विभूतिनारायण राय के उपन्यासों में कथ्यगत वैविध्य


विभूतिनारायण राय के उपन्यासों का कथ्य 

              'कथ्य' शब्द संस्कृत की 'कथ' धातु से बना है, जिसका अर्थ है- 'कहना'। साहित्यकार युगीन परिवेश से साक्षात्कार करके 'अपने समाज का निरीक्षण करता है और उचित - अनुचित को ध्यान रखते हुए समाज के समुचित विकास की ओर संकेत करता है। साहित्यकार स्रष्टा एवं दृष्टा बनकर समाज की संभावनाओं को लक्ष्य करके अपने पाठकों से जो कुछ कहता है, वही उसके साहित्य का कथ्य कहलाता है। समीक्षक इनके अनुशीलन द्वारा ही कृति का सम्यक् विश्लेषण करता है। कथ्य क्या है- समीक्षकों के बीच यह विवाद का विषय है। तथापि कथ्य का तयशुदा अर्थ है- 'कहानी का मूल विचार, विषयवस्तु या संदेश जो लेखक अपने उपन्यास के माध्यम से पाठक तक पहुँचाना चाहता है। यह केन्द्रीय विचार है, जिसके इर्द-गिर्द पूरी कहानी घूमती है और जिसे लेखक पाठकों के सामने उजागर करना चाहता है।

            समकालीन हिन्दी उपन्यास कारों में समाकृति श्री विभूतिनारायण राय ने कुल पाँच उपन्यासों- 'घर','शहर में कर्फ्यू, 'किस्सा लोकतंत्र', 'तबाद‌ला' तथा 'प्रेम की भूतकथा' का सृजन किया है। राय जी के प्रत्येक उपन्यासों की कथावस्तु अलग-अलग है, शिल्प में भी विविधता है और उनके उपन्यासों की भाषा भी अलग- अलग है। विभूति नारायण राय के सभी उपन्यासों के कथ्य का क्रमिक विवेचन निम्नवत् प्रस्तुत है:-

1. 'घर' नामक उपन्यास का कथ्य

             'घर' विभूति नाराय‌ण राय जी का प्रथम उपन्यास है। इस उपन्यास में 'घर' के बहाने जिस निम्नमध्यवर्गीय परिवार का यथार्थपूर्ण चित्रण किया गये है, उसको उपर से देखने पर केवल अवसाद नहीं दिखाई पड़ता, जबकि वह परिवार भयानक आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा है। उस परिवार के सारे के सारे सदस्य व्यस्त दिखाई पड़ते हैं, जबकि किसी के पास कोई काम नहीं है। सबके सब अपनी सक्रियता से कुछ न कुछ बन जाने की चेष्टा कर रहे हैं। सही अर्थों सभी घोर आर्थिक संकट के शिकार हैं। परिवार में राजकुमारी नामक एक युवा लड़की है, जिसकी अपनी स्वाभाविक यौन-आकांक्षाएँ हैं, जिसका दायरे से बाहर निकलकर स्त्री-विमर्श के दायरे से बाहर निकलकर अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। उदाहरण के लिए एक कथन देखिये - "उसका मन करता है-चीखें- चिल्लाये, अपने बदन के कपड़े तार-तार कर लें। उसकी नसें तड़क रही हैं, एक अजनबी सी आग है, जो इसके पूरे शरीर को जलाकर जलाक भष्म कर देना चाहती है। अगर वह मुंशीजी (पिताजी) से विद्रोह कर दे तो लेकिन नहीं, शायद वह ऐसा नहीं कर सकती।"(1)

            

             राजकुमारी अपनी यौनाकांक्षा के वशीभूत होकर अपने छोटे भाई के मित्र (सुरेन्द्र) के साथ यौन-संबंध बनाने की कोशिश करती है, लेकिन उसके बावजूद घर के बंधन को तोड़ने का प्रयास नहीं करती है। यहाँ उपन्यासकार में मध्यवर्गीय मानसिकता से चाहकर भी न निकल पाने की चेष्टा दृष्टिगत होती है। राय जी ने आलोच्य उपन्यास में कथानायक मुंशीजी की आर्थिक दुरवस्था, उसके परिवार के सदस्यों की मानसिक दशाओं एवं समस्याओं से प्रारंभ करके उसके गौरवमय अतीत तक की कथा प्रस्तुत किया है। 'घर' नामक उपन्यास का अध्याय है- 'समीकरण ; पेंशन और बाजर भाव का', 'किस्सा उस राजकुमारी का, जिसे लेने कोई राजकुमार नहीं आया', 'इस साल का दिसम्बर','पनियाई आँखों का भविष्य', तथा 'जैसे उनके दिन फेरे'। इन शीर्षकों के आलोक में प्रस्तुत कथा में कथानायक मुंशीजी, विनोद, राजकुमारी तथा पप्पू के जीवन तथा उससे संबद्ध तमाम समस्याओं को जिस शिल्प में अभिव्यक्त किया गया है, वह आकर्षक एवं रोचक बन गया है। इस खास शिल्प के वजह से, लेखक को कथानक की कड़ियों, सूत्रों और बिन्दुओं को स्पष्ट करने में सहायता मिली है। इससे पात्रों को विवशताओं, वातावरण तथा एक- दूसरे के प्रति व्यक्त की गई प्रतिक्रियाओं से उनके आंतरिक जीवन की झांकियां उद्घाटित होती है। कथा के आंतरिक अन्विति में कहीं बिखराव परिलक्षित नहीं होता। अतएव, मुंशीजी के परिवार की तरह ही देश के असंख्य परिवारों के बिखराव और इसके ऐतिहासिक कारणों को प्रकट करने वाला यह उपन्यास अपना महत्त्व रखता है।


              'घर' नामक उपन्यास में 'परिवार के प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे -दूसरे से कटे हुए हैं। घर में एक साथ रहकर भी कोई एक-दूसरे के सामने नहीं आना चाहते, और न ही बात करता है। घर में एक तरह से संवादहीनता की स्थिति बनी हुई है। सभी सदस्य अपनी-अपनी वैयक्तिक पीड़ा से ग्रसित है। बड़े बेटे विनोद की पीड़ा बेरोजगारी है, तो राजकुमारी की पीड़ा समय से विवाह न होना। भाई-बहन, माता-पिता के बीच वह भाव तब तक था, जब तक तारा (मुंशीजी की पत्नी) जीवित  थी। तारा की मृत्यु के बाद ही परिवार में संवादहीनता की स्थिति निर्मित हो गई। विनोद अपने पिता के समक्ष इसलिए नहीं आता कि कहीं वे उसकी पीड़ा को न जान जाए। पुत्री राजकुमारी की दशा तो और भी दयनीय है। वह पिता को भोजन कराने तक ही उसके पास रहना चाहती है, क्योंकि उनकी मानसिक स्थिति यौनेच्छा को लेकर कुंठित - सी हो गयी थी। वह देह की भूख से पीड़ित थी, उसकी दृष्ति के लिए वह बेचैन रहती थी और दिलकश इलाहाबादी की किताबों ने उसे और भी बढ़ा‌वा दिया, उसकी व्यग्रता निरंतर बढ़ती ही जा रही थी। उसकी इस स्थिति को मुंशीजी से छिपाने के लिए वह संवादहीन हो गयी थी। "पप्पू अनेक गलत संगत में पड़ गया था। स्कूल की फीस से वह सिने‌मा देखता था और मौज करता था, इस सच्चाई को छिपाने के लिए भी वह संवादहीन था।"(2) 


             इस परिवार में भाई- बहन भी आपस में संवादहीन थे, क्योंकि सभी एक-दूसरे से कुछ न कुछ छिपा रहे थे। विनोद अपने पड़ोस की एक लड़की बिन्नी से प्यार करता है, लेकिन सबसे छिपाता है, क्योंकि बेरोजगार होने के कारण बड़े बाबू (बिन्नी के पिता) उससे अपनी बेटी का विवाह न करते। राजकुमारी यौनाकांक्षा से इत‌ना परेशान थी कि अपने छोटे भाई के मित्र सुरेन्द्र से शारीरिक संबंध स्थापित कर लेती है। पप्पू को राजकुमारी के साथ एक रजाई में सोने से उसके शरीर में अजीब-सी सरसराहट महसूस हो रही है, क्योंकि अब वह किशोर हो रहा है और उसमें अब अनेक शारीरिक परिवर्तन आ रहे थे। कई कई बार तो मुंशीजी ने ने भी रात में उसे नाली के पास झुके हुए देखा था। उसकी संवादहीनता का यह भी एक महत्वपूर्ण कारण था।

