स्मृति के सुनहरे फलक पर
उभर रही है पुनः एक तस्वीर
कहीं तुम वही तो नहीं,
जिसने भर दिया था संगीत
मेरे नीरस अंतस में,
जिसने खिलाया था फूल
जीवन के पतझड़ में।
कहीं तुम वही तो नहीं,
जिसने भरा था शब्द
मेरे भीतर में,
और वे शब्द थे- प्रेम, समर्पण , दया, क्षमा,
करुणा, सहानुभूति,
अब प्रतिफलित हो रहे हैं ये शब्द
भर गया है लवालब मेरा हृदय
छलक रहे हैं शब्द
और बन रही है
कविता।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
Bahut khoob likhe hai,sir
ReplyDeleteबहुत शुन्दर
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