पंचम अध्याय :
विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में आधुनिकता बोध
आधुनिकता बोध : अर्थ और स्वरूप :
आधुनिक, आधुनिकता और आधुनिकीकरण और आधुनिकतावाद के लिए अंग्रेजी में क्रमशः 'मॉडर्न' (Modern), 'माडर्ननिटी' (Modernity), 'माडर्नाइजेशन' (Modernization) और 'माडर्निज्म' (Modernism) शब्द प्रयुक्त होते हैं। यूरोप में सोलहवीं सदी के मध्य से लेकर उन्नीसवीं सदी के मध्य तक 'आधुनिक' शब्द का प्रयोग 'वर्तमान' के पर्याय के रूप में किया जाता था। पुनर्जागरण के बाद 'आधुनिक' शब्द ने कई विशेषणों को जन्म दिया। यथा- 'आधुनिकतावाद', 'आधुनिकीकरण' आदि। "इमारतें आधुनिक शैली की बनाई जा रही हैं"(1) अथवा "वेश-भूषा आधुनिक हो चली है।"(2) जैसे वाक्य सामान्य तौर पर प्रयुक्त होने लगे। उन्नीसवीं शताब्दी के समाप्त होने तक आधुनिकता, 'सुधार', 'कार्यक्षमता', 'प्रगतिशीलता' आदि का पर्याय बनकर प्रयुक्त होने लगा।
इसीलिए आधुनिकीकरण में सामाजिक वर्गों की सीमाओं के मिटने तथा ग्रामीण क्षेत्रों से नगरों और महानगरों की ओर प्रस्थान, सामाजिक गतिशीलता, शिक्षा का प्रसार, ज्ञानविज्ञान का विस्तार, सामंती मूल्यों का ह्रास आदि शामिल है। आधुनिकीकरण की इस प्रक्रिया को नगरीकरण तथा नए अभिजात वर्ग (बुर्जुआ) के उदय के रूप में देखा जाता है।
आधुनिकता का संबंध आधुनिकीकरण के फलस्वरूप पुरातन तथा परंपरागत विचारों एवं मूल्यों, धार्मिक विश्वासों और रूढ़िगत रीति-रिवाजों के विरुद्ध नवीन और वैज्ञानिक आविष्कारों, विचारों, नए मूल्यों आदि से है। 'आधुनिकीकरण' शब्द उन समस्त परिवर्तनों तथा प्रक्रियाओं के लिए प्रयोग किया जाता है जो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के अंतर्गत औद्योगीकरण तथा यंत्रीकरण के कारण प्रकट हुई है।
इन परिवर्तनों के कारण साहित्य और कला के क्षेत्र में भी तेजी से नये चिंतन और नये प्रयोग दिखायी देने लगे। आधुनिकतावाद साहित्य और कला के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण आंदोलन बनकर उभरा।
आधुनिकतावाद का युग यूरोप में उन्नीसवीं सदी से शुरू होकर बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक माना जाता है। कुछ विचारकों के अनुसार यूरोप में आधुनिकता के दो अलग-अलग काल है-पहला आधुनिकतावाद जो अपने प्रारंभ से लेकर बीसवीं सदी के आरंभिक दो दशकों तक जारी रहा और दूसरा नव आधुनिकतावाद, जो इसके बाद शुरू हुआ।
लेकिन आधुनिकतावाद के लिए इस प्रकार का काल-विभाजन प्रत्येक देश के लिए संभव नहीं है। काल का निर्धारण अलग-अलग देशों के आधुनिकीकरण को प्रक्रिया पर निर्भर करता है। तीसरी दुनिया के देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया और बाद में शुरू हुई।
यद्यपि आधुनिकतावाद साहित्य, कला तथा अन्य सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के लिए बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रचलित रहा लेकिन वास्तव में साहित्यिक प्रवृत्तियों के समय की कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। कई प्रवृत्तियां कभी-कभी एक-दूसरे से जुड़ी हुई एक ही समय में प्रवाहित होती रहती हैं। इसके अतिरिक्त, साहित्य की नई प्रवृत्तियां प्रस्फुटन से पूर्व बीज-रूप में पूर्व प्रवृत्तियों में मौजूद रहती हैं। वे बाद में आंदोलन की शक्ल ले लेती हैं। यही कारण है कि कुछ लेखकों ने तो यह भी कह दिया कि आधुनिकतावाद कोई अलग से साहित्यिक प्रवृत्ति, आंदोलन या सिद्धांत नहीं है, अपितु यह स्वच्छंदतावाद का ही विस्तार है।