            अतएव, कहा जा सकता है कि 'घर' नामक उपन्यास में परिवार तो है, किन्तु परिवार के लिए वह 'घर' नहीं केवल मकान है। यह मकान घर तब तक था, जब तक माँ तारा जीवित थी, उसके मृत्यु के पश्चात यह 'घर' कब और कैसे मकान बन गया, पता ही न चला। सत्य ही है कि माँ से ही घर घर बनता है और माँ के बिना घर बिखरकर मकान में परिवर्तित हो जाता है। माँ घर की नींव की वह ईंट होती है, जिस पर यह मकान घर बनकर खड़ा रहता है। उसका अप्रदर्शित समर्पण उसी नींव की ईट के समान होता है जो प्रत्यक्ष में दिखता तो नहीं, किंतु ईमारत उसी की पीठ पर खड़ी होती है। इस तरह 'घर' उपन्यास में समाज की महत्त्वपूर्ण ईकाई परिवार की उस सच्चाई का वर्णन हुआ है, जो अधिकतर भारतीय धनाभाव से ग्रस्त परिवार का जिस पर यथार्थ है। 


            श्री विभूति नारायण नारायण राय के उपन्यास 'घर' में वर्णित समाज स्वातंत्र्योत्तर समाज है। जमीदारी प्रथा का अंत हुआ। अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव भी समाज में प्रभावी था। यद्यपि शिक्षा का स्तर निम्न ही था, क्योंकि मुंशीजी अपने भाईयों में अकेले शिक्षित थे। देश की अभावग्रस्तता का सबसे अधिक प्रभाव निम्नमध्यवर्गीय परिवार पर ही पड़ा था। बाजार की वह स्थिति थी ग्राहक पीला और दुकानदार लाल था। इसी निम्नमध्यवर्गीय समाज के एक सदस्य थे मुंशीजी। जो तद्‌युगीन अभावग्रस्तता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उस वक्त नौकरी करने वाले और व्यव्यवसाययों के जीवन में क्या अंतर था, वह दर्शाता है। एक नौकरी पेशा अध्यापक की तनख्वाह इतनी कम थी कि वह अपने संपूर्ण जीवन काल में अपने छोटे-छोटे सपनों को पूरा करने में समर्थ नहीं हो पाते। जीवन की आवश्यक जरूरतों की की पूर्ति हेतु भी उसे संघर्ष करना पड़ता है। आरामदेह जीवन की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कड़ी मेहनत के बाद भी उसकी छोटी-छोटी जरूरतें पूरी नहीं हो पाती। ब्याज पर लिये गये धन का ही सहारा होता! 

 

               आलोच्य उपन्यास में प्रमुख चरित्र मुंशीजी भी ऐसे ही व्यक्ति हैं। नौकरी के वक्त तो  फिर भी ठीक-ठाक जीवनयापन हो रहा था, परंतु अवकाश ग्रहण करने के पश्चात उसका जीवन अत्यंत कठिन हो गया। समाज में पेंशनभोगी लोगों की स्थिति लगभग ऐसी ही थी। मुंशीजी न चाहते हुए ‌भी शंकर बनिये के उधार पर आश्रित हो जाते थे। छोटी-छोटी जरूरतों का गला घोंट का भी एक पिता अपनी पुत्री के लिए दहेज का इंतजाम नहीं कर पाता तो उसका अवसादग्रस्त होना स्वाभाविक ही है। "वह अपनी पत्नी को दवा के अभाव में मरते हुए देखता है, तो कुंठित हो जाता है।वह पढ़े-लिखे बेटे को रोजगार के लिए भटकते और धक्के खाता देखता है, तो उसका हाल ऐसा होना ही था। बेटी का विवाह न का की पाने की विवशता भी उसे कुंठित तो कर ही देती है, उस पर छोटे बेटे की आवारगी।"(3) 


              समाज में एक बढ़ती उम्र की अविवाहित पुत्री के प्रति क्या नजरिया होता है, इसका जीवंत उदाहरण उपन्यास में मिल जाता है। राजकुमारी अट्‌ठाईस वर्षीय सुंदर युवती है, लेकिन धनाभाव में पिता उसका विवाह अब तक नहीं कर पाये। वह युवावस्था की यौनेच्छा से व्यथित है, किन्तु समाज के दबाव में उसकी यौनेच्छा पूर्ण नहीं हो पाती है। वह अंदर ही अंदर कुढती रहती है। शंकर बनिया की कुदृष्टि हमेशा उस पर है। वह मौके दर मौके उसके साथ छेड़‌छाड़ करता रहता है। एक बार तो रात्रि के समय जब वह टमाटर के के लिए उसके दुकान पर जाती है, तो वह उसकी छाती पर हाथ डाल देता है, और उसके साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश काता करता है। पड़ोसी बड़े बाबू की नजर भी उसे घूरती रहती है, जबकि वह उसके पिता के उम्र के हैं। कई बार तो वह राजकुमारी को छेड़ने की कोशिश की। मुहल्ले के किशोर लड़के भी उस पर पर फब्तियाँ कसते हैं और वह राजकुमारी का नाम लेकर मुंशीजी को भी चिढ़ाते हैं। सुरेन्द्र जो कि पप्पू की उम्र का है और उसका दोस्त है, फिर भी वह राजकुमारी को कामुक दृष्टि से देखता है। एक बार तो वह अंधेरे का लाभ उठाकर राजकुमारी के साथ छत पर संबंध भी बना लिया था, यद्यपि उसमें राजकुमारी की सह‌मति शामिल थी।

               

             विनोद, बिन्नी से छत पर मिलता है, उससे प्रेम करता है, बिन्नी भी उससे दिल से प्रेम करती है। दोनों अक्सर अक्सर छिप-छिप कर मिलते हैं, तथापि समाज से डरते हैं। पप्पू अभी किशोर है,  लेकिन हस्तमैथुन करता है। लड़‌कियों को छेड़ता है। फिल्में देखते वक्त मिस्त्री ने उसके साथ दुर्व्यवहार भी किया। पप्पू को बड़ी बहन के साथ सोने में संकोच होता है। वह शंकर बनिया को लूटने का प्लान बनाता रहता है और पिस्तौल लेने मिस्त्री के घर चला जाता है।


             आलोच्य उपन्यास में जिस कृत्सित समाज को दिखाया गया है, वह कहीं न कहीं देशकाल  अस्सी के दशक के भारतीय समाज की यथार्थ स्थिति है। अतएव कहा जा सकता है कि अस्सी के दशक में लिखा गया उपन्यास 'घर' अपने समय का साक्षात्कार कराता है। निम्न मध्यवर्गीय भारतीय अभावग्रस्त परिवार की स्थिति - परिस्थिति को प्रत्यक्ष उजागर करता यह उपन्यास तत्कालीन समाज के ऐसे परिवारों के पति दृष्टिकोण को भी हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। उपन्यासकार ने अपने उपन्यास 'घर' में अपने सामाजिक यथार्थ की ओर ध्यान भी आकृष्ट कराया है।


2. 'शहर में कर्फ्यू' उपन्यास  का कथ्य :

              समकालीन उपन्यासकार श्री विभूतिनारायण राय ने 'शहर में कर्फ्यू' नामक उपन्यास उपन्यास में जिस तरह के सामाजिक यथार्थ का उद्‌घाटन किया है, उसमें राजनीतिक षड्‌यंत्र, सांप्रदायिकता की गहरी जड़ों, अभावों में जिंदगी जीने को मजबूर आम आदमी, गंदी बस्तियों की सड़ांध में अभिशप्त जीवन, अनैतिकता वर्ग-भेद, हत्यहीनता, शासक वर्ग की उदासीनता और बहसों - झपटों में खोती वास्तविकता, मरती आत्मीयता, सहानुभूति का आवरण ओढ़े राजनेता, राजनैतिक छल-प्रपंच, पुलिस के हथकंडे, पूर्वाग्रह से ग्रसित एक विशेष के समाज की तरफ टेढ़ी दृष्टि, भय, चुप्पी, जिंदगी के लिए जद्दोजहद करता परिवार परिवार आदि प्रमुख रूप से उद्धृत हुआ है।


               लेखक ने कर्फ्यू के समय फैलती सामाजिक अव्यवस्था, दशहत मानव और आंतक का वर्णन किया है। लेखक ने यह भी उजागर किया है कि पूंजी और सत्ता के अदृश्य हाथ धर्म के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम समुदाय को लड़ाकर किस तरह अपने स्वार्थों को पूरा करने में लगे हुए थे। कर्फ्यू के समय में इतनी अव्यवस्था फैल जाती है कि आम आदमी का जीवन बसर नारकीय हो जाता है। शहर में इतना पुलिसियां खौफ फैल जाता है कि आम आदमी अति संवेदनशील, स्थिति में घर से बाहर भी नहीं निकल पाता है। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए लेखक उदाहरण देता है कि एक घर में आदमी जख्मी पड़ा रहता है लेकिन घर के लोग कर्फ्यू की दहशत से उसका सही समय पर इलाज नही करवा पाते और उसकी मौत हो जाती है।


