चित्रा मुद्गल की कहानियों में यथार्थ के विविध आयाम



चित्रा मुद्गल की कहानियों में यथार्थ के विविध आयाम 


प्रस्तावना :

            प्रत्येक रचनाकार अपने जीवन और समय के सत्य से अवश्य ही प्रभावित होता है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में उसका जीवन-सत्य और युग का बोध किसी न किसी रूप में अवश्य परिलक्षित होता है। कला की पष्ठभूमि में जीवन-सत्य और यथार्थ की क्या महत्ता होती है, इसे बड़े ही सुंदर शब्दों में महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने "ज्योत्सना' की भूमिका में स्पष्ट करते हुए कहा है, ''कला अपना अस्तित्व जीवन में लय कर जब तक उससे तदाकार नहीं हो जाती, उसके मूर्त हाथ सत्य की ज्वाला को नहीं पकड़ सकते। सर्वोच्च कलाकार वह है जो कला के कृत्रिम पट में जीवन की प्रतिकृतियों के निर्माण के बदले अस्थि-मांस की इन सजीव प्रतिमाओं में अपने हृदय से सत्य की साँसें भरता है, उन्हें सम्पूर्णता में सौंदर्य प्रदान करता है।"1 युग और काल सापेक्ष माना जाने वाला साहित्य समसामयिक परिवेश की हर धड़कन को रेखांकित करता चलता है। किसी भी रचनाकार के लिए उसके समय के यथार्थ का वर्णन सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है। ऐसा वह तभी संभव कर पाता है, जब वह गहरी संवेदनशीलता और मानवीय जवाबदेही के साथ सतह के यथार्थ की परतें तोड़कर उनके भीतर प्रवेश करता है। उस यथार्थ को रचनाकर्म में परिवर्तित करने के लिए उसमें प्रतिभा, कल्पनाशीलता और अंतर्दृष्टि का होना बहुत आवश्यक माना जाता है।

           

             चित्रा मुद्गल वस्तुत: जनवादी साहित्यकार हैं। उनके लिए कहानी विमर्श, वैचारिकी अथवा दार्शनिकता का विषय नहीं है। उनके लिए वह जीवन के धड़कते हुए हिस्सों को संभालकर रचने का विषय है। वह भी कुछ इस तरह कि उसका अर्थवान सघन प्रभाव क्षेत्र निर्मित हो सके। उनकी कहानियों में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों और स्तरों के जीवन को गहरी आत्मीयता के साथ रचने का सफल प्रयास हुआ है। गाँव देहात से लेकर झुग्गी-झोंपड़ी और संपन्न बंगला-फ्लैटों से लेकर दफ्तर-कारखानों तक प्रवाहित जीवन इन कहानियों में स्पंदित होता है। समय चार पीढ़ियों का है। दाने-दाने को तरसते दम तोड़ते बच्चे, अपने तन-मन को असह्य यातना में झोंककर भी उन बच्चों का जीवन बचाने में असमर्थ माताएँ, पत्नी-बच्चों का शोषण करते नरपशु, अभाव सामाजिक संबंधों के बीच पिसते मध्यवर्गीय स्त्री-पुरुष, ग्रामीण संस्कारों के साथ शहरों में कमाने वाले बेटों के साथ अपनी जहाँ से उखड़कर रह रहे वृद्धजन, भरे-पूरे परिवार के बावजूद वृद्धाश्रम में मौत की बाट जोहते वृद्धजन, झाडू-पोछा, चौका- बरतन करके परिवार चलाती बदहाल स्त्रियाँ, अपराधजीवी मवाली, लेखक, संपादक, पत्रकार के रूप में संघर्ष करते बुद्धिजीवी और सभी वर्गों के लोग इन कहानियों में आकर पाठक की संवेदना को झंकृत करते हैं। घर से दफ्तर तक युवतियाँ, प्रौढ़ा होने पर पति के व्यभिचारी भाव की शिकार पत्नियाँ, बाप की लाड़ली होने के बावजूद दोनों के बीच शीतयुद्ध का हथियार बनी बच्ची, किशोरी, युवती, युद्ध के मोर्चे पर शहीद हुए अधिकारी की विधवा और उसके बच्चे- सभी के मन की गहराई में उतरती हुई लेखिका पाठक को चकित, द्रवित, उत्तेजित, मुग्ध करती चलती है।

             

              यह तो सत्य है कि चित्राजी बाल्यावस्था से लेकर आज तक महानगरों से अधिक संबद्ध रही हैं, परिणामस्वरूप महानगरों से संबंधित प्रत्येक पहलू पर उन्होंने अपना ध्यान केंद्रित किया है। चाहे बात हो महानगरों के यातायात की, वहाँ के आवास की, रोजगार की, स्त्री-पुरुष संबंधों की या बात हो, नौकरी करने वाली स्त्री की समस्याओं की या घर में रहने वाली स्त्रियों की मानसिकता की, ऑफिस में होन वाली राजनीति की अथवा समाज में फैले अंधविश्वासों, रूढ़ियों और परम्पराओं की और चाहे युवाओं द्वारा की जा रही वृद्धों की उपेक्षा की, इन सभी का यथार्थ चित्रण इनकी कहानियों में मिलता है। किंतु ग्रामीण जीवन से तुलनात्मक रूप से कम संबद्ध रहने पर भी उनका ग्रामीण यथार्थ- बोध भी कम विस्मित करने वाला नहीं। 'जगदंबा बाबू गाँव आ रहे हैं' कहानी को जब पाठक पढ़ता है तो उसे लगता है कि ग्रामीण राजनीतिक परिवेश का यथार्थ इससे अधिक कुशलता से व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह तभी संभव हो सका, क्योंकि लेखिका ग्रामीण जीवन के प्रत्येक पक्ष से भलीभाँति परिचित रहीं हैं। यह चित्राजी के परिवेश की यथार्थ प्रस्तुति ही है, जिसके प्रवाह में पाठक अनायास ही बह जाता है!

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प्रथम अध्याय :

चित्रा मुद्गल की कहानियों में वर्ग- संघर्ष :


              वर्ग तथा वर्ग- संघर्ष की अवधारणा कार्ल मार्क्स की है, जिसमें उन्होंने दुनिया भर के लोगों को दो ही वर्गों में विभाजित किया है- शोषक और शोषित। इनके बीच सदैव संघर्ष होता रहता है। किसी भी राष्ट्र के उत्थान में इस तरह के संघर्ष की अत्यंत साकारात्मक भूमिका होती है। चित्रा जी को वर्ग-संघर्ष का जीवंत अनुभव है। मालिक हो या मालकिन, यही चाहते हैं कि नौकर उसकी मर्जी से चलें। यदि वे नहीं चलते उन्हें काम से हटाकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। वर्तमान समय में शहर के घरों में काम करने वाली बाइयाँ भी काफी तेज हो गई हैं। वे जानती है कि बड़े लोगों को उनके बिना गुजारा नहीं, अतः वे अब फालतू बात अथवा ऊँच-नीच की बातें नहीं सहती। 'स्टेपनी' कहानी में मिसेज खन्ना नताशा से सोफे की जगह नीचे बैठकर सब्जी काटने के लिए कहती है, यह उसे अच्छा नहीं लगता। वह उन्हें जवाब दे देती है। परिणामस्वरूप वे उसे अपने यहाँ से काम से हटा देती हैं, इसके साथ ही और लोगों को भी उसके खिलाफ इस तरह भड़काती हैं , ताकि वह भी उसे काम से हटा है। जाड़े के समय में कोई भी स्त्री बिना माइयों के नौकरी नहीं कर सकती। इसीलिए इनकी मांग निरंतर बढ़ती जा रही है और इनके नाज-नखरे भी बढ़ते जा रहे हैं। तभी तो नताशा श्रीमती खन्ना के कहने पर कह देती है, ''सोचना क्या है बीबीजी, पहली से आप कोई और इंतजाम कर लेना। मेहनत करते हैं, मेहनत में जात-पाँत कैसी?"2 जब आभा नताशा को लेकर विनोद से बात करती है तो वह उसे नौकरानियों के यथार्थ बताते हुए कहता है, ''दिमाग से काम लो, अम्मा! बहकावे में मत आओ! अच्छी तरह से जानती हो तुम कि इधर मयूरविहार में बाईयों की कितनी किल्लत हो रही है।...लोग चाहते हैं कि इधर तुम उसे निकालो, उधर वे उसे अपने घर के लिए फाँस लें।"3 यद्यपि अंतर्द्वंद से घिरी आभा एक बार तो उसे निकालने की सोचती है, लेकिन चित्त के शांत हो जाने पर वह सारी स्थिति का आकलन कर इस निष्कर्ष पर पहुँचती है, ''शायद कोई विकल्प नहीं है उसके हिस्से।"4 कर्मचारियों में बहुत एकता होती है, इसी कारण ये मालिक की परवाह कम हो करते हैं, क्योंकि ''मजाल है जो उसके अलावा कोई अन्य जमादारिन जीना चढ़ जाए... इसी एका के चलते कोठीवालों की दाल नहीं गलती।"5

            

               आज के उच्च वर्गीय समाज में ब्रिज खेलना, शराब पीना, मित्रों की पत्नियों के साथ अभद्र व्यवहार करना जैसी बातें बुरी नहीं मानी जाती। बावजूद इसके कहानी में गोयल को भी यह सब बहुत पसंद है, ''जिंदगी जीने के उसके अपने तेवर थे। क्लब में रात एक-दो बजे तक 'ब्रिज' जमा रहता। साथ पीना-पिलाना भी खाना भी ज्यादातर किसी बड़े होटल में खाया जाता या फिर किसी दोस्त के घर लौटकर।"6 जो पत्नी पति की इन बातों को स्वीकार कर लेती है, तब तो ठीक, अन्यथा वैसी ही लड़ाइयाँ होती हैं, वैसी ही मारपीट होती है, जैसी गोयल और प्रीति के बीच होती हैं और अंत में प्रीति गोयल से तलाक लेने का निर्णय लेती है। महानगरीय जीवन और आधुनिक उच्च वर्गीय जीवन के यथार्थ को बड़ी ही सजीवता से अपनी वापसी कहानी में उजागर किया गया है। बड़े-बड़े में बालों में सबके पास अलग-अलग कमरे होते हैं परिणामस्वरूप पारम्परिक संबंध कम होती जा रही है जैसे कि शकुन स्वयं कहती है, ''उसे क्या पता था कि अलग कमरे पाकर एक ही घर में कई-कई घर उग आएँगे।"7 बड़े घरों का एक सच यह भी है कि बच्चे रात में देर से सोते हैं और सबरे देर से जागते हैं। ऑफिस जाने के समय घर में चारों ओर से कैसी मारा-मारी होती है, एक झलक, ''तीनों बच्चे एक साथ उठते-किसी को हल्की चाय चाहिए। किसी को चौक कॉफी। किसी को बाथरूम में गीजर से गरम पानी।"8 आजकल माता-पिता की संपत्ति पर लड़के लड़कियों का बराबर का हक होता. है, सरकार द्वारा भी इस संबंध में कानून बना दिया गया है। सन्निपात कहानी में इस बात को वर्णित किया गया है। उच्चवर्गीय ठाकुर साहब को जब इस कानून के बारे में बताया जाता है, वे कहते हैं, ''सरकार का काम है, विदेशों की नकल कर आए रोज नए-नए कायदे-कानून बनाना अमल कौन करता है? फिर वैसवाई के तेवर जुदा ठहरे। यहाँ सरकार के कानून नहीं चलते चलते हैं भूपति क्षत्रियों के परंपरागत नियम-कायदे।"9 इस प्रकार बड़े-बड़े पैसे वालों द्वारा जिस प्रकार कानून की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं, इसका साफ पता चलता है। 


               हमारे देश में धर्म के नाम पर होने वाले दंगे का कोई भी कारण हो, कुछ भी हो, धर्म के नेता बनने के शौकीन लोग और साधारण घटना को अपने तरीके से तोड़-मरोड़ कर इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि सामान्य- सी बात बहुत बड़ी बनकर कभी- कभी सांप्रदायिक हिंसा में परिवर्तित इसी है। चित्रा मुद्गल समाज के इस सबसे अच्छी तरह अवगत है। यह भी है कि एक के लोग एक ही कॉलोनी में रहना चाहते हैं। यदि कहीं एक धर्म के लोग ज्यादा है और दूसरे धर्म के लोग कम है, तो सांप्रदायिक की संभावना बढ़ जाती है। बाद में मिस्टर पुरोहितजी अपने लिए खरीदना चाहते हैं,उसे पिछले साल के दंगों की याद दिलाता है और यह भी सूचित करता है कि आने वाली रामनवमी पर ऐसे दंगों के दोबारा भड़कने की आशंका है। इसी के चलते दूसरा मजहबी अपना मकान सस्ते में देकर अपने लोगों की में चले जाना चाहता है।

