हिन्दी जनसंचार की विकास-यात्रा

 प्रथम अध्याय

हिन्दी जनसंचार की विकास-यात्रा

जनसंचार : अर्थ और परिभाषाएँ :


              संचार साधनों ने दुनिया को बहुत छोटा बना दिया है- तार- बेतार, टेलीफोन, दूरदर्शन ने बहुत हद तक भौगोलिक दूरियों का मतलब ही बदल दिया है। संचार और संपर्क के आधुनिक माध्यम अब हर सुबह नहीं, बल्लि हर पल दुनिया की खैरियत, उसके हर्ष-विषाद और उसकी उपलब्धियों की खबरें देते रहते हैं।

             'गति ही जीवन है और जड़ता ही मृत्यु है। चलने, दौड़ने, आगे बढ़ने की और व्यापक होने के अर्थ में 'संचार' शब्द का प्रयोग होता है। 'संचार' संस्कृत के 'चर' धातु से बना है, जिसका अर्थ 'चलना' है। जब हम किसी भाव, विचार या जानकारी को दूसरों तक पहुँचाते हैं या फैलाते हैं तो वही संचार कहलाता है। विचारों के आदान-प्रदान की सामूहिक प्रक्रिया 'जनसंचार' कहलाती है।


            अंग्रेजी भाषा में 'संचार' को 'Communication' कहते हैं, जो लैटिन भाषा के 'Communis' से बना है, जिसका अर्थ है- किसी वस्तु या विषय का सबके लिए 'साझा होना।'1 संचार' एक ऐसा प्रयास है, जिसके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के विचारों, मनोवृत्तियों में सह‌भागी होता है। वे समस्त विधियाँ 'संचार' है,  जिनके माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे को प्रभावित करता है। अभिव्यक्ति के उन सभी रूपों को 'संचार' कहते हैं जो पारस्परिक समझदारी के उद्देश्य की पूर्ति करते हैं।

                स्पष्ट है कि संचार एक प्रक्रिया है, जिसमें दो या दो से अधिक लोगों के बीच विचारों, अनुभवों, तथ्यों और प्रभावों का इस प्रकार से आदान-प्रदान होता है, जिसमें दोनों के संदेश के बारे में सामान्य ज्ञान होता है। संचार ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें संप्रेषक और संग्राहक के बीच सामंजस्य स्थापित हो, उनमें जागरुकता उत्पन्न हो। यह संप्रेषण की ऐसी कार्रवाई है, जिसके द्वारा जनता के ज्ञान, विचार और अभिवृति को बनाया जाता है या परिवर्तित किया जाता है। हावलैंड ने संचार को शक्ति माना, जिससे संचारकर्ता किसी उत्तेजना द्वारा दूसरे व्यक्ति के व्यवहार को परिवर्तित करता है। संचार एक ऐसा प्रयास है, जिसके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों के विचारों, मनोवृतियों और सूचना में भाग लेता है।

           एशले मौटगु तथा फ्लोएड मैटसन के अनुसार - "वह असंख्य ढंग, जिनसे मानवता से संबंध रखा जा सकता है, केवल शब्दों या संगीत, चित्रों या मुद्रण द्वारा, इशारों या अंग-प्रदर्शन, शारीरिक मुद्रा या पक्षियों के परों से सभी की आँखो तथा कानों तक संदेश पहुँचाना ही जनसंचार कह‌लाता है।" 2


           जार्ज ए० मिलर के अनुसार-"जनसंचार सूचना को एक स्थान से दूसरे स्थान का अर्थ तक पहुँचना है।"3


              जनसंचार को परिभाषित करते हुए डेविड ह्यूम ने कहा है कि, "जनसंचार  बताता है कि राजसत्ता या शासन की व्यवस्था के आधार क्या हो? सरकार का रूप कैसा हो, स्वच्छेचारी राजा या सैनिक अधिकारियों का शासन हो या स्वतंत्र और लोकप्रिय सरकार हो - जनसंचार माध्यम से ही यह पता चलता है।"4


               नये ज्ञान के संबंध में अधि‌काधिक लोगों को मालूम होना 'प्रसार' है। 'प्रसार' फैलने या व्याप्त होने की क्रिया है। 'संप्रेषण' में संदेश भेजने का कार्य सम्मिलित है। किसी तथ्य, सूचना, ज्ञान, विचार और मनोरंजन को व्यापक ढंग के जनसामान्य तक पहुँचाने की प्रक्रिया जनसंचार है। समान लक्ष्य की प्राप्ति और पारस्परिक मेल-जोल के लिए इसकी अपरिहार्यता स्वयं सिद्ध है। जनसंचार एक सहज प्रवृति है। संचार ही जीवन है, संचार शून्यता ही मृत्यु है। आधुनिक जनजीवन और सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था का ताना-बाना जनसंचार साधनों द्वारा सुव्यवस्थित है। वे ही जनता, समाज, राष्ट्र के सजग प्रहरी है। संचार - व्यवस्था समाज की प्रगति, सभ्यता और संस्कृति के विकास का माध्यम है। असभ्य को सभ्य, संकीर्ण को उदार तथा नर को नारायण बनाने की अभूतपूर्व शक्ति संचार में ही निहित है। इसके बिना मानव- गरिमा की कल्पना नहीं की जा सकती। संचार ही तथ्यों और विचारधाराओं के विनिमय का विस्तृत क्षेत्र है।


हिन्दी जनसंचार का विकास :


             भारतवर्ष में जन‌संचार  के उपलब्ध साधनों ने प्राचीन काल से आधुनिक काल तक विकास की एक लंबी यात्रा तय की है। प्राचीन काल में जनसंचार के प्रमुख साधनों के रूप में जहाँ वाहन, दूत, गुप्तचर आदि थे, वहीं आधुनिक काल में जनसंचार के साथनों में प्रमुख रूप से रेडियो, टेलीविजन, फिल्म, फोन, फैक्स आदि ने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। आज इन आधुनिक साधनों में भारत ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व की घटनाओं और सूचनाओं को इतनी गति प्रदान कर दी है कि विश्व के किसी भी कोने में किसी क्षण अगर कोई घटना घटती है तो क्षण मात्र में ही यह घटना संपूर्ण विश्व में प्रसारित हो जाती है। यह सब आधुनिक जनसंचार के क्रांतिकारी परिवर्तनों का ही सुपरिणाम है।


(क) आकाशवाणी का विकासक्रम :


              भारत में प्रारंभ में रेडियों का प्रसारण प्राइवेट कंपनियों के माध्यम से आरंभ हुआ। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और डाक-तार - विभाग ने मिल-जुलकर मुंबई से रेडियो कार्यक्रम का प्रसारण आरंभ किया था। इन्हीं दिनों मद्रास प्रेसीडेन्सी रेडियो क्लब ने हल्के-फुल्के मनोरंजन कार्यक्रम का प्रसारण शुरु किया। इस रेडियो कलब का प्रसारण 31 जुलाई 1924 से शुरू हुआ। क्लब के सदस्‌यों को हल्ले- फुल्ले मनोरंजन के कार्यक्रम सुनाए जाते थे। रेडियो क्लब के सदस्यों ने आपस में पैसे इकट्ठे करके एक किलोवाट का एक शार्ट वेब ट्रासमीटर लगाया था, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह क्लब बहुत दिनों तक प्रसारण जारी नहीं रख सका । 1926 ई. में मार्च में 'इंडिया ब्राडकास्टिंग कंपनी' बनाई गई। कंपनी ने सरकार से 18 सितम्बर, 1926 ई० को प्रसारण करने का लाइसेंस प्राप्त किया और बंबई तथा कलकत्ता में  डेढ़-डेढ़ किलोवाट के मीडियम वेव ट्रासमीटर लगाए गए। 


                  23 जुलाई 1927 को 'इंडियन ब्राडकास्टिंग कंपनी की बम्बई प्रसारण शाखा का उद्‌घाटन तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने किया। अपने उद्‌घाटन भाषण में उन्होंने कहा -

             "भारत के दूर-दराज गाँवों में ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जिनके लिए दिन का काम खत्म हो जाने के बाद समय काटना पहाड़ बन जाता है। बहुत से कर्मचारी व अन्य लोग होते हैं, जिन्हें अपने काम के सिलसिले में ऐसे एकांत स्थानों में सब जाना पड़ता है, जहाँ न तो अपने लोग होते हैं और न कोई साथी। इन सबके लिए और इनके अलावा बहुतों के लिए प्रसारण एक वरदान सिद्ध होगा। मनोरंजन और शिक्षा दोनों ही दृष्टियों से इसकी संभावनाएँ अधिक हैं, यद्यपि इस समय शायद उनकी सीमा का अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं।''5


              उपर्युक्त व्याख्यान से स्पष्ट हो जाता है कि रेडियो केन्द्र की स्थापना के मूल में अंग्रेज अधिकारियो के मनोरंजन का भाव अंतर्निहित था। उनके साथ भारतीयों पर कोई प्रतिबंध नहीं था, क्योंकि शब्द ब्रह्म को सीमित नहीं किया जा सकता। 1.5 किलोवाट मीडियम वेव टांसमीटर वाले बम्बई केन्द्र को घाटे में चलने के कारण बन्द होना पड़ा। अप्रैल 1930 से भारत सरकार के उद्योग और श्रम विभाग ने प्रसारण कार्य को अपने अधिकार क्षेत्र में लिया तथा इसे 'इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस' के नाम से पुकारा। 18 जून 1936 को नाम बदला गया। लाई लिनलिथगों द्वारा इसे 'आल इंडिया रेडियो' की संज्ञा से अभिहित गया। 21 वर्ष तक इसी शीर्षक से प्रसारण के बाद दिसम्बर 1957 में सूचना प्रसारण मंत्रालय ने एक ज्ञापन के माध्यम से सभी केन्द्रों से किये जाने वाले प्रसारणों की उद‌घोषणाओं में 'आकाशवाणी' शब्द के उपयोग करने का आदेश निर्गत किया, जो आज भी जारी है।