टी.एस. इलियट की काव्य कृति 'द वेस्टलैंड' (The Westland) और जेम्स ज्वायस का उपन्यास 'यूलिसेस' (Ulises) सन् 1922 में प्रकाशित हुए। इन कृतियों को साहित्यिक आधुनिकतावाद का मूल माना जाता है।
विचारकों ने अलग-अलग देशों में आधुनिकतावाद के विकास का अलग-अलग समय निश्चित किया है। हिंदी में आधुनिकतावाद के उदय को लेकर अनेक प्रकार के मत प्रचलित हैं। पश्चिमी चिंतन से प्रभावित लोग उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों अर्थात् भारतेंदु-युग से आधुनिकता का उदय मानते हैं और कुछ लोग आधुनिकतावाद का संबंध प्रयोगवाद और नई कविता से जोड़ते हैं। कुछ लोगों का यह भी विश्वास है कि हिंदी में आधुनिकतावाद का जन्म द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में उत्पन्न नवीन संवेदना और नयी चितन दृष्टि के साथ हुआ। 'आधुनिकता' और 'आधुनिकतावाद' शब्दों के अंतर पर ध्यान देना जरूरी है। जब हम कहते हैं कि 'भारतेंदु युग आधुनिकत का प्रवेशद्वार है' तब आधुनिकता से हमारा अर्थ होता है नवीन वैज्ञानिक, तर्कयुक्त दृष्टिकोण जो रुढिबद्धता के विरोध में खड़ा है और जब आधुनिकतावाद के उदय की बात करते हैं, तब आशय विश्वयुद्धों के बाद जन्मी संवेदना और विचार-दृष्टि से होता है।
भारत में आधुनिकतावाद पचास के दशक के आसपास चर्चा का विषय बना, जब यूरोप में विक्षुब्ध युवा (Angry Youngman) और अमेरिका में बोट्स को कृतियों तथा यूरोप के अस्तित्ववादी चिंतक लेखकों-ज्यों पाल सार्ज, अल्बेयर कामू आदि का प्रभाव हिंदी लेखने तथा आलोचना पर पड़ा।
आधुनिकतावाद सामाजिक समस्याओं के बजाय व्यक्ति के स्वरूप तथा आत्म-बोध को प्रमुख मानता है। प्रत्येक वस्तु, विचार तथा संरचना पर व्यक्ति को वैयक्तिकता की छाप अंकित है। बाह्य जगत या वस्तुएं या तो मनुष्य की मनःस्थितियों की अभिव्यक्ति है या मात्र उसका प्रतीक है। आधुनिकतावाद प्रत्येक विश्वास और विचार को संशय की दृष्टि से देखता है। इसी कारण उसमें अनास्था का स्वर मुखर है। वह मूल्यों की स्थिरता में विश्वास नहीं रखता। मूल्य न केवल अनावश्यक तथा अर्थहीन हैं, बल्कि हानिकर भी है। मूल्यों के संकट का ही फल है कि लेखक अपने लेखकीय दायित्व को स्वीकार नहीं करता। आधुनिकतावाद अतीत से विमुख होकर वर्तमान में शरण लेता है। वह स्थायी अनुभवों को अपेक्षा क्षणिक अनुभवों को वाणी देता है। अतः मनुष्य के अनुभव क्षणिक तथा विखंडित होते हैं। आधुनिकतावाद धर्म, प्रकृति, परंपरा, नैतिकता, प्रतिबद्धता, आस्था, मूल्य तथा प्रत्येक प्रचलित विचार तया वस्तु-स्थिति और व्यवस्था को चुनौती देता है। विद्रोह उसका मूल स्वर है। आधुनिकतावाद हर प्रकार के सामाजिक, नैतिक, वैचारिक तथा यौन दमन के विरुद्ध है।