         

               'लपटें' कहानी में सांप्रदायिक दंगों का सच दिखाया गया है। कहानी में परिवार बंबई का नहीं है, कहीं बाहर से आकर यहाँ बसा है। पिछले साल भी सांप्रदायिक वातावरण होने के कारण उसके बेटे मुनुआ की लपटों की भेंट चढ़ा दिया गया था, ''हमने अपनी नंगी आँखों से शेट्टी टीवी वाले की दुकान लूटने के बाद सत्तार चाली के छोकरों को मुनुआ को दबोच लपटों में फेंकते हुए देखा है... सतार वाली वाले पार साल इन्हीं की पार्टी के लिए चंदा माँगने नहीं आए थे।"10 इस प्रकार कहानी में सांप्रदायिकता की समस्या को लेखिका उजागर करती है।


              आर्थिक विपन्नता मानव समाज की सबसे जटिल समस्या है। इसे अनेक समस्याओं की जड़ कह सकते हैं। आर्थिक विपन्नता का सबसे महत्वपूर्ण कारण है-बेरोजगारी। पहले तो गाँव से लोग यह सोचकर ही आते थे कि शहर में जाकर उन्हें रोजगार अवश्य ही मिल जाएगा और उन्हें मिल भी जाता था, लेकिन अब महानगर मैं भी रोजगार मिलना बहुत मुश्किल हो गया है। 'ठेकेदार' कहानी में रोजगार की तलाश में गाँव से शहर में आए छेदी को अनेक प्रकार की यातनाएँ सहनी पड़ती है। स्टोव की बुझती आँच में रोटी पूरी तरह से सिक नहीं पाती। परिणामस्वरूप रामसुर कक्का और छेदी को कच्ची -पक्की रोटी खानी पड़ती है। जब उसे रोजगार नहीं मिलता, रामेसुर कक्का द्वारा दिए गए ज्ञान के आधार पर वह रिक्शा चलाने की बात सोचता है। किंतु आजकल रिक्शा चलाना भी कम मुसीबत का काम नहीं है। ठेकेदार के यहाँ पैसे डिपाजिट कराना, फिर हर रोज का किराया समय पर दे जाना, चाहे रिक्शे से कोई आमदनी हो या न हो डिपाजिट की रकम 1500रु. तथा प्रति सैकड़ा भारी सूद पर उठाकर ठेकेदार के यहाँ जमा करने के बाद रिक्शे की व्यवस्था कर छेदी मयूर विहार के मैट्रो स्टेशन पर जा खड़ा होता है। सुनहरे सपनों को मन में बसाए, लेकिन पुलिस को पैसा न मिलने पर, ''खाकी वर्दी आपा खो बैठी - 'कमीने कहीं के, सरकार से जबानदराजी की हिमाकत' हुमक कर वर्दी ने एक डंडा उसकी बांई टाँग पर मारा। दूसरा वार किया रिक्शे के हैंडिल पर।"11 ऐसी घटनाएँ महानगरों में आमतौर पर देखने को मिल जाती हैं। एक तो रोजगार के अवसरों का न बढ़ना, दूसरे जनसंख्या में निरंतर होती जा रही वृद्धि तथा साथ ही लड़कियों के रोजगार करने पर लड़कों के लिए रोजगार के अवसर में कमी आ रही है। ऐसी स्थिति में 'लिफाफा' कहानी में अशोक यही सोचता है, ''कमबख्त घरों में बंद चूल्हा -चौका निपटा रही होतीं तो आज लड़के निठल्ले, बेरोजगार न घूम रहे होते ।"12

           

              हमारे देश में गरीबी और बेरोजगारी भीषण समस्या का रूप ले चुकी है। लोग आधी मजदूरी मैं भी काम करने को तैयार हैं लेकिन यह भी नहीं मिलती है। 'भूख' कहानी में इसका चित्रण करते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि बेरोजगारी हमारे देश में चरम सीमा पर है. ''बुरा वक्त एक काम, दस मजूर काम मिले भी तो कैसे? ऊपर से मुसीबत का रोना एक से एक बईमान ओढ़कर निकलते। आधी से जास्ती मजूर इधर आधी दहाड़ी पर काम करते। पूरी, दिहाड़ी कौन देता? टिरेनिंग में सरकार देती।"13 एंटीक पीस में बहुत कोशिशों के बाद भी को नौकरी नहीं मि पाती। ''वह' की बेरोजगारी के कारण ही उसके लकवाग्रस्त पिता को नहीं दिखाया, जिसका पिछले हफ्ते अड़चन रही हिंदुजा की फीस, फीस के अलावा डॉक्टरों के बेमुरव्वत अनेक किस्म के प्रयोगवादी जाँच के खर्चे।"14

            

               महानगरों में निम्नवर्गीय परिवार की क्या स्थिति होती है, इसका सजीव वर्णन है 'केंचुल' कहानी में। पत्नी रात-दिन खटती है, लेकिन पति को शराब पीने से होश नहीं मिलता। कमला का पति विष्णु रात तो रात, दिन में भी शराब पीकर पड़ा मिलता है। काम से घर आकर जब वह उसे इस स्थिति में पड़ा देखती है, तो उसकी मानसिक स्थिति का बड़ा ही यथार्थ वर्णन, ''इस स्थिति में उसे पारा चढ़ गया। हिकारत से थूक देने का मन किया। आदमी है मुरदार? पीना, पीना, सिर्फ पीना। घर को फूँक डाला। उसकी जिंदगी हराम कर दी।"15 विष्णु के दिन -रात पीने और जुआ खेलने के कारण कमला का परिवार बरबाद हो जाता है। शराब पीते समय और जुआ खेलते समय अपने बड़े बेटे रत्नू को अपने साथ रखने पर किसी बात पर आपस में झगड़ा हो जाने के कारण किसी के द्वारा उसकी हत्या कर दी जाती है। विष्णु के द्वारा ही किसी बात पर अत्यधिक पिटाई करने के कारण उसका छोटा बेटा गोविंदा घर छोड़ कर चला जाता है, यह सब याद आ जाने के कारण कमला को विष्णु से नफरत हो जाती है, ''पिच से थूक ही दिया औंधी देह पर। घृणा के उबाल पर संयम टूट गया।"16

          

               महानगरों में छोटे-छोटे गरीब बच्चे पढ़ते तो हैं, लेकिन स्कूल खत्म होने के बाद गलियों में खेलते रहते हैं। 'त्रिशंकु' कहानी में बंडू स्कूल से आने के बाद गली में खेलता रहता है। उसकी माँ घरों में काम करती है। उसका पति दिन -रात शराब पीकर अपनी बीवी को कूटता- पीटता रहता है। यह बात पास- पड़ोस के सभी लोग जानते हैं, तभी तो पास के दुकानदार भइया जी के शब्दों में, ''तू कैसे आ गया रे, बंडू.... कहीं बाप ने कुटम्मस तो नहीं की महतारी (माँ) की ?... अक्खा झोपडपट्टी का ऐसन हाल वा... जोरू चार घरि चौका-बासन करति हय और इनके म घाटी साले... दारू पी पा के महरारू के हाड़-गोड़ तोरत हैं, राम-राम, कैसी जबराई।"17 पिता के शराब पीकर आने के बाद माँ-बाप के बीच जब युद्ध हो व्याकुल लगता है, बाप माँ को कूटने लगता है तो बालक बड़ और उसकी बहन कमला, ''आतंक से सहमे, अपनी दरी पर पड़े हुए, छाती में घुमड़ती, फूटने की। हिचकियों को होठों में भींच, विवश, मोम से टपकते रहते।"18 समस्याओं की जननी गरीबी निम्न वर्ग की मुख्य समस्या होती है। गरीबी के कारण ही माँ घरों में बरतन माजती है और उसके बावजूद उसके पिता से पिटती है, इसी 示 ही वह पढ़ाई छोड़ अपनी माँ को अच्छा जीवन देने के लिए कई तरह के कारण काम करता है और अंत में सिनेमा की टिकट अनेक में बेचने का गलत धंधा भी अपना लेता है।

             

              चित्राजी निम्न- वर्ग की गरीबी का बड़ा ही सजीव चित्रण करती हैं। 'बलि' कहानी में गरीब के बच्चों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने के कारण बदलती हुई स्थिति दिखाई है जो वर्तमान का सच है, ''नए चलन के चलते लिखने-पढ़ने में दीदा लगा रहे चमरा टोले के लड़का उदंडई दिखाते हाथ में रेडियो लिए घूम रहे, लेकिन बूढ़ी हड्डियों से अब तलक मालिकों का लोना नहीं झड़ा।"19 बेईमान कहानी में ट्रेनों में घूम- घूम कर पत्रिका बेचने वाले बच्चे की गरीबी का यथार्थ, ''एक तो उसकी चार फुटी काया! ऊपर से दस किलो के लगभग पत्रिकाओं का बोझ लादे हुए उसके सुन्न पड़ते बाजू फेरी पूरी होते न होते कंधों से अलग होने लगते। सुतली से बँधी खाकी मैली निकर चार कदम चलने ही कमर पर टिकने से आँख दिखाने लगती स्टेशन पर पत्रिका बेचने दुकानदार उस बच्चे से पैसे कम मिलने पर क्या-क्या बोल जाता है, कैसे उस गरीब का शोषण करता है, इसका सजीव वर्णन है। पत्रिका विकती हैं" 17, हिसाब देता है वह 15 का, वह यह बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाता कि एक पत्रिका टिकट चेकर ने उठा ली, लेकिन डोंटकर पूछने पर जब यह बता देता है, तब दुकानदार किस तरह उसे झाड़ता है, "चिरौरी नहीं की, में मालिक नहीं, नौकर है, कहाँ से डाँड़ भरूँगा...अबे वाजिद अली की औलाद डिब्बे-डिब्बे टिकट बाबू मिलेंगे तुझे और तू उन सबको मुफ्त पत्रिका बाँटता फिरेगा? खैरात बाँटने निकलता है कि....20 और फिर यह दुकानदार उसकी पुरानी बची हुई रकम में कमीशन जोड़कर तथा उसमें से दो पत्रिकाओं की कीमत काटकर बचे हुए इक्कीस रुपए उसके हाथ में पकड़ते हुए उसकी मजबूरी को समझते हुए भी उसे काम छोड़ देने के लिए कहता है। पत्रिका बेचैन वाला वह बच्चा बड़े ही खुशामदी स्वर में उसे मनाता है और दुकानदार के मान जाने पर उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है। छोटे-छोटे दुकानदार ही नहीं बड़ी-बड़ी कंपनी चलाने वाले मालिक भी अपने कर्मचारियों का शोषण करने से नहीं चूकते। बंद कहानी में बबई-बंद का ऐलान होने पर फिल्मी-पत्रिका 'मेनका के ऑफिस में काम करने वाले रमेश, हरीश और नवल रद्दी इकट्ठी कर और उसे बेचकर अपने पूरे दिन का खाने-पीने का खर्च चलाते हैं और अगले दिन मालिक मल्होत्रा द्वारा बेची हुई रद्दी का हिसाब पूछकर उन पैसों को वहाँ के कर्मचरियों के मेहनताने में बदल दिया जाता है और इस प्रकार उन कर्मचारियों का शोषण किया जाता है तो एक कर्मचारी नवल बंबई-बंद के बारे में यह सोचने के लिए विवश हो जाता है, "यह बंद न मराठियों का मद्रासियों के खिलाफ है, न एक जाति का दूसरी जाति के प्रति। यह उस जाति के खिलाफ है. जो स्वार्थी और संकीर्णताओं के चलते दूसरों का शोषण करती है और किसी भी जाति का मुखौटा ओढ़कर अपना चेहरा बदल लेती है। और यह मलहोत्रा भी..."21 समाज का सच यही है। वह भी स्वयं को शोषित महसूस करता है और मल्होत्रा से बदला लेने के लिए बीड़ी सुलगाकर, उसके एक-दो कश लेकर चुपके से 'मेनका' के बंडलों में खोंस देता है। प्रतिशोध की भावना ही विद्रोह का कारण बनती है। शोषण ही आक्रोश का जन्मदाता होता है।

         