              इस 'आकाशवाणी' शब्द के प्रयोग पर दक्षिण उत्तर भारतीय सांस्कृतिक 'आक्रमण' का नाम दिया गया। उन्हें यह तथ्य ज्ञात नहीं था कि 'आकाशवाणी' शब्द की उद्‌भावना लगभग बाइस वर्ष पूर्व एक दक्षिणी राज्य में हुई थी। यह उल्लेख है कि मैसूर राज्य में वहाँ के महाराजा ने 1935 ई० में 'आकाशवाणी' नामक रेडियो स्टेशन स्थापित किया था।


             सरदार बल्लभभाई पटेल जब भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री हुए तो उन्होंने आकाशवाणी के विस्तार की एक वृहद्  योजना प्रस्तुत की। योजना के परिणामस्वरूप 1950 ई० तक रेडियो से प्रसारित कार्यक्रमों की अवधि 60,000 घंटे प्रति वर्ष हो गयी। सभी क्षेत्रीय भाषाओं में कार्यक्रम प्रसारित हुए। पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत ट्रांसमीटर और रेडियो केन्द्र का द्रुतगति से विस्तार हुआ।


              सन् 1954 से 1961 ई० के मध्य अखिल भारतीय संगीत, वार्ता, नाटक, फीचर, समसामयिक साहित्य एवं अन्य गौरवपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रमों का प्रसारण हुआ। फिल्ली संगीत निर्माताओं से कुछ अनबन होने के कारण जब सरकार ने आकाशवाणी से फिल्मी गीतों का कार्यक्रम कम कर दिया तो श्रोतावर्ग रेडियो सीलोन की तरफ आकर्षित हुए। श्रोताओं को अपनी ओर झुकाने के लिए रेडियो ने 3 अक्टूबर 1957 को अखिल भारतीय कार्यक्रम प्रारंभ किया, जिसे 'विविध भारती' कहा गया। मीडियम और शार्ट दोनों तरंगों पर लोकप्रिय संगीत एवं हल्के-फुल्के मनोरंजक कार्यक्रमों द्वारा श्रोताओं को रिझाना ही 'विविध भारती' का लक्ष्य था। लोकगीत, नाटक तथा सांस्कृतिक बहुरंगी कार्यक्रमों द्वारा राष्ट्रीय चेतना पैदा को करने की दिशा में इस विशाल योजना की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।


              त्वरित संप्रेषण और विस्तृत प्रसारण की चमत्कारिक सुविधाओं से पूर्ण रेडियो को लार्ड जिन-थिम लिथगो के निर्देशन पर बी० बी० सी० लंदन के लियोनेल और गोयडर ने इस प्रसार माध्यम को अंग्रेजों का भोंपू बना दिया। 1940 ई० में 10 एस. बुखारी डायरेक्टर डायरेक्टर जनरल बने। स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद पाकिस्तान चले गये। अपनी प्रकृति के अनुरूप उन्होंने 'आल इंडिया रेडियो' को खुशामदी संस्कार से परिपूर्ण बना दिया। सन् 1952 ई० में डाॅ. बाल‌कृष्ण विश्वनाथ केसकर सूचना और प्रसारण मंत्री बनाये गये। उन्होंने इस जन माध्यम को राष्ट्रीय धारा से संपृक्त किया। डॉ. जगदीशचन्द्र माथुर जैसे प्रख्यात साहित्यसेवी ने राष्ट्र‌भाषा के द्वारा आकाशवाणी को गौरवान्वित किया। 


                3 अक्टूबर 1957 को विविध भारती और मई जन-जन तक 19665 को 'उर्दू' सर्विस के प्रारंभ होने पर आकाशवाणी को लोकप्रियता के उच्च शिखर पर प्रतिष्ठित किया गया। कला, साहित्य, संस्कृति को जने-पहुंचाने में रेडियो ने अभूतपूर्व भूमिका निभाई। बडे गुलाम अली खाँ, पंडित रविशंकर, गिरिजादेवी, विस्मिल्लाह खाँ, मिश्रबंधु जैसे संगीतज्ञ, सुमित्रानंदन पंत, फिराख गोरखपुरी, इलाचंद्र जोशी, भगवतीचरण वर्मा, अज्ञेय उपेन्द्रनाअश्क, पंडित नरेन्द्र शर्मा जैसे दिग्गज साहित्यकारों ने आकाशवाणी को गौरवान्वित किया। 


               1950 से 60 के मध्य भारतीय फिल्म संगीत पाश्चात्य संगीत से प्रभावित हुआ। आकाशवाणी की नीतियों के अनुरूप संगीतकारों ने पाश्चात्य संगीत का मोह त्यागकर भारतीय संगीत पर आधारित स्वर-रचना प्रारंभ कर दिया। 1982 में उपगृह के माध्यम से 'दूरदर्शन' प्रसारण के राष्ट्रीय विस्तार के कारण आकाशवाणी को झटका लगा। सरकार ने भी इसे अपना 'सौतेला बेटा' मान लिया। इसके अतिरिक्त अधिकारियों की आपसी खींचतान, व्यावसायिक प्रोत्साहन का अभाव कला के ऊपर  आफिसर  का बोलबाला के कारण आकाशवाणी का अपेक्षित उत्कर्ष नहीं हो पा रहा है। चित्रपट, संगीत, फारमाइशी  कार्यक्रम जैसे घिसे- पिटे प्रसारण से दूर रहकर जनता के वर्तमान सामाजिक परिवेश और मानसिक जागरुकता के अनुरूप यदि आकाशवाणी के कार्यक्रम सुनिश्चित हो तो अन्य जनसंचार माध्यमों में इसकी विशिष्ट भूमिका सिद्ध होगी।


(ख) दूरदर्शन की विकास-यात्रा :


              आधुनिक संचार- क्रांति में दूरदर्शन की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। दूरदर्शन तो किसी राष्ट्र की प्रगति का प्रामाणिक व्याख्याता है। यह राष्ट्र के स्वरूप का दर्पण हैं। समस्त संचार माध्यमों में दूरदर्शन ही परिवर्तनकामी तत्व है। विगत दस वर्षों में अपने देश का संपूर्ण परिदृश्य ही बदल गया है, न कोई सपरिवार सैर सपाटे पर निकल रहा है, न पार्को में ही हल्ला मच रहा है, अधिकांश आधिकांश लोगों की नजर टी. वी. पर गड़ी रहती है। कोई सीरियल बहकने न पाए। अब तो सप्ताह के दो -दो दिनों को टी. वी. सीरियल माध्यम से पहचाना जाता है। पहले रविवार का दिन छुट्टी का दिन माना जाता था, जिस दिन बड़े इत्मीनान से रुचिकर कार्यों को पूरा किया जाता था, अब तो प्रमुख धारावाहिक ने गृहिणियों को इस प्रकार व्यस्त कर दिया है कि पुरुप-वर्ग चुप बैठ जाते हैं। खिचड़ी खाकर ही चुप बैठ जाते हैं।


               वस्तुतः दैनिक जीवन में दूरदर्शन की घुसपैठ ने जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। इसके माध्यम से हमारे जीवन में सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है। फलतः जीवन-शैली ही बदल रही है। हमारी रुचि बदल रही है। विभिन्न तेल, शैम्पू, साबुन, वाहन और विद्युत करणों के बिना अब हमारा काम ही नहीं चल सकता। हमें सिनेमा हाल से दूर रखता है। किन्तु पर्सनल सिनेमा, फैमिली सिनेमा, प्राइवेट सिनेमा, एक्सपर्ट सिनेमा को बढ़ावा देता है। जिस देश में दूरदर्शन केन्द्रों का त्वरा और और तत्परता से अपने जाल बिछा है, उसी त्वरा तथा तत्परता से अपनी संस्कृति भी परिवर्तित हुई है। तात्कालिकता, घनिष्ठता और विश्वसनीयता के कारण दूरदर्शन सामाजिक परिवर्तन लाने में सर्वाधिक सशक्त जनसंचार माध्यम है जो एक साथ आदर्श शिक्षक, विकास अभिकर्ता, मनोरंजनकर्ता और सूचना देने वाले के रूप में लाभ एवं लोभ रहित समाज का निर्माता है। इंगलैंड में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार बाल अपराध के मूल में दूरदर्शन द्वारा प्रदर्शित अपराध-दृश्य है। वस्तुतः हर देश की युवा पीढ़ी के उठने, बैठने, चलने, मुस्कराने में टी० वी० मैनरिज्म की स्पष्ट छाप है, यही कारण है कि संप्रति युवा पीढ़ी को 'टी. वी. जेनरेशन' के नाम से पुकारा जाता है। टेलीविजन की महत्ता को रेखांकित करते हुए श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा है-


              "हम दूरदर्शन का विस्तार न केवल मनोरंजन के साधन के रूप में वरन् विकास के लिए शिक्षा के साथन के रूप में करना चाहते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं; यह पद्ध‌ति लोकतंत्र के लिए अत्यंत सहायक होगी। ग्रामों के आधुनिकीकरण में उसका योग निर्णायक हो सकता है। कृषकों के लिए देखना ही विकास करना है।"6


             दूरदर्शन के विकास पर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि विज्ञान में प्रगति करने वाले वाले पाश्चात्य पाश्चात्य देशों में सर्वप्रथम 1920 ई0 में चित्र को वाणी देने की समस्या उठी।1923 में डॉ० बलाडिमिर वोरिकीन ने इस प्रश्न पर गहन चिंतन-मनन किया। इस दिशा में उन्हें सफलता भी मिली। दो वर्ष बाद अमेरिका के जेकिन्स नीज ने यांत्रिक दूरदर्शन उपकरण का प्रदर्शन किया। 1927 ई० में न्यूयार्क और वाशिंगटन के मध्य बेल टेलीफोन लेबोरेटरीज द्वारा तार के माध्यम से टी० वी० कार्यक्रम भेजा गया। धीरे- धीरे इसमें अनेक सुधार किये गए। फाइलो टेलर फन्सवर्थ को दूरदर्शन का आविष्कारक माना जाता है। उसने प्रकाश किरणों को 'इलेक्ट्रानिक सिग्नलों' में बदलने की बात कही, जिसे विश्व के वैज्ञानिकों ने मान्यता दी। फन्सवर्थ के अनुसार बैक्यूअम ट्‌यूब की सहायता से इमेज के प्रसारण और ग्रहण के कार्य सुविधाजनक ढंग से हो सकते हैं। ट्‌यूब को विद्युत शक्ति द्वारा शक्तिशाली बनाना होगा, ताकि वह वायुमंडल में प्रेषित चित्र जाल को कैद कर सके। 10 लाख डॉलर खर्च करने और 12 वर्ष की कठिन तपस्या के पश्चात् अमेरिका का यह अध्यवसायी अपनी प्रयोगशाला से प्रथम प्रसारण में क्राकर बैंक में रखे एक डिब्बे पर डालर का एक चित्र संप्रेषित किया। दुनिया का सर्वप्रथम टेलीविजन प्रसारण यही था।