               सदानंद शाही कर्फ्यू के बहाने में बताते है "यों तो शहर में कर्फ्यू कर्फ्यूग्रस्त शहर के तीन दिन की कहानी है लेकिन वास्तव में है यह आजादी के तीसों बरसों की कहानी।"(4)


                लेखक ने साम्प्रदायिकता के साथ समाज में भारतीय स्त्री की पीड़ित, शोषित, दयनीय स्थितियों को उजागर किया है। पात्र सईदा बहुत ही गरीब और अभावग्रस्त परिवार में रहती हैं। उसके परिवार के सारे सदस्य बीड़ी का व्यवसाय कर जीवनयापन करते हैं।


                 इस प्रकरण में लेखक ने मीरंगज बाजार में होती वेश्यावृत्ति का चित्रण करता है। लेखक ने भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की विंडबना को उजागर कर स्पष्ट करता है कि अपने आपको आधुनिक और सभ्य कहे जाने वाले समाज में स्त्रियां सामाजिक स्थिति की तरह आर्थिक दृष्टि से भी इतनी पिछड़ी हुई है कि अपने पेट की भूख मिटाने के लिए वे जिस्म व्यापार करने के लिए मजबूर हैं।


                शहर में कर्फ्यू के विषय में जर्मन विदुषी डॉ. ईनेस फोर्नेल का अभिमत -"इस उपन्यास ने मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव डाला है। किताब में कुछ वर्णन हुई घटनाएँ ऐसी भयानक और शोकदायक थी कि पढ़ चुकने के बाद मैं कुछ दिनों तक इनके बारे में सोचती रही कि कितने खौफनाक हालत में मुस्लिम लोगों को कर्फ्यू के दिन गुजराने पड़ते है।"(5)


                कर्फ्यू के दिनों में फैलती अफवाहों और मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं की संकुचित मानसिकता का उल्लेख किया है। अधिकांशतः हिन्दुओं की यह मानसिकता होती है कि मुस्लिम जाति सबसे ज्यादा हिंसक और क्रूर होती हैं। अंशों में सही भी है, लेकिन यह दृष्टिकोण कर्फ्यू के दिनों के लिए अधिक घातक साबित होता है। देवीलाल शराबी अपना खून बेचकर (स्वरूपरानी अस्पताल) जीवनयापन करता है और कर्फ्यू के दिनों में अफवाहे फैलता है।


              इस उद्धवरण कथावस्तु में लेखक कर्फ्यू में अफवाहें आग में घी का काम देवीलाल जैसे शख्स को मनोरंजन तथा सत्ता स्वार्थपरता के भोगियों का हथकण्डा मानता है। यह कथावस्तु देशकाल में घटित घटना का यथार्थ चित्रण कि अभिव्यक्ति है।


              जहाँ मानवीय गुणों को शर्मसार करने वाला भी चित्रण किया है कर्फ्यू में एक तरफ सईदा और सैफुन्निसा जैसी मुस्लिम औरतें का परिवार दंगों के डर से भूखा प्यासा बीमारी की स्थिति में घर से बाहर निकल नहीं पाता वही दूसरी ओर हिन्दू मोहल्ले में बच्चे कर्फ्यू के दौरान सड़क पर बेखौफ गुल्ली डंडा और क्रिकेट खेलते हैं।


"बच्चे अपना मनोरंजन करने लगे है। नारे लगाते है :-


"हिन्दू पुलिस भाई भाई, कटुआ कौम कहां से आई!"(6)


              इस प्रकार राय जी ने युसूफ दर्जी पात्र द्वारा यह दिखाया कि हिंदू बहुल इलाके में अकेला युसुफ का घर है जिन्हें हिन्दुत्ववादी मानसिकता के इलाके में जीवनयापन कितना मुश्किल है।


               "दरवाजे पर ईंट लगते ही जो भगदड़ की आवाजें हुई उन्होंने युसुफ दर्जी के पूरे परिवार को खौफ के समुद्र में डूबो दिया। छोटे बच्चों ने रोना शुरु कर दिया युसुफ ने दहशत भरी आंखो से दरवाजे की तरफ देखा।"(7)


                 लेखक ने मातृत्व के दुःख दर्द को भी उ‌द्घाटित किया है। अभाव और भूखमरी के वातावरण में अपने पति के दबाव में सईदा दो बेटियों को जन्म देती है। भोजन के अभाव में यह सालभर की बच्ची को अपने सीने का दूध नहीं पीला सकी।


                निष्कर्षतः साम्प्रदायिकताओं को और उससे पनपी समस्याओं के साथ सईदा पात्र के माध्यम से भारतीय समाज में स्त्री जीवन की विडम्बनाओं और विवशता का यथार्थ चित्रण लेखक की बहुआयामी दृष्टि को रेखांकित करता है।


               रामनारायण बोहरे - "प्रामाणिक अनुभवों का जीवन्त दस्तावेज में बताते है कि- "इस उपन्यास में कोई मानव नायक नहीं है, पारम्परिक कथानक का यहां अभाव है, इसके स्थान पर परिस्थितियों का सुक्ष्म और प्रामाणिक चित्रण उपन्यास की रोचकता बनाएं रखकर रचना को आगे बढ़ाता है।"(8) कथा को बढ़ाते हुए लेखक ने सईदा की कहानी को गति प्रदान की है शहर में कर्फ्यू के दौरान सईदा के घर में गम और संगीन मातम का माहौल का वर्णन किया।


              सुधीर पचौरी अपने लेख जिसका शहर उसका कर्फ्यू में बताते है - "कर्फ्यू लगने पर गरीब मुसलमान मोहल्लों में क्या दृश्य होता है और कैसे देखते-देखते एक मोहल्ला पाकिस्तान बना दिया जाता है, कैसे प्रशासन और पुलिस के लिए मुसलमान का मतलब कुटना और घर का मतलब हथियारों की फैक्टी हो जाता है। कैसे हिन्दू मोहल्लो में कर्फ्यू का अर्थ सन्नाटा नहीं होता और हिन्दू लोग पुलिस को किस तरह अपना समझने लगते है किस तरह तटस्थ मुद्रा वाला प्रशासन अचानक बहुसंख्यक समुदाय की हिफाजत करने वाला बन जाता है। कर्फ्यू के मायने अल्प संख्यकों के लिए वहीं नहीं होते, जो बहुसंख्यकों के लिए होते हैं।"(9)


               कर्फ्यू के दौरान जुल्म अत्याचार झेलते सईदा परिवार की यह त्रासदी ही नहीं बल्कि गरीब व असहाय लोगों के लिए यह विडम्बना होती है। चाहे कर्फ्यू पास की बात हो या सुरक्षा की। लेखक ने इस उपन्यास का सबसे महत्त्त्वपूर्ण और सारग्रही तथ्यों का उल्लेख किया है जिसमें लेखक ने राजनीतिक नेता पं. अयोध्यानाथ दीक्षित, रामकृष्ण जायसवाल, पुंजीपति हाजी बदरुद्दीन, पुलिस और प्रशासन के आला अफसर आदि के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से ये सभी समाज में दंगे फैलाकर अपने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को पूरा करने में लगे है। ये सभी लोग अंदर से एक है और अवसरवादिता के शिकार है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध कला आलोचक शंभु गुप्त लिखते है कि "राजनीति, प्रशासन, सुरक्षा, समाज सेवी, व्यापारी, अफसर, वकील, जैसे बुद्धिजीवी कहे जाने वाले और पढ़े लिखी लोग और सबसे ऊपर प्रेस और सूचना समाचार जगत् में सबसे ज्यादा या तो स्वयं साम्प्रदायिकता फैला रहे है या प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से उसमें शामिल है।"(10)


               पूंजी और सत्ता की ताकत तथा नौकरशाही की भ्रष्टाचारिता ही समाज की दुर्गति और विषमता का मूल कारण हैं। पुलिस अधिकारी होते हुए स्वयं ही पुलिस के अत्याचारों का खुला चित्रण किया है। शंभुगुप्त - साम्प्रदायिकता की वर्तमान वस्तुस्थिति और शहर में कर्फ्यू में बताते है - "शहर में कर्फ्यू झीनी झीनी बीनी चदरिया से कथावस्तु के विस्तार और विविधता में अपेक्षाकृत छोटा उपन्यास है किन्तु जिस वस्तु को इसने अपना उपजीव्य बनाया है उसने यह बहुत गहरे और प्रामाणिकता के साथ उतरा है। कथा विषय की नवीनता तो इसकी उल्लेखनीय अ‌द्वितीय विशेषता है जिस तरीके से और जिस प्रक्रिया से गुजर कर लेखक ने इस औपन्यासिक कलात्मक सृजन का रूप प्रदान किया है, वह हिन्दी में अभूतपूर्व है।"(11)