              "भूख" कहानी में तो लेखिका ने निम्न वर्ग की विपन्न ता की भीषण समस्याओं का चिट्ठा हो खोलकर रख दिया है। ऐसा कच्चा चिट्ठा वही खोल सकता है, जिसने नजदीक से इस वर्ग को देखा होगा। चौराहे पर गोद में लटकाए, रोते -पीटते छोटे बच्चों को लिए औरतों को भीख मांगते हम सबने देखा है। लेकिन इस सबके पीछे कितना बड़ा गैंग काम करता है, मासूम बच्चों का किस हद तक शोषण किया जाता है, मानवीयता इंसान में किस सीमा तक खत्म हो जाती है, यह कहानी में सब बातें सोचने के लिए विवश कर देती है। लक्ष्मा तो कलाबाई के यह कहने पर विश्वास कर लेती है कि इस छोटू को दूध-बिस्कुट मिल जाएगा, साथ ही दो रुपए मिलने से दोनों बड़ों के लिए भी खाने-पीने का इंतजाम हो जाएगा। यह सोचकर वह छोटू को भिखारिन जग्गूबाई को सौंप देती है। लेकिन वहाँ छोटू को कुछ खाने-पीने के लिए नहीं दिया जाता, उसकी आतें चिपक जाती हैं और बच्चा मर जाता है। जग्गूबाई छोटू को किराए पर क्यों ले जाती थी, इसका खुलासा कांवलेबाई के इस कथन से होता है, ''अब रोने से क्या!....वो छिनाल बच्चे का पेट भरती तो बच्चा आराम से सोता, पिच्छू उसको भीक कौन देता? अरे, वो बच्चे को फक्त मुक्काच नई रक्खते, रोता नई तो चिकोटी काट-काट के रुलाते कि लोगों का दिल पिघलना... अभागिन, काय कूई दी उसको अपना छोटू रे।"22 गरीबी इंसान को वह सब करने को मजबूर कर देती है जो उसने कभी सोचा भी न हो। इसी के कारण ही लक्ष्मा निराश होकर आत्महत्या का कदम उठाना चाहती है, पहले भी दो बार वह यह कदम उठाने की "ऐसे भरें या वैसे, मरेंगे जरूर एक दिन और वह भी हत्या ही होगी और वह पानी पेट की आं उनकी खुराक न देकर, उन्हें तरसा-तरसा कर मारना क्या हत्या नहीं।"23 गरीबी के कारण ही भिक्षावृत्ति, पॉकेटमारी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हैं। चेहरे कहानी में बंबई महानगर के पश्चिमी रेलवे स्टेशन पर बहुत-सी पुरुष यात्रियों को पेंट और टखनों को छू-छू कर भीख माँगती हैं, जिसका परिणाम है कि पुरुष यात्रियों में सेक्स की भावना जाग्रत हो जाती है, उनका नाम उठकर भिखारिन के बच्चे या साथी उनकी जेब से पर्स साफ कर जाते हैं। साथ ही इस तथ्य को भी उजागर किया गया है कि रेलवे स्टेशनों पर भिखारियों की ही नहीं होती, इसके पीछे वहाँ के अधिकारियों की उनसे हफ्ता वसूली को मान भी होती है। वहाँ की पुलिस उनसे सख्ती इसलिए नहीं कर पाती क्योंकि में उन्हीं औरतों के पास जाकर अपनी हवश शांत करते हैं। इन सबकी मिलीभग से यात्री परेशान होते हैं।

            

              गरीब- वर्ग का शोषण तो अमीर- वर्ग के द्वारा सदा से ही किया जाता रहा है। 'लेन' कहानी में जमादारिन महेंदरी अपने पति के छुरा लगने पर उसे अस्पताल में दाखिल करवाती है और इस वजह से चार-पाच दिन काम पर नहीं जा पाती। अमर वर्ग की तरफ से कोई भी उससे उसके न आने का कारण नहीं पूछता, वरन उसके आते ही सब अपने-अपने काम बताने लगते हैं, जैसे वकीलनी कहती है, ''जीने। बड़ी गंदी हो रही है, जमादारिन पाइप लगा छोड़ती हूँ, अपने-अपने दरवाजे डलवा ले सबसे! धुलाई कर डाल।"24 उसके तन-मन की परवाह न करते हुए उससे पूरे जीने की धुलाई करवाते हैं। इसमें रिक्शे वालों का यथार्थ भी वर्णित कि है। रात-दिन रिक्शा चलाने के बाद बीड़ी तमाखू खाना-पीना तो इनके लिए आम बात है, इसके अलावा ये कई अन्य तरह का नशा भी करते हैं चाहे वह शराब का हो या अफीम का परिणामस्वरूप इनकी गरीबी दूर नहीं होती। एक दूसरा इनकी गरीबी के पीछे यह भी है कि रिक्शाचालक किराए का रिक्शा चलाते हैं, ''यात्री मिले, न मिले, इससे रिक्शे के मालिक का क्या वास्ता! वह तो रिक्शे की वापसी के पर साथ ही पूरे दिन के ठहरे बारह रुपल्ली गिनवा लेता है।"25 

            

              आपराधिक मानसिकता के लोग बहुत दबंग होते हैं। जब वे किसी अपराध के तहत पकड़े जाते हैं, तो अपने दूसरे साथियों को पीड़ित लोगों को डराने- धमकाने के भेजते हैं। इसी कहानी में महेंदरी के पति को मारने वाले जब तीनों लोग पकड़ लिए जाते हैं, तो तीसरे आदमी को पहचानने से मना करवाने के लिए दो लोग महेंदरी के पास आते हैं। पहले तो वे लोग बड़ी नरमी से उससे बात करते हैं, ''आप अगर उस हत्यारे को पहचानने से मुकर जाएँगी तो हम उसकी कीमत आपको चुका देंगे।...।"26 आपके सामने ये पाँच हजार रुपए रखे हैं। उसे सुनकर महेंदरी को बहुत गुस्सा आता है और वह काफी ऊलजलूल बोलती है। ये दोनों उसकी बातों को सुन पहले तो मुस्कराते हैं और बाद में चेतावनी के स्वर में अपनी बात कुछ भी घटा, बहुत दुर्भाग्यवश ही घटा...लेकिन आगे जो कुछ घटेगा, उसकी जिम्मेदारी आप पर होगी। कहकर जाते हैं। महंदरी गरीबी के करण उनकी बात मानन के लिए बेवश हो जाती है।

           

              महानगरों में प्रायः लोगों को स्थाई रोजगार नहीं मिल पाता, ऊपर से इन महानगरों के खर्चे भी अपनी ही तरह के होते हैं जिनके चलते व्यक्ति आर्थिक तंगी से रात-दिन घिरा रहता है। मामला आगे बढ़ेगा अभी कहानी में मोठ्या को सक्सेना साहब के यहाँ कार साफ करने की नौकरी मिलती है। यह मिसेज सक्सेना में अपनी माँ को महसूस करने लगता है जिसके कारण वह उनके घर के और काम भी करता रहता है। लेकिन जब यह बीमार पड़ता है तो सक्सेना उसका पैसा काट लेते हैं, उसके द्वारा इस बात का विरोध करने पर वे उसे मार-पीटकर बाहर निकाल देते हैं। उस समय मिसेज सक्सेना का कुछ भी न कहना उसे अखर जाता है। वह रोता-रोता यही सोचता है, ''जबी झापड़ मारा...मेमसाब पासमेच खड़ी होती... धक्का देके बाहर किया... नई बोलने को सकती थी कि मैं ताप में होता?"27 अत्यंत कुछ हुआ मोट्या उसी रात को सक्सेना साहब की गाड़ी को बेरहमी से पीट-पीट कर डिब्बा बना देता है।

          

               अचानक कोई परेशानी आ जाने पर जब मालिक अपने अधीनस्थ का साथ नहीं देता, तो अधीनस्थ बेईमानी करने के लिए मजबूर हो जाता है। ब्लेड कहानी में ड्राइवर रामखिलावन की लड़की के पैर की हड्डी टूट जाती है, उस पर प्लास्टर चढ़वाना है, उसके लिए पैसे चाहिए। वह अपने मालिक के सामने पैसों की बात करता है जिसे उनके द्वारा टाल दिया जाता है। अब उसके सामने पैसों की व्यवस्था करने का बड़ा प्रश्न है, उस समय उसे जमाल द्वारा कुछ समय पहले की कही गई बात याद आती है, ''अबे घनचक्कर, गाड़ी जल्दी-जल्दी गैराज भेजा कर!"27 और यह सोचकर वह गैराज मालिक सरदारजी के पास जाकर अपनी समस्या को सुलझा लेता है और गैराज में जाकर पिछली सीटों की खिंची सिलाई ब्लेड से काटकर गाड़ी सरदार जी के गैराज में खड़ी कर देता है। कभी-कभी मालिकों का आचरण भी गरीब व्यक्ति को बेईमान बनाता है।


               हमारे समाज में प्रायः देखा जाता है कि झोपड़पट्टी में रहने वाले गरीब तबके के लोग तो दूसरों की मदद के लिए आगे आ जाते हैं लेकिन जब लोगों का रहने का स्तर बढ़ जाता है, वे लोग मानवीय संवेदनाओं से दूर हो जाते हैं, जैसे सौदा कहानी में मंगला ही सोचती है, ''झोंपड़पट्टी में थी तो मामूली-सी 'चीं-चीं' पर खोली में बंद अपने-अपने दुःख-सुख।"28 इसी कहानी में गेंदा गरीबी से तंग आकर एक ड्राइवर के यह कहने पर, "हमरे संग सहर चल, अपने सेठ के घर नौकर रखवाय दंगे के लालच में वह उसके साथ आ जाती है। लेकिन वह यहाँ आकर उसे एक दलाल को बेच देता है और दलाल उससे धंधा करवाने के लिए मार-कुटाई भी करता है जिससे बचने के लिए वह मौका पाते ही खिड़की के रास्ते बाहर भाग जाती है रोज ही अखबारों में प्रकाशित होती रहती हैं।

            

                गरीबी के कारण पति-पत्नी के संबंधों में भी कड़वाहट आ जाती है। यही कारण है कि कहानी में तांगा चलाने वाले असलम की पत्नी जुवेदा भूख के मारे जब बच्चों को तड़पता देखती है, तो वह असलम के सामने कहती है, ''नामुरादो! कहाँ से लाऊँ दोनों जून तुम्हारे पेट में डालने को...एक मैं ही साबुत बची हूँ इस घर में, सो कहो तो अपनी बोटियाँ काट के चढ़ा दूँ हांडी में पकने को ?''29 गरीबी के कारण ही असलम में लालची प्रवृत्ति का जन्म होता है। घोड़ी सरवरी की बीमारी से हुई खराब हालत देख कर वह सोचता है कि तांगा खाली ही ले जाए लेकिन घर के रास्ते में इकलौती सवारी के मिलने पर वह अपने लालच पर नियंत्रण नहीं रख पाता और उसे बिठाकर रास्ते में उतार देता है। लालच के कारण ही वह ताग को कार से भिड़ा देता है ताकि वह घोड़ी की मौत का सौदा कर सके।

           

               गरीबों का एक बड़ा सच यह भी है कि वहाँ स्त्रियाँ अधिक काम करती हैं और पुरुष ज्यादातर शराबी जुआरी होते हैं। गिल्टी रोजेस कहानी में गुनावाई का पति भी शराबी और जुआरी है और यह सब ऐब वह घर में बैठकर ही करना चाहता है। जब गुनाबाई उससे इस प्रकार का व्यवहार घर में करने से मना करती है तो वह बेटियों के सामने ही उसे लात-घूसों से मारता है। जब उसका पति बड़ी बेटी से वेश्या जैसा कुकृत्य करवाने के बाद उस पैसे से शराब पीने चला जाता है, इससे पीड़ित होकर वह स्वयं तथा बच्चियों पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आत्म हत्या और हत्या कर देना चाहती है। लेकिन बेटियाँ तो मर जाती हैं और वह बच जाती है। इस बात का उसे गहन पश्चाताप होता है। ऐसी घटनाएं प्रायः रोज अखवारों की खबर बनती हैं और बासी हो जाती हैं। समाज की नष्ट होती जा रही संवेदना इसके मूल में दिखाई देती है।

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द्वितीय अध्याय  :

चित्रा मुद्गल की कहानियों में नगरीय मध्यवर्ग :