            1936 ई० में सर्वप्रथम दूरदर्शन के नियमित कार्यक्रम को बी.बी. सी. ने प्रारंभ किया। 1939 ई० में न्यूयार्क में लगे विश्व मेला में जनता ने टी. वी. को देखा। 15 सितम्बर 1959 ई० को यूनेस्को की सहायता से भारतीयों ने दूरदर्शन का आनंद लिया। 15 अगस्त 1965 से भारत में नियमित रूप से एक घंटे का टी. वी का कार्यक्रम शुरू में हुआ। डॉ. विक्रम साराभाई के प्रयास से 1967 ई. में अहमदाबाद में S.A.C. (Space of ApplicationCantre) की स्थापना हुई। । साथ ही ग्रामोन्मुखी आवश्यकताओं के अनुरूप खेड़ा (गुजरात) में साइट SITE (Satellite Instructional Televison Experiment) ने उपग्रह शैक्षणिक दूर संचार के क्षेत्र में आशातीत सफलता प्राप्त की। 


          1964 ई. में भारत में दूरदर्शन की विकास-यात्रा प्रारंभ हुई। पहले दिल्ली केन्द्र ही एकमात्र टेलीविजन केन्द्र था। आकाशवाणी के अंग के रूप में यूनेस्कों की सहायता से 15 सितम्बर 1959 को विद्यालयों और गाँवों के लिए दूरदर्शन की प्रायोगिक सेवा का श्रीगणेश हुआ। सामूहिक रूप से  देखने के लिए टेलीविजन सेटों की व्यवस्था की गई थी। अप्रैल 1966 ई. में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में चंदा समिति ने दूरदर्शन को आकाशवाणी से पृथक करने और दोनों के संचालन हेतु स्वायत नियम बनाने की सिफारिश की। 11अप्रैल 1976 को पहली सिफारिश क्रियान्वित हुई, जो अब तक चल रही है। सूचना प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध दूरदर्शन के लक्ष्य निम्नलिखित हैं-


           1. सामाजिक परिवर्तन में प्रेरक भूमिका निभाना ।


           2. राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन देना।


           3. जन-सामान्य में वैज्ञानिक चेतना जगाना ।


            4. परिवार कल्याण और जनसंख्या - नियंत्रण के संदेश को प्रसारित करना।


             5. कृषि उत्पादन प्रोत्साहित कर हरित - क्रांति और पशुपालन को बढ़ावा देकर 'श्वेत क्रांति' के क्षेत्र में प्रेरणा देना।


            6. पर्यावरण - संतुलन बनाने रखना ।


            7. गरीब और निर्बल वर्गों हेतु सामाजिक कल्याण के उपायों पर बल देना।


             8. खेल-कूद में रुचि रखना।


            9. भारत की कला और सांस्कृतिक गरिमा के प्रति जागरूकता पैदा करना।


              15 अगस्त 1982 से भारत में रंगीन दूरदर्शन का सूत्रपात हुआ। नवम्बर 82 में नवें एशियाई खेलों को दूरदर्शन के माध्यम के प्रदर्शित करने हेतु 100 वाट के 20 ट्रांसमीटर आयात हुए। इनके द्वारा देश के दूरस्थ क्षेत्रों में दूरदर्शन का आनंद उठाया गया। भारत में पहली बार स्वदेशी उपग्रह इन्सेट 1-ए अप्रैल 82 में छोड़ा गया, जिनके कारण राष्ट्रीय कार्यक्रमों का एक साथ प्रसारण हुआ। अक्टूबर 1983 से इन्सेट 1-बी कार्य कर रहा है। पहले दूरदर्शन महानगरीय संस्कृति के आभिजात्य वर्ग के मनोरंजन का साधन मात्र था। कला, संगीत तथा नाटक का ही प्रदर्शन होता था। 1984-1985 तक यह माध्यम सारे देश के घर-घर पहुँच गया। इसकी प्रसारण अवधि भी सारे देश में क्षेत्रीय कार्यक्रमों के साथ राष्ट्रीय कार्यक्रमों के रूप में बढ़ गई। धारावाहिकों और राष्ट्रीय प्रसारणों ने दर्शकों की रुचियों में परिवर्तन प्रारंभ कर दिया है। 'नेटवर्क' कार्यक्रमों ने संस्कृति, साहित्य, कला एवं जीवनोपयोगी प्रसारणों द्वारा जनता जनार्दन को गौरवान्वित किया है। कुतुबमीनार से तीन गुना ऊँचा पीतमपुरा टी.वी. टावर का उद्‌घाटन 1988 ई. में हुआ।


             भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय में 6 दिसम्बर, 1982 को घोषणा की गई कि एक कार्यदल गठित किया गया है, जिसका प्रधान उद्देश्य दूरदर्शन के कार्यक्रमों का प्रारूप तैयार करना है। दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों का उद्देश्य राष्ट्र में एवं सामाजिक, आर्थिक विकास की प्रक्रिया में सहायक होना और लोगों को सूचना, शिक्षा और मनोरंजन प्रदान करना है। 


             आकाशवाणी और दूरदर्शन के विकास में वर्गीस समिति की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। चूँकि आकाशवाणी और दूरदर्शन की स्वायत्तता के बारे में वर्गीस समिति ने समीक्षा प्रस्तुत की। उस समय दिल्ली केन्द्र सामान्य दर्शकों हेतु 1965 से ही नियमित सेवा शुरू कर चुका था। अन्य छह केन्द्र मुम्बई (72), श्रीनगर (73) अमृतसर (73) कुलकत्ता (75), मद्रास (75) तथा लखनऊ (75) भी कार्य करने लगा था । इन तमाम केन्द्रों से कला, संगीत, विशेष प्रकार के नाटकों के प्रदर्शन- संबंधी कार्यक्रम प्रदर्शित हुए। जनवरी 1976 से केन्द्रों से विज्ञापन सेवा भी प्रसारित हुए। अगस्त 1975 से उपग्रह शिक्षा दूरदर्शन परीक्षण के अंतर्गत छह राज्यों के 2330 गांवों में सीधे दूरदर्शन कार्यक्रम ग्रहण करने वाले सेटों पर देश की बहुत विशाल आबादी ने शिक्षाप्रद और रोचक कार्यक्रम देखें।


            वर्गीस समिति ने लागत लाभ के सिद्धांत के आधार पर सिफारिश की कि अगले 10-15 वर्षों तक रोडियों के विकास की ओर ही ध्यान देना चाहिए। उनकी सात मान्यता थी कि रेडियो सर्वसुलभ सस्ता माध्यम है। 1 घंटे के दूरदर्शन कार्यक्रम पर रेडियों के कार्यक्रम से ही 8 या 10 गुना अधिक व्यय आता है। समिति ने जिला स्तर पर आकाशवाणी केन्द्र बनाने का सुझाव दिया।


(1) दूरदर्शन हेतु अपेक्षित क्षमताएँ :


             दूरदर्शन पत्रकारिता में संकलन, लेखन एवं प्रस्तुतीकरण संबंधी विशिष्ट क्षमताएँ अपेक्षित होती हैं-

             साधना और तपस्या का पुजारी ही लेखक होता है। वास्तव में लिखने की क्षमता उनमें होती है, जिनके अंदर लगन है, विचार है, अनुराग है, समाज-सेवा की भावना है। समाज का दर्द है तथा मूक को वाणी देने की व्यग्रता है। सक्षम महान लेखक अपने पाठक का मित्र एवं शुभेच्छु होता है। दूरदर्शन पत्रकारिता में आलेख, संकेत पट्टिका, ग्राफ लिखने और तैयार करने वाले को लेखक माना जाता है। समाचारों के लिए चित्र अंकित करने वाले, विडीयो, टेपरिकार्डियाँ का कार्य करने वाले भी लेखक हैं। वृत्त लेखक दूरदर्शन का श्रृंगार है जो कम से कम शब्दों में बहुत कुछ कह देता है।


            कैमरे के सामने अथवा फिल्म पर काम करने वाले को प्रतिभा कहा जाता है। दूरदर्शन संवाददाता घटनाक्रम का चल-चित्रांकन करता है तथा वह परिचयात्मक विवरण प्रस्तुत करने हेतु भाषागत सामर्थ्य और वाणी की विशिष्ट शैली का मर्मज्ञ होता है।'7


            विविध स्रोतों से प्राप्त समाचारों के संपादन का उत्तरदायित्व समाचार संपादक का होता है। वह समाचारों को महत्त्व के अनुसार क्रमबद्ध कर उसे संपादित करता है। तथा उसे समाचार वाचक के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य बनाता है। समाचार को प्राविधिक नजरिये से प्रसारित करने की दिशा में समाचार संयोजक सतत सन्चेष्ठ रहता है। प्रसारण के पूर्व वह समाचार संपादक से आवश्यक विचार विमर्श कर अपेक्षित तैयारी कर लेता है।


             'दूरदर्शन में कार्यरत पत्रकार को लेखन, शब्द-ध्वनि, व्यक्तित्व के के साथ विडियो टेक्नीक्स, साउण्ड टेक्नीकस, फिल्म टेकनीक में पारंगत होना चाहिए। विडीयो टेप रिकार्डिंग, फिल्म स्टील फोटोग्राफ एवं ग्राफ संबंधी प्राविधिक जानकारी चित्र स्रोत हेतु अपरिहार्य है। माइक्रोफोन वीडियो टेपरिकार्डिंग फिल्म ओडोटेप रिकार्डिंग, फोनोग्राफ से संदर्भित ध्वनि की सम्यक जान‌कारी दूरदर्शन पत्रकार के लिए आवश्यक है। मान‌चित्र, चार्ट्स, डायग्राम विचार के सहयोगी है, उनके प्रदर्शन की क्षमता से पूर्ण पत्रकार ही दूरदर्शन के परदे पर विशिष्ट स्थान बना सकता है।'8