              आज के हमारे देश में सांप्रदायिक वातावरण, सांप्रदायिकता के जिन्न के निरन्तर विराट रूपाकार लेते जाने वाले राजनीति, प्रशासनतंत्र और बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के उपकरण बनते जाते और इसके तले अल्पसंख्यकों की दूभर और संत्रस्त होती जिन्दगी के लगभग अछूते किन्तु आज के ज्वलंत प्रसंग को तार तार करके जैसे हमारे सामने मूर्त करके रख दिया है।


               समकालीन समस्याओं पर कलम चलाना और विशेषतः ऐसे मुद्दो पर, जिन पर बड़े बड़े दिग्गज डांवाडोल होते नजर आ रहे हो, कोई कम साहसिक कला कर्म नहीं है। राय जी यह साहस दिखाते है और बड़ी दृढ़ता और अग्रगामिता के साथ आज के हमारे सबसे भीषण और निरंकुश व्यर्थ से टकराते है तो यह हिन्दी उपन्यास की सबसे ताजा और उल्लेखनीय घटना कही जा सकती है। प्रेमचंद युगीन समाज भी वर्तमान से भिन्न नहीं था बल्कि समाज जान पड़ता है।


                 डॉ. श्रीमती शीलागुप्त ने लिखा "प्रेमचंद के युग में आर्थिक विषमता का प्रश्न इतना विषम और सर्वग्राही हो गया है कि एक नवीन जीवन दर्शन, सभ्यता और राजनैतिक व्यवस्था की मांग होने लगी। आर्थिक संघर्ष की भावना, जिसमें रोष, घृणा, हिंसा, विध्वस आदि पनप रहे इन सब दुर्गुणों ने मिलकर मनुष्य-मनुष्य के सम्बन्ध को और स्त्री पुरुष के सम्बन्ध को विषादमय बना दिया।"(12)


                यह उपन्यास हमारे समाज के समाजशास्त्र का ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत करता हैं जो कथा रस की चिन्ता से ऊपर उठाकर भी हमें संवेदित और उ‌द्वेलित करता है। यह उपन्यास कथावस्तु के गुणों में रोचकता, सम्बन्धता, मौलिकता व सत्यता को समायोजित कर उल्लेखित किया गया है।

               

3. 'किस्सा लोकतन्त्र' उपन्यास का कथ्य :

             विभूति नारायण जी के अन्य उपन्यासों की भांति किस्सा लोकतन्त्र उपन्यास में दो कथावस्तुयें है। इन दोनों कथाओं का समानान्तर क्रमिक विकास हुआ है। एक कथा प्रेमपाल यादव उर्फ पी.पी. की कथा है और दूसरी समानान्तर चलने वाली कथा शांतिप्रसाद और उनके मित्रों की कथा है।

            

             लंबे प्रशासनिक अनुभव वाले राय जी पार्थिव राजनीति को विषय बनाते है। इस उपन्यास में कलात्मकता के बावजूद यथार्थ की तस्वीर धुंधली नहीं बल्कि स्पष्ट हुई है। उपन्यास किस्सा लोकतंत्र स्थानीय राजनीति के सच को उकेरता है।


              राजनारायण बोहरे 'किस्सा लोकतंत्र' एक उम्दा कहानी कमजोर उपन्यास में बताते है- "इस उपन्यास का पहला अध्याय अपने आप में एक संपूर्ण कहानी है। बाद की सामग्री तो मात्र इस कथा का विस्तार भर हैं। यह सच्चाई शायद विभूति जी ने भी स्वीकार कर ली है। तभी तो मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् की पत्रिका साक्षात्कार में यह कहानी बजाय उपन्यास अंश के रूप में एक कहानी के रूप में प्रकाशित हुई। उपन्यास के लिए आवश्यक गौण कथायें इस उपन्यास में न के बराबर है। लेकिन अपने विषय का सूक्ष्म विश्लेषण तो पूरी प्रभावशीलता के साथ लेखक के सृजन कौशल्य को प्रकट करता ही हैं।"(13) यह कृति पाठक की अपेक्षाओं के अनुरूप पुरा नहीं करती। एक कहानी के रूप में यह कथानक तो परिपूर्ण है, लेकिन एक उपन्यास के रूप में यह पाठक को निराश करती है। यह उपन्यास 1998 के चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है जो एक ओछा अपराधी जो कि चरम बिन्दू में एक नेता बन जाता है।

              "लेखक इस उपन्यास में अपनी इस वैचारिक उत्प्रेरणा से संचालित है कि बागी एक व्यक्ति के रूप में सशक्त और प्रतिरोधी तथा प्रगतिशील चरित्र है। उसकी आर्थिक या सामाजिक या राजनैतिक परिस्थितियों ने भले ही उसे प्रभावित किया हो परन्तु जब कोई बात उसे चुभ जाती है तो उनसे लोहा लेने के लिए अपनी जान की परवाह किये बिना खड़ा हो जाता है।"(14)

              आख्यान शैली का प्रयोग किस्सा लोकतंत्र में है क्योंकि कहानी और किस्सा सुनाते समय कौतूहल, रहस्य एवं नाटकीयता का होना जरूरी है। लेखक के शीर्षक में ही यह छुपा है। जिससे ज्ञात होता है किस्सा या कहानी सुना करते है उपन्यास नहीं। किस प्रकार मामूली सा अपराधी बड़े औहदे तक इलियट बन शीर्षस्थ नेता पदासीन होता है। इस उपन्यास में लेखक विभिन्न घटनाओं का सिलसिलेवार विवरण देता है। जो लेखक की कथा का स्वाभाविकता की रक्षा का सूत्र है।

               लेखक ने अपने अनुभवों के सहारे घटित घटनाओं का सापेक्ष मूल्यांकन भी किया कि आखिर घटना क्यों घटित हुई उसकी तह में जाकर निर्णयात्मक केन्द्र बिन्दु को खोजा है। यथार्थता के नाते लेखक की यह मानस रचना भी हैं। क्योंकि बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश की घटना का यथार्थ चित्रण है। 

             लेखक यह कथा पी.पी. द्वारा भ्रष्ट, भावनाशून्य तंत्र के अन्तर्दर्शन, अपनी आतंरिक मनुष्यता से शक्ति के अमानुषत्व में बहिर्गमन और उसी अनुपात में समाज में सम्मान अर्जन की अवस्थाओं को चित्रित करती है। हर सोपान पर उसकी दीक्षा के लिए पहले से ज्यादा अमानुष, धुर्त और शक्तिशाली एक परिवेश खंड और एक पात्र मौजूद हैं।

            ललित कार्तिकेय, तंत्र में बढ़ती अमानवीयता में बताते है- "1967 के बाद समाज और राजनीति के लगातार अवमूल्यन या मूल्य निरपेक्षीकरण का बयान करते समय 'नेरेटिव' अपनी औपन्यासकिता खोकर निबंधीय हो जाता है।"(15)


            उपन्यास में कुख्यात अपराधी प्रेमपाल यादव उर्फ पी.पी. की टिकट की दावेदारी को पक्का करने हेतु प्रेस कॉन्फ्रेंस का वर्णन है। उपन्यास का मुख्य पात्र प्रेमपाल इलाके का कुख्यात शराब माफिया और अपराधी है जो चुनाव में टिकट का प्रबल दावेदार है। अपनी उम्मीदवारी को मजबूत करने के लिए वह प्रेस कॉफ्रेस का आयोजन करता है। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पी.पी. से पत्रकारों के सवाल जवाबों को उपन्यासकार ने रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। उपन्यासकार पत्राकार के प्रश्न के माध्यम से हमें यह बात बताता चलता है कि पी.पी. एक गुंडा है जो समाज में अपनी हैसियत को मनवाने के लिए राजनीति में प्रवेश करना चाहता है। राय जी ने अपने इस उपन्यास में प्रेस के बदलते हुए चेहरे को बेनकाब किया है। यहां पी.पी. के माध्यम से यह बात कहलवाकर वर्ण-व्यवस्था पर भी चोट की है।

               

               राय जी ने पी.पी. के अपराध जगत में प्रवेश से लेकर जेल में 27 दिनों तक ओमी नामक शातिर अपराधी के सानिध्य में मिली ट्रेनिंग की कथा है। उपन्यासकार ने पी.पी. के वर्तमान के साथ-साथ उसके अतीत का पूरा ब्यौरा आधारभूत तथ्यों के साथ दिया हैं यदि यह कहा जाय कि पी.पी. यादव के अतीत पर दृष्टि डालते हुए लेखक ने वर्तमान कालिन यथार्थदृष्टि से काम लिया है तो यह इस उपन्यास की कथावस्तु पर सबसे उपयुक्त टिप्पणी होगी। राय जी इस संदर्भ में बहुत ही संश्लिष्ट इतिहास दृष्टि का परिचय देते है। लेखक ने जगतपाल नामक विधायक से मुलाकात के बाद पी.पी. का अपराध जगत में पूरी तरह पैर जमाने की कहानी का वर्णन किया है। आगे लेखक ने पी.पी. भू-माफिया बनकर अकूत सम्पदा कमाता है और पुलिस, कानून, अदालत, सबकी पहुंच से बाहर हो जाता है और बाहुबल, तिकडम और दिमाग के सहारे पी.पी. के बेशुमार दौलत कमाने की कहानी कही है।