             हृदय की अंतरतम संवेदनाओं को प्रस्तुत करती हुई 'गर्दी' कहानी एक ऐसे पुरुष के इर्द-गिर्द घूमती है जो नौकरी करने बंबई गया हुआ है। अपनेपन के किसी रिश्ते से परिचय नहीं होने के कारण उसका वहाँ मन नहीं लगता और वह घर लौट जाना चाहता है। लेकिन जब वहाँ उसकी मुलाकात अपने 11 वर्ष पुराने मित्र उमेश से हो जाती है तो वह वहीं रम जाता है। कुछ समय बाद अल्सर फटने से उमेश की मृत्यु हो जाती है। उसकी पत्नी राजी और उसकी दोनों लड़कियाँ बेसहारा हो जाती हैं। वह उस परिवार में अपने घर के सदस्यों का मूर्त रूप देखने लगता है जैसा कि वह अपनी छोटी बहन रेनू से स्वीकारता है, ''परिवार पर अचानक टूटे पहाड़ के चलते जिन परिस्थितियों में वे अकेले, असहाय हुए, वहाँ अगर मैं उन्हें बेसहारा छोड़ देता तो शायद अपने से ज्यादती होती, तुम सबसे भी... क्योंकि तुम सब उस घर में! मेरे लिए मूर्त हो गए थे।"30 और वह उन सबका ख्याल रखने लगता है। राजी को लेकर झूठी-सच्ची खबरें उसके परिवार तक पहुँचने लगती हैं, इस पर परिवार द्वारा उसकी माँ की 'डेथ वेड' की झूठी खबर भेजकर उसे बुलवा लिया जाता है। वहाँ पहुँच कर उसे अपने परिवार वालों से जो व्यवहार मिलता है, उससे उसे ऐसा लगता है कि वे सब उसकी जान के लेवा हो रहे हैं। वह उन्हें बताना चाहता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जैसा वे लोग सोच रहे हैं। वह उन्हें बताना चाहता है कि महानगर में व्यक्ति, सुरक्षित तभी बचता है जब उसे अनायास किसी घर में अपना घर मिल जाता है। रिश्ते मिल जाते हैं।"31 लेकिन कोई उस पर विश्वास नहीं करता। पारिवारिक जनों में उसके प्रति उपजी शंका के कारण जब वह वहाँ से बंबई के लिए चलता है, उसे ऐसा लगता है, ''मानो उनसे अलग होना साँसें पाना जैसा लगा। शायद इसलिए कि वह अपनों से नहीं, संशयों से मिला, अविश्वासभेंट हुई उसकी।"32 इस प्रकार कहानी का 'वह बंबई जैसे महानगर की ि और अपने परिवार की रूढ़िवादिता के बीच पिसता हुआ भी अपने 'स्व' की पहचान को अंत तक नहीं खोता और माँ द्वारा बांधे गए ताबीज को तोड़कर अपने दिवंगत मित्र की पत्नी को जीवनसंगिनी बनाने का फैसला कर लेता है।

            

                जिस व्यक्ति का चरित्र पल-प्रतिपल बदलता है, वह पत्नी और बच्चों को किस सीमा तक द्वंद्वग्रस्त कर सकता है, इस कथ्य को आकार देती ताशमहल कहानी है। पति दिवाकर से अलग होने के बाद अपने बेटे बच्चू के साथ अच्छा जीवन जीने वाली शोभना के जीवन में निशीथ आ जाना चाहता है। लेकिन शोभना ऐसा नहीं चाहती। किंतु निशीथ द्वारा दिखाई जाने वाली बेपनाह मुहब्बत और शराफत, साथ ही उसके द्वारा उसकी सभी प्रकार की शर्तों के मान लिए जाने पर वह निशीथ से विवाह कर लेती है और पुत्र रोनू का जन्म हो जाता है। किंतु वक्त के साथ निशीय में परिवर्तन आने लगता है। उसमें शंकालु प्रवृत्ति जन्म ले लेती है जो उसकी बातों में झलकने लगती है, ''बच्चू मात्र दिवाकर का अंश ही नहीं, उसकी शक्ल में तुम दिवाकर को जी रही हो...इस घर में, अपने और तुम्हारे बीच इसे और नहीं बरदाश्त कर सकता!... लगता है, रोनू को पैदा ही नहीं किया तुमने...क्यों कर रही हो सौतेला व्यवहार मेरे बच्चे के संग ?''33 अपनी शंकालु प्रवृत्ति के कारण एक दिन जब वह बच्चू को अपने बिस्तर से उठा कर पटक देता है, तब उसके अहंकारी और कुंठाग्रस्त स्वरूप से अपने पहले पति से हुए बेटे को बचाने के लिए शोभना स्वतंत्र जीवन जीने का निर्णय लेती है।

            

              महानगरीय जीवन के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण तलाक लेना और देना एक आम बात होती जा रही है, जिसका दुष्प्रभाव बच्चों के जीवन पर पड़ रहा है। उसका बच्चों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आज के बच्चे तलाकशुदा माता-पिता के बीच हथियार बनना चाहते हैं? इन बातों के इर्द-गिर्द घूमती है 'हथियार' कहानी। तन्वी के माता-पिता में तलाक हो जाता है और उसकी माँ अपने प्रेमी से विवाह कर लेती है। तन्वी अपने सौतेले पिता के साथ रहते हुए भी उससे बात नहीं करती है। उसके अपने पिता डोंबवली में रहते हैं। नौकरी करने वाली तन्वी अपने पिता से माँ को बिना बताए मिलती रहती है। तलाक हो जाने के बावजूद वे उसकी माँ के बारे में पूरी जानकारी रखते हैं। वे यह भी जानते हैं कि उसके सौतेले पिता का प्रेम संबंध अन्य किसी स्त्री से चल रहा है। जब उसे अपने पिता के इस ज्ञान का पता चलता है, वह बहुत आश्चर्यचकित होती है वह सोचती है, ''माँ की सिसकियाँ घर की दीवारें फॉदकर क्या उन तक दौड़ आती हैं?"34 वह स्वयं जब इस बात को अपने पिता के सामने स्वीकारती हुई अपनी माँ की परेशान स्थिति की बात करती है तब वे बड़े ही विद्रूप स्वर में कहते हैं कि उन्हें वह सब कुछ ''खामोशी से सह लेना चाहिए जैसे लिया करता था जानते हुए कि वह चमड़े वाले के साथ घूमती है...।"35 अपने पिता की माँ के प्रति कही गई बात वह सह नहीं पाती और बिल देकर उठने के लिए तैयार हो जाती है। उसी समय उसके पिता तीन महीने पहले पूछा गया प्रश्न दोहराते हैं, ''तुम रहने के लिए कब आ रही हो?' उसका उत्तर "किसके घर"।36 अब वह सोचने के लिए विवश हो जाती है, 'वह क्या है आखिर अपने लिए, उनके लिए, माँ के लिए?"36 काफी गहन मंथन के बाद वह अंत में कह देती है कि 'निर्णय ले लिया है, अपने घर ही लौटना चाहती हूँ पा।' ''तब दिक्कत क्या है' 'दिक्कत है...घर ढूँढना‍ तो उसके पिता गुरति हैं, 'क्या मतलब?' 'मतलब अब मैं बालिग हो चुकी हूँ पा! और अपने घर में रहना चाहती हूँ आपके पास ही वनरूम-किचन किराए पर लेकर।"37 अब वह उन दोनों के बीच हथियार नहीं बनना चाहती। किसी भारतीय का विदेशों में रहने पर अपने प्रति तो दृष्टिकोण बदल जाता है किंतु अपनी पत्नी को लेकर उसकी दृष्टि पुरुषप्रधान वाली ही रहती है। इस कव्य के इर्द-गिर्द घूमती है पेंटिंग अकेली है कहानी वाशिंगटन के डी.सी. उपनगर के शीत ताप रहित मकान में रहते हुए तीन साल तक 'वह', योनि और कोख का उपयोग कर बहुत अधिक संपत्ति कमाने वाली, दो फ्लैटों की मालकिन, तीन बार तलाक लेने वाली और तीन बच्चों की माँ 'जे' के साथ रहता है लेकिन वह उससे संतान की चाहना नहीं करता क्योंकि वह अपनी संतान को 'जे' के उन तीन बच्चों की भीड़ में शामिल नहीं करने चाहता था जो सप्ताहांत में अपने पिता से मिलने का इंतजार करते हैं। तीन साल इस तरह बिताने के बाद वह भारत में रह रही अपनी पसंद की किसी लड़की से विवाह कर लेता है। लेकिन वह 'जे' की तरह आधुनिक नहीं है। परिणामस्वरूप जब वह और उसकी पत्नी परस्पर बात करते हैं, 'जे' उनके मध्य हमेशा बनी रहती है। यहाँ रहते हुए वह अपने पति से इस संबंध में कुछ भी नहीं कह पाती और दो साल पूरे होने से पहले ही वह भारत लौट जाती है।

         

               जब उसकी पत्नी भारत के अपने कनुमा घर में लौट जाती है, उसे अपनी पत्नी की बहुत-सी बातें याद आती हैं। एक बार फोन पर जब वह बड़ी ही सहजता से उसके भविष्य को लेकर उससे बात करता है तो वह बड़ी स्पष्टता और साहस से कह देती है कि जब वह दिसंबर में दिल्ली आएगा तो वह उससे लिखा-पढ़ी करके मुक्त होगी और नौकरी मिलते ही 'जे' जैसा नया जीवन शुरू करेगी। जब 'वह' यह उत्तर सुनता है, सन्न रह जाता है। 'वह' के इस मनोविज्ञान को लेखिका ने बड़ी ही सुंदरता से अभिव्यक्त किया है, ''अनेक बार की तरह वह फिर से डिवाइडर के करीब आ गए अपने खाली हुए गिलास के साथ। बर्फ के सफेद कंचे उतर रहे हैं 'रम' की तरलता में उसी तरह ।... वे अपने से पूछते हैं, क्या वे दिल्ली पहुँचना चाहते हैं? एक निर्णय जो वहाँ उनका इंतजार कर रहा है, उसका सामना करना चाहते हैं... ।"38

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तृतीय अध्याय :

चित्रा मुद्गल की कहानियों में आदर्श एवं यथार्थ का द्वन्द्व 


            चित्राजी की कहानियों में समकालीन राजनीति का खोखलापन भी अनुगूंजित है। 'बंद' कहानी आज की भ्रष्ट राजनीति पर केंद्रित है। मुंबई में बंद के बहाने देश की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को जाति, प्रांत तथा स्वजन के तहत इन्सानों को बांटने की घटिया राजनीति करके दंगा चलाया गया। बंद के माध्यम से लोगों के मन में आतंक और असुरक्षा का भाव पैदा करना राजनीतिज्ञों का तंत्र है। बंबई नगरी में बंद हो रहा था। यहीं की संतान को ही यहां नौकरी करने का अधिकार दिलाने को लक्ष्य करके बंद चलाया गया। यहां काम करनेवालों में अधिकांश लोग मद्रासी हैं। महाराष्ट्रियों की मांग यह है कि जमीन उनकी है, इसलिए नौकरी उनको ही मिलनी चाहिए, “मद्रासियों के प्रति बंद का आह्वान करनेवालों का खास रोष था उनका तर्क था कि इन लोगों ने अति मचा रखी है। जिस दफ्तर में काम करते हैं, अपनी जात-बिरादरीवालों को भर लेते हैं। बेचारे महाराष्ट्रियों को नौकरियां नहीं मिलतीं, जबकि मुंबई उनकी और उनकी अपनी ही मुंबई में उनका यह अनादर। उनकी मांग थी कि अस्सी प्रतिशत नौकरियां स्थानीय लोगों को प्राप्त होनी चाहिए। उनका नारा था- बाहरवालों को भगाओ, अपनों को जगह दिलाओ ।"39

           

               बंद के दिनों में लोगों को कितनी मुसीबतों को झेलना पड़ता है, इसका उदाहरण है अखबार के दफ्तर में काम करनेवाले नवल, हरीश और रमेश की कथा। रोज-दर-रोज मेहनताने का पैसा मिलने पर भी इनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है। मनुष्य का सबसे बड़ा दर्द है भूख। इस भूख को मिटाने के लिए उन्होंने पत्र के दफ्तर के पुराने अखबारों को बेच डाला, लेकिन पत्र का मालिक मलहोत्रा जो है, यह सबसे बड़ी निर्मम पूंजीवादी मानसिकता का आदमी है। उसने उन अखबरों का पैसा काटने के बाद ही उन्हें वेतन दिया। तब नवल नामक युवक ने बीड़ी सुलगाकर अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण करनेवाले मल्होत्रा के पेपर का बंडल जला डाला। इस कहानी में एक ओर मल्होत्रा जैसे शोषक का शैतानी रूप अनावृत है तो दूसरी ओर नौकरी की तलाश में वंबई में भटकनेवालों के शोषण का यथार्थ।

             