आधुनिकतावादियों के अनुसार साहित्य का कोई सामाजिक प्रयोजन नहीं है। इसी कारण साहित्य मूल्यों तथा उद्देश्यों से पृथक होकर विकसित होने लगा। आधुनिकतावादी साहित्य और कला की उपयोगिता को स्वीकार नहीं करता। उसके अनुसार साहित्य का बाह्य जगत या आम आदमी से कोई संबंध नहीं है। साहित्य जन-रुचि के अनुकूल नहीं रचा जाता। साहित्य आम पाठक के लिए उपयोगी नहीं रह जाता और न ही वह सामान्य पाठक या जन के प्रति उत्तरदायी होता है।
आधुनिकतावादियों की नवीन से नवीनतर सृजन करने की तीव्र इच्छा के कारण प्रयोग अपने आप में ध्येय और मूल्य बन जाता है। प्रति-क्षण नया होने, कुछ अपूर्व, विलक्षण या अद्वितीय प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। रूप, शिल्प तथा शैली के नित-नए प्रयोग साहित्यिक आधुनिकतावाद की विशिष्टता है। नयी भाषा, नयी संरचना, नयी शब्दावली, पुराने प्रचलित शब्दों का नया अर्थ, नयी साहित्यिक पदावली की झलक आदि आधुनिकतावादी साहित्य की पहचान बन गई। सुप्रसिद्ध आधुनिकतावादी कवि ऐज़रा पाउंड ने तो यहाँ तक कह दिया कि 'अच्छी कविता कभी भी बीस वर्ष पुरानी शैली में नहीं लिखी जा सकती।'(3) कई आधुनिकतावादी लेखक चौंकाने या सनसनी फैलाने के लिए या उत्तेजना, आघात और आतंक का प्रभाव उत्पन्न करने के लिए ही भाषा और शैली में नए परिवर्तन लाते हैं।
आधुनिकतावाद के प्रभाव से साहित्य का शास्त्रीय सौंदर्य-बोध संदिग्ध हो गया। साहित्यिक कृतियों को पूर्णता की दृष्टि से नहीं, टुकड़ों टुकड़ों में देखने की प्रवृत्ति बढ़ गई। मनुष्य अपने सामाजिक परिवेश, परिवार तथा वर्तमान परिस्थिति से अलगाव अनुभव करने लगा। व्यक्ति भीड़ में भी अकेला महसूस करने लगा। एकाकीपन और अलगाव आधुनिकतावादी साहित्यिक कृतियों का मुख्य सरोकार है। आधुनिकतावाद वस्तु यथार्थ की अपेक्षा अनुभव की प्रामाणिकता पर बल देता है। आधुनिकतावाद प्रकृतिवाद के विपरीत व्यक्ति की जटिल मानसिकता और अछूती संवेदनाओं को प्रस्तुत करता है। कतिपय आधुनिकतावादी लेखक आदिम मानव की प्रवृत्तियों को प्रस्तुत करके और समाज, संस्कृति, धर्म तथा नैतिक मूल्यों का उपहास करके ही आधुनिकतावाद का प्रमाण देते हैं।
आधुनिकतावादी साहित्यिक आंदोलन के अंतर्गत प्रतीकवाद, बिंबवाद, दादावाद, अतियथार्थवाद, भविष्यवाद, अंतश्चेतनावाद आदि शामिल हैं।
आधुनिकतावाद में दुरूहता तथा पाठकीय उपेक्षा के कारण इसका रचना- विधान जटिल और अपरिचित लगने लगता है। पाठक को सम्प्रेषण की कमी की शिकायत रहती है। परिणामस्वरूप वह अर्थ-बोध तथा सौंदर्य-बोध से वंचित रह जाता है। पाठक उद्विग्न तो होता है, लेकिन उसका रचना- बोध अतृप्त रहता है। कई बार आधुनिकतावादी रचनाएँ पहेली-सी दिखाई देने लगती हैं। प्रयोग आधुनिकतावाद का मुख्य उद्देश्य बन जाता है। उक्त कमजोरियों के बावजूद आधुनिकतावाद के प्रभाव से कोई भी क्षेत्र बच नहीं सका है।
'आधुनिकता बोध' नयी कविता के दौर में विकसित होनेवाली हिंदी का अपना पारिभाषिक शब्द है। साहित्येतर अनुशासनों में भी यह सहज व्यवहृत होता हुआ देखा जा सकता है। हिंदी की नई कविता के दौर में सामाजिक-साहित्यिक मनोवृत्तियों का विश्लेषण करनेवाला 'आधुनिकता बोध' शब्द एक सिद्धांत की तरह विकसित हुआ।
