भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास भारतीय पुरुषों के साथ-साथ भारतीय महिलाओं के संघर्ष को अद्भूत कहानी है। सन् 1857 ई. के भारतीय स्वाधीनता- संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने जिस अद्भुत शौर्य और वीरता का परिचय दिया, यह विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। अग्रेज भी उनकी वीरता की प्रशंसा किये बगैर नहीं रहे। उनके बारे में ह्यूरोज ने लिखा है- "सैनिक- विद्रोह के नेताओं में महारानी लक्ष्मीबाई सर्वाधिक बहादुर और श्रेष्ठ थी।" रामगढ़ की रानी ने जहाँ रणक्षेत्र में लड़ते-लड़ते प्राण दे दिये, वहीं बेगम हजरत महल अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करने के बजाए नेपाल की ओर चल पड़ी, जहाँ वनवास के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। जीनत महल को वर्मा में निर्वासित कैदी के रूप में अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं को संगठित रूप से 1885 ई. में गठित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने राजनीतिक मंच उपलब्ध कराया। काँग्रेस के अधिवेशनों में महिलाएँ प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने लगी। 1890 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में स्वर्ण कुमारी देवी और श्रीमती कादम्बिनी ने भाग लिया। श्रीमती गांगुली प्रथम महिला थी, जिसने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के मंच से अपना प्रथम भाषण दिया। इसके बाद से संगठन में लगातार महिलाओं को संख्या बढ़ने लगी, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी महती भूमिका अदा की।
सन् 1920 ई. में महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में गाँधी ने महिलाओं को उत्साहित कर संगठित किया। 1930 ई. में 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' में भी महिलाओं ने भाग लेकर अपनी क्षमता और साहस का परिचय दिया। स्वदेशी के प्रचार एवं प्रसार में महिलाओं ने विदेशी की होली जलाई। शराब की दुकानों पर धरना देकर बंद कराई। इसी प्रकार सन् 1942 ई. के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में हजारों की संख्या में महिलाएँ घर से बाहर सड़कों पर निकलीं और पूरे मनोयोग से इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन में अपना सहयोग प्रदान किया। संगठित रूप से अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित भाव के कारण महिलाएँ यातनाओं से विचलित नहीं हुई और उस समय जब अधिकांश भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं को ब्रिटिश सरकार ने अपने सीखचों में जकड़कर रखा था। उस समय राष्ट्रीय स्तर पर श्रीमती सरोजनी नायडू, अरुणा आसिफ अली, श्रीमती सुचेता कृपलानी, कमला देवी चट्टोपाध्याय, कस्तूरबा गाँधी, विजय लक्ष्मी पंडित,लक्ष्मी रेड्डी, एनी बेसेंट तथा राजकुमारी अमृता कौर जैसे अनेक महिलाओं के योगदान को भारतीय इतिहास हमेशा याद रखेगा।
गाँधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन से लेकर भारत की स्वाधीनता तक महिलाओं ने जो योगदान किया, वह उसको जागरुकता एवं परिवर्तन को दर्शाता है। महिलाओं ने सदियों से चली आ रही रूढ़िवादिता, अंधविश्वास तथा सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति को स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गाँधी जी के दर्शन में बदल दिया। उनमें राजनीति परिपक्वता का बोध होने लगा। गांधीवादी विचारधारा देश की भोली -भाली एवं बेहद शांतिप्रिय महिलाओं के लिए अनुकूल थी। यही कारण है कि इस संघर्ष के दौरान शहरी और ग्रामीण महिलाओं ने बढ़-चढ़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।
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