              बंद की अनावश्यकता नवल के शब्दों के माध्यम से कहानीकार पेश करती हैं, "यह किसके हक की लड़ाई लड़ी जा रही है? वे जो रोज-रोज मजदूरी करके खाते हैं, काम बंद, दुकाने बंद, होटल बंद आज तो उन्हें उनका असल पाव भी नसीब नहीं होगा। हम भी तो उन्हीं लोगों में है। हमें बंद से क्या फायदा? ये जो पथराव की ताकत रखते हैं, बसें जला डालने की हिम्मत दिखा रहे हैं।"40 भारत में सर्वत्र इस प्रकार के अनावश्यक बंद चलाए जाते हैं। इन बंद से राजनीतिज्ञ लाभ उठाते हैं तो साधारण जनता का दम घुटता है। अंत में पेपर बंडल जलाते हुए नवल के शब्दों में बंद का समर्थन हो रहा है, "यह बंद न मराठियों का मद्रासियों के खिलाफ है, न एक जाति का दूसरी जाति के प्रति। यह उस जाति के खिलाफ है, जो अपने स्वार्थों और संकीर्णताओं के चलते दूसरों का शोषण करती है और किसी भी जाति का मुखौटा ओढ़कर अपना चेहरा बदल देती है और यह मल्होत्रा भी।"41 इसलिए इस जलन में पूंजीवाद की जलन है, शोषण की जलन है। यहां यह सवाल उठता है कि अपने देश में आदमी कहां नहीं जा सकता है? भारत की मिट्टी जहां हो, भारत की है। वहां सबको जाकर काम करने का अधिकार है। 'हमारी अपनी मिट्टी' जैसे स्वार्थभाव को यहां तिलांजलि देने की जरूरत है। भावात्मक एकता के लिए इस प्रकार का स्वार्थ संकुचित भाव बड़ा हानिकार है, लेकिन बंद के उद्देश्य को लेकर हमेशा हम मन में सवाल उठता है कि यह किसके लिए है? विद्रोह प्रकट करने का यह सही रास्ता है? आम जनता के लिए इससे कोई फायदा है? ऐसे सवालों के घेरे में भी आज लोग बंद को धूमधाम से चलाते आ रहे हैं।

           

               'चेहरे' नामक कहानी में समकालीन भ्रष्ट व्यवस्था का खुलासा हुआ है। शासन के भीतर और बाहर के लोग एक समान हैं। वे सब अन्याय के साथ खड़े हुए हैं और इससे जो मुनाफा मिलता है, सब इसके हिस्सेदार बनते हैं। इस व्यवस्था में दिखाई पड़नेवाले विभिन्न चेहरों का बयान है इस कहानी में यह मुंबई के रेलवेस्टेशन पर भीख मांगनेवाली औरतों तथा उनके बच्चों की कहानी है। क्यू में खड़े होनेवाले यात्रियों का ध्यान भंग करके वे भिखमंगे उनकी जेब काट लेते हैं। एक आदमी इसके खिलाफ शिकायत करता है। जनता तथा अधिकारियों का ध्यान उस ओर आकृष्ट करता है। जब मुजरिम पकड़ा गया तो वह एक बच्चा है। उसके साथ एक भिखमंगिन भी है। वह बच्चा भिखमंगिन का है या नहीं? कोई पता नहीं, पर भिखमंगिन से यह सिद्ध हो जाता है कि टिकट काउंटर के अंदर रहनेवाले लोग इनका साथ दे रहे हैं।

           

               बंबई नगरी में भीख मांगना मना किया गया है। उनके लिए भिक्षुक गृह हैं। बंबई जैसी नगरी को स्वच्छ बनाने का अभियान भी चल रहा है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे जैसे स्थानों से भिखमंगों को निकालने के लिए सख्त नियमों को बनाना है। ये जो भिखमंगे हैं, उनका मकसद भीख मांगना नहीं है, लोगों की गाड़ी कमाई को छीन लेना है यात्रियों ने कई बार शिकायत की है, "हम सब यात्री मिलमगियां और भिखमंगों के उत्पात से गले तक त्रस्त हैं कि ये भिखमंगयां ये जवान भिखमंगियां अधनंगी बैठकर यात्रियों का मनोबल ही नहीं डिगाली, बल्कि धंधे के लिए ग्राहक भी जुटाती हैं। जेबकटी भी इन्हीं के इशारों पर धड़ल्ले से चल रही है। ये घिनौनी हरकतें हमारे स्टेशनों के नाम पर कलंक है। क्या हम यात्रियों का कोई नैतिक कर्तव्य नहीं है कि हम अपने स्टेशनों को मार और गु का अड्डा बनने दें। सच तो यह है कि इन असामाजिक के खिलाफ रेलवे प्रशासन द्वारा अब तक की गई कार्रवाई कतई संतोषजनक नहीं है, उन् अधिकारियों का तर्क है कि इन बुराइयों को जब यात्री प्रथम देते हैं तो हम कैसे और किस तरह सुलझाएं।"42

             

               लेकिन इस बार आदमी के साथ बाहर खड़े सब मिल जाते हैं। बच्चे की सेवा करती है तो रेलवे पुलिस उसे दबोच लेती है। वे सिपाही उसे सड़क की तरफ घसीट ले जाते हैं और एक सिपाही भद्दी-सी गालीको उसकी छाती में देता है तब भीड़ तो जरा शांत हो जाती है। बंद टिकट खिड़कियां खुल जाती है। चित्राजी प्रतीकात्मक ढंग से भीड़ की नपुंसकता, निष्क्रियता एवं स्वार्थ पर जब प्रकाश डालती है, तब उनकी भाषा बहुत नुकीली और संस्थात्मक बन जाती है, "भीड़ जैसे एकाएक सम्मोहनमुक्त हुई और मरमसाकर टिकटयर पर टूट पड़ी, क्यू में अपना नंबर आगे से आए रख पाने के प्रयास में धकियानी मुकियाती कितनी बेअसर! अपने में बंदर अपने तक यह वही भीड़ है? उसका मन हुआ कि कहीं से उसके हाथों में देलों का ढेर पड़ जाए तो वह टिकटबर की खिड़कियां तोड़ दे, भीतर दुबके बैठे अधिकारियों के खोपड़ फोड़ दे, मगर सच्चाई अकेले उसने तो नहीं सुनी? फिर, जागी हुई भीड़ का उबाल सच्चाई और नैतिकता के प्रति कैसे नपुंसक हो उठा।" 43

              

               उस आदमी को ऐसा लग रहा था कि सुरक्षा की लड़ाई बाहर की मिगिनों से नहीं, बल्कि खिड़कियों के भीतर दुबके बैठनेवालों से है। यहां के बड़े बाबू को बाहर आने की जब उसने चुनौती दी तो उसको ऐसा लगा कि "उसकी आंखों को दृष्टि-भ्रम हो रहा है या उसने पलकें पटपटाई आंखें मिचमिचाई और पुनः गहरी दृष्टि से भीतर झांका-उसे समूची भी खिड़की के भीतर मे पर झुकी हुई बैठी नजर आई।" 44 भारत की दुरावस्था का मुख्य कारण हमारी यहां की सड़ी-गली व्यवस्था है। व्यवस्था के भीतर और बाहर खड़े होनेवाले लोग जब तक समझौते में आगे बढ़ते हैं, तब तक देश को बचाना संभव नहीं है। अन्याय के खिलाफ लड़ने की हिम्मत होनी चाहिए।

            

               इस नपुंसकता से जनता को मुक्त होना चाहिए। चित्राजी की 'जगदंबा बाबू आ रहे हैं कहानी जनता एवं ग्रामीणों के विकास की गति में बाधा उपस्थित करनेवाले मवेश जनसेवकों की पोल खदेती है। इस कहानी में राजनीतिक चुनावों के प्रचार-प्रसार के लिए गरीब एवं विकलांगों के साथ जुड़कर जनता के बीच सहृदय नेता की छवि गढ़नेवाले अनेक लोग हैं। विकलांग उद्धार समिति के जरिये गांव-देहातों में विकलांग बच्चों को मुफ्त में गाड़ियों का वितरण कर पूरे गांव की प्रशंसा का पात्र बननेवाले जगदंबा चाबू सबके लिए अवतार पुरुष बन जाते हैं। सुक्खन भौजी का बेटा ललौना पोलियोग्रस्त है। वह चलने में असमर्थ है। उसके इलाज की व्यवस्था जगदंबा बाबू के माध्यम से होने की खबर सुनकर गांववासियों की टिप्पणी सुनिए, "चौदह वर्ष में तो घूरे के दिन भी फिरते हैं, चलो दुखियारी महतारी की भी भोले बाबा ने सुन ली, वह आंखें पोछने लगती और प्रत्युत्तर में ठाकुर सुमेर सिंह की महानता के बखान के संग जगदंबा बाबू का जस गाते, कृतज्ञता से दोहरी होने लगती। लोगों ने उसकी हां में हां मिलाई। कलयुग में गांधी बाबा ने दुखिवारों को सुध ली थी, सुराज दिलाया। उनके बाद विनोबा बाबा लंगोटी घरे गांव-गांव बेसहारों के लिए दौड़ते रहे। जगदंबा बाबू वैसे ही महात्मा अवतारी पुरुष लगते हैं, वरना कौन गरीब-गुरबा के कष्टों पर पुलटिस बांधता है।"45

          

              लीना की दोनों का बेसाखी से जख्मी हो जाती है। सुमेर सिंह की खुशी का अंदाजा लगाना मुश्किल है, लेकिन यह खुशी दूसरे गांव बीजापुर में गाड़ी वितरण तक रही। बीजापुर गांव में गाड़ी वितरण के लिए ललौना की गाड़ी रात को चुपचाप उठवाकर सुमेर सिंह ले जाते हैं। उसने कहा कि एकाध रोज में ललौना के लिए मजबूत बैसाखियां बनवा देंगे। वह आराम से चल-फिर सके। उसने यह भी कहा कि पूछा- पाछी होने पर समझा देना गाड़ी चोरी चली गई, लेकिन सुक्खन भौजी ठाकुर सुमेर सिंह की उपस्थिति में कुछ बोल नहीं पाई। उसकी सारी आशाएं नष्ट हो गई। कुटिया के अंदर प्रवेश करते ही हाथ में कसी ढिबरी उस दीवार की ओर उठा दी, जिस पर पंचायतवर से प्राप्त अखबार की वह कतरन चिपकाई हुई थी, जिसमें गाड़ी पर बैठे हुए ललीना और बगल में हर्षित मुद्रा में ताली बजाते हुए जगदंबा बाबू की तस्वीर छपी हुई थी। बीजापुर गांव में गाड़ी के वितरण के लिए दिया गया सारा धन जगदंबा बाबू के नेतृत्व में छीन लिया गया। बेचारे गरीब, अभावग्रस्त लोगों के लिए जो-जो योजनाएं तैयारी की जाती हैं, उनमें से अधिकांश योजनाओं की राशि समाजसेवक नाम से विख्यात नेतागण और तथाकथित राजनीतिज्ञ खा जाते हैं। उनके शैतानी रूपों से साधारण जनता अपरिचित है।

              

                ऐसे नेतागण हमारे देश के अभिशाप बन चुके हैं। चुनाव के संदर्भ में उन नेताओं के गुणगान सुनकर हम अयने में पड़ जाते हैं। उम देशचारी जगदंबा बाबू चुनाव के अवसर पर कैसे प्रतिष्ठित हो जाते हैं, देखिए, "जगदंबा बाबू जनता के सेवक हैं। दीन-दुखियों के रक्षक, प्रजा के कष्टों को पहचानने वाले गुप्ताजी के मंत्रिमंडल में वे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री थे।"46 चित्रा मुद्गल आजकल के नेतागणों के प्रतिनिधि के रूप में जगदंबा बाबू को हमारे सामने पेशकर असल में भारतीय राजनीति के सबसे हीन, कलुषित, कपट रूप को अपनी अचूक भाषा के जरिये रेखांकित कर रही हैं।

            

                'तप' कहानी भी आज की राजनीति के छद्म चेहरे का पर्दाफाश करती है। वादे नेता लोग देते ही रहते हैं। उनके भाषणों से हम अभिभूत भी हो हैं। जैसे, "ये जागा (जमीन) किसकी. हमारी न' हमारे बाप-दादों की न अपनी धरती पर हम उपेक्षित हो रहे हैं, क्यों? अपनी ही धरती पर हम अन्य प्रांतवासियों से शासित, शोषित हो रहे हैं, क्यों? बरसों बरस पहले रोजी-रोटी की तलाश में आए थे थे। बाहर के लोग, आज हमारे घर में करोड़पति व्यवसायी, बड़े-बड़े अफसर, सिनेमा सुपर स्टार, दुकानदार, ठेकेदार बने हुए बैठे हैं और अपनी जात-बिरादरी के लोगों की हित चिंता की खातिर, उनके अधिकारों के संरक्षणको खातिर हमने अपनी पार्टी गठित की है 'लोक सेना तालियों की तुमुल ध्वनि के बीच नेता के निश्चय का स्वागत हुआ।"47. लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्हें देखने को भी नहीं मिलेगा। हमारे कल्याण के लिए होहल्ला मचानेवाले वे लोग अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर लोगों को तहस-नहस करने के लिए तैयार हो जाते हैं। लपटों में जनता को वे समाप्त कर देंगे। नीति व्यवस्था को भी जला देने के लिए वे तैयार हो जाते हैं। लोगों में भय पैदा कर उनकी संपत्ति आदि चंदे के रूप में वसूल कर वे अपनी जेब को भर लेते हैं।