              ललित कार्तिकेय तंत्र में बढ़ती अमानवीयता समीक्षा में लिखते है -"किस्सा-लोकतंत्र गो-प्रदेश में हुए इसी व्यापक गुणात्मक परिवर्तन, एक पूरे समाज के शीर्षासन की मुद्रा में आने की प्रक्रिया को प्रेमपाल यादव उर्फ पी.पी. की कथा के माध्यम से रचनाबद्ध करता है।"(16)

                

              विभूति  नारायण जी ने चुनावों में होने वाली धांधलियों का विस्तृत वर्णन किया है। जिसमें पी.पी. एवं ओमी के सहयोग से चौधरी जगतपाल विधायक का चुनाव जील जाता है और उसी समय पी.पी. के अन्तर्मन में भी यह महत्त्वाकांक्षा जन्म लेती है कि जब मैं इसे चुनाव जीता सकता हूँ तो खूद क्यों नहीं जीत सकता? तो इस तरह पैसा, आतंक कमाने के बाद पी.पी. का ध्यान राजनीति पर जाता है इसी का वर्णन लेखक ने बखूबी किया है।

               

            लेखक ने नेता एवं अपराधी दोनों के गठनबंधन को एक-दूसरे की जरूरत बताते हुए विवरण दिया है इसी के साथ शुरू हुआ अपराधी और राजनेता का खुला गठबंधन। खुले आम नेता ने अपराधियों को पालना शुरू कर दिया। अपराधी उसकी सभाएं कराने लगे, चुनाव जिताने लगे और एवज में नेता उनके लिए थाने पर टेलीफोन करने लगे, गिरफ्तार होने पर उनकी जमानत कराने लगा। पी.पी. से पहले ओमी इन मामलों में जगतपाल का दाहिना हाथ हुआ करता था लेकिन धीरे-धीरे अब सारी कमान पी.पी. के हाथ में होने लगी थी।  

            प्रसिद्ध लेखक खगेन्द्र ठाकुर ने अपने एक लेख 'साख रंगदारों की' में राजनीति का अपराधीकरण का अर्थ बताते हुए कहा है- "राजनीति का अपराधीकरण का अर्थ है राजनीति को अपराधवृति में बदल देना। ऐसा करने पर राजनीति का इस्तेमाल, अपराधों और अपराधियों के संरक्षण के लिए किया जाता है।"(17)

                 अंग्रेजी के सी अक्षर से शुरू होने वाले तीन शब्द करप्शन (भ्रष्टाचार) क्रिमनलादेशन (अपराधीकरण) और कास्टिज्म (जातिवाद) कम्यूनलिज्म (सांप्रदायिकता एक ही सिक्के के दो पहलू) हमारे राजनैतिक जीवन और व्यवस्था को खोखला कर रहे है। राजनीति के सामने गंभीर समस्या आ खड़ी हुई है। राय जी का यह उपन्यास किस्सा लोकतंत्र उक्त समस्याओं को लेकर एक विमर्श खड़ा करता है।

              ललित कार्तिकेय तंत्र में बढ़ती अमानवीयता लेख में लिखता है कि -किस्सा लोकतंत्र स रचता है, वह हरमन हेस के उपन्यास सिद्धार्थ की याद दिलाता हैं इस अंतर के साथ कि सिद्धार्थ ने मनुष्यत्व के चरम में मुक्ति पाई और पी.पी. ने मनुष्यत्व से चरम मुक्ति। एक तथागतत्व को प्राप्त हुआ, दूसरा अमानुषत्व को।"(18)


             लोकतंत्र की घटनाएं एक-दूसरे से मिलती हुई प्रतीत होती है। घटनाओं को एक-दूसरे में समायोजित कर चित्रित किया है। अपराध की दुनिया में सप्रवेश से लेकर शीर्ष तक पहुंचने में कितनी सीढ़ियाँ एक अपराधी को पार करनी पड़ती है इसका यहां बखुबी वर्णन किया गया है।

              इस उपन्यास में पिता-पुत्र सम्बन्धों को भी दर्शाया गया है। जब पी.पी. द्वारा अपराध करने पर उसे जेल ले जाया जाता है उस दौरान उसके पिता लाख प्रयत्न करके अन्त में उसे छुड़ा ही लेते है जो पिता का पुत्र के प्रति प्रेम को दर्शाता है। पुत्रों द्वारा लाख अपराध करने के बावजूद भी पिता माफ कर देता है जो पितृत्व प्रेम को दर्शाता है।

              लेखक ने यहां पर किशोर अवस्था के उत्तार-चढ़ाव में सहानुभूति प्रेम, दया की किस कदर आवश्यकता होती है, इस पर जोर दिया हैं वह उसे उस समय मिल जाये तो वह भटकता नहीं है। सही रास्ते पर आ जाता है। परन्तु लेखक हमें यह भी बताता चलता है कि जेल में अमानवीयता की हदे है, वहां से निकल कर आया हुआ व्यक्ति कभी-कभी प्रतिक्रिया स्वरूप भी अपराध करता है।

               राय जी अपराधीकरण से निपटने का एकमात्र रास्ता जन प्रतिरोध को ही मानते है जो कि अपने पात्र बागी के मार्फत दिखाते है। यहां लेखक यह बताना चाहता है कि राजनीति का अपराधीकरण हमारी पूंजीवादी व्यवस्था के बढ़ते संकट का प्रतिबिम्ब है। हमारी व्यवस्था में जो असंगति, असमानता और अन्याय निहित है वह इतना तीखा हो गया है कि कानून का शासन लागू करने के संवैधानिक ढांचे में यह व्यवस्था काम ही नहीं कर पा रही। अब वक्त आ गया है कि जनता संगठित प्रतिरोध में उतरे तभी इस अपराधपूर्ण व्यवस्था को चुनौती दी जा सकती है, उसे बदला जा सकता है।

              पहले जिस प्रकार किसी जमींदार को तब तक जमींदार नहीं कहा जा सकता था, जब तक उसके साथ चलने वाले लठैत न हो। ठीक उसी प्रकार का सम्बन्ध आज राजनेताओं और गुंडों का है। अन्तर सिर्फ इतना है कि लठैत सार्वजनिक स्थानों पर जींदार के बगल में बैठने की हैसियत नहीं रखता था। वह केवल जमींदार के इशारों का पालन लेखक आज की राजनीति का दागदार चेहरा भी दिखाता है एवं चर्चित-अचर्चित कई खौफजदा घटनाओं की स्मृति को ताजा कर देता है, ऐसे माफिर डॉन से पीड़ित शोषित लोगों, परिवारों की बड़ी संख्या हमारे बीच मौजूद है। उपन्यासकार ऐसे अपराधी तत्त्वों को साहस के साथ अभिव्यक्त भी करता चलता है।

               इस उपन्यास में रोचकता तब आती है, जब पी.पी. पर्चा भरने हेतु बड़ी भीड़ को लेकर जाता है। उसी दौरान बागी शहर में जगह-जगह पी.पी. के खिलाफ भाषण देने लगता है। पी.पी. के उत्थान के गडे-मुर्दे उखाड़ने लगता है। पी.पी. के आतंक का तिलिस्म तोड़ने की कोशिश करने लगता है। उस दौरान लोगों को आश्चर्य होने लगा। उपन्यासकार यहां जनता के भय से मुक्त होने की ओर इशारा करते हुए लिखता है - "पहली बार इस शहर में ऐसा हुआ कि छोटी ही सही, लोगों की भीड़ पी.पी. के खिलाफ भाषण सुनने एकत्र होने लगी थी।" जिस आदमी के बारे में सार्वजनिक स्थलों की तो बात क्या, घरों में भी फुसफुसाकर बातें की जाती थी, उसके खिलाफ इस तरह खुलेआम कोई आषण दे सकता है। यह शहर के निवासियों के लिए अविश्वास और रोमांच से भरी हुई बात थी जो उन्हें उत्तेजना के कगार पर ले जा रही थी।


                लेखक इस ओर संकेत करना चाहता है कि भारतीय लोकतंत्र के लिए अपराध और भ्रष्टाचार की रोकथाम एक चुनौती भरा काम है लेकिन लोकतंत्र के झंडावरदार सांसद विधायक और अन्य नेता ही जब अपराध के दल-दल में फल-फूल रहे हो तो वहां इसकी रोकथाम की बात करना बेमानी है। अपराध और भ्रष्टाचार ने लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया में बहुत बाधा पहुंचाई है और काफी नुकसान भी किया है। यह आज भी जारी है पर अब पहले की तुलना में थोड़ा कम है। कम इस रूप में कि जनता कुछ जागरूक होकर निर्णय लेने लगी है। अभी हाल के चुनावों में जनता ने अपराधियों को नकारा है यह अच्छा संकेत है। 

          निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि किस्सा लोकतंत्र उपन्यास राजनीति में अपराध और अपराध के राजनीतिकरण का आख्यान है। एक प्रकार से यह कथा समकालीन भारतीय राजनीति के एक विशेष चेहरे को अनावृत करती है। इसके अन्तर्गत अपने समय के कुख्यात अपराधी जनतांत्रिक राजनीति की मुख्यधारा में आते दिखाई देते हैं।

 4. 'तबादला' उपन्यास का कथ्य :

              साधना अग्रवाल कुंभ में तबादला भ्रष्टाचार की जनम पत्री में कहा -"तबादला भारतीय नौकरशाही में उस संक्रामक रोग की तरह है जिसकी लपेटों में आज पूरा देश है। उपन्यास का कथ्य छोटा है लेकिन इसकी परिधि बड़ी बड़ी है जो चिन्ता के साथ पूरे शासन तंत्र का पर्दाफाश करती है।"(19) 

              इन उ‌द्योगों की जिन बारीक डिटेल्स (समग्र) को हम इसके भीतर उतरे बिना इसका हिस्सेदार बने नहीं जान सकते, उन्हीं को यह उपन्यास इतने तीखे और मारक व्यंग्य के साथ हमारे सामने रखता है कि हमें उस हताशा को लेकर नये सिरे से चिन्ता होने लगती है जो भारतीय नौकरशाही के पिछले पचास सालों में आम जनता को दी है।

            लेखक सरकारी सेवा का प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष अनुभव संसार का यथार्थ चित्रण किया है। तबादला मूलतः उत्तर प्रदेश के सार्वजनिक निर्माण विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की कहानी हैं। जिसमें तबादला तंत्र को प्रभावित करने वाले विभिन्न सत्ता दल के दलालों, नेताओं तथा बाबुओं से लेकर अफसरों तक के पदासीन कर्मचारियों का वर्णन हैं। जिस प्रकार ख्यातनामी व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का काक भगोडा में सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार को चित्रण किया है ठीक वैसा ही श्री लाल शुक्ल ने राग दरबारी में तथा गोविन्द मिश्र ने फूल, इमारत और बंदर में सरकारी तंत्र के अ‌द्योपतन की रेखांकित किया हैं। सरकारी तंत्र में तबादला उ‌द्योग किया हैं। सरकारी तंत्र की विदुपता को बेनकाब करते हुए सिरे से इसकी पडताल को मुमकिन किया हैं।

             वस्तुतः एक सफल रचना के लिए उसके कथ्य के साथ ही उसके शिल्प का महत्त्व भी निर्विवाद हैं। उपन्यास एक लोकोन्मुखी गद्य विद्या है। "उपन्यास केवल मात्र कथात्मक गद्य नहीं है। वह मानव के जीवन का गद्य हैं ऐसी पहली कथा है, जो सम्पूर्ण मानव को लेकर उसे अभिव्यक्ति प्रदान करने की चेष्टा करती है।"(20)

              सर्वेश जैन अपने लेख एक नए औपन्यासिक शिल्प में कहते है कि "इसका सहज, स्वाभाविक और ग्रहीत जीवन तथ्यों को अनुकूल होना सर्वथा अनिवार्य हैं लेकिन यह सहजता और स्वाभाविकता केवल शिल्प तक ही सीमित नहीं है, उसके साथ जीवन की सहजता और स्वाभाविकता भी अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है।"(21) जो कि राय जी के तबादला में सरसता से प्रवाहित है। लेखक ने अपने कथा शिल्प की विषय वस्तु को सहजता से उकेरा है। वह अपने देश की सम्पूर्ण स्थिति-परिस्थिति की ओर ध्यान कराता है कि चारों ओर शोषण, उत्पीड़न, अन्याय, भ्रष्टाचार और उत्पीड़न की ओर ध्यान कराता है कि चारों ओर शोषण मंडरा रहा है। 

             लेखक राय जी ने तबादला में औपन्यासिक शिल्प और संरचना में यथार्थ की प्रस्तुती दी है। इसमें लेखक यथार्थ वृतांत करता हैं। उपन्यास की मुख्य विशेषता चिताकर्षक कथा रचना यानी किस्सागोई की कला है। लेखक ने इसमें सामाजिक और आर्थिक परिवेश को दृढ़ता के साथ पेश किया हैखने का कौशल हैं। उसमें किस्सागोई की कला से समाज की सडांध का अनावरण किया हैं।

              लेखक ने इस उपन्यास में व्यंग्यात्मक शैली का वर्णन किया है उपन्यासकार ने मंत्री के साथ जिस भाषा और संकेतों में तबादला का सौदा तय दिखाया है वह विडम्बना और विद्रूप की भाषा का चरम रूप है। लेखक यथार्थवादी को व्यंजित करता है चाहे कथावस्तु हो या पात्रों की भाषा। यह बंधी बंधायी लकीर पर उपन्यास रचना विधान नहीं करता बल्कि प्रेमचंद धारा के यथार्थ वही शैली को अपनाता है जो लेखक की रचनात्मकता, वर्णनात्मक की अपनी कला है।

             उपन्यास में पठनीयता, रोचकता ही यह जवाब दे देती है कि यह उपन्यास आदि से अंत तक दिलचस्पी और गैर संजीदा माहौल की संजीगदी बनी रहती है। यही संजीदगी पूरे एक दर्शन दृष्टिकोण और प्रतिबद्धता को भी पेश करती है। यही परिभाषा नयी शैली की ओर आकर्षित करती है।

           लेखक के कथा शैली का वर्णन करते हुए प्रख्यात रचनाकार सर्वेश जैन कहते हैं- "यह उपन्याय पारम्परकि शैली से हटकर, एक नयी शैली नये वातावरण को भी पेश करता है। नये समाज के दफ्तरी खांचों में ढला यह उपन्यास अपने अनोखेपन की एक मिसाल यह भी रखता है कि इसमें न हीरो और न हीरोइन, बस रगड़े-झगड़े और उसमें डूबी पूरी व्यवस्था। व्यवस्था ही हीरो है हीरोइन भी और खलनायक भी और उसी पर धार पर धार चढ़ाती नौकरशाही उसी धार पर चांदी जैसी चमक पैदा करने वाला यह उपन्यास अपनी अनुठी प्रस्तुति, तीखे यथार्थ आम सी भाषा शैली और कड़वे मुहावरें जन जीवन की पेचीदगियों और जटिलताओं को पेश करके हिन्दी उपन्यास को मालामाल तो किया ही उपन्यास की पारम्परिक परिभाषा को तोड़कर एक नयी परिभाषा को जन्म देता हैं।"(22)

             राय जी ने अपने उपन्यास तबादला में सरल भाषा और रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है। दफ्तर में कार्य करने वाले अफसर बाबू,  तक की भाषा अपने चरित्रों के अनुसर स्वाभाविक है। कोई बनावटीपन नहीं। जिस प्रकार से सरकारी दफ्तरों में भाषा का प्रयोग होता है ठीक भाषा का प्रयोग लेखक ने किया है। एक पाठक को उपन्यास पढने के लिए जिस तरह सरल भाषा, स्वच्छंदता और प्रसन्नता की जरुरत होती है। वैसा लेखक ने लिखा है। नैतिक और अनैतिक के संघर्ष में वे साफगोई से नैतिक के पक्ष में खड़े है। पेंचदार भाषा के युग में आकर्षक दिखाई देते हैं।

              कमलकांत वर्मा का कुंभ मेला के लिए निर्माण कार्य के अधिशासी अभियंता पद से तबादला हो जाता है तो उनका कितना नुकसान होता? उनके परिवार और उनके स्वप्नों पर क्या असर पड़ता? पत्रकारिता में स्टोरी एक सिद्धान्त है- "फाईव डब्ल्युज एंड वन एस यानी कब, क्या, कौन, किसको, कहाँ और कैसे वाले प्रश्नों का उत्तर स्टोरी को देना है। तबादला में कैसे यानी कथानक पर बल तो है पर प्लाट के बुनियादी प्रश्नों पर समुचित बल नहीं दिया जा सका बल्कि चरित्र भी इकहरे रह गए। कमलकांत वर्मा या बटुकचंद उपाध्याय है पर उनका परिवार और समाज उपन्यास में नहीं है। इकहरापन इतना व्याप्त है कि कथाभूमि इलाहाबाद तक हाशिए पर हैं।"(23)