(2) दूरदर्शन समाचार :


            आकाशवाणी, समाचार और दूरदर्शन में समाचारों का अपना अलग स्वरूप होता है। टी. वी. पर समाचार वाचकों को देखा जा सकता है। विदेशों में वाचक को चेहरा कम से कम और कैमरा कवरेज अधिक से अधिक होता है। जबकि अपने यहाँ के दूरदर्शन समाचार में मेकअप में लिपे-पुते चेहरों पर ही दृष्टि केन्द्रित होती है। दूरदर्शन में नाटकीयता का विशेष महत्त्व है। दूरदर्शन के परदे पर घटनाक्रम का देखना समाचार की विश्वसनीयता को बढ़ाना है। सर्वप्रथम घटना के चरमोत्कर्ष का प्रदर्शन होता है। उसके बाद घटना के कारण और प्रभाव को इंगित किया जाता है।


             चित्रात्मकता दूरदर्शन समाचार का प्राण-तत्व है। एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है। तात्पर्य यह कि हजारों शब्दों में जिस स्थिति, भाव या घटना की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती, उसे हम एक चित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं। चित्र तो शब्द रहित काव्य है। चित्र समाचार के आभूषण तो होते ही है साथ में दर्शकों के मानस को मथने वाले भी होते हैं। दूरदर्शन के चित्र स्वतः बोलते हैं, दर्शकों को भाव- विह्वल कर देते हैं।


             संक्षिप्तता दूरदर्शन समाचार का महत्त्वपूर्ण अंग है।। मुद्रित माध्यमों में व्यास शैली वरेण्य हो सकती है, परंतु दूरदर्शन तो अति संक्षिप्तता पर ध्यान देता है। संक्षिप्त किंतु स्पष्ट रूप से विश्व की गतिविधि को जन-जन तक पहुँचाना ही दूरदर्शन की विशेषता है। देश-विदेश में घटित घटनाओं की जानकारी समाचार-पत्र तो अगले दिन प्रात: ही दे पाते हैं। इसलिए रात भर की प्रतीक्षा किये बिना हम दूरदर्शन समाचार देख-सुन लेते हैं। इसमें विजुअल का अधिक महत्त्व होता है। दिखाने में जरा भी चूक होती है तो दर्शकों के सैकड़ों सवालों से दूरदर्शन की स्थिति दयनीय हो जाती है।


            दूरदर्शन में संवाद की प्रस्तुति कलात्मकता पर अधिक निर्भर होती है। टी. वी. के समाचार वाचक को हम मात्र वाचक ही नहीं मानते,  उन्हें तो Newspresenter भी कहते हैं। समाचार वाचक ऐसा कुशल अभिनेता होता है जो दूरदर्शन के पर्दे पर Motion picture play, Variety Show, अथवा Stage play का देदीप्यमान नायक बनता है। वह समाचार को प्रदर्शन योग्य बनाता है। वह व्यक्तिगत रिपोर्टिंग, समाचार - लेखन शैली, विविध संवादों की क्रमबद्धता, चित्रात्मकता द्वारा प्रभाव पूर्ण प्रस्तुति पर विशेष जोर देता है। वाचक का व्यक्तित्व, उसकी वाणी का उतार-चढ़ाव एवं समाचार वाचन की शैली समाचार को जीवंत बनाती है। वाचक के मुस्कराने, आंख झपकाने और भौहों के तानने का दूरद‌र्शन समाचार पर वही प्रभाव पड़ता है जो समाचार के संवाद में सम्मति जोड़ने का होता है। टेली पत्रों के टेली प्राम्प्टर और संकेतपट्‌ट समाचार को व्याख्यायित करने में महत्त्वपूर्ण होते हैं। वाचक और नियंत्रण कक्ष के मध्य मंच प्रबंधक संपर्कसूत्र का कार्य करते हैं। समाचार के सारथी समाचार वाचक सामान्य आदमियों के लिए समाचार निर्माता, प्रस्तुतकर्ता, संपादक सभी कुछ होता है। दूरदर्शन पत्रकार शिक्षक और विकास अभिकर्ता होता है। वह ऐसा शिक्षक है जो भौतिक वातावरण के बदलने के साथ- साथ मानव-मन की आंतरिक कलियों को विकसित करता है।'9 दूरदर्शन पत्रकार एक साथ निवास कार्यकर्ता, परिवर्तनकी और मनोरंजन कर्ता होता है। अर्थव्यवस्था, समाजनीति, संस्कृति और विज्ञान की बातों को टी. वी. पत्रकार इस रूप में प्रदर्शित करता है। एक साधारण किसान भी अनायास कह बैठता है-'अरे यह तो मेरी ही जिंदगी है। इस मनोरंजन सूचना और शिक्षापरक जनमाध्यम का भविष्य अपने राष्ट्र में समुज्ज्वल है। यद्यपि कुछ लोग इसे 'सत्ता-दर्शन, दुष्ट-दर्शन' 'भ्रष्ट-दर्शन' कह देते हैं, परंतु राष्ट्र की 75% जनता का सच्चा हमदर्द दूरदर्शन जैसा शक्तिशाली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया है, जिससे जन-मानस का उन्नयन हो रहा है। अपने भीमकाय विस्तार के साथ दूरदर्शन सूचना-संदेश पहुंचा कर जनमत - निर्माण में क्रांतिकारी भूमिका निभा रहा है।


 (3) प्रसार भारती :


             'मुक्त आकाश पर बुद्धवाणी यानी आकाशवाणी' और 'सत्ता दर्शन यानी दूरदर्शन' की छवि सुधारने की दिशा में समय- समय पर सोचा गया। टी. वी. और रेडियो में गुणवत्ता आए, सरकारी नियंत्रण तथा नौकरशाही जकड़‌बंदी से इन्हें मुक्ति मिले अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ जनमानस के उन्नयन में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कैसे सार्थक हो, इन प्रश्नों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया। सन् 1966 ई० में चन्दा समिति समिति और 1976 में में वर्गीज समिति ने आकाशवाणी और दूरदर्शन की स्वतंत्रता और इनके विविध पक्षों पर विशद् विवेचन प्रकट किया। सर्वप्रथम सन् 1977 ई० में जनता पार्टी सरकार के समक्ष राष्ट्रीय संचार की स्वायत्ता की समस्या उपस्थिति हुई, क्योंकि आपातकाल में संचार साधनों के साथ व्यभिचार हुआ। वर्गीज समिति ने 'आकाश भारती' नामक राष्ट्रीय प्रसारण न्यास स्थापित करने की आवश्यकता बतलाई। सन् 1979 ई० में जनता सरकार ने 'प्रसार भारती' विधेयक प्रस्तुत किया जो सत्ता-परिवर्तन के कारण अधर में लटक गया। 20 वर्षों बाद राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने 29 दिसम्बर, 1989 को 'प्रसार भारती' विधेयक संसद में प्रस्तुत किया।


(4) प्रसार भारती' का स्वरूप :


              आकाशवाणी और दूरदर्शन को स्वायत्तता देने हेतु 'प्रसार भारती' विधेयक के अंतर्गत दूरदर्शन और आकाशवाणी के दो अलग-अलग विभाग होंगे, जिसके प्रबंध के लिए एक निगम होगा। निगम के प्रबंधक के लिए नौ सदस्यों का एक निर्देशक मंडल होगा, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की अनुशंसा पर करे। नियुक्ति समिति में राज्यसभा के सभापति, भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष तथा राष्ट्रपति द्वारा नामित एक विचारक होगा। विधेयक में प्रसार परिषद् के गठन का प्राविधान है, जिसमें एक अध्यक्ष के अतिरिक्त राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत दस सदस्य होंगे। यह परिषद सुनिश्चित करेंगी कि 'प्रसार भारती' निर्बाध सूचना प्राप्त करने के नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं को एवं राष्ट्र की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता में एकता बनाए रखे।। 'प्रसार भारती' के बारे में शिकायत सुनकर उसे दूर करने की चेष्टा भी परिषद्‌ द्वारा होगी। विधेयक में प्राविधान है कि 'प्रसार भारती' निगम संसद के माध्यम से भारत की जनता के प्रति उत्तरदायी होगा। निगम देश की एकता, अखंडता तथा संविधान में निहित लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों को सर्वोपरि रखकर कार्य करेगा। केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून- व्यवस्था के हित में समय-समय पर प्रसारण रोकने के निर्देश देने का अधिकार होगा, जिसकी प्रति संसद में रखनी होगी। 


             विधेयक के अनुसार ''सरकार चाहती है कि, प्रसार भारती भारती निगम वास्तविक रूप में स्वायत मिकाय हो, जो गतिशील, प्रामाणिक और विश्वसनीय हो। 'प्रसार भारती' का लक्ष्य स्वतंत्र, निष्पक्ष और वस्तुगत कार्यक्रम प्रस्तुत करना है।"(10)


              विधेयक के संदर्भ में पूर्व सूचना-प्रसारण मंत्री पी. उपेन्द्र का कथन है कि स्वायत्तता को अनुशासनहीनता का अधिकार पत्र नहीं मानना चाहिए। इससे तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सत्ताधारियों एवं बड़े उद्योगपतियों के चंगुल से बचाये रखा जायेगा। वास्तव में शिक्षा, समाचार और मनोरंजन के तीन लक्ष्यों द्वारा लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों को सर्वोपरि बनाना 'प्रसार भारती' का लक्ष्य है।