             

              ये जनता की भलाई के लिए क्या करेंगे? पार्टी के लिए चंदा वसूल करने के लिए लोगों को जला डालने को भी वे तैयार हो जाते हैं। जन जागरण एवं विकास के लिए हमारे प्रतिनिधि बनकर आनेवाले ऐसे मवेशियों को जनता को संगठित होकर खत्म करना है। रघुनंदन यादव दूधवाला है। उसकी पत्नी उसे नेताजी के स्वागत में जाने से मना करती है, पर रघुनंदन पुराने जख्म नहीं भूल पाते उन्हें अब भी समाज और कानून पर भरोसा है। इस शहर के लिए किए गए कार्यों की याद है, लेकिनपत्नी नहीं मानती है और उनको बाध्य करके नेताजी को आमंत्रित करने के लिए भेजती है। उन्होंने चंदे का भी इंतजाम कर रखा है, यह भी बच्चे को डॉक्टरी के लिए फीम, लेकिन रघुनंदन बटा देने के खिलाफ रहता है। पत्नी के अनुरोध को रघुनंदन स्वीकारने के लिए जब तैयार नहीं हुआ तो पत्नी सच्चाई को पति के सामने खोल देती है, "मला को उन लोगों ने पटों में नहीं झांका जहरा बता रही थी कि रोजे का समय चल रहा मेरा झूठ नहीं बोलूंगी, भाभी साद। हमने अपनी नंगी आंखों से भेंट टीबी वाले की दुकान लूटने के बाद सत्तार चाली के छोकरों को मनुज को दबोच लपटों में झोंकते देखा है-सनार चालीवाल पार साल इन्हीं की पार्टी के लिए चंदा मांगने नहीं आए थे।"48 तब भी उसे नेता को ले जाने के लिए जाना पड़ता। बंद की इस राजनीति में बाहर से आनेवालों के विरुद्ध महाराष्ट्रियों के मन में विद्रोह उत्पन्न कर वोट हासिल करने का उद्यम भी दिखाई देता है। नेता गणों के में इस मुद्दे पर ज्यादा बल दिया गया है।

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चतुर्थ अध्याय  :

चित्रा मुद्गल की कहानियों में स्त्री जीवन का यथार्थ 

          

             आज यद्यपि स्त्री शिक्षा का प्रचार-प्रसार बहुत बढ़ गया है तथापि विषय में समाज की धारणा में चींटी की-सी चाल जैसा अंतर ही आया है। कुछ उदाहरणों से इस यथार्थ को जाना जा सकता है। बावजूद इसके कहानी में जब विवाहित लड़की प्रीति, जो शिक्षित भी है, बिना किसी सूचना के अपने पर वापस आ जाती है, तो माँ, भैया-भावी किसी को भी यह बात अच्छी नहीं लगती। उनका पूरा प्रयास यही होता है कि कैसे भी हो, लड़की अपनी ससुराल वापस चली जाए। उसकी खुद की माँ को, ''इतना कुछ होना उन्हें मात्र 'मियाँ- बीबी में तुन्न-भुन्न होना' भर ही लगा। भावी कहती हैं, 'घर से बाहर निकलकर चार अन्य लोगों का शोषण और लताड़ बरदाश्त कर सकती हो, पर अकेले पति को सहन नहीं कर सकतीं। यह कैसा स्वाभिमान ?"49 भैया तो बिल्कुल ही तटस्थ हो जाते हैं।

            

               आधुकिता के नाम पर स्त्री को किस प्रकार भोग की वस्तु बना दिया गया है, बाइफ स्वैपी कहानी में बड़ी ही संजीदगी से उभारा गया है ''वाइफ स्वैपी'... पानी पत्नियों की अदला-बदली।"50 आधुनिक जीवनशैली में ड्रिंक, डांस डिनर पार्टी के बाद एक बड़े से जग में विवर पलटी जाती है और सभी की कारों की चाबियों उसमें डाल दी जाती हैं। फिर अपनी-अपनी बारी पर ''साँस रोके, धड़कते दिलों से हम सभी चाबी उठाने की अपनी बारी का बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि जिस भी गाड़ी की चाबी हमारे हाथ लगेगी, उस गाड़ी के मालिक की पत्नी यानी कि उनकी मलिका-ए-आजम हमारी उस खुशनुमा रात की लाटरी होगी।"51 उच्चवर्गीय समाज में यह परंपरा काफी प्रचलित है। इसमें स्त्री की इच्छा का कोई मूल्य नहीं है।

           

                शून्य में स्पष्ट किया गया है कि समाज में आज भी स्त्री प्रयोग की वस्तु ही समझी जाती है। यह जान लेने पर भी कि राकेश किसी अन्य स्त्री से प्रेम करता है और वह उसी से विवाह करना चाहता है, उसकी माँ सरला से विवाह कर देती है यह सोचकर कि क्या पता, विवाह के बाद राकेश सुधर जाए। उसकी बड़ी बहन को भी इस संबंध में भनक लग चुकी थी, ''जीजी ने यही सोचा होगा-कुछ होगा भी तो शादी के बाद सब ठीक-ठाक हो जाएगा-शायद शायद माँजी ने भी, शायद सभी ने...और वह लड़की न होकर प्रयोग की। हो गई।"52 लेकिन विवाह के बाद सरला जिन मानसिक-शारीरिक यंत्रणाओं के गुजरती है, उसकी परवाह किसी को भी नहीं है।

           

                चाहे स्त्री कितनी ही बड़ी नौकरी करती है लेकिन अगर वह बदसूरत है उसे बहुत गहरी मानसिक यातनाओं से गुजरना पड़ता है। लाक्षागृह कहानी को नायिका सुन्नी अपनी बदसूरती के कारण हीनताबोध से ग्रस्त रहती है, र्याप कर सरकारी नौकरी करती है। उसके सभी बहन भाईयों का विवाह हो जाता है, "उसके लंबोतरे चेहरे ने, ऊँची नाक के नीचे पैंसी-भैँसी आँखों ने, होठों से हमेशा बाहर निकले रहने वाले दाँतों ने, उसे कभी साखर पूड़ा (सगाई) की संभावनाओं तक नहीं पहुँचने दिया।....जबकि माँ हर जगह इस बात का दाना डालना न भूलती कि रेलवे की पक्की नौकरी में सुन्नी साढ़े पाँच सौ रुपए महीने कमा रही है।"53 नौकरी और घर का जबरदस्त प्रलोभन भी उसके लिए वर हासिल करवाने में असफल रहता है। अभी भी विवाह के संदर्भ में स्त्री का शरीर ही आकर्षण का केंद्र रहता है। उच्चवर्गीय लोग स्त्रियों के जीवन की परवाह नहीं करते, तभी तो जगदंबा बाबू गाँव आ रहे हैं कहानी में पहले से ही विवाहित सुभग सिंह अपनी ग्रामीण पनी को शहरी जीवन के लिए अनुपयुक्त मानकर शहरी स्त्री से दूसरा विवाह कर लेते हैं।

          

                 अचानक हो जाने वाली माहवारी की स्थिति में औरत की मनोदशा कैसी हो जाती है, इसे वर्णित किया गया है दरमियान कहानी में, "कहीं साड़ी दाग-धब्बों से भर गई तो रास्ता चलना दूभर हो जाएगा फिर यदि उसका धब्बा कपड़ों पर लग जाए, 'ऐसी स्थिति में किसी ने उसे घूर-भर दिया तो वह लज्जा से गढ़ जाएगी।"54 स्वयं को हवश का शिकार होने से बचाने की कोशिश में कोई भी लड़की बेला ही करती जैसा सौदा कहानी में गेंदा करती है। वह अपनी रक्षा के लिए किसी के घर का दरवाजा खटखटाती है, दरवाजा खुलते ही घर में प्रवेश कर दरवाजे की सिटकनी चढ़ा देती है, उसके इस प्रकार के व्यवहार से घर की मालकिन मंग दुविधाग्रस्त हो जाती है जब मंगला को गेंदा की कहानी पता चलती है तो वह वही सोचती है, ''गेंदा क्या निर्दोष है? किसने कहा था कि वह एक सर्वथा अनजान व्यक्ति पर विश्वास करने की मूर्खता करे"55 जब मंगला को पता चलता है कि गेंदा का दोषी उसका पति चंदू है, तो वह अपने पति का पक्ष लेते हुए सोचती है. ''चंदू का क्या दोष? धंधा फिर धंधा है।... बड़े-बड़े होटलों में औरतों से नंगा नाच करवाते हैं सेठिए! कितनी इज्जत है समाज में उनकी? ठाठ से लंबी गाड़ी घूमते हैं। कोई उठाता है उंगली उन पर"56 भी कोई भी किसी स्थिति में दूसरों को उपदेश देने में तो होता है जब स्थ उसके जीवन में आती है तो वह सोचता है, "उसे क्या लेना-देना गंदा से? एक अनजान लड़की की खातिर वह इतना बड़ा जोखिम उठाने चली है। सारी दुनिया के उद्धार का ठेका उसी ने ले रखा है।"57 यह एक बार तो वह मैदा की जिम्मेदारी से बचना चाहती है। यदि स्त्री स्त्री की मदद को आगे आए तभी स्त्री-समाज का भला संभव है। पहले तो मंगला पर स्वार्थ हावी होता है जब उसके अंदर यह विचार दृढ़ता से हावी हो जाता है, ''स्त्री होकर स्त्री के दुर्भाग्य में भागीदार हो सकेगी?"58 तो यह संकल्पबद्ध हो उसकी सहायता के लिए तैयार हो जाती है। कहानी संदेश देती है कि स्त्री को स्त्री की मदद अवश्य करनी चाहिए।

          

                 आज के महानगरीय जीवन का एक यथार्थ यह भी है कि पढ़ी-लिखी और नौकरी के लिए बाहर निकलने वाली स्त्रियों में से कुछ स्त्रियों सफलता पाने के लिए शार्टकट के रूप में कुछ भी करने को तैयार रहती हैं। कृत्रिमतापूर्ण और दिखावटी जीवन की ही वे सही जीवन मानती हैं। हस्तक्षेप कहानी में ऐसी ही एक पात्र नीता है जो मध्यवर्ग से संबंध रखती है। परंतु वह पाश्चात्य रंग में रंगी है। भौतिक सुख- सुविधाओं को पाने के लिए और अपने को एक सफल महिला के रूप में स्थापित करने के लिए यह अपनी देह का भी उपयोग करने से नहीं जिसे उसकी परम मित्र अंकिता सही नहीं मानती। वह उससे प्रश्न करती है, ''आम्रपाली के विज्ञापनों का अनुबंध प्राप्त करने की शर्त कपड़े उतारकर सागर-तट पर दौड़ना था क्या?"59 उसके इस बात से इंकार करने पर वह उसे दोबारा ऐसा न करने के लिए समझाती है, लेकिन नीता इन बातों पर विश्वास नहीं करती और कहती है, "उन कपड़ों को पहनकर जब मैं किसी संकोच और अश्लील भाव से ग्रस्त नहीं हुई, तुम क्यों कर ऐसा महसूस कर रही हो, समझ पाने में असमर्थ हूँ।"60

            

                जो स्त्रियों स्वावलंबी होती हैं. वे अपने जीवन के निर्णय लेने में भी सक्षम हो जाती है। मुआवजा कहानी में जब तू अपने माता-पिता को एन.टी.पी.सी. में कार्यरत और बर्लिन में मिले सुमित के विषय में बताती है, साथ ही यह भी कहती है, ''जितनी जल्दी आप लोग ब्याह कर देंगे, हम अपनी गृहस्थी शुरू कर देंगे, मगर आपकी सहमति के बिना नहीं।"61 परंपरागत सोच वाली उसकी माँ मधु को यह सुनकर धक्का लगता है क्योंकि उसका मानना है, ''उपयुक्त घर-घर तलाशना तो उसका दायित्व था।"62 अभी भी हमारे समाज में स्त्री अस्मिता का कोई महत्व नहीं है, तभी तो उसके अनुसार न चलने वाली शैलू के आत्मसम्मान को छलनी करने के लिए उसका पति सुमित उसे जलती हुई सिगरेट से जलाता है। सुमित के रूप में अधिकांश पुरुष आज भी यही चाहते हैं कि लड़की के घरवाले लड़के के घरवालों है उंगली उन पर भी सच है कि कोई भी किसी स्थिति में दूसरों को उपदेश देने में तो होता है लेकिन जब स्थिति उसके जीवन में आती है तो वह सोचता है, उसे क्या लेना-देना गेंदा से?... एक अनजान लड़की की खातिर वह इतना बड़ा जोखिम उठाने चली है।... सारी दुनिया के उद्धार का ठेका उसी ने ले रखा है। यह सोचकर एक बार तो यह पैदा की जिम्मेदारी से बचना चाहती है। यदि स्त्री स्त्री की मदद को आगे आए तभी स्त्री-समाज का भला संभव है। पहले तो मंगला पर स्वार्थ हावी होता है, लेकिन फिर जब उसके अंदर यह विचार दृढ़ता से हावी हो जाता है, ''स्त्री होकर स्त्री के दुर्भाग्य में भागीदार हो सकेगी? तो वह संकल्पबद्ध हो उसकी सहायता के लिए तैयार हो जाती है। कहानी संदेश देती है कि स्त्री को स्त्री की मदद अवश्य करनी चाहिए।"63

