं क्या करूँ ?' नत्थू ने असमंजस की-सी स्थिति में कहा।"

           ''तू पढ़ा-लिखा है। तू पिगरी लोन हेतु फॉर्म भरकर क्यों नहीं देता है?''61

           दलित अपने व्यवसाय में कुछ बदलना चाहे तो यह तन्त्र उसे घसीटकर वहीं डाल देता है। रामसहाय बहुत ही चालाकी से नत्थू को सलाह देता है। तन्त्र की ये मनोगत स्थितियाँ यथास्थिति बनाए रखने के लिए सक्रिय होती हैं। लेकिन दलित अब ऐसे तन्त्र को चुनौती देने लगे हैं।

             'घाटे का सौदा' सूरजपाल की कहानी आत्मविश्लेषण की कहानी है। पढ़े-लिखे दलित सामाजिक भेदभाव के भय से जाति छिपाकर रहने के लिए बाध्य होते हैं। ऐसे एक अधिकारी के इर्द-गिर्द घूमती है यह कहानी। कथा का मुख्य पात्र डी. लाल अपने ही द्वारा बुने जाल में स्वयं ही फँस जाता है। आत्मग्लानि और डर से मुक्त होने के लिए वह 12-12 लाख की अपनी कोठी मात्र 6 लाख में बेचकर उस जगह से भाग खड़ा होता है। सूरजपाल चौहान ने इस कथ्य को बहुत ही सहज ढंग से कहानी में पिरोया है।

            दलितों में एक ऐसा वर्ग भी उभर रहा है जो इस टूटन और हीनताबोध की जिजीविषा को बराबर रखकर शक्ति अर्जित करने का जतन कर रहे हैं। भले ही आवेग के अनिश्चय के दोराहे पर हैं, किन्तु भविष्य में उन्हें प्रकाश किरण दिखाई दे रही है। 'कहाँ जाए सतीश' (ओमप्रकाश वाल्मीकि) में सतीश इसी संघर्ष का प्रतीक है। 'अप्पो दीपो भव' को आदर्श मानकर दलितों में नई चेतना का प्रादुर्भाव हुआ है।

           जात-पाँच की भावना से ऊपर उठकर यदि कोई व्यक्ति मैत्रीभाव स्थापित करना चाहता है तो वर्ण-व्यवस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उसे ही सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगता है। 'सलाम' (ओमप्रकाश वाल्मीकि) कहानी का कमल उपाध्याय जब हरीश की बारात में शामिल होता है तो गाँव की एक दुकान पर उसे इसलिए चाय नहीं मिलती, क्योंकि उसे चूहड़ा समझ लिया जाता है, जबकि वह कहता है कि वह ब्राह्मण है। लेकिन कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं करता। 'बामन हो तो चूहड़ों की बारात में क्या मूत पीने आया है...'(62) यानी एक ब्राह्मण का दलितों के साथ उठना-बैठना, सम्बन्ध रखना सामाजिक अपराध है। कमल उपाध्याय सिर्फ अपमानित ही नहीं होता उसके साथ हाथापाई भी होती है। वह भागकर खुद को बचाता है। सामाजिक यथार्थ की बेबाक अभिव्यक्ति दलित कहानियों को जीवन्त बनाती है।

           सामाजिक शोषण को अपनी नियति मान लेनेवाले दलित की जब आँख खुलती है तो उसकी जिह्वा पर उत्पीड़न का दर्द शाप बनकर फूटता है, 'तेरे कीड़े पड़ेंगे चौधरी, कोई पानी देनेवाला भी ना बचेगा।' (पच्चीस चौका डेढ़ सौ ओमप्रकाश वाल्मीकि) ।

           दलित उत्पीड़न की निर्माणशाला सिर्फ सामाजिक संस्थाएँ ही नहीं, शैक्षणिक संस्थान भी हैं, जहाँ दलितों को आज भी शिक्षा ग्रहण करने में अनेव, बाधाओं को पार करना होता है। डॉ. दयानन्द बटोही की कहानी 'सुरंग' ऐसे शिक्षा संस्थानों की अभेद्य दीवारों में सुरंग बनाती है जहाँ द्रोणाचार्य के वंशज आज भी एकलव्य का अँगूठा काटने के षड्यन्त्र रचते हैं।

             जहाँ एक ओर दलित अपनी पीड़ा को आक्रोश में बदलकर साहित्यिक अभिव्यक्ति को एक नया रूप दे रहा है, वहीं दूसरी ओर आत्मबोध की कहानियाँ भी रच रहा है। डॉ. प्रेमशंकर की 'बित्ते भर जमीन' ऐसी ही कहानी है।

