प्रश्न संख्या-2. कुआँ ठाकुर का/ पानी ठाकुर का/ खेत-खलिहान ठाकुर के/ गली-मुहल्ले ठाकुर के/ फिर अपना क्या?/ गाँव?शहर? देश?..........
उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश प्रख्यात दलित चिंतक, आलोचक, विचारक और सहृदय कवि ओमप्रकाश बाल्मीकि रचित कविता 'ठाकुर का कुआँ' से उद्धृत है।
इस कविता में समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित होने के लिए सदियों से संघर्ष करने वाले, समता, स्वतंत्रता और बंधुता की मांग करने वाले दलितों की घनीभूत पीड़ा अभिव्यक्त हुई है। दलित भी ठाकुरों या सवर्णों के समाज में अपने मान-सम्मान की तलाश करते नजर आते हैं। राज और समाज के अधिसंख्य संसाधनों पर सवर्णों का ही अधिपत्य है। दलित अधिकार- विहीन, फटेहाल और निरीह हैं!
कविता की उद्धृत पंक्तियों में दलितों का अस्मिताबोध परिलक्षित होता है। वह विचार करता है कि जिस समाज की समृद्धि के लिए वह निरंतर श्रम करता है, क्या वह समाज उसका भी है? जिस कुएँ को वह खोदता है, क्या उस पर उसका भी अधिकार है? जिस खेत को वह जोतकर अन्न ऊपजाता, उस अन्न से क्या उसका भी पेट भरता है? और अंत में निष्कर्ष निकलता है नहीं! उन तमाम चीजों पर ठाकुरों का एकाधिकार है। दलितों के नसीब में केवल श्रमशीलता का अधिकार है और कुछ नहीं।
लेखक का प्रश्न अत्यंत गंभीर है कि 'फिर अपना क्या है? गाँव, शहर? देश? इनमें से तो कुछ भी अपना नहीं है! गाँव से लेकर शहर तक, पूरे देश में दलितों का शोषण बदस्तूर जारी है। उसका ज्ञानवर्धन, उनकी समृद्ध, उनकी संस्कृति आज भी मुख्यधारा के लोगों को नहीं पच रहा है। आर्थिक समृद्धि के पश्चात भी दलितों की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समस्याएँ बनी रह जाती हैं।
कुल मिलाकर कवि ने 'ठाकुर का कुआँ' के बहाने संपूर्ण सवर्ण समाज को कटघरे में खड़ा किया है और साथ ही दलितों की अस्मिता की जागृति का सफल प्रयत्न किया है। कथ्य , शिल्प और भाषा की दृष्टि से कविता कबीरवाद और अंबेडकरवाद का सम्मिश्रण है। निश्चित रूप से इसकी समीक्षा के लिए पृथक् सौन्दर्यशास्त्र की आवश्यकता है।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश प्रख्यात दलित चिंतक, आलोचक, विचारक और सहृदय कवि ओमप्रकाश बाल्मीकि रचित कविता 'ठाकुर का कुआँ' से उद्धृत है।
इस कविता में समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित होने के लिए सदियों से संघर्ष करने वाले, समता, स्वतंत्रता और बंधुता की मांग करने वाले दलितों की घनीभूत पीड़ा अभिव्यक्त हुई है। दलित भी ठाकुरों या सवर्णों के समाज में अपने मान-सम्मान की तलाश करते नजर आते हैं। राज और समाज के अधिसंख्य संसाधनों पर सवर्णों का ही अधिपत्य है। दलित अधिकार- विहीन, फटेहाल और निरीह हैं!
कविता की उद्धृत पंक्तियों में दलितों का अस्मिताबोध परिलक्षित होता है। वह विचार करता है कि जिस समाज की समृद्धि के लिए वह निरंतर श्रम करता है, क्या वह समाज उसका भी है? जिस कुएँ को वह खोदता है, क्या उस पर उसका भी अधिकार है? जिस खेत को वह जोतकर अन्न ऊपजाता, उस अन्न से क्या उसका भी पेट भरता है? और अंत में निष्कर्ष निकलता है नहीं! उन तमाम चीजों पर ठाकुरों का एकाधिकार है। दलितों के नसीब में केवल श्रमशीलता का अधिकार है और कुछ नहीं।
लेखक का प्रश्न अत्यंत गंभीर है कि 'फिर अपना क्या है? गाँव, शहर? देश? इनमें से तो कुछ भी अपना नहीं है! गाँव से लेकर शहर तक, पूरे देश में दलितों का शोषण बदस्तूर जारी है। उसका ज्ञानवर्धन, उनकी समृद्ध, उनकी संस्कृति आज भी मुख्यधारा के लोगों को नहीं पच रहा है। आर्थिक समृद्धि के पश्चात भी दलितों की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समस्याएँ बनी रह जाती हैं।
कुल मिलाकर कवि ने 'ठाकुर का कुआँ' के बहाने संपूर्ण सवर्ण समाज को कटघरे में खड़ा किया है और साथ ही दलितों की अस्मिता की जागृति का सफल प्रयत्न किया है। कथ्य , शिल्प और भाषा की दृष्टि से कविता कबीरवाद और अंबेडकरवाद का सम्मिश्रण है। निश्चित रूप से इसकी समीक्षा के लिए पृथक् सौन्दर्यशास्त्र की आवश्यकता है।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
0 Comments:
Post a Comment