            

               आज के महानगरीय जीवन का एक यथार्थ यह भी है कि पढ़ी-लिखी और नौकरी के लिए बाहर निकलने वाली स्त्रियों में से कुछ स्त्रियाँ सफलता पाने के लिए शार्टकट के रूप में कुछ भी करने को तैयार रहती हैं। कृत्रिमतापूर्ण और दिखावटी जीवन को ही वे सही जीवन मानती हैं। हस्तक्षेप कहानी में ऐसी ही एक पात्र नीता है जो मध्यवर्ग से संबंध रखती है। परंतु वह पाश्चात्य रंग में रंगी है। भौतिक सुख- सुविधाओं को पाने के लिए और अपने को एक सफल महिला के रूप में स्थापित करने के लिए वह अपनी देह का भी उपयोग करने से नहीं हिचकिचाती जिसे उसकी परम मित्र अंकिता सही नहीं मानती। वह उससे प्रश्न करती है, 'आम्रपाली के विज्ञापनों का अनुबंध प्राप्त करने की शर्त कपड़े उतारकर सागर-तट पर दौड़ना था क्या? 800 उसके इस से इंकार करने पर वह उसे दोबारा ऐसा न करने के लिए समझाती है, लेकिन नीता इन बातों पर विश्वास नहीं करती और कहती है, 'उन कपड़ों को पहनकर जब मैं किसी संकोच और अश्लील भाव से ग्रस्त नहीं हुई, तुम क्यों कर ऐसा महसूस कर रही हो, समझ पाने में असमर्थ हूँ 

           

                जो स्त्रियाँ स्वावलंबी होती हैं, वे अपने जीवन के निर्णय लेने में भी सक्षम हो जाती हैं। मुआवजा कहानी में जब शैलू अपने माता-पिता को एन.टी.पी.सी. में कार्यरत और बर्लिन में मिले सुमित के विषय में बताती है, साथ ही यह भी कहती है, 'जितनी जल्दी आप लोग ब्याह कर देंगे, हम अपनी गृहस्थी शुरू कर देंगे, मगर आपकी सहमति के बिना नहीं। परंपरागत सोच वाली उसकी माँ मधु को यह सुनकर धक्का लगता है क्योंकि उसका मानना है, 'उपयुक्त घर-वर तलाशना तो उसका दायित्व था।"64

         

                अभी भी हमारे समाज में स्त्री अस्मिता का कोई महत्व नहीं है, तभी तो उसके अनुसार न चलने वाली शैलू के आत्मसम्मान को छलनी करने के लिए उसका पति सुमित उसे जलती हुई सिगरेट से जलाता है। सुमित के रूप में अधिकांश पुरुष आज भी यही चाहते हैं कि लड़की के घरवाले लड़के के घरवालों चाहते हैं अन्यथा गा व्यवहार किया जाएगा जो उसने शैल के साथ किया है। लेकिन अब किसी किसी लड़की के घर वाले उसका साथ देने लगे हैं। जब शैल की माँ अपनी लड़की के शरीर पर पड़े छालों को देखती है, वह अपनी भाषा को नियंत्रित नहीं कर पाती और कर देती है, ''ऐसा क्या कहर ढा दिया है शैलू ने लड़की की माँ होने का मतलब है, आप लोगों के सामने घिघियाते रहो, बेसिर-पैर की सुनते रहो ?... आप लोग नहीं जानते थे कि उसे मॉडलिंग का शौक है?"65 आज भी ऐसे पति मिल जिनकी अपनी पत्नी से नहीं बनती और वे उससे अलग रहते हैं, लेकिन पत्नी की वजह से होने वाले लाभ के समय वे बराबर में आ खड़े होते हैं। सुमित भी एक ऐसा ही पति है। छः सालों से वह अपनी पत्नी शत्रु से अलग रह रहा था। लेकिन जब हवाईजहाज से हुई दुर्घटना में उसकी मौत हो जाती है, तो उसके लिए मिलने वाले मुआवजे में वह अपना नाम प्रस्तावित कर देता है क्योंकि इस बात की उसे जानकारी है कि कानूनी रूप से मुआवजे पर अधिकार पति का ही होता है चाहे वह उसके हुए साथ कितना ही दुर्व्यवहार करे। इस बात की सूचना अपने सास-ससुर को देते। कहता है, ''मुआवजे के कागजात मैंने प्रमाण-पत्रों सहित एयर इंडिया के मुख्यालय में दाखिल कर दिए हैं।"66

           

               अभी भी कहानी में शिल्पा के पति मुकेश की मृत्यु हो जाने पर उसकी साम बीजी एक षडयंत्र के तहत बड़ी ही मीठी भाषा में, शिल्पा के पिता का विश्वास जीत कर, अपने दूसरे बेटे सुरेश से उसका विवाह करवा देती हैं। फिर अपने सास के स्वरूप का बोध करवाती हैं उसके ऊपर प्रतिपल चौकन्नी निगरानी रखते हुए 'शिल्पा फोन पर उंगली रखती तो बीजी दुप्प से टोक बैठतीं, ''किसे कर रही है। 'शिल्पा ?', 'किसका फोन था?''67 'मिसेज दूबे आजकल बड़े चक्कर लगा रही हैं। तेरे? उन्हें क्या पूरे घर को लगता कि कहीं ऐसा न हो कि कोई उसे अपने ऊपर हो रहे शोषण के प्रति सचेत न कर दे। बीजी शिल्पा का विवाह अपने दूसरे बेटे से इसलिए करवाती हैं, ताकि शिल्पा के पास उनके पहले बेटे मुकेश के द्वारा जमा करवाया गया पैसा उनके घर के काम आ सके, ''तुम सबों का ऊँचा-नीचा सोच होशियारी बरती मैंने, घर का पैसा घर की ही चुनाई में लगे, आबरू ऊपर बनी रहे।"68 आज भी बहुओं पर होने वाले अत्याचार की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं।

        

                 जब तक स्त्रियों पुरुषों के आगे नहीं बोलती हैं, उनकी सारी बातें मानती रहती हैं, तब तक तो सब कुछ ठीक चलता रहता है लेकिन जैसे ही वे अपनी बात मनवाने के लिए जिद करती हैं, अधिकांश पुरुषों को उनकी बात बहुत अखरती है और कुछ पुरुष तो उनकी इस बात के खिलाफ किसी हद तक भी चले जाते हैं। लकड़बग्घा नहीं है, और -पोषण की सारी जिम्मेदारी उसके की है। अपने सुंदर भविष्य के लिए उन्हें पढ़ने के लिए उनकीना बनाते है और उस बेटी को पढ़ाने के लिए आनाकानी करते हैं जिसे देख पटवली का है। वह एक निश्चय करके अपनी कोटी में जाकर पड़ जाती है। तीन दिन जाते हैं, सूखी उल्टियाँ होने लगती हैं, डॉक्टर को बुलवाने के लिए प खबर भेजी जाती है लेकिन ये आकर उससे स्वयं बात करते हैं। उसके उपवास को जब वे 'त्रियाचरित्र' कहते हैं, उसकी जाती है और वह उनसे अलगी की बात करने लगती है। अत्यंत क्रुद्ध संवदार एक पत्र के तहत कैसे उसे अपने रास्ते से हटाते हैं, 'रात भर लंबरदार अपने निवाड़ के पलंग पर बेचैनी से करवटें बदलते रहे। "..मुँह अंधेरे कहीं जाकर आँख लग पाई थी लंबरदार की, मगर तभी घबराए हुए सतीशवा ने आकर झकझोर कर जगा दिया, 'बप्या! बप्पा!... खेत में से चाची को अचानक लकड़बग्घा उठा ले गया...उठो बा उठो......।"69 बड़ी चतुराई और योजनाबद्ध तरीके से लंबरदार उसकी हत्या करवा देते हैं और डिंडोरा पिट जाता है कि पंछाहवाली को उठा कर ले गया।

           

              हमारे समाज में आजकल अधिकांश परिवार अपनी लड़की का पालन-पोषण लड़कों की तरह करते हुए उसे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ना सिखाते हैं। प्रेतयोनि कहानी में अनिता के पिता ने उसे अत्याचार और शोषण के विरुद्ध लड़ना सिखाया है। इसी कारण वह उस ड्राइवर का सामना कर पाती है जो उसे अकेली पा उसका बलात्कार करना चाहता है। उससे बचने के बाद यह उसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा के महिला पुलिस कांस्टेबल के साथ रात को अपने पर पहुँचती है। पहले तो उसके घरवाले इस बात से बहुत खुश होते हैं लेकिन बाद में उसके साहसी कार्य के बारे में अखबार में पढ़कर उसके पिता की मानसिकता पर रूढ़िवादी सोच प्रभावी हो जाती है और ये अपनी बेटी अनिता के साहसी कार्य के विरोध में खड़े हो जाते हैं। रूढ़ियों से लड़ने की हिम्मत अभी हमारे मध्यवर्गीय परिवारों में नहीं आ पा रही है। कथनी-करनी में अंतर रखने वाले पिता के व्यवहार से अनिता अंतर्द्वद्व में घिर जाती है, ''वही बाबूजी सुबह अखबार में उसकी संघर्ष गाथा की चर्चा पढ़कर एकाएक संवेदनाशून्य कैसे हो उठे ?... "70 अपवाद लोकापवाद के विरुद्ध तब बाबूजी कैसे तनकर खड़े हो गए थे, जब मुक्ता दीदी के अकेले बंबई जाकर नौकरी करने के निश्चय की सगे-संबंधियों ने आलोचना की थी ? आज भी समाज में जीवट किस्म की लड़कियों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। उससे विवाह करने के लिए लड़के सामने नहीं आते हैं। तभी तो अनिता की दीदी मुक्ता अपने पिता से उसे बी.ए प्राइवेट कराने की सलाह देती है। पटना की खबर अखबार में अपने पर उसे कमरे में बंद करके रखा जाता है और उसकी खबर को किसी और की खबर बता कर अनेक झूठ बोले जाते हैं। हमारे समाज में लोगों को अपने घर से ज्यादा दूसरों के घर में रुचि होती है, इसलिए लोग उसे खबर का सच जानने के लिए उसके पर आते हैं ताकि पीठ पीछे उस लड़की के बारे में ऊस-जुलूल बातें बनाई जा सकें और मनोरंजन किया जा सके। लेकिन घर आने पर शब उन लोगों को यह बताया जाता है, 'टैक्सी चालक की हवस का शिकार हुई अनिता अपने सेवक राम गुप्ता की पुत्री अनिता नहीं है-जानकर उनका उत्साह 'पुष्प' से बुझ गया। दूसरे के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने की परंपरा तो बहुत पुरानी है। जो लोग उनके यहाँ आते तो ये सभी ''उस लड़की के माता-पिता को सलाह देने को उतावले हो रहे थे कि रिश्वत खा-खूकर पुलिस अगर मामला हकार जाना चाहे तो उन्हें चुप्पी मारकर नहीं बैठ जाना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ना चाहिए और उस टैक्सी चालक को फाँसी पर लटकाकर ही दम लेना चाहिए।"71 अनिता की माँ को भी अनिता पर विश्वास नहीं होता कि टैक्सी चालक ने उसे छोड़ दिया होगा। उनका मानना है, ''हाथ आई को मर्द छोड़ता है कहीं ? और जबरदस्ती समय पर माहवारी आने के लिए उसे काढ़ा पिलाना चाहती है।"72

            