             जयप्रकाश कर्दम ने कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियाँ लिखी हैं, जिनमें 'नो बार' प्रगतिशील और लोकतान्त्रिक मूल्यों का समर्थन करनेवाले आधुनिक परिवार की कहानी है, जिसके लिए वैवाहिक विज्ञापन में 'नो बार' देने का यह अर्थ कतई नहीं कि वे अपनी बेटी किसी 'चूहड़े-चमार' को दे दें। भले ही वह कितना भी योग्य क्यों न हो- 'वह सब तो ठीक है कि हम जाति-पाँति को नहीं मानते और हमने मैट्रीमोनियल में 'नो बार' भी छपवाया था, लेकिन फिर भी कुछ चीजें देखनी ही होती हैं। आखिर 'नो बार' का यह मतलब तो नहीं कि किसी चूहड़े-चमार के साथ...' समाज में व्याप्त दलितों के प्रति घृणा को यह कहानी बेरहमी से उघाड़ती है।

           दलित महिला कथाकारों ने एक नई भूमि तैयार की है। डॉ. सुशीला टाकभौरे की कहानी 'सिलिया' के मुख्य पात्र सिलिया को, जो बड़ी कठिनाइयों से मैट्रिक पास करती है, कोई भी लालच रास्ते से भटका नहीं पाता है। सुदृढ़ और पक्के इरादोंवाली सिलिया ने जिस प्रकार के सामाजिक उत्पीड़न सहे हैं, वे सब उसकी स्मृति में ताजा हैं। तमाम असुविधाओं के बीच भी वह सम्मान से जीना चाहती है। यही संकल्प उसे लड़ने का हौसला देता है। यह एक अन्तर्मुखी कहानी है जो सुधारवादी दृष्टिकोण से लिखी गई है। इसके ठीक विपरीत रजतरानी मीनू ने 'सुनीता' कहानी में गम्भीर सरोकारों और बदलाव की उत्कट चाह को दलित नारी की आन्तरिक शक्ति बनाया है। 'सुनीता' में यह क्षमता है कि वह अपनी बात पर अड़कर उसे मनवा सकती है। परिवर्तन की संघर्षशील प्रवृत्ति से संस्कारित सुनीता एक अद्भुत चरित्र है।

            कावेरी की कहानी 'द्रोणाचार्य एक नहीं' कथा संग्रह की कहानियों के साथ 'सुमंगली' और कुसुम मेघवाल की कहानी 'समय के शिलालेख' दलित नारी के अन्तर्मन को उकेरनेवाली कहानियाँ हैं।

            दलित कहानियों के सन्दर्भ में वियोगी जी का कहना है : ''हिन्दी के इन सहज कथाकारों में ही दलित कथाकार का उल्लेख किया जाना चाहिए। ओमप्रकाश वाल्मीकि, श्यौराजसिंह बेचैन, प्रेमकुमार मणि, चन्द्रेश्वर कर्ण आदि की कहानियों ने भारतीय समाज के एक ऐसे रोंगटे खड़े कर देनेवाले यथार्थ की ओर हमारा ध्यान खींचा है। जिसे पहले चादर की ओट कर दिया जाता था।''63

             इसी सन्दर्भ में वे आगे लिखते हैं ''ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'प्रमोशन', प्रेमकुमार मणि की, 'जुगाड़' और चन्द्रेश्वर कर्ण की 'सुरंग से गुजरते हुए' कहानियों में अपमानों की गहरी कचोट है जो सीधे दिल में उतरती है और हक्का-बक्का कर जाती है। दलित साहित्य सच में सभ्यता के नकली मुखौटों की चिन्दी-चिन्दी कर देनेवाला साहित्य है।''64

             डॉ. पुष्पपाल सिंह कहते हैं -''ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी (अम्मा) एक अभूतपूर्व पात्र हिन्दी कहानी में प्रस्तुत करती है और हिन्दी में दलित साहित्य का आन्दोलन-सा उठा है, उसमें अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराती... ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अम्मा के वर्गीय चरित्र और निजता को अत्यन्त कुशलता से उकेरा है।''65

              'अम्मा' कहानी पर टिप्पणी करते हुए महेश कटारे लिखते हैं: ''अम्मा' हिन्दी में दलित चेतना को स्वर देते हुए उपेक्षित वर्ग के संघर्ष व आत्मसम्मान की रेखाएँ उभारती है।''66

