प्रेमचन्द और उनकी कहानियाँ : एक विहंगावलोकन

  प्रेमचन्द और उनकी कहानियाँ : एक विहंगावलोकन 

             प्रेमचन्द हिन्दी के युग- प्रवर्तक कहानीकार माने जाते हैं। पहले वे 'नवाबराय' के नाम से उर्दू में लिखते थे। उर्दू में लिखा हुआ उनका कहानी संग्रह 'सोजे वतन' 1907 ई. में प्रकाशित हुआ था। स्वातन्त्र्य भावना से ओत-प्रोत होने के कारण इस कहानी संकलन को अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर लिया था। कालान्तर में वे हिन्दी में प्रेमचन्द नाम से लिखने लगे और उनका यह नाम कथा साहित्य में अमर हो गया। उनकी पहली हिन्दी कहानी ‘पंच परमेश्वर' सन् 1916 ई. में प्रकाशित हुई और अन्तिम 'कफन' 1936, ई. में, अतएव इस काल (1916 से 1936 ई.) को प्रेमचन्द- युग कहा जाता है। मुंशी प्रेमचन्द ने अपने जीवनकाल में लगभग 300 कहानियों की रचना की, जो 'मान सरोवर' के आठ खण्डों में संकलित हुई हैं।


            प्रेमचन्द की कहानियों में विषय-वैविध्य दृष्टिगत होता है। किसी अन्य कथाकार ने जीवन के इतने व्यापक फलक को अपनी कहानियों में नहीं समेटा, जितना प्रेमचन्द ने। उनकी में कहानियाँ अपने परिवेश से अपने आस-पास के जीवन से लिया गया है, किन्तु कई कहानियाँ कस्बे की जिन्दगी या स्कूल-कॉलेज से भी जुड़ी हुई हैं। उनकी कहानियों के पात्र हर वर्ग, धर्म, जाति के होते हैं। कोई हिन्दू है तो कोई मुसलमान, कोई किसान है, तो कोई विद्यार्थी। अपनी कहानियों में उन्होंने राज और समाज के विविध समस्याओं को उठाया है- जमींदारों के द्वारा किसानों के शोषण की समस्या, सूदखोरों के शोषण से पिसते ग्रामीणों की समस्या, छुआछूत की समस्या, रूढ़ि एवं अन्धविश्वास, संयुक्त परिवार की समस्या भ्रष्टाचार एवं व्यक्तिगत जीवन की समस्याएँ आदि।


            प्रेमचन्द की प्रारम्भिक कहानियों में आदर्श का पुट दिया गया है। ‘पंच परमेश्वर’, ‘आत्माराम’, ‘प्रेरणा’, ‘ईदगाह’, ‘नमक का दरोगा’ आदि कहानियों का मूल उद्देश्य है- सत्य का बोलबाला और झूठे का मुंह काला, जबकि परवर्ती कहानियाँ यथा- 'पूस की रात' और 'कफन' तक आते-आते उनका दृष्टिकोण परिवर्तित हो गया। अब वे जीवन के यथार्थ से जुड़ गए थे। स्पष्ट है कि उनकी पहले वाली कहानियाँ आदर्शवादी हैं और बाद में लिखी गई यथार्थवादी कहानियाँ हैं।


            प्रेमचन्द की प्रारम्भिक कहानियाँ आदर्शात्मक, इतिवृत्तात्मक एवं घटना बहुल हैं तथा इनका मूल स्वर 'पश्चाताप' है। ‘बड़े घर की बेटी’, ‘नमक का दरोगा’, ‘मंत्र’ आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं। इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए डाॅ. हेतु भारद्वाज लिखते हैं- "आदर्शवादी एवं सुधारवादी दृष्टि का कारण यह भी है कि प्रेमचन्द के मन में मनुष्य की सदवृत्तियों के प्रति गहरी आस्था है। उन्हें लगता है कि मनुष्य बुनियादी तौर पर बुरा नहीं होता एवं उसके सुधार की संभावनाएँ सदा बनी रहती हैं।"


           प्रेमचन्द की वे कहानियाँ, जिनमें शोषण का विरोध है, आक्रोश है। द्वितीय चरण की कहानियाँ हैं, जिन्हें विकासवादी काल की कहानियाँ कहा जा सकता है। महाजनी सभ्यता में शोषण का स्वरूप कितना भयावह है, इसका प्रमाण ‘सवा सेर

गेहूं’ है। कर्ज में लिए गये सवा सेर गेहूं को एक पीढ़ी तो चुका नहीं पाती, दूसरी पीढ़ी भी चुका पायेगी इसमें संदेह है। ‘जुलूस’ और ‘समरयात्रा’ में प्रेमचन्द ने राष्ट्रीय आन्दोलन का जिक्र है। प्रेमचन्द के कथा विकास का तीसरा चरण उत्कर्षकाल है, जिसमें ‘सद्गति’, ‘ईदगाह’, ‘नशा’, ‘कफन’, ‘पूस की रात’ आदि कहानियों को लिया जा सकता है जो यथार्थवादी कहानियाँ हैं। ‘कफन’ शोषण-मूलक व्यवस्था पर कठोर टिप्पणी है तो सद्गति का दुखिया धार्मिक पाखण्ड एवं शोषण का शिकार बनकर मर जाता है। "यही जीवनपर्यन्त की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।” यह कहकर प्रेमचन्द ने जो व्यंग्य किया है, वह पाठक को भीतर तक तिलमिला देता है। 'कफन' के घीसू माधव कफन के लिए मिले पैसों से अपना पेट भरते हैं और शोषकों को कोसते हुए अपने को तसल्ली देते हैं कि “निश्चय ही बुधिया स्वर्ग जायेगी, जो मरते-मरते हमारी आकांक्षा को पूरी कर गयी,......वह बैकुंठ न जायेगी तो क्या मोटे-मोटे लोग जायेंगे जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं।"