             यह स्मृतियों में डूबा उपन्यास नहीं है। यह यथार्थवाद से मुक्त होकर उत्तर यथार्थ या बौद्धिक यथार्थ रचने का प्रयत्न भी नहीं करता है बल्कि यह टटके अनुभवों और अवलोकनों वाला उपन्यास है। जो यथार्थवाद की सीमाओं में नहीं फंसता। यह यथार्थवाद का ही विस्तार है क्योंकि यह सिर्फ यथार्थवाद की पुरानी पद्धति को छोड़कर भी उसकी भावना का निर्वाह करता है और यथार्थवाद के समकालीन बने रहने का मार्ग भी सुझाता है। अरूण प्रकाश कोई उम्मीद बर नहीं आती में बताते हैं कि "अपने देश में पिछले कुछ सालों में और कोई तरक्की हुई हो या नहीं, पर इलेक्टॉनिक एक्सचेंजों की बहार जरुर आ गयी हैं।"(24) तबादला उपन्यास में यही सच्चाई प्रकट की है कि राज्य सरकारें नौकरशाही और राजनेताओं के लिए वेतन और सहूलियतें जुटाने की मशीनरी भर बन कर रह गयी हैं। यह हमारे जनतंत्र के समक्ष आया सबसे बड़ा संकट है।

             इस निमित्त ध्रुवलाल अपने व्यक्तित्व और सोच के अनुकूल पढ़ाई से लेकर नौकरी तक आसान तरीके से पा जाता हैं। धुव्रलाल की कथा वर्तमान समय के ठीक सन्निकट है। आये दिन विभिन्न परीक्षाओं में कई पेपरआउट होना, परीक्षा दलालों का नेटवर्क भंडाफोड़ होना आम बात है। इस मकड़जाल में कई लोगों का स्वार्थ निहित है तबादला की कथावस्तु साधर्म निहित हैं।तबादला में लेखक ने स्त्री विमर्श को भी उभारा है जो आजकल की राजनीति की हिस्सेदार तो बनायी है लेकिन स्त्री विमर्श में कई सवालिया निशान भी लगे है।

            राय जी अपने उपन्यास में बतलाते हैं कि "तबादला और लाइसेंस प्रणाली राजधानी के साहित्य और संस्कृति थे। राजनेताओं के घरो, दलालों के ठिकानों, पार्टी दफ्तरों और सचिवालयों के कक्षों में चौबीसों घंटे इन्हीं पर गोष्ठियों होती रहती थी....... चुनाव बाद इन्हीं घोषणा पत्रों को चौराहों पर गायें खाती नजर आती है............ भाभाजी उर्फ मिनि मुख्यमंत्री के यहाँ आजकल सबसे अधिक भीड़ लगी रहती थी क्योंकि आजकल सबसे अधिक तबादले करा रही थी।"(25) 

          लेखक की कथा में स्त्री विमर्श के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव झलकता है। यह लेखक ने यथार्थ राजनीति का पर्दाफाश किया हैं। अर्थात् स्वातंत्रयोत्तर भारतीय राजनीति की अकथ कहानी का ही बयान करती है।

               राजनेताओं के चारित्रिक पतन तथा भ्रष्टचार के मामले में नौकर व राजनेताओं के बीच सांठ-गांठ की ये संक्षिप्त करती है। इस हम्मास में सब नंगे है- कौन किस पर हंसे। प्रशासनिक तंत्र की भीतरी नारकीय दुनिया, जो बाहर से चमकती दमकती दिखाई देती है, के संत्रास व कुंठाओं का अत्यन्त सुक्ष्म वर्णन इस उपन्यास में मिलता है। बाबू संस्कृति का बारीक चित्रण मिलता है।

               लम्बे प्रसंगों का निर्वाह करने में भी राय जी की कला सामर्थ्य दिखाई देती है। वे अनेक पात्रों के समूह को बराबर सम्भाले रहते और प्रत्येक पात्र का समुचित उपयोग करते है। यह प्रसंग बहुधा नाटक तत्त्व से युक्त होने के कारण जहां हमें ललित आघात देते है, वहां दूसरी ओर चरित्र की सम्पूर्ण चेतना की अंतर्दृष्टि और व्यक्तित्व की नवविकसित रेखा के ज्ञान की परितृप्ति भी प्रदान करते है।तबादला उपन्यास में लेखक ने वर्तमान समय की राजनीति में गिरते हुए मूल्यों की ओर इशारा किया है। यह कथावस्तु के उपर्युक्त गुणों को लेकर लिखा गया है।

               इस उपन्यास में लेखक ने दफ्तरी व्यवस्था के अन्दरुनी यथार्थ का वर्णन किया। घटनाओं को इस तरह से समायोजित किया है कि सारी घटनाएं दफ्तर में घटित होती हुई प्रतीत हुई है यहां यह सिद्ध किया है कि इस झूठी दुनिया में सच्चाई लिखना, सच्चाई बयान करना, सच्चाई प्रस्तुत करना एक जोखिम भरा कार्य है जो कि लेखक की साहसिकता, निर्भिकता को दर्शाता है।

           लेखक ने तबादले की सौदेबाजी का वर्णन किया है जो कि राजनीति का वीभत्स चेहरा दिखाने की कोशिश की है। साथ ही यहां बेशर्मी, बेहयाई की हदों को पार करते लोगों की ओर इशारा करते हुए नौकरशाही के पतित चरित्र को उजागर किया है।

            समकालीन भारतीय राजनीति अनियंत्रित उद्देश्यहीन तथा नैतिक पतन की ओर अग्रसर है जिसका राय जी ने एक-एक पूर्जा खोलकर रख दिया है। लेखक ने इस सब स्थितियों को पास से देखा है, अनुभव किया है तत्पश्चात् मौलिक रूप से अपने उपन्यास में बहुत ही सुनियोजित तरीके से उसे कलमबद्ध किया है। अभिप्राय यह है कि कहने को तो यह उपन्यास कार्यपालिका अथवा नौकरशाही परं केन्द्रित है परन्तु जैसा कि हम जानते है नौकरशाही का सह-अस्तित्व और सह-सम्बन्ध विधायिका या सरकार से है अतः नौकरशाही का सम्बन्ध सरकार या सत्ता की राजनीति से है। लेखक ने इसका बारिकी से चित्रण किया है।

              समकालीन युग में लेखक ने ऐसे कार्यकर्ताओं की भीड़ की ओर इशारा किया है जो अनुशासन में विश्वास नहीं करते बल्कि उच्छृंखलता ही उनका मुख्य कार्य है। राजनीति में भर्ती किये गये कार्यकर्ताओं के नाम पर ये गुंडे है जो दलाली करते है और लुट में हिस्सेदार है। राजनीति का संचालन अब गुंड़ों, उठाईगीरों के हाथ में आ गया है। अब कार्यकर्ताओं के नाम पर ऐसी ही भीड़ इकट्ठी होने लगी है।  देश का भविष्य अब ऐसे लोगों के हाथ में है।

               राय जी ने वर्तमान में शिक्षा के गिरते हुए मूल्यों की ओर इशारा किया है। शिक्षा की दुनिया बदल रही है और उससे जुड़े गुर बदल रहे है। वर्तमान युग में शिक्षा का स्तर इतना गिर गया है कि खुल्लमखुल्ला नकल कराकर शैक्षिक संस्थान व्यवस्थित रूप से धंधा चला रही है तथा मेहनत करने वाले छात्रों के साथ अन्याय हो रहा है क्योंकि नकल करने वाले आगे चलकर रिश्वत देकर नौकरी प्राप्त करने लगे और होनहार छात्र पीछे रह जाते है।

             लेखक का ध्यान सत्ता एवं नौकरशाही में आती हुई नई पीढ़ी की ओर भी है। यह नई पीढी सभी चीजों की ट्रेनिंग लेकर आ रही है। उनका भी एक उद्देश्य है दलाली, झुठ, मक्कारी तथा लुट में निमग्न होकर पैसा कमाना और एश करना है। राय जी ने इन बातों का वर्णन अपने उपन्यास में किया है।

              राय जी ने अफसर एवं बाबू के साथ-साथ निर्जीव वस्तुएं ऑफिस, कुर्सी, मेज, अलमारी, कागज, चाय, पान, समोसा एवं साईकिल आदि सजीव चित्रण किया है और यह बताने की कोशिश की है कि लंगडी कुर्सी की तरह लंगड़ी व्यवस्था है जो हमें दफ्तरों में दिखाई देती है। इस प्रकार हम देखते है राय जी के तबादला का कथावस्तु संयोजन अपूर्व और सुलझा हुआ है। बिखराव उसमें यत्र-तत्र है पर ऐसा बिखराव नहीं जो उपन्यास की रोचकता पर आघात करें। सन्दर्भों में इस उपन्यास की कथावस्तु का विशेष महत्त्व है। यह वर्तमान में भविष्य की समन्विति का उपन्यास है इसमें कोई सन्देह नहीं निष्कर्षतः हम कह सकते है कथावस्तु की दृष्टि से तबादला समूचे युगीन परिवेश का उपन्यास है। इसमें युग की पीड़ा और उल्लास को अपने में समेटे हुए युग के विराट फलक पर आधारित यह जनजीवन का मर्मस्पर्शी दर्पण है।

