टिप्पणी : स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है!
उत्तर :- 'स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है! पैदा तो होती है वह, उसी तरह जैसे एक मनुष्य, जैसे एक पुरुष, परन्तु परिवार और समाज उसे ठोक- पीट कर स्त्री के फर्मे में ढाल देता है!' यह कथन विश्व प्रसिद्ध स्त्री-वादी लेखिका सिमोन द बोअवार का है, जिसे उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'द सेकेण्ड सेक्स' से उद्धृत किया गयी है। प्रस्तुत संदर्भ में लेखिका स्पष्ट करती है कि स्त्री को समाज में दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। उसे शक्ति, सामर्थ्य और बौद्धिक कुशलता में पुरुष से कमतर आंका जाता है। जबकि इसके लिए स्त्री नहीं, परिवार और समाज जिम्मेवार हैं। वह उसे ठीक से पनपने ही नहीं देते हैं। जन्म से ही उनमें स्त्रीपन भरा जाता है- तुम लड़की हो, तुम्हें यह नहीं बोलना चाहिए...तुम्हें ये कपड़े नहीं पहनने चाहिए....तुम्हें यह नहीं खाना चाहिए...तुम्हें अकेले से नहीं निकलना चाहिए...तुम्हें लड़कों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए... आदि-आदि!
आज स्त्रियां चांद पर चली गईं, परंतु समाज का पुरुषवादी सोच नहीं बदल पाया। आज भी उसे कमजोर समझा जाता है। आज भी स्त्री का मूल अर्थ- एक देह या पुरुष के उपभोग की वस्तु या बच्चे पैदा करने की एक नैचुरल मशीन है। अब भी उनसे शारीरिक शुचिता का प्रमाण मांगा जाता है। आज भी स्त्री की इज्जत का अर्थ उनकी प्रतिभा, कुशलता, ईमानदारी या नैतिकता से संबद्ध न होकर केवल शारीरिक पवित्रता के आधार पर निर्धारित किया जाता है। स्त्री को सदैव किसी न किसी पुरुष के संरक्षण और नियंत्रण में रहने का निर्देश दिया जाता है- बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में बेटे से बाहर कभी उनके व्यक्तित्व को स्वतंत्र रूप से विकसित ही नहीं होने दिया जाता है। मतलब यह कि पुरुष के बिना स्त्री की कोई वैयक्तिक सत्ता है ही नहीं।
सिमोन द बोअवार का उक्त कथन पुरुषवादी सत्ता के खिलाफ़ स्त्री-जागृति का उद्घोष है। लेखिका स्त्री को उनके शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध मानसिक रूप से तैयार करना चाहती है। वह स्त्री को उसकी अस्मिता का बोध कराती है और उनमें अपनी पहचान बनाने की चेतना जगाती है।
डॉ उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
उत्तर :- 'स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है! पैदा तो होती है वह, उसी तरह जैसे एक मनुष्य, जैसे एक पुरुष, परन्तु परिवार और समाज उसे ठोक- पीट कर स्त्री के फर्मे में ढाल देता है!' यह कथन विश्व प्रसिद्ध स्त्री-वादी लेखिका सिमोन द बोअवार का है, जिसे उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'द सेकेण्ड सेक्स' से उद्धृत किया गयी है। प्रस्तुत संदर्भ में लेखिका स्पष्ट करती है कि स्त्री को समाज में दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। उसे शक्ति, सामर्थ्य और बौद्धिक कुशलता में पुरुष से कमतर आंका जाता है। जबकि इसके लिए स्त्री नहीं, परिवार और समाज जिम्मेवार हैं। वह उसे ठीक से पनपने ही नहीं देते हैं। जन्म से ही उनमें स्त्रीपन भरा जाता है- तुम लड़की हो, तुम्हें यह नहीं बोलना चाहिए...तुम्हें ये कपड़े नहीं पहनने चाहिए....तुम्हें यह नहीं खाना चाहिए...तुम्हें अकेले से नहीं निकलना चाहिए...तुम्हें लड़कों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए... आदि-आदि!
आज स्त्रियां चांद पर चली गईं, परंतु समाज का पुरुषवादी सोच नहीं बदल पाया। आज भी उसे कमजोर समझा जाता है। आज भी स्त्री का मूल अर्थ- एक देह या पुरुष के उपभोग की वस्तु या बच्चे पैदा करने की एक नैचुरल मशीन है। अब भी उनसे शारीरिक शुचिता का प्रमाण मांगा जाता है। आज भी स्त्री की इज्जत का अर्थ उनकी प्रतिभा, कुशलता, ईमानदारी या नैतिकता से संबद्ध न होकर केवल शारीरिक पवित्रता के आधार पर निर्धारित किया जाता है। स्त्री को सदैव किसी न किसी पुरुष के संरक्षण और नियंत्रण में रहने का निर्देश दिया जाता है- बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में बेटे से बाहर कभी उनके व्यक्तित्व को स्वतंत्र रूप से विकसित ही नहीं होने दिया जाता है। मतलब यह कि पुरुष के बिना स्त्री की कोई वैयक्तिक सत्ता है ही नहीं।
सिमोन द बोअवार का उक्त कथन पुरुषवादी सत्ता के खिलाफ़ स्त्री-जागृति का उद्घोष है। लेखिका स्त्री को उनके शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध मानसिक रूप से तैयार करना चाहती है। वह स्त्री को उसकी अस्मिता का बोध कराती है और उनमें अपनी पहचान बनाने की चेतना जगाती है।
डॉ उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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