              नतीजा कहानी में केतकी के रूप में उस स्त्री का सच भी दिखाया है जिसके पति की मृत्यु हो जाती है और बहु-बेटे उसके साथ नौकरों जैसा व्यवहार करते हैं। पुरवी द्वारा उसमें चेतना विकसित की जाती है, 'बहु-बेटों को अपना घर-संसार अपनी लाग-लगन के संग भोगने दें। वे आएं और उन लोगों से जुड़ें जिनको उनकी जरूरत है। देह व्यापार में पड़ी, सड़ रही निर्वासित दुर्गाओं की बच्चियों को पालें । इसके माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि बहु-बेटों के साथ नरक जैसा जीवन बिताने के स्थान पर ऐसी स्त्रियों को अपना जीवन जरूरतमंदों की सेवा में लगाना चाहिए।

           

              जब कोई स्त्री अविवाहित रहती हुई समाज सेवा का काम करती है, उसे समाज के लालनों को भी सहना पड़ता है जैसी कि पुरबी दी को, 'लेक गार्डन' के पड़ोसियों और नाते-रिश्तेदारों ने उनके सामाजिक परोपकार की भावना को घर-फूंक तमाशा माना और बिनव्याही युवती की सनक ।...इसके पीछे सेवा-भावना कम प्रचार पाने और सुर्खियों में बने रहने की महत्वाकांक्षा मुख्य पेच है।

           

              पति की मृत्यु के बाद पत्नी की स्थिति को बड़ी संजीदगी से उकेरा गया है, नीले चौखानेवाला कंबल कहानी में, ''हमको किसके भरोसे छोड़े जा रहे हो मोर मालिक! हम न जिंदा रहेंगे... तुम्हारे संग जाएँगे।"73 वे गाँव वालों के समझाने पर सती नहीं होतीं क्योंकि वे तब गर्भवती थीं। उनका बेटा भी टिकतिन कक्की के साथ सब काम करते हुए बड़ा हो जाता है। इस कहानी में लड़के की शादी के उसके पर अब दिखनेए आने लगते हैं, तो उनके मन में भी ये सब बातें जाने लगती है, गढ़वाने जवाहर होगा। दुलहिन के लिए मौरीन की सबसे होती है, रेग करती है जैसे जन्मपत्री देखना, दहेज आदि वे भी अपने पढ़े-लिखे बुला के बाबूगिरी के सपने देखने लगती है।

           

              जब किसी बच्चे को स्कूल से जाने में देर हो जाती है, तो एक माँ के म मैं क्या क्या बातें आ सकती है और उसके देरी से जाने के बारे में जानने की क एक माँ से क्या-क्या करवाती है, इसका बड़ा भी सजीव वर्णन इसी कहानी में किया हैनी को इस बात की चिंता हो रही है कि दोपहर बीत गई है, अभी तक उनका बहुओं पर क्यों नहीं लौटा। जबकि इससे पहले तो देर होने पर वह किसी-न-किसी के द्वारा खबर भिजवा देता था। ''आज क्या हो गया है उसे? इतनी गैरजिम्मेदारी तो उसने कभी नहीं दिखाई। एक तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान की लड़ाई छिड़ी हुई है, कब क्या अनर्थ हो जाए, कौन जाने? जब टितिन की को पता चलता है कि उनका बबुआ मार दिया गया है, उनकी हालत, 'जह मूरत-सी खड़ी ही अचेत हो भूमि पर ढह गई। अथ उठने से पहले टिकतिन कक्की के मुँह पर पानी के टि मार कर उन्हें होश में लाने का प्रयास किया जाता है। 'हैरत-भरी आँखों से उन्होने टिकटी से बँधे, शांत मुख-मुद्रा में सो रहे बचुआ को देखा।"74 अपने बथुआ को इन्हें के रूप में देखने की इच्छा से विवाह के लिए तैयार किए गए सामान से उसे सजाती हैं, बड़ी भौजाई से नजर का टीका लगवाती हैं, फिर गाय दान करवाने के लिए कहती हैं, कारण, ''बचुआ को दसवीं कक्षा में बैठना है न! पूँछ पकड़कर वह चट से वैतरणी पार कर लेगा... अउर सुरग पहुँचकर अपनी परीक्षा में बैठ लेगा... और अंत में बचुआ की टिकटी उठते ही 'मोर भय्या रेऽऽ... किसके भरोसे महतारी को छोड़ के चल दियेऽऽ...''75 हाहाकार यहाँ उपस्थित सभी लोगों को रुला देता है और वे फिर अचेत हो जाती हैं।

              पहले पति की मृत्यु और अब बचुआ की मौत उनमें वैराग्य भाव उत्पन्न करती है। वे दो बार आत्महत्या का प्रयास करती है किंतु बाद में अतोनी बाबा के दिशा- निर्देश पर अपनी धन-संपत्ति, जमीन-जायदाद आदि को जरूरतमंदों में बांटकर और जेवरों को बेचने से प्राप्त रकम से कंबल बांटने का निर्णय करती हैं। लेकिन नीते चौखानेवाला कंवल किस तरह से उनमें जीवन के प्रति आकर्षण पैदा कर देता है, "बाजुओं में फैलाए हुए कंबल को अचानक टिकेतिन कक्की ने छाती से भीज लिया।...नीले चौखाने वाले कंबल की रेशमी छुअन की गुनगुनी आंच आहिस्ता-आहिस्ता उनकी काँपती पसलियों में उतरने लगी। यह भी एक कड़वा सच है।"76

            

              बलि कहानी में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि करों के यहाँ ि की भावनाओं का कोई मूल्य नहीं होता है। यही कारण है कि कहानी में ठाकुर वल 1 सिंह मांगलिक दोष दूर करने के लिए अपनी बेटी शिवकला कुँवर का विवाह गुईंयादीन के बेटे से करवा देते हैं और फिर उस लड़के को मरवा देते हैं। जब शिवकला की माँ उसकी चूड़ियाँ तोड़ती है तो वह बड़े ही निश्छल भाव से यह पूछती है, ''हमारी चूड़ियाँ काहे तोड़ रही हो अम्मा... का हमारा दूल्हा गुजरिगा उनकी नजरों में दूसरे की स्त्री का भी कोई महत्व नहीं होता, तभी तो वे गुईयादीन की पत्नी को 'सुअरिया' कह देते हैं।"77

           

               गिल्टी रोजेस कहानी की दुखना की कथा आज भी आमतौर पर हमारे समाज में देखी जा सकती है। अनेक स्त्रियों पुरुषों की पाशविकता का हिंसक विरोध कर अपने को बचा तो लेती हैं किंतु उसका परिणाम जेलों में जाकर भोगती हैं। दुखना ने अपनी इज्जत बचाने की खातिर अपनी सौत के बेटे की हत्या की थी लेकिन उसका प्रायश्चित उसे जेल में सात साल की सजा भोग कर करना पड़ता है। गुनाबाई ने अपनी लड़कियों को अपने पिता के कुकृत्यों से बचाने के लिए अपने सहित तीनों को मार डालने का प्रयास किया था लेकिन वे तीनों तो मर जाती हैं और वह बच जाती है। अब वह आजीवन कारावास भोग रही है। समाज में न जाने कितनी स्त्रियाँ जेलों में सड़कर ऐसे दण्ड भोग रही हैं।

             

             पेंटिंग अकेली है कहानी में पाश्चात्य जीवन के बधार्थ को स्पष्ट किया गया है। वहाँ पर स्त्री की योनि और कोखा उपभोग के लिए होती है। इसके सहारे जे दो बड़े फ्लैटों की मालकिन बनती है। वहाँ पर आए दिन होते तलाकों का बच्चों की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसकी परवाह किसी को नहीं होती। भविष्य की विडंबना से अनभिज्ञ बच्चों को सप्ताह के अंत में उनके पिताओं के पास समझा-बुझा कर भेजा जाता है जैसे 'जे' अपने तीनों बच्चों को बारी-बारी से उनके पिताओं को सौंपती है, ''मासूमों को पहले से ही अनुकूलित करती। भारतीय पत्नी अभी इतनी साहसी नहीं हुई है जो पति के सामने रहते हुए अपने और अपनी सौत के अंतर के बारे में चर्चा कर सके।"78 यही कारण रहा कि राज की भारतीय पत्नी अमेरिका में रहते हुए 'जे' को लेकर उससे कोई बात नहीं कर पाती। लेकिन भारत में लौट जाने पर जब वह फोन पर अपने पति से यही बात पूछती है तो वह यही कहता है, 'अरसा साथ रहने के बावजूद, जिस परस्परता की दरकार होती है। पति-पत्नी के संबंधों में, पैदा नहीं कर पाए हम अपने बीच। चाहे व्यक्ति अमेरिका में रह ले, चाहे भारत में या कहीं और, स्त्री को वस्तु समझने की भावना आज भी हमारे समाज में विद्यमान है। तभी तो पति राज बड़ी ही सरलता से कह देता है, 'हम भी पटरी बदल कर देखना चाहते थे।लेकिन तुरंत उसे लगता है कि शब्द का गलत प्रयोग किया गया है, वह भूल सुधार करता है, 'देखो, जिंदगी को विकल्प देना चाहिए। जरूरत महसूस हो रही थी हमेंलेकिन उसी पति को तब जोर का झटका लगता है जब पत्नी कहती है कि दिसंबर में उसके आने पर उसके साथ लिखा-पढ़ी कर वह उससे मुक्त हो जाना चाहती है। पति को वह सुनकर लगने लगता है, ''अनेक बार की तरह वह फिर से डिवाइडर के करीब आ गए अपने खाली हुए गिलास के साथ।"79

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संदर्भ- ग्रंथ सूची :

1. ज्योत्सना - सुमित्रानंदन पंत, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1961, पृष्ठ-11

2. आदि- अनादि- 3, चित्रा मुद्गल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ- 56

3. वही, पृष्ठ-61-62

4. वही, पृष्ठ- 64

5. आदि-अनादि- 2, चित्रा मुद्गल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ- 139

6. आदि- अनादि -1, चित्रा मुद्गल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ- 110

7. वही, पृष्ठ- 159

8. पेंटिंग अकेली है- चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 132

9. आदि- अनादि- 3, पृष्ठ- 131

10. आदि- अनादि- 2, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ - 133

11. पेंटिंग अकेली है- चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 40

12. आदि- अनादि-2, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ - 27

13. वही, पृष्ठ- 95

14. वही, पृष्ठ- 103

15. आदि- अनादि- 1, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ - 62

16. वही, पृष्ठ- 62

17. वही, पृष्ठ - 80

18. वही, पृष्ठ - 74

19. आदि- अनादि- 3, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 211

20. वही, पृष्ठ -71

21. आदि- अनादि- 2, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 49

22. वही, पृष्ठ- 108

23. वही, पृष्ठ- 102

24. वही, पृष्ठ- 130

25. वही, पृष्ठ- 139

26. वही, पृष्ठ- 147-48

27. वही, पृष्ठ- 148

28. वही, पृष्ठ- 225

29. वही, पृष्ठ,-231

30. वही, पृष्ठ - 83

31. वही, पृष्ठ - 83

32. वही, पृष्ठ- 80

33. वही, पृष्ठ- 127-28

34. आदि- अनादि- 3, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 270

35. वही, पृष्ठ- 270

36. वही, पृष्ठ- 271

37. वही, पृष्ठ- 272

38. वही, पृष्ठ- 272

39. आदि -अनादि-2, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 87

40. वही, पृष्ठ- 37

41. वही, पृष्ठ- 49

42. वही, पृष्ठ - 115

43. वही, पृष्ठ 117

44. वही, पृष्ठ- 117

45. वही, पृष्ठ- 162

46. वही, पृष्ठ- 163

47. आदि -अनादि- 3, चित्रा मुद्गल, 172

48. वही, पृष्ठ- 178

49. आदि-अनादि- 1, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 111

50. वही, पृष्ठ- 115

51. आदि- अनादि- 2, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 15

52. वही, पृष्ठ- 13

53. आदि- अनादि- 1, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 205

54. आदि- अनादि- 1, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 231

55. आदि- अनादि- 2, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ- 171

56. वही, पृष्ठ- 236

57. वही, पृष्ठ- 236- 237

58. वही, पृष्ठ - 237

59. वही, पृष्ठ- 238

60. वही, पृष्ठ- 241

61. वही, पृष्ठ- 242

62. वही, पृष्ठ- 249

63. वही, पृष्ठ- 253

64. वही, पृष्ठ -252

65. आदि- अनादि - 3, चित्रा मुद्गल, पृष्ठ - 17

66. वही, पृष्ठ- 19

67. वही, पृष्ठ- 63

68. वही, पृष्ठ- 66

69. वही, पृष्ठ- 51-52

70. वही, पृष्ठ-89

71. वही, पृष्ठ- 207

72. वही, पृष्ठ- 211

73. वही, पृष्ठ- 287

74. वही, पृष्ठ- 286

75. वही, पृष्ठ-91

76. वही, पृष्ठ- 97

77. वही, पृष्ठ- 306

78. वही, पृष्ठ- 97

79. वही, पृष्ठ-107

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Milan Tomic

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