            प्रेमचन्द का कथा-शिल्प भी उत्तरोत्तर विकास- पथ पर अग्रसर रहा है। प्रारम्भिक कहानियों में इतिवृत्तात्मकता अधिक है तथा चरित्र- चित्रण की मनोवैज्ञानिकता के स्थान पर व्यक्ति के आचरण का वर्णन अधिक किया गया है। 'पंच परमेश्वर' इसी कोटि की कहानी है। सन् 1930 के बाद की कहानियों में कथानक छोटे एवं संश्लिष्ट होते गए तथा कहानी की मूल संवेदना को उभारने वाली दो-तीन घटनाओं पर ही बल दिया जाने लगा। कहानियों के पात्रों का चरित्रांकन मनोविश्लेषणात्मक पद्धति पर किया जाने लगा और कहानी को चरम सीमा तक द्वन्द्ध एवं 'समस्या' के माध्यम से पहुंचाया गया। 'शतरंज के खिलाड़ी' इसी तरह की कहानी है। इससे पूर्व की कहानियाँ प्रभाव की दृष्टि से कमजोर ही कही जाएंगी। प्रेमचन्द का आदर्शवादी दृष्टिकोण, परम्परागत मूल्यों में आस्था और अन्धविश्वास परवर्ती कहानियों में दिखाई नहीं पड़ता।


           सन् 1930 से लेकर 1936 ई. तक का कालखण्ड प्रेमचन्द की कहानी- कला का उत्कर्ष काल है। इस काल की कहानियों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं जीवन के यथार्थ का चित्रण किया गया है। इन कहानियों में कथानक और घटनाओं को उतना महत्व नहीं दिया गया, जितना कहानी की मूल संवेदना को पाठकों तक पहुंचाने की ओर ध्यान दिया गया। ‘कफन’ और ‘पूस की रात’ इस वर्ग की कहानियाँ हैं। इनमें सच्चाई को नग्न रूप में उजागर किया गया है। हिन्दी की आधुनिक कहानियों को ऐसी कहानियों से बहुत कुछ दाय के रूप में प्राप्त हुआ है, इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।


           हिन्दी कहानी में मनोविज्ञान का प्रवेश कराने का श्रेय निश्चय ही प्रेमचन्द को दिया जाना चाहिए। उन्होंने चरित्र-चित्रण में मनोविज्ञन का समावेश किया तथा पात्रों में मनोविश्लेषण पर ध्यान दिया। ‘नशा', 'मनोवृत्ति', 'ईदगाह', मनोवैज्ञानिक सत्य पर आधारित कहानियाँ हैं। प्रेमचन्द जी ने आजादी के लिए जनसंघर्ष करने वाले पात्रों का चित्रण भी ‘आहुति’, ‘जुलूस’, ‘सत्याग्रह’, ‘समरयात्रा’ नामक कहानियों में किया है।


          प्रेमचन्द की कहानी कला में भाषा का विशेष योगदान है। उनकी कहानियाँ भाषा की दृष्टि से बेजोड़ हैं। भाषा पूर्णतः पात्रानुकूल है तथा उसमें लोकोक्ति-मुहावरों का प्रयोग प्रचुरता से किया गया है। भाषा के कारण ही उनकी कहानियों की पठनीयता एवं संप्रेषणीयता बढ़ गई है। सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण भाषा जिसमें उर्दू, अंग्रेजी के चलते हुए शब्द प्रयुक्त हैं, प्रेमचन्द की कहानियों में उपलब्ध होती है। आज जिस 'दलित चेतना' को कहानियों में अभिव्यक्त किया जा रहा है, उसे बहुत पहले ही प्रेमचन्द ‘ठाकुर का कुआं' और 'सद्गति' नामक कहानियों में अभिव्यक्ति दे चुके हैं। ग्रामीण समाज की सच्चाइयों को अपनी कहानियों के माध्यम से प्रेमचन्द जी उजागर करने में पूर्ण सफल रहे हैं।


            प्रेमचन्द की प्रमुख कहानियों में- ‘पंच परमेश्वर’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘गृहदाह’, ‘परीक्षा’, ‘आपबीती’, ‘सवा सेर गेहूं’, ‘आत्माराम’, ‘सुजान भगत’, ‘माता का हृदय’, ‘कजाकी’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘नशा’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘ईदगाह’, ‘लाटरी’, ‘पूस की रात’ और 'कफन' आदि के नाम लिए जा सकते हैं।


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Milan Tomic

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