(1) कैसा बुरा रिवाज है, जिसे जीते जी तन ढँकने के लिए चिथड़ा भी न मिला हो, उसे मरने के बाद नया कफन चाहिए!
संदर्भ : - प्रस्तुत गद्यांश कथा- सम्राट् प्रेमचंद रचित हिन्दी की प्रसिद्ध कहानी 'कफन' से उद्धृत है, जिसका प्रकाशन प्रथमत: 1935 ई. में हुआ। यह कहानी 'मानसरोवर' नामक ग्रंथ में संकलित है।
प्रसंग :- प्रणीत गद्यांश 'कफन' शीर्षक कहानी के दो पुरूष पात्र घीसू और माधव के संवाद के रूप में कहानी में उपस्थापित किया गया है।
व्याख्या :- कहानी के प्रस्तुत प्रसंग के माध्यम प्रेमचंद ने भारतीय समाज में प्रचलित रूढ़िवादी रिवाज का मखौल उड़ाया है। संवाद के बहाने वे भारत के मृत्युसेवी संस्कृति पर व्यंग्य करते हैं, जहाँ जीवन को बचाने से ज्यादा मृत्यु को सजाने-सवारने और यादगार बनाने की कोशिश की जाती है। घीसू और माधव की भूख ने उसे परंपरा को तोड़ने के लिए बाध्य किया। यही कारण है कि यहाँ कफन की निरर्थकता के संदर्भ में तीन तर्क दिए जाते हैं। पहला, जिसे जीते जी तन ढँकने के लिए चिथड़ा भी न मिला हो, उसे मरने के बाद नया कफन चाहिए। दूसरा, रात को कफन कौन देखता है। और तीसरा, कफन तो लाश के साथ जल ही जाता है।
घीसू और माधव के द्वारा घर की औरत के कफन के पैसे से शराब पी जाना, एक क्षण के लिए दोनों के अमानवीय संस्कार को रेखांकित करता है, परन्तु अगले ही क्षण पाठकों यह यह अस्वाभाविक नहीं लगता है, क्योंकि घीसू ने जीवन में केवल दो बार पेटभर खाया। पहली बार ठाकुर के भोज में और दूसरी बार बहू के कफन के पैसे से। और माधव तो केवल एक बार पेट भर खाता है- पत्नी के कफन के पैसे से। ऐसी स्थिति में दोनों के द्वारा की गई करतूत के प्रति पाठकों की संवेदना जागती है।
निर्मल वर्मा ने ठीक ही कहा कि जब पहली बार बाप और बेटे ने घर की स्त्री के कफन के पैसे से शराब का कुल्हड़ मुँह से लगया होगा, उसी समय हिन्दी कहानी में व्यक्ति-स्वातंत्र्य का जन्म हुआ होगा।
बहरहाल, कहानी का यह संदर्भ सबसे अधिक प्रभावी है, पूरी कहानी के मंतव्य को स्पष्ट करने में समर्थ है। कहानी की भाषा एकदम सहज, सरल और प्रभावोत्पादक है। कथ्य पूरी तरह स्पष्ट है।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
संदर्भ : - प्रस्तुत गद्यांश कथा- सम्राट् प्रेमचंद रचित हिन्दी की प्रसिद्ध कहानी 'कफन' से उद्धृत है, जिसका प्रकाशन प्रथमत: 1935 ई. में हुआ। यह कहानी 'मानसरोवर' नामक ग्रंथ में संकलित है।
प्रसंग :- प्रणीत गद्यांश 'कफन' शीर्षक कहानी के दो पुरूष पात्र घीसू और माधव के संवाद के रूप में कहानी में उपस्थापित किया गया है।
व्याख्या :- कहानी के प्रस्तुत प्रसंग के माध्यम प्रेमचंद ने भारतीय समाज में प्रचलित रूढ़िवादी रिवाज का मखौल उड़ाया है। संवाद के बहाने वे भारत के मृत्युसेवी संस्कृति पर व्यंग्य करते हैं, जहाँ जीवन को बचाने से ज्यादा मृत्यु को सजाने-सवारने और यादगार बनाने की कोशिश की जाती है। घीसू और माधव की भूख ने उसे परंपरा को तोड़ने के लिए बाध्य किया। यही कारण है कि यहाँ कफन की निरर्थकता के संदर्भ में तीन तर्क दिए जाते हैं। पहला, जिसे जीते जी तन ढँकने के लिए चिथड़ा भी न मिला हो, उसे मरने के बाद नया कफन चाहिए। दूसरा, रात को कफन कौन देखता है। और तीसरा, कफन तो लाश के साथ जल ही जाता है।
घीसू और माधव के द्वारा घर की औरत के कफन के पैसे से शराब पी जाना, एक क्षण के लिए दोनों के अमानवीय संस्कार को रेखांकित करता है, परन्तु अगले ही क्षण पाठकों यह यह अस्वाभाविक नहीं लगता है, क्योंकि घीसू ने जीवन में केवल दो बार पेटभर खाया। पहली बार ठाकुर के भोज में और दूसरी बार बहू के कफन के पैसे से। और माधव तो केवल एक बार पेट भर खाता है- पत्नी के कफन के पैसे से। ऐसी स्थिति में दोनों के द्वारा की गई करतूत के प्रति पाठकों की संवेदना जागती है।
निर्मल वर्मा ने ठीक ही कहा कि जब पहली बार बाप और बेटे ने घर की स्त्री के कफन के पैसे से शराब का कुल्हड़ मुँह से लगया होगा, उसी समय हिन्दी कहानी में व्यक्ति-स्वातंत्र्य का जन्म हुआ होगा।
बहरहाल, कहानी का यह संदर्भ सबसे अधिक प्रभावी है, पूरी कहानी के मंतव्य को स्पष्ट करने में समर्थ है। कहानी की भाषा एकदम सहज, सरल और प्रभावोत्पादक है। कथ्य पूरी तरह स्पष्ट है।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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