टिप्पणी : अष्टम पत्र

 "समता, स्वतंत्रता और बंधुता दलित साहित्य की मूल मांग है।"
            उत्तर : दलित साहित्य वस्तुतः दलितों की आत्माभिव्यक्ति है,  जिसमें समता, स्वतंत्रता और बंधुता के लिए उनके संघर्ष को दिखाया जाता है। दलित साहित्य दलितों की चेतना की अभिव्यक्ति है, जिसके बहाने समतामूलक सामाजिक व्यवस्था की मांग की जाती है।
             दलित अथवा तथाकथित अछूत को आरंभ से ही समाज की मुख्यधारा से काटने का प्रयत्न किया गया। उसे स्वतंत्र रूप से ज्ञान अर्जित करने, व्यवसाय करने तथा विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी नहीं दी गयी , उसे समाज में बराबरी का अधिकार नहीं प्राप्त हो सका, जिसके कारण दलितों को सदैव संघर्ष करना पड़ा है।
            इतिहास बतलाता है कि दलित और आदिवासी ही यहाँ के मूल निवासी हैं। आर्य विदेशी हैं, पर वे समाज में सम्मानित हो चुके हैं। लेकिन मूल निवासी उपेक्षित बनकर रह गये हैं। वर्णों का विभाजन जो वस्तुतः श्रम का विभाजन था, उसका स्तरीकरण कर दिया गया, जिसमें सवर्ण को समाज में सबसे ऊँचा और अवर्ण को सबसे नीचा स्थान दिया गया। साथ ही दलितों के शास्त्र- अध्ययन और श्रवण पर पाबंदी लगायी गयी।
              यद्यपि समता स्वतंत्रता और बंधुता की प्राप्ति का संघर्ष बहुत पुराना हो, तथापि आधुनिक भारत में इसे सर्वप्रथम बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने अर्थवत्ता प्रदान किया। उसने बताया कि समाज में समता की प्राप्ति के लिए दलितों को शिक्षित बनने, संगठित होने तथा संघर्ष करने की आवश्यकता हैं। जातीय विषमता की कीड़े धर्म में स्थित है। अतएव सर्वप्रथम उसे नकारना होगा। अंबेडकर जी ने अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया, और कहा कि जब तक सवर्णों और दलितों के खून में खून नहीं मिलेगा, तब तक जातिवाद के कीड़े नहीं मरेंगे।
           आज यद्यपि समाज प्रगतिशील बन गया हो और शहरीकरण ने जातिभेद को कुछ शिथिल बना दिया हो, परन्तु अब भी दलितों को समाज में समता की प्राप्ति नहीं हो सकी है। दलितों के द्वारा रचित आत्मकथा, जिसकी परंपरा अंबेडकर की आत्मकथा 'मी कसा झालो' अर्थात् 'मैं कैसे बना' से शुरू हुई और दया पवार के 'बलुतं' से होते हुए ओमप्रकाश बाल्मीकि के 'अछूत', शरण कुमार लिम्बाले के 'अक्करमाशी' तुलसीराम के 'मुर्दहिया' एवं 'मणिकर्णिका' तक पहुँची है, वह वस्तुतः दलितों की संघर्षगाथा के साथ समता , स्वतंत्रता और बंधुता की मांग है।
            कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि संपूर्ण दलित साहित्य की सृजनात्मकता का मूल उद्देश्य समता, स्वतंत्रता और बंधुता की मांग करना ही है, ताकि समतामूलक सामाजिक व्यवस्था की स्थापना की जा सके।

डॉ.उमेश कुमार शर्मा
   युवा रचनाकार
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