एक समय पूरे विश्वास से अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने, भविष्य निर्माण के लिए संघर्ष करने, वर्तमान को सुधारने, नैतिक ह्रास को रोकने और उत्पीड़ित मनुष्य के साथ एकात्म होकर उसको मुक्ति के लिए उपाय करने को भी 'आधुनिकता बोध' के अंतर्गत शामिल कर लिया गया था, लेकिन अमृतराय ने 'आधुनिक भाव बोध की संज्ञा' नामक पुस्तक में 'आधुनिक भाव-बोध' के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा है-"आधुनिक भाव-बोध, युग-बोध, राग-बोध, तत्त्व-बोध यानी जितने तरह के आधुनिक बोध हैं और जो आधुनिक संवेदना है, उन सबका स्थायी भाव एक ही है, ऊब यानी बोरडम या उससे भी अधिक अर्थ-विस्तार लिए हुए सीधे फ्रेंच से अंग्रेजी में आनेवाला शब्द, 'आन्वी'। बड़े मजे की चीज है यह ऊब, इससे बड़ा बहुरुपिया कोई नहीं। साधारण सी, रोज की जानी-पहचानी ऊब से लेकर हत्या और आत्महत्या में पर्यवसित कठिनतम हताशा तक उसका साम्राज्य फैला हुआ है।"(4) निश्चय ही अमृत राय ने यहां 'आधुनिक भाव-बोध' को अस्तित्ववाद से प्रभावित मनोदशा माना है। यह बात उन्होंने प्रथम दौर की 'नयी कविता' के समर्थकों द्वारा स्वीकृत 'आधुनिक भाव-बोध' को समझाने के लिए कहा था। 'आधुनिक भाव-बोध' के संबंध में नंददुलारे वाजपेयी का मत है कि, "प्रत्येक देश का 'आधुनिक भाव-बोध' उसके सामाजिक परिवेश और लक्ष्य तथा उद्देश्य के आधार पर बनाया जाता है।"(5) हिंदी की 'नयी कविता' में 'आधुनिक भाव-बोध' के अंतर्गत वाजपेयी जी को अहं भावना का अतिरेक, आत्मलघुता की भावना, अनास्था आदि के तत्त्व दिखाई दिए। 'आधुनिक भावबोध' की रचनात्मक उपलब्धि के रूप में वाजपेयी जी ने मानववाद को महत्व दिया है। लेकिन जहां तक मुक्तिबोध का सवाल है, उन्होंने 'आधुनिक भाव-बोध' को 'नयी कविता' की आत्मा माना है। वे कहते हैं-"नयी कविता की आत्मा है 'आधुनिक भाव-बोध'।" (6) आज का सुशिक्षित मनुष्य अपने परिवेश, परिस्थितियों से जो संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएं करता है, वे संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएं या उनका सामान्यीकरण नयी कविता में प्रकट होता है। ऐसे सुशिक्षित मनुष्य का दृष्टिकोण मध्ययुगीन धार्मिक दृष्टि से अनुप्राणित अथवा छायावादी भावुकता से परिपूर्ण कल्पना-प्रधान नहीं होता। विज्ञान के इस युग में, उसकी दृष्टि यथाथोन्मुख तथा संवेदनशील होती है। वह यथार्थ संबंधों को ग्रहण कर यथार्थबोध द्वारा संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएं करता है। 'काव्य एक सांस्कृतिक प्रक्रिया' शीर्षक अपने निबंध में मुक्तिबोध 'आधुनिक भाव-बोध' को दूसरे संदर्भ में व्यक्त करते हुए कहते हैं कि "वस्तुतः 'आधुनिक भाव-बोध' क्या है? मैं अपनी खुद की जिंदगी से और दोस्तों की जिंदगी के तजुर्बे से बता सकता हूँ कि अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करना 'आधुनिक भाव-बोध' के अंतर्गत है। आधुनिक भाव-बोध के अंतर्गत यह भी है कि मानवता के भविष्य-निर्माण के संघर्ष में हम और भी अधिक दत्तचित्त हों, तथा हम वर्तमान परिस्थिति को सुधारें, नैतिक हास को थामें, उत्पीड़ित मनुष्य के साथ एकात्म होकर उसकी मुक्ति की उपाय-योजना करें। क्या यह 'आधुनिक भाव-बोध' के अंतर्गत नहीं कि में अपनी लेखनी द्वारा किसी विशेष लोकादर्श के लिए कविता लिखूं ?"(7)