             वर्गीज और पी० सी० जोशी के सुझावों के अनुरूप बहुभाषी बहुक्षेत्रीय, बहुआयामी रंगारंग जन-जीवन के सपनों, सरोकारों और सवालों से संबद्ध 'प्रसार भारती' भविष्य में एक सशक्त इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रूप में समाहत होगी। स्वायतत्ता एक सांस्कृतिक वातावरण है, एक जीवन मूल्य है। इसे कानून से नहीं प्राप्त किया जा सकता और न सरकार देंगी। इसे तो चरित्रता और निर्भयता से प्राप्त किया जा सकता है। यदि कोई कृपापूर्वक इसे देता है, तो वह अपने दूरगामी लक्ष्यों की सिद्धि हेतु अपने नियम और व्याख्या इस प्रकार स्वायत्तता व्यक्तिगत सोच पर आधारित है। 'मुंडे- मुंडे मतिर्भिन्ना' की बात देखी जाती है।


(ग) फिल्म :


             सिनेमा के आविष्कार में प्रथम महत्त्वपूर्ण प्रयास 'जैट्राप' नामक यंत्र है, जिसका निर्माण 1835 ई. के आसपास हुआ था। यह एक ऐसा यंत्र था, जिसमें बहुत से चित्र चर्खी में पास-पास चिपका दिये जाते थे। इसके आगे एक चर्बी लगी होती थी। जब जैट्राप को घुमाया जाता, तब दृष्य को चित्रों की गति होने का आभास होता। सिनेमा के अगले यंत्र के आविष्कार के पूर्व, एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक बुइस डेभ्युरे ने सन् 1839 ई० के आस-पास फोटोग्राफी के कैमरे का आविष्कार किया। धीरे-धीरे यह कैमरा विकसित होता गया और इसने सैन फ्रांसीसी को एक फोटोग्राफर को मूवी कैमरे के आविष्कार की प्रेरणा मिली, उसने सन् 1877 ई० में एक प्रयोग किया। उसने एक पंक्ति में पच्चीस कैमरे लगाकर लगातार एक भागते हुए घोड़े के चित्र उतारे थे। इस प्रयोग के लिए माइब्रिज ने सभी कैमरों के शटर एक तागे से इस प्रकार बाँधे थे कि जब थोड़ा उन कैमरों के सामने से दौड़ा, तब एक के बाद एक तागा टूटता गया और खुलकर बंद होते गये तथा इस प्रक्रिया से भागते हुए घोड़े के एक के बाद एक पच्चीस चित्र खिंच गए। उस सभी चित्रों को जब एक साथ रखकर देखा गया, तो ऐसा प्रतीत होता था कि मानों घोड़ा दौड़ रहा है। लेकिन इस प्रयोग मात्र से माइब्रिज को सिनेमा के आविष्कार का जनक नहीं माना गया।


             वस्तुतः सिनेमा यंत्र का आविष्कारक बनने का श्रेय महान वैज्ञानिक टामस एल्वा एडीसन को प्राप्त हुआ। एडीसन को 'एनोग्राफ' और 'इलेक्ट्रानिक बल्ब' का आविष्कारक होने का भी गौरव प्राप्त है। वे सिनेमा यंत्र के आविष्कार के लिए निरंतर प्रयास करते रहे और अंततः सन् 1889 ई० में वेस्ट ओरंज, रूजर्सी (संयुक्त राज्य अमरीका) स्थित अपनी अप प्रयोगशाला में 'किनेटोस्कोप' नामक सिने यंत्र का सफल एवं ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। वस्तुतः यंत्र एक प्रकार की मशीन थी, जिसमें पचास फीट लंबी चलती-फिरती तस्वीरें 'मेग्नीफाईंग'लेंस द्वारा देखी जा सकती थीं।


              भारत में सिनेमा का श्रीगणेश उन्नीसवी शताब्दी के अंत में, उसके आविष्कार के कुछ ही वर्षों के अंतर्गत हो गया था। स्व० दादा साहब फालके को भारत में सिनेमा का जनक माना जाता है। यद्यपि फालके साहब को 'भारतीय सिनेमा का पिता कहा गया है, फिर भी उनके अतिरिक्त भी फिल्म निर्माण अथवा प्रदर्शन के कुछ प्रयास किये गये थे, जिनमें से कुछ का अधिकारिक प्रसारण भी उपलब्ध होता है।


              इस दिशा में फ्रांस के ल्यूमिए बंधुओं का योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। ल्यूमिए बंधुओं ने व्यापारिक दृष्टिकोण से फ्रांस में किनमेटोस्कोप का प्रसारण किया और नवीन अनुसंधानों के द्वारा व्यवस्थित करके छोटी-छोटी फिल्मों का प्रदर्शन किया। उन्होंने इन लघु फिल्मों के प्रदर्शन के लिए पेरिस कैफे में एक छर्विगृह खोला, जो केवल इसी कार्य के लिए नियत था। भारत में भी बम्बई के वाटसन्स होटल में 7 जुलाई, 1896 को ल्यूमीए बंधुओं के सहयोग से प्रथम बार फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। बम्बई में इन लघु फिल्मों का प्रदर्शन निःशुल नहीं था, बलि दर्शकों को दो-दो रुपये प्रवेश शुल्क देना पड़ता था। यह उल्लेखनीय है कि उस समय के दो रूपये का मूल्य आज के सौ रुपये से कम किसी भी हालत में नहीं था। फिर भी इतने महंगे टिकट खरीदकर विज्ञान के इस नये चमत्कार को देखकर दर्शक अभिभूत हो गए।


(1) हिन्दी की प्रथम फिल्म :


            प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर भारत में फिल्म निर्माण का श्रीगणेश दादा साहेब फालके द्वारा निर्मित एवं प्रदर्शित फिल्म 'राजा हरिश्चन्द्र' से होता है। इस फिल्म का प्रदर्शन बम्बई में, सैण्डहर्स्ट रोड पर स्थित कोरोनेशन थियेटर में हुआ था। इस फिल्म के प्रदर्शन तिथि के बारे में सिने इतिहासकार एकमत नहीं हैं। किन्तु इसका निर्माण सन् 1912 हुई में ही कर लिया गया था। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया, बम्बई द्वारा प्रकाशित 'इंडियन टाकी' (1931-56) के अनुसार इस फिल्म का प्रदर्शन कोरोनेशन थियेटर, बम्बई में दिसम्बर, 1912 में किया गया था। बच्चन श्रीवास्तव के अनुसार इस फिल्म का प्रदर्शन अप्रैल 1913 में हुआ था। ठीक ऐसा ही मत श्री द्वारका प्रसाद शास्त्री का भी है।

    

             'राजा हरिश्चंद' फिल्म को हिन्दी भाषा की भी प्रथम फिल्म होने का गौरव प्राप्त है। इसका प्रमाण यह है कि इस फिल्म में कथा विकास को दर्शाने के लिए 'हिन्दी टाइटल्स' का प्रयोग किया गया है और साथ में अंग्रेजी अनुवाद भी किया गया है। इस तरह मराठी भाषी होते हुए भी दादासाहेब फालके ने महात्मा गांधी भाँति हिन्दी भाषा के राष्ट्रव्यापी स्वरूप को पहचान के लिए था और उसी को उन्होंने अपनी इस प्रथम मूक फिल्म को समझाने का माध्यम स्वीकार किया था। मराठी और बांग्ला भाषा का प्रयोग उन्होंने नहीं किया । इस फिल्म में दादा फालके ने भारतमुनि का नाट्य- परंपरा के अनुरूप ही रंगमंचीय स्वरूप प्रदान कर हिन्दी साहित्य की नाट्‌य- परंपरा के रूप में हमारे सामने रखा था। इस फिल्म के निर्माण की एक पूरी रील भी उपलब्ध होती है, जिससे दादा साहब फालके को निर्देशित करते हुए देखा जा सकता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि दादा साहब फालने यह जानते थे कि वे जिस नई विधा का सूत्रपात भारत में करने जा रहे है, वह एक ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य है।


            अतएव, भारतीय सिनेमा के इतिहास का आरंभ 'राजा हरिश्चन्द्र' फिल्म से स्वीकार करना ही अधिक उपयुक्त है। सन् 1917 ई० तक क्षेत्र में दादा साहब फालके ही एकमात्र निर्माता थे। इस समय तक उन्होंने 23 फिल्मों का निर्माण किया था, जिसमें  'भस्मासुर मोहिनी', 'सत्यवान सावित्री' और 'लंकादहन' आदि फिल्में विशेष लोकप्रिय सिद्ध हुईं। 


             भारत की पहली कथा फिल्म 'पुंडलीक' सिर्फ दो हफ्ते चली थी और तोरणे उसके बाद दृश्य से हट गए थे, लेकिन फालके अपनी फिल्म की अपार सफलता से न सिर्फ खुद प्रोत्साहित हुए, वरन उन्होंने यह भी स्थापित कर दिया कि फिल्म व्यवसाय मुनाफे का धंधा है। 'राजा हरिश्चन्द्र' के पश्चात दादा अपना दादर स्थित स्टूडियों उठाकर नासिक ले गए और वहाँ उन्होंने तीन महीने के अंदर 'मोहिनी भस्मासुर' फिल्म बनाई, जो 1913 के के दिसम्बर के अंत में बम्बई के ओपंपिया थिएटर में लगी। यह भी एक घंटे की फिल्म थी। इस फिल्म में दुर्गाबाई और कमला नामक स्त्री पात्र मिल गई थी। ये दोनों माँ बेटी रुपहले पर्दे की पहली महिला कलाकार साबित हुई। इस फिल्म के साथ फालके ने अपने ही द्वारा निर्मित दो लघु चित्र 'पिठाचे पजे' और 'गोदावरी दृश्यावली' भी प्रदर्शित किये थे। अपनी तीसरी फिल्म 'सत्यवान -सावित्री' के लिए फालके को चार स्त्री पात्र मिल गई। चार हजार फुट की यह फिल्म बहुत कम समय में फिल्माई गई और जून 1914 में ओपंपिया में रिलीज हुई। यह फिल्म बम्बई में दो हफ्ते चली और इसके लिए भी दर्शक खूब उमड़े। खूब कमाई हुई, लेकिन इसे दादा का समर्पण भाव ही कहा जाएगा कि उन्होंने फिल्मों से कमाया पैसा अपने स्टूडियो और मशीनों की बेहतरी में लगाया। फालके अपनी पहली तीन फिल्में लेकर लंदन गये, जहाँ उनकी मांग थी।


