जब भी कोई निकलता है
गृह -त्याग कर
सत्य की खोज में
शिद्धार्थ की तरह
तो सामने अकड़ कर
खड़ा हो जाता है
कोई दुर्गम पहाड़
मुँह फाड़ कर
ऊफनने लगती हैं
कितनी नदियाँ
तलवार की तरह तनकर
खड़ी हो जाती हैं झाड़ियाँ
बरछी बन जाता है कंटक
और इतना ही नहीं,
उस पार पुकारती है
प्राणप्रिय यशोधरा
आत्मज राहुल।
और लौट आता है
जो इन बाधाओं से डरकर
वह बुद्ध नहीं बनता ।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
बहुत शुन्दर कविता
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