'आधुनिक भाव-बोध' से जो अर्थ मुक्तिबोध ने लिया है, उससे भिन्न अर्थ इंद्रनाथ मदान ने लिया है। उन्होंने पूरे 'आधुनिक हिंदी साहित्य' में 'आधुनिक भाव-बोध' को पहचानने की कोशिश की है। वे 'आधुनिक भाव-बोध' के अंतर्गत विसंगति, व्यर्थता, विडम्बना आदि तत्त्वों को समाहित मानते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि एक ओर जहाँ मुक्तिबोध के लिए अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करना 'आधुनिक भाव बोध' की एक पहचान है, वहीं दूसरी ओर इंद्रनाथ मदान जैसे भाववादियों के लिए विसंगति, व्यर्थता और विडंबना आधुनिक भाव बोध के तत्त्व हैं और इस तरह निराशा और दुःख-भावना, ग्लानि और विरक्ति तथा अगति भी 'आधुनिक भाव-बोध' के अन्य नाम हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो 'आधुनिकता बोध' ही 'आधुनिक भाव-बोध' है। अतः 'आधुनिक भाव-बोध' मध्ययुगीन धार्मिक दृष्टि तथा छायावादी भावुकता से भिन्न आज के वैज्ञानिक युग के सुशिक्षित मनुष्य की, अपने परिवेश के प्रति संवेदनात्मक प्रतिक्रिया है और यही प्रतिक्रिया सामान्यीकृत होकर जब नयी कविता में प्रकट होती है तो आधुनिक भाव-बोध का रूप लेती है। दृष्टिकोणों की भिन्नता की 'आधुनिकताबोध' के स्वरूप निर्धारण में खास भूमिका है।
विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में आधुनिकता बोध :
वर्तमान समय आधुनिकता के दौर से गुजर रहा है, जिसे कारण समाज में अनेक तरह के परिवर्तन हो रहे हैं। विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में इस परिवर्तन की भली-भाँति प्रस्तुत किया है। उनके उपन्यासों के केन्द्र में सामाजिक यथार्थ स्थित है। सामाजिक यथार्थ अपने आप में एक विस्तृत शब्द है। इसके अनेक पहलू है, परंतु यहाँ उनके कुछ महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में व्यक्त संदर्भों पर विचार किया गया है। इन संदर्भों में वर्तमान समय के पारिवारिक जीवन यथार्थ का चित्रण किया गया है। सर्वविदित है कि हमारे सामाजिक और मानवीय जीवन का आधारभूत चीज परिवार है। मनुष्य की प्रारंभिक तथा मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले संगठन एवं संस्थाओं में परिवार का स्थान सबसे ऊपर है। व्यक्ति का सर्वप्रथम साक्षात्कार अपने परिवार के साथ ही होता है, जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान समय में परिवार में भावात्मक संबंधों में परिवर्तन हुए हैं। संबंधों में अनेक दरारें आई हैं। पिता-पुत्री, पति-पत्नी, माँ-बेटी, माँ-बाप, संतान भाई-भाई भाई-बहन का प्रेम, स्नेह, आदर व वात्सल्य तथा एक-दूसरे में अपनापन परिवार में ही पनपता है। विनोद कुमार शुक्ल ने हमारे परिवार के बदलते जीवन यथार्थ को अपने उपन्यासों में अभिव्यक्ति दी है।
विनोद कुमार शुक्ल रचित उपन्यास 'नौकर की कमीज' का नायक है- संतू बाबू। इस पात्र का जन्म एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। अपने अभावपूर्ण परिस्थिति से गुजरते हुए बी०ए० तक की पढ़ाई पूरी की। संतू बाबू के परिवार में अम्मा बड़े भाई और भाभी और उनके दो छोटे बच्चे हैं। पिता की मौत पहले हो चुका है। एक सरकारी दफ्तर में साधारण क्लर्क की नौकरी मिलने के बाद संतू बाबू की शादी साल भर के भीतर हो जाता है। संतू बाबू की पत्नी भी इंटर पास है। पत्नी में समझदारी, साहचर्य सभी संस्कार है। वह अपने पति को सहयोग देने हेतु सदैव