              द्वितीय विश्वयुद्ध के छिड़ने के बाद फिल्म उद्योग के सामने जो बहुत बड़ी कठिनाई आई, कच्ची फिल्म पाने की। कच्ची फिल्म के लिए भारत पूरी तरह विदेशी आयात पर निर्भर था। इसलिए फिल्मों की लम्बाई कम करने का सुझाव आया, परंतु इस पर अमल करना कठिन था। युद्ध काल में लाभ बढ़ जाने के कारण निर्माताओं की संख्या बढ़ जाने के कारण इस उद्योग में वृद्धि हुई।


              तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की स्पष्ट छाप भी फिल्मों में दिखाई पड़ने लगी थी। गांधीजी ने 'हरिजन उद्धार अभियान' में प्रभावित फिल्म 'अछूत' का निर्माण चन्द्रकलाल साह ने 1940 ई. में किया। बाम्बे टॉकीज ने अपनी फिल्म 'कंगन' की सफलता को, वही फार्मूला अपनाकर 'बंधन' में दुहराया। मेहबूब की प्रसिद्ध फिल्म 'औरत' (जिसे उन्होंने बाद में मदर इंडिया नाम से फिर बनाया) भी इसी साल बनी। प्रभात की संत ज्ञानेश्वर भी संत तुकाराम के समान ही सफल रही। अगले ही वर्ष बाम्बे टॉकीज ने कंगन और बंधन के फार्मूले पर पर ही झूला बना कर सफलता की तिकड़ी पूरी की। इसी साल सांप्रदायिक सद्‌भाव पर शांताराम प्रभात अलग हो गए। सोहराब मोदी की दूसरी ऐतिहासिक फिल्म 'सिकन्दर' को भी अच्छी सफलता मिली। केदार शर्मा ने भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास पर 'चित्र‌लेखा' पर फिल्म का निर्माण किया। मराठी के प्रसिद्ध लेखक पी० के० अत्रे ने अपनी स्वयं की फिल्म निर्माण संस्था स्थापित करके 'चरणों की दासी' बनाई। इस दौरान पारिवारिक संबंधों और समस्याओं पर कई फिल्में बनीं और यह प्रवृत्ति कमोबेश अभी तक फिल्मों में मौजूद रही। फिर भी अनपेक्षित रूप से सर्वाधिक सफलता मिली। लाहौर में दलसुख पंचाली निर्मित और मोती गिंडवानी निर्देशित खचांजी को काफी सफलता मिली। गुलाब हैदर द्वारा इसमें पंजाबी लोक संगीत का अच्छा उपयोग किया गया था। मद्रास में महात्मा शीर्षक से एक पूरी लम्बाई का वृत्त चित्र बनाया गया। ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के कार्यकलाप पर लघु चित्रों के निर्माण के लिए एक फिल्म सलाहकार बोर्ड बनाया। इसी साल सिंधी की पहली फिल्म 'एकता' का निर्माण वाड़िया मूवीटोन ने किया, जो हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश देती थी। सांप्रदायिक सद‌भाव पर बनी फिल्म 'भक्त कबीर' में भारत भूषण ने कबीर की भूमिका की और 'भक्त -सूरदास' की मुख्य भूमिका सैगल ने निभाई। अभिनय चक्रवर्ती निर्देशित बाम्बे टॉकीज की वसंत ने हीरक जयंती मनाई, जिसमें पन्नालाल घोष का संगीत था। इसके गीत इतने लोकप्रिय हुए कि पन्नालाल घोष पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गए। इस फिल्म में मधुबाला भी पहली बार परदे पर आई आई थी। 'मेहबूब की रोटी' प्रगतिशील विचारधारा का संदेश लिए हुई थी, तो देवकी बोस की फिल्म 'अपना घर' आजादी के लिए अहिंसक लड़ाई में गांधीजी के सिद्धांत पर आधारित थी। विजय भट्ट ने भरत-मिलाप बनाकर पौराणिक फिल्मों की नई लहर को जन्म दिया। कारदार की शारदा, किशोर साहू की कुंआरा बाप और पंचोली की खानदान भी सफल फिल्मों में उल्लेखनीय है


             युद्ध का पूरा प्रभाव अब तक फिल्म उद्योग अनुभव करने लगा था। कच्ची फिल्मों की कमी के कारण 1930 में फिल्मों की लंबाई 11 हजार फुट तक सीमित कर दी गई। सरकार ने अब एक लाइसेंस प्रणाली लागू कर दी थी। काँग्रेस द्वारा सरकार के युद्ध-प्रयलों में असह‌योग की नीति का फिल्म निर्माता भी अनुसरण कर रहे थे। थे। कच्चा स्टॉक पाने के लिए युद्ध प्रयत्नों में सहयोग, कम से कम एक फिल्म प्रतिवर्ष बनाना, एक शर्त बना दी गहरी, सेंसरशिप सख्त कर दी गई। राष्ट्रवादी गीत, राष्ट्रीय नेताओं के चित्र और महात्मा गांधी बारे में किसी भी उल्लेख पर प्रतिबंध लगा था। ऐसे उल्लेख नहीं कर सारे शब्द बेरहमी से काट दिए जाते, जिनसे संघर्ष या विजय का संकेत भी मिलता हो। इसलिए हल्की-फुल्की संगीतमय मनोरंजन प्रधान फिल्मों का चलन बढ़ा। अलबत्ता इन फिल्मों में भी परोक्ष रूप से' गीता संवाद' में राष्ट्रीय भावनाएँ बड़ी चतुराई से पिरोई जाने लगी। युद्ध के कारण आई मुद्रास्फीति के कारण टिकट खिड़की पर भीड़ बढ़ने लगी। 'किसमत, 'शकुंतला' और 'रामराज्य' ऐसी तीन फिल्में थीं, जो 1943 में बेहद सफल हुई। बॉम्बे टॉकीज के लिए एस. मुखर्जी द्वारा निर्मित, ज्ञान मुखजी द्वारा निर्देशित 'किसमत' में अनिल विश्वास का संगीत था। यह फिल्म कलकत्ता में लगातार तीन साल आठ महीने चली। इस फिल्म का गीत ''दूर हटो ए दुनिया वालो, हिन्दुस्तान ह‌मारा है।" देश भक्ति के संदेश के रूप में बहुत लोकप्रिय लोकप्रिय हुआ। इसका 'दूर हटो' आह्वान गांधीजी के 'भारत छोड़ो आंदोलन' का समानार्थी समझा जाने लगा था।


               प्रभात छोड़कर आए शांताराम ने राजकमल कला मंदिर स्टूडियो स्थापित किया और 'शकुंतला' नामक फिल्म बनाई। यह फिल्म बम्बई में लगातार दो वर्ष से भी अधिक चली। कुछ ऐसी ही सफलता विजय भट्ट निर्देशित फिल्म "रामराज्य'साल  को भी मिली। इसी सैगल अभिनीत तानसेन और सोहराब मोदी की तीसरी ऐतिहासिक फिल्म 'पृथ्वी बल्लभ' उल्लेखनीय है। 'मेहबूब की तकदीर' में नरगिस पहली बार नायिका बनी। चूँकि युद्ध लम्बा खिंचता जा रहा था, इसलिए 1944 ई० भी संगीतप्रधान मनोरंजक प्रेम कहानियों की भीड़ रही। इनमें रतन बहुचर्चित और बहुत लोकप्रिय हुई। जागीरदार के निर्देशन में बनी प्रभात की फिल्म रामशास्त्री एक बढ़ि‌या जीवनी फिल्म थी।


           युद्ध के अंतिम वर्ष यानी 1945 ई. में भी संगीत प्रधान, रोमांटिक मेलोड्रामाई और छद्म ऐतिहासिक फिल्में बनती रहीं, किन्तु फिल्म निर्माण में गिरावट आई। इस साल कुल 99 फिल्म बनीं, जिनमें से 74 हिन्दी थी। इसी साल न्यू थिएटर्स की अंतिम फिल्म 'हमराही' बनी, किन्तु इसी फिल्म से एक ऐसे नए फिल्मकार का उदय हुआ, जो आने वाले वर्षों में फिल्म जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ गया है। ये फिल्मकार विमल राय थे, जिन्होंने हमराही की पटकथा - लेखन, फोटोग्राफी और निर्देशन किया था। इसी फिल्म में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीत 'जन गण मन' का भी उपयोग भी किया गया था, जो स्वतंत्र भारत में राष्ट्र‌गान के रूप में स्वीकार किया गया। यही वह समय था, जब भविष्य के कुछ बहुत बड़े फिल्मी सितारे, फिल्मों में अपना स्थान बनाने के लिए संघर्ष करे रहे थे। दिलीप कुमार 1944 ई० में बाम्बे टॉकीज की फिल्म 'ज्वार-भाटा' में परदे पर पर आ चुके थे। राजकपूर भी इस समय तक सक्रिय हो गए थे और अंततः 1947 ई० में मधुबाला के साथ नीलकमल में हीरो के रूप में आर एस देव आनंद ने 1946 में प्रभात फिल्म 'हम एक है' से शुरुआत की । नरगिस, कामिनी कौशल, सुरैया, निरुपमा राय जैसी अभिनेत्रियाँ प्रसिद्धि की ओर उसी समय अग्रसर हुई। अनमोल घड़ी, मिलन और शाहजहाँ ऐसी फिल्में थीं, जिन्होंने दर्शकों की बहुत सराहुना पाईं। युद्ध के समाप्त होते ही सारे नियंत्रण समाप्त हो गए और फिल्म में दुगुनी वृद्धि हुई।


            भारत को आजादी मिलते ही स्थितियों में भारी बद‌लाव आया। हर प्रकार के कला- कौशल में पुनर्जागरण और विकास आरंभ हुआ। किन्तु उस समय वृत्त चित्रों के निर्माण का कोई नियमित संगठन नहीं था। इनफर्मेशन फिल्म्स ऑफ इंडिया लगभग 170 वृत्तचित्र बनाकर समाप्त कर दिया गया था। इसलिए इम्पा ने 'आजादी की कहानी' बनाई। देसी सरकार ने सेंसर को भी थोड़ा सख्त बनाया और टैक्स बढ़ा दिए। फिर भी फिल्म निर्माण में वृद्धि हुई। उस साल बनी कुल 283 फिल्मों में 182 हिन्दी फिल्में थीं। फिल्मों की संख्या में तो वृद्धि हुई, किन्तु स्तर में नहीं। असफल फिल्मों में भी संख्या वृद्धि हुई। विभाजन के कारण स्टूडियों, सिनेमाघर और फिल्मों का काफी बड़ा बाजार पाकिस्तान में चला गया।