             डॉ० कुसुम वियोगी हिन्दी के चर्चित कवि होने के साथ ही कुशल कथाकार भी हैं। वियोगी जी ने अनेक कहानियों का सृजन किया है। इनकी कहानियों में भी कविता की भाँति ही दलित-प्रतिरोध स्वर परिलक्षित होते हैं। जातीय विषमता के खिलाफ इनके पात्र अनवरत संघर्ष करते दृष्टिकत होते हैं। वियोगी जी का प्रथम कथा संग्रह- चार इंच की कलम' दलित साहित्य जगत में खूब सराहा गया। वे कुछ इस संग्रह की कहानियों अनेक भाषा में अनुदित होकर देश-विदेश सहित कई भारतीय विश्वविद्यालयों के पाठ्‌यक्रम में सम्मिलित हुई। इनका दूसरा कहानी संग्रह- 'प्रेरक दलित कहानियाँ' आज की सामाजिक विषमताओं से जूझ रही है। 'इस संग्रह की कहानियों में सामाजिक उत्पीड़न एवं विषमता के खिलाफ संघर्ष और सफलता के सोपान है जो उत्पीड़न, संघर्ष और प्रतिरोध के स्वर से परिपूर्ण है।"67

          दलित साहित्य की गहनतम पीड़ा से सहमत होते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकि का कहना है : ''नई कहानी के प्रवक्ता 'प्रामाणिक अनुभव' की बात यों ही नहीं करते थे। इसलिए जिन कथाकारों के पास दलित जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव हैं अथवा जिन्होंने इस जीवन से गहरा मानसिक साहचर्य स्थापित कर लिया हो उनके लेखन में यह आँच बराबर महसूस होती है। प्रेमकुमार मणि, सुरेश कांटक, ओमप्रकाश वाल्मीकि आदि कथाकारों के यहाँ दलितों के बहुरूपीय  शोषण के सच्चे चित्र  मिलते हैं।''68

              दलित जीवन की नारकीय विभीषिकाएँ जहाँ दलित कहानियों को जीवन से जोड़ती हैं, वहीं ये कहानियाँ मानवीय सरोकारों को प्रतिबद्धता के साथ प्रस्तुत भी करती हैं। अपनी अस्मिता की तलाश और व्यापक स्तर पर अपने अधिकारों के प्रति सजगता इनमें स्पष्ट दिखाई पड़ती है। सामाजिक जीवन के अन्तर्सम्बन्धों की जटिलता ने जो खाई पैदा की है, उसे पाटने का काम भी दलित कहानियों की प्राथमिकताओं में है।

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संदर्भ- सूची :

57. समकालीन दलित कहानियाँ- डाॅ. कुसुम वियोगी, आर. के. पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्टर्स, दिल्ली, संस्करण-2021, पृष्ठ- 27

 58. समकालीन दलित कहानियाँ- डाॅ. कुसुम वियोगी, आर. के. पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्टर्स, दिल्ली, संस्करण-2021, पृष्ठ- भूमिका से

59.  समकालीन दलित कहानियाँ- डाॅ. कुसुम वियोगी, आर. के. पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्टर्स, दिल्ली, संस्करण-2021, पृष्ठ- भूमिका से

60. चर्चित दलित कहानियाँ- कुसुम वियोगी, आर. के. पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्टर्स, दिल्ली, संस्करण-2022, पृष्ठ- 75

61. वही, पृष्ठ- 76

62. समकालीन दलित कहानियाँ- डाॅ. कुसुम वियोगी, आर. के. पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्टर्स, दिल्ली, संस्करण-2021, पृष्ठ- 37

63. 21 वीं सदी की इक्कीस कहानियाँ-  कुसुम वियोगी, पुष्पांजलि प्रकाशन, दिल्ली, 2021, पृष्ठ- भूमिका से

64. समकालीन दलित कहानियाँ- डाॅ. कुसुम वियोगी, आर. के. पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्टर्स, दिल्ली, संस्करण-2021, पृष्ठ- भूमिका से

65. वही, पृष्ठ- भूमिका से

66. दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र- ओमप्रकाश वाल्मीकि , राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2014, पृष्ठ- 110

67. प्रेरक दलित कहानियाँ- कुसुम वियोगी, लक्ष्य साहित्य, दिल्ली, संस्करण- 2025

68. दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र- ओमप्रकाश वाल्मीकि , राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2014, पृष्ठ- 112


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Milan Tomic

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