निष्कर्ष  :

             राय के सभी उपन्यासों में यथार्थवादी दृष्टि का चित्रण है और इन उपन्यासों का मुख्य प्रतिपाद्य सामाजिक पतन है। उपन्यासकार ने शील निरुपण पर पर्याप्त ध्यान दिया है। शील निरुपण वर्ग का भी है, व्यक्ति का भी। राय जी ने आर्थिक व्यक्तिवाद से उत्पन्नशील की समस्याओं का निरुपण कई अन्य समकालीन कथाकारों की तुलना में अधिक अच्छा किया है। महिला कथाकारों ने तो आर्थिक व्यक्तिवाद की लगभग पूरी अपेक्षा की है। उन्होंने आर्थिक स्वाधीनता और यौन स्वाधीनता की समस्याओं को प्राथमिकता दी है। आर्थिक व्यक्तिवाद और आर्थिक स्वाधीनता एक ही चीज नहीं हैं। यह एक ऐसा यथार्थवाद है जिसमें जीवन की एक फांक लेकर उसका बारीकी के साथ वर्णन किया गया है। इस वर्णन में देवता की तटस्थता नहीं वरन् मनुष्य की धरता यानी देवता प्रतिबद्धता हैं।

            राय जी के घर उपन्यास में निम्न मध्य वर्ग की जिन्दगी को कथावस्तु के रूप में चुना गया है। यह घीस-धीस कर जीते और तिल तिल कर टूटते निम्न मध्यवर्गीय सेवामुक्त शिक्षक मुंशी रामानुजलाल श्रीवास्तव और उनके तीन बच्चों की कहानी है। जिसकी मूल संवेदना और वातावरण की अन्विति का चित्रण है। मूल संवेदना यह है कि मनुष्यत्व को सुखी और सुन्दर बनाने वाला जीवन इस शोषण मूलक व्यवस्था में पंगु बनाया जा रहा है। इस संवेदना को जिस संसार में प्रस्तुत किया गया है। वह लेखकीय कौशल के कारण पंगु और खोखला दिखाई पड़ता है। वातावरण की यह सृष्टि कहीं मूर्त है तो कहीं अमूर्त।

              किस्सा लोकतंत्र उपन्यास में लेखक यही साबित करना चाहता है कि तुम मुझे गद्दी दिलवाओं, मैं तुम्हें संरक्षण दूंगा और मालामाल करूंगा। की राजनीतिक खेल समीकरण का वर्णन हैं. अर्थात् साख रंगदारों के बदले रूप का नाम 'लोकतंत्र' कह सकते हैं। ऐसे तत्त्वों के कारण राजनीति को अपरावृत्ति नीति में तब्दील के नुक्से हैं। एक शब्द कहे तो सड़क से संसद तक के राज में, 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' की कहावत साबित हो सकती हैं। लेखक केन्द्र बिन्दु ही सत्तारुढ़ पार्टी के सफलता के राज उगालने से है जो बुद्धिजीवियों को सोचने हेतु ढेर सारे प्रश्न उछाले है। वर्तमान राजनीति के बड़े हिस्से से प्रान्तों के या गांव की गोठ राजनीति से संसद के जनपद तक की राजनीति का सफरनामा प्रस्तुत किया हैं। श्री गोपाल कृष्ण कोल ने कहा है "साहित्य में कभी-कभी ऐसी कृतियों का सृजन हो जाता है जो साहित्य के इतिहास की धारा के प्रवाह का रुख बदल देती है व जो अपने युग जीवन का प्रतिनिधित्व करती है और साथ ही अपने प्रभाव से नये युग के द्वार भी खोलती है।"(26)

              राय जी वर्तमान पीढ़ी के अग्रणी उपन्यासकारों में अपना विशिष्ट स्थान रखते है। वर्तमान में उपन्यास साहित्य को जिन उपन्यासकारों ने दिशा दी और समृद्ध किया उनमें राय जी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मूलतः उनके उपन्यासों में नये मूल्यों के अन्वेषण की छटपटाहट दृष्टिगोचर होती है। उनके प्रथम उपन्यास घर से लेकर तबादला तक के उपन्यासों में ऐसा कोई समाज का पहलु हमें नजर नहीं आता जिसके उपर उन्होंने अपनी कलम न चलाई हो। राय जी ने अपने उपन्यासों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक चेतना को बड़ी सुक्ष्मता की दृष्टि से अंकित किया शहर में कर्फ्यू उपन्यास में आधुनिक समाज जीवन का वास्तविक चित्रण किया है। समय के साथ भारतीय समाज और मनुष्य में परिवर्तन आया। जीवन जटिल और चिन्तन क्षेत्र व्यापक हुआ जिससे उपन्यास में आदर्श और सन्तुलन की जगह जीवन के संघर्ष और तनाव केन्द्र में आ गए।

               तबादला उपन्यास में जीवन के टूटते मूल्यों एवं यथार्थ का व्यंग्यात्मक चित्रण मिलता है। भ्रष्ट राजनीति स्वार्थी और पदलोभी प्रवृत्ति, दलबन्दी और सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों का विघटन आदि का वर्णन किया गया है।राय जी के उपन्यास अतीत, भविष्य और वर्तमान की धूरी पर घुमते दिख पड़ते हैं। वर्तमान सत्य है तथा वर्तमान से जुझे बिना उज्ज्वल भविष्य हो  प्रकार से राय जी के उपन्यासों में सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति को विभिन्न पहलुओं से जोड़ा गया है। व्यक्ति, परिवार, समाज, विवाह, शिक्षा, राजनीति के पहलुओं का सुक्ष्म अंकन किया है। इनके राजनीति स्थिति में समाज में दुद्वेष की भावना दिखाई पड़ती है। भ्रष्टाचारी राजनेताओं भी कथनी-करनी में भेद होता है। इसी प्रकार से आर्थिक विसंगतियों को भी चित्रित किया गया है।

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संदर्भ ग्रंथ-सूची :

1. घर (शहर में कर्फ्यू एवं अन्य चार उपन्यास) -विभूति नारायण राय, पृष्ठ-28-29

2. वही, पृष्ठ-68-69

3. वही, पृष्ठ- 14-15

4. शहर में कर्फ्यू- विभूति नारायण राय, पृष्ठ-8

5. कर्फ्यू के बहाने- सदानंद शाही- पृष्ठ- 8

6. ईनेस फोर्नेल का अभिमत: शहर में कर्फ्यू के विषय में जर्मन विदुषी, पृष्ठ- 49

7. शहर में कर्फ्यू - विभूति नारायण राय, पृष्ठ- 41

8. वही, पृष्ठ- 44- 45

9. प्रामाणिक अनुभवों का जीवन्त दस्तावेज- राजनारायण बोहरे, पृष्ठ- 181

10. जिसका शहर उसका कर्फ्यू- सुधीश पचौरी, पृष्ठ- 183

11. अनहद गरजै- शंभुगुप्त एवं सर्वेश जैन, पृष्ठ- 3

12. वही, पृष्ठ- 191

13. प्रेमचंद  : एक अध्ययन- शैल रस्तोगी, पृष्ठ-30

14. किस्सा लोकतन्त्र - एक उम्दा कहानी कमजोर उपन्यास- राजनारायण बोहरे, पृष्ठ- 28

15. अनहद गरजै- शंभुगुप्त, पृष्ठ- 276

16. तंत्र में बढ़ती अमानवीयता- ललित कार्तिकेय, पृष्ठ- 282

17. वही, पृष्ठ- 5

18. अनहद गरजै- शंभुगुप्त, पृष्ठ- 266

19. तंत्र में बढ़ती अमानवीयता- ललित कार्तिकेय, पृष्ठ- 283

20. किस्सा लोकतन्त्र- विभूति नारायण राय, पृष्ठ- 88

21. कुंभ में तबादला : भ्रष्टाचार की जन्म पत्री- साधना अग्रवाल, पृष्ठ-9

22. उपन्यास और लोकजीवन- राॅल्फ फॉक्स, पृष्ठ-68

23. अनहद गरजै- शंभुगुप्त एवं सर्वेश जैन, पृष्ठ- 361

24. एक नये औपन्यासिक शिल्प एवं संरचना का मानदंड- सर्वेश जैन, पृष्ठ-363

25.  तबादला - विभूति नारायण राय, पृष्ठ- 112

26. प्रेमचंद और उनका युग- रामविलास शर्मा, पृष्ठ-116


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Milan Tomic

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