             टिकट खिड़की  पर सफलता की दृष्टि से भारी संख्या में बनी फिल्मों में से केवल कुछ ही  सफल हुई।  किशोर साहू के निर्देशन में 'फिल्मिस्तान की सिन्दूर' सफलतम फिल्म थी। जिसमें विधवा हुए स्त्रियों के पुन‌र्विवाह की समस्या दिखाई गई थी। उसी साल पुन‌र्विवाह की बात संतोषी के निर्देशन में बनी 'शहनाई' हल्की-फुल्की पलायनवादी मनोरंजन फिल्म थी, जिसमें सी. रामचन्द्र का संगीत था। इस फिल्म की शैली और संगीत ने लगभग अगले दो दशकों तक फिल्मों को प्रभावित किया। इसी वर्ष दक्षिण भारतीय फिल्म भीरा का हिन्दी संस्करण बना, जिसमें गायिका एम. एस. सुब्बलक्षमी ने अभिनय किया था।


             जैमिनी स्टूडियो की स्थापना 1940 ई० में एस.एस वासन ने मद्रास में की थी। इसी जैमिनी स्टूडियों में 1946 ई. में अपनी एक तमिल फिल्म 'चन्द्रलेखा' हिन्दी में प्रस्तुत की। विशाल और भव्य सैटों, नृत्यों, सरकस के के करतबों और मारधाड़ के दृश्यों के कारण इस फिल्म को अपार सफलता मिली।  हिन्दी फिल्मों के निर्माण की वह श्रृंखला स्थापित की जो आज भी बनी हुई है। इसी वर्ष युवा राजकपूर ने 'आग' का निर्माण करके निर्माता-निर्देशक-अभिनेता के रूप में अपनी भावी सफलता का पहला चरण रखा । नई-नई मिली आजादी भी फिल्मों की कहानियों, गीतों आदि में प्रतिबिंबित रही थी। कलकता में शरद बाबू के उपन्यास 'पधेर दावी' पर हिन्दी बंगाली में सव्यवसाची का निर्माण हुआ, जिस पर कभी ब्रिटिस टिस सरकार ने प्रतिबिंब लगा दिया था। फिल्मिस्तान ने शहीद नाम की फिल्म बनाई, जो हिंसक साधनों से आजादी लड़ाई लड़ने वाले एक शहीद की कहानी थी। इसी फिल्म का गीत था- 'वतन नौजवाँ शहीद हो। बॉम्बे टॉकीज की फिल्म मजबूर से पार्श्व गायिका लता मंगेशकर का उदय हुआ। भारत सरकार ने फिल्म्स डिवीजन की स्थापना की, जो अभी तक समाचार और वृत्त चित्रों का निर्माण कर रहा है। गांधीजी पर भी दो फिल्में इसी साल बनीं।


               सिनेमोटोग्राफ अधिनियम में संशोधन करके 1948 में सेंसरशिप को केन्द्र का विषय बना दिया गया। अब दो प्रकार के सेंसर प्रमाण-पत्र हो गए - एक तो 'यू' सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए और दूसरा 'ए' केवल व्यस्कों के लिए प्रदर्शन हेतु। कई राज्यों में मनोरंजन बढ़ा दिया गया, जिसका विरोध करने के लिए 30 जून, 1949 को सारे देश में सिनेमाघर बंद रखे गये। इसी साल आई राजकपूर की फिल्म बरसात, जिससे गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी तथा संगीतकार शंकर जयकिशन चमके। महबूब की अंदाज नाए लिबर्टी सिनेमा में पहली फिल्म थी। बम्बई के लिबर्टी सिनेमा से ही देश में फिर वातानुकूलित भव्य सिनेमाघरों की परंपरा शुरु हुई। जैमिनी ने 'चन्द्रलेखा' की अपनी सफलता को 'निशाना' से दुहराया। कमाल अमरोही निर्देशित बाम्बे टॉकीज फिल्म महल के रहस्य और सनसनी भरी फिल्मों की शुरुआत हुई। लगभग दस वर्ष बाद भी फिल्म 'अजीत' में फिर रंगों का प्रयोग किया गया। रूप के शोरी की 'एक थी लड़की' ने मीना और मोतीलाल की हँसोई नायक-नायिका जोड़ी बनाई। शांताराम की अपना देश में समाज विरोधी तत्त्वों का पर्दाफाश किया गया।


(4) पत्र-पत्रिकाओं का उद्‌भव और विकास :


           भारत में हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव सामाजिक राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक क्रांति के गर्भ से हुआ है। इस क्षेत्र में आने वाले लोग पत्रकारिता को पेशे के रूप में नहीं, अपितु मिशन के रूप में अपनाया। राज और समाज के प्रति देशवासियों में परिवर्तनकामी चेतना का प्रसार इसका केन्द्रीय उद्देश्य था। इसलिए प्रसिद्ध शायर अकबर इलाहाबादी ने ठीक ही कहा है -


           "खीचो न कमानों को, न तलवार निकालो।


            जब तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो।।"11


              भारत में हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत वस्तुत: 'उदंत मार्तण्ड' से मानी जाती है। इसका प्रकाशन युगल किशोर शुक्ल के संपादकत्व में कलकत्ता से 30 मई, 1826 को साप्ताहिक अंक के रूप में प्रारंभ हुआ। यह प्रत्येक मंगलवार को निकलता था। राज और समाज के लिए समर्पित यह पत्रिका हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रकाशपुंज है। आज हिन्दी पत्रकारिता विकास की चरमावस्था में है, लेकिन हम 'उदंत मार्तण्ड' को विस्तृत नहीं कर सकते। अभाग्य से सरकारी सुविधाओं के अभाव, सत्ता के विरोध और ग्राहकों की उदासीनता के कारण यह पत्रिका 4 दिसम्बर, 1827 ई. को सदा के लिए बंद हो गयी। बहुत दुखी होकर संपादक ने अंतिम अंक की प्रस्तावना में लिखा है -


        "आज दिवस लौं उग चुक्यौं मार्तण्ड उदन्त।


         अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।।"12


             भारतीय नवजागरण के अग्रदूत कहे जाने वाले राजा राममोहन राय के संरक्षण तथा नीलरतन हलदार के कुशल संपादन में 10 मई,1829 ई. से कलकत्ता से ही 'बंगदूत' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्रिका अंग्रेजी, बंगला, फारसी और हिन्दी में एक साथ प्रकाशित हो रही थी। यह प्रत्येक सप्ताह के रविवार को पाठकों को प्राप्त होती थी। इस पत्रिका ने राजा राममोहन राय के द्वारा प्रवर्तित 'ब्रह्म समाज' संबंधी विचारों के प्रसार में अपनी गंभीर भूमिका निभाई।


            हिन्दी क्षेत्र से हिन्दी में निकलने वाली पहली पत्रिका है-'बनारस अखबार'। इसका प्रकाशन जनवरी, 1845 ई. में मासिक पत्रिका के रूप में हुआ। इसके संचालक थे राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द तथा संपादक थे श्री गोविन्द नारायण थत्ते। बनारस अखबार में अरबी, फारसी भाषा के शब्दों का बाहुल्य मिलता है। यूँ भी सितारेहिन्द संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के विरोधी तथा उर्दू- फारसीनिष्ठ हिन्दी के समर्थक थे। 


            सन् 1850 में तारामोहन मिश्र ने काशी से 'सुधाकर' नामक पत्रिका निकाला। भाषा की दृष्टि से यह अपने समय की सबसे महत्त्वपूर्ण पत्रिका थी। समसामयिक लेख- आलेख के प्रकाशन से इस पत्रिका ने अपनी अलग पहचान बनाई। इसके तुरंत बाद 1852 ई. में मुंशी सदासुख लाल ने 'बुद्धि- प्रकाश' का संपादन किया। इस पत्रिका में इतिहास, भूगोल, साहित्य, दर्शन, शिक्षा तथा विज्ञान से संबंधित विविध विषयक लेख- आलेख प्रकाशित हो रहे थे। ज्ञान के अनेक क्षेत्रों से संबद्ध होने के कारण इसके पाठक अपेक्षाकृत अधिक थे। 


            'समाचार- सुधावर्षण' हिन्दी का प्रथम दैनिक पत्र है, जिसका प्रकाशन जून,1854 ई. में श्याम सुंदर सेन के संपादकत्व में कलकत्ता से प्रारंभ हुआ। सामाजिक- राजनीतिक विषयों के अतिरिक्त व्यापार- संबंधी विज्ञापन का प्रकाशन इस पत्र में प्रमुखता से हो रहे थे। 8 फरवरी,1857 ई. को महान राष्ट्रवादी चिंतक अजीमुल्ला खाँ ने 'पयामे आजादी' का संपादन किया। अंग्रेजी राज का विरोध और भारतीय स्वाधीनता का उद्घोष करने के कारण इसे अंग्रेजों का कोपभाजन बनना पड़ा। कुछ ही दिनों के बाद इसका प्रकाशन बंद करवा दिया गया। 


           हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का आगमन युगांतकारी सिद्ध हुआ। इन्होंने क्रमश: तीन पत्रिकाओं- 'कविवचन सुधा', 'हरिश्चंद्र मैग्जीन', तथा 'बाला बोधिनी' का संपादन किया। कविवचन सुधा का प्रकाशन 15 अगस्त, 1867 ई. से प्रारंभ हुआ। इस पत्रिका में जायसी का 'पद्मावत', कबीर के दोहे और साखियाँ, देव रचित 'अष्टयाम' आदि साहित्यिक कृतियों का प्रकाशन क्रमिक रूप से हुआ। साथ ही हिन्दी की तद्युगीन कविताएँ भी इसमें छपती थीं। हरिश्चंद्र मैग्जीन का संपादन और प्रकाशन 15 अक्टूबर, 1873 से हुआ। ज्ञात हो कि आठ अंकों के बाद इस पत्रिका का नाम 'हरिश्चंद्र चन्द्रिका' हो गया। हिन्दी गद्य के विकास में इस पत्रिका का ऐतिहासिक योगदान रहा। इसमें पुरातत्व, उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना के साथ ही राजनीतिक, दार्शनिक तथा देशभक्तिपूर्ण लेख प्रकाशित होते थे। इसी पत्रिका का संदर्भ देते हुए भारतेन्दु ने अपने इतिहास जर्नल 'कालचक्र' में लिखा है - ''हिन्दी नई चाल में ढली 1873 ई. में।''13 भारतेन्दु जी राजा राममोहन राय के ब्रह्म -समाज संबंधी विचारों से काफी प्रभावित थे, इसीलिए उन्होंने स्त्री- शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए 1874 ई. में 'बाला बोधिनी' नामक पत्रिका का संपादन किया। यह महिलाओं के लिए निकलने वाली हिन्दी की पहली पत्रिका है।


            भारतेन्दु युग के प्रसिद्ध साहित्यकार बालकृष्ण भट्ट ने 1877 ई. में 'हिन्दी प्रदीप' का संपादन किया। आर्थिक अभावों के बावजूद इस पत्रिका ने हिन्दी की समृद्धि के लिए लगातार 27 वर्षों तक काम किया। 1881 ई. में बदरी नारायण चौधरी 'प्रेमघन' ने 'आनंद कादंम्बिनी' का संपादन किया। हिन्दी आलोचना के विकास में इस पत्रिका का सराहनीय योगदान है। इसके बाद 1883 ई. में प्रताप नारायण मिश्र ने कानपुर से 'ब्राह्मण' का संपादन किया। ये भारतेन्दु के सच्चे अनुयायी थे। इस पत्रिका ने हिन्दी कविता तथा गद्य को समृद्ध बनाया। इसी के माध्यम से प्रताप नारायण मिश्र ने 'हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान' का नारा बुलंद किया था। एक संवेदनशील साहित्यकार होने के कारण विधवाओं की दयनीय स्थिति से मर्माहत होकर इसमें लिखा था- ''कौन करेजो नहिं कसकत, सुनि विपति बाल विधवन की!''14


           ब्राह्मण पत्रिका भी निरंतर आर्थिक विपन्नता से जूझती रही। संपादक अपने ग्राहकों से जो दिवेदन किया है, उसी से इसकी स्थिति को समझा जा सकता है- ''आठ मास बीते जजमान, अब तो करो कुछ दक्षिणा दान।''15


            भारत की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से सन् 1896 में 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्रिका त्रैमासिक थी। इसके प्रधान संपादक थे- बाबू श्यामसुंदर दास तथा संपादक मंडल में सुधाकर द्विवेदी, राधाकृष्ण दास, वेणीमाधव, रामचंद्र शुक्ल आदि शामिल थे। इस पत्रिका में भाषा, साहित्य, अनुसंधान तथा समालोचना से संबंधित लेख प्रकाशित होते थे। अनेक अज्ञात कृतियों की खोज तथा प्राप्त कृतियों के रचनाकार की तलाश में निरंतर सक्रिय रहने वाली यह पत्रिका हिन्दी भाषा और साहित्य की समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।


            हिन्दी पत्रकारिता का तीसरा और सबसे प्रभावशाली पड़ाव है- द्विवेदी -युग। इस युग का प्रारंभ सन्1900 ई. में सरस्वती के प्रकाशन से हुआ। यह पत्रिका ज्ञान के समग्र क्षेत्र को एक साथ प्रकाशित करने का उद्देश्य लेकर शुरु हुआ। इसके संपादक मंडल में शामिल थे- बाबू श्यामसुंदर दास, किशोरीलाल गोस्वामी,राधाकृष्ण दास, कार्तिक प्रसाद खत्री और जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'। इस पत्रिका का प्रधान उद्देश्य था - भारत का राष्ट्रीय- सांस्कृतिक जागरण। अभाग्यवश 1901 ई. में वैचारिक मतभेद के कारण संपादक मंडल भंग हो गया। फिर श्यामसुंदर दास ने अकेले दो वर्षों तक इसका संपादन किया। सन् 1903 में रेलवे की नौकरी छोड़कर इस पत्रिका के संपादन का काम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया। दरअसल, यहीं से हिन्दी साहित्य में एक नये युग का प्रवर्तन हुआ, जिसे 'द्विवेदी-युग' के नाम से जाना जाता है। द्विवेदी जी ने सरस्वती के माध्यम से साहित्य में व्याप्त अश्लीलता की परंपरा का निषेध किया, हिन्दी भाषा का परिष्कार किया, गद्य के साथ ही खड़ीबोली को कविता की भाषा बनाया, कविता के विषय को विराट फलक प्रदान किया और साथ ही साहित्य में उपेक्षित स्त्री पात्रों की ओर कवि का ध्यान आकृष्ट कराया। इसी के फलस्वरूप 'प्रियप्रवास', 'साकेत', 'यशोधरा', तथा 'विष्णुप्रिया' आदि की रचना हुई।


            विदित हो कि इसी युग में खड़ीबोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य 'प्रियप्रवास' लिखा गया। इसी युग में सरस्वती पत्रिका की कोख से राष्ट्रीकवि मैथिलीशरण गुप्त, महान आलोचक और निबंधकार रामचन्द्र शुक्ल, कथा-सम्राट प्रेमचंद, महाकवि निराला का अवतरण हुआ। अतएव, इसे हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। इसी दौरान 1907 ई. में महामना मदनमोहन मालवीय ने 'अभ्युदय' तथा 1910 ई. में गणेश शंकर विद्यार्थी ने 'प्रताप' का संपादन कर राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का प्रयत्न किया। इस श्रृंखला में राष्ट्रवादी कवि माखनलाल चतुर्वेदी विशेष रूप से स्मरणीय हैं। उन्होंने 1919 ई. में जबलपुर से 'कर्मवीर' का संपादन कर देश के युवाओं की सुषुप्त चेतना को झकझोर दिया। इसी पत्रिका में 'पुष्प की अभिलाषा' शीर्षक कविता प्रकाशित हुई, जिसमें कवि ने जो आह्वान किया, वह देखिए -


     "मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेक।


     मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक।।"16


              हिन्दी पत्रकारिता के विकास में महात्मा गांधी की सराहनीय भूमिका रही है। गांधी जी ने 1921 ई. में 'हिन्दी नवजीवन' का संपादन अहमदाबाद से किया। इस पत्रिका का उद्देश्य था- अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी भाषा का व्यापक प्रचार - प्रसार। 1930 ई. में गाँधी जी ने 'हरिजन' का संपादन कर दलितोत्थान की कोशिश की। 1928 ई. से बनारसी दास चतुर्वेदी जी ने 'विशाल भारत' का संपादन किया। भारत के सामाजिक -राजनीतिक जागरण तथा राष्ट्रीय एकीकरण में इस पत्रिका की गंभीर भूमिका रही। 


         कथा- सम्राट प्रेमचन्द ने 1930 में बनारस से हंस का संपादन किया। साहित्य की विविध विधाओं के प्रकाशन के साथ दलित और स्त्री- चेतना का बीजारोपण इसी पत्रिका में किया गया था। यह अलग सवाल है कि प्रेमचन्द के मरणोपरांत इसका प्रकाशन बंद हो गया। पुन: 1986 ई. में राजेन्द्र यादव ने इसका पुनर्संपादन किया। यह पत्रिका तब से निरंतर निकल रही है। 


            बहरहाल, हिन्दी पत्रकारिता की संघर्ष-यात्रा आज भी अनवरत जारी है। राज और समाज में जो परिवर्तन हो रहे हैं, हिन्दी पत्रकारिता उसे चित्रित करने का काम करती है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का 'चतुर्थ स्तंभ' कहा गया है। यह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर अपनी पैनी दृष्टि रखती है और उसे निरंकुश होने से बचाती है। आज पत्रकारिता के लिए 'मीडिया' शब्द प्रचलित हो गया है और इसके अनेक रूप विकसित हो गये हैं, जैसे- प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया आदि। इस बीच जिस तेजी से पत्रकारिता का उत्थान हुआ है, उसी तेजी के साथ इसमें वैचारिता और नैतिकता का ह्रास भी हुआ है। मिशन के रूप में जिस पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी, वह आज मुनाफे का सबसे शानदार कारोबार बन चुका था। सत्ताधारियों की चाटुकारिता उसकी नियति बन गई है। इस प्रकार लोकतंत्र चतुर्थ स्तंभ का 'गोदी मीडिया' में कायांतरण हो जाना देश और समाज के लिए सही संकेत नहीं है!


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संदर्भ-ग्रंथ-सूचीः


1. जनसंचार और हिन्दी पत्रकारिता- डॉ० अर्जुनतिवारी, जयभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2014, पृष्ठ-17


2. वही, पृष्ठ-18


3. वही, पृष्ठ-19


4. वही, पृ०-101


5. हिन्दी पत्रकारिता : आधुनिक संदर्भ- देवप्रकाश मिश्र, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली, 2007, पृष्ठ -79


6. जनसंचार और हिन्दी पत्रकारिता - डॉ० अर्जुन तिवारी, पृष्ठ- 112


7. वही, पृष्ठ-116


8. हिन्दी सासाहित्य  का इतिहास - संपा.- डॉ० नगेन्द्र, मयूर पैपर बेक, दिल्ली, 191950पृष्ठ -17  


9. आजकल - संपादक- सीमा ओझा, जनवरी, 2012, पृष्ठ-41


10. वही, पृष्ठ- 42

  

11. हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास- रामस्वरूप चतुर्वेदी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1986, पृष्ठ-219


12. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-२, संपा.-धीरेन्द्र वर्मा, ज्ञानमंडल प्रशंशन, वाराणसी, 1953, पृष्ठ -609 


13. वही, पृष्ठ- 609

  

14. हिन्दी साहित्य का इतिहास- डॉ.नगेन्द्र पृष्ठ -418


15. वही, पृष्ठ- 419


16.  हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास-डॉ. बच्चन सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996 ई. पृष्ठ- 301


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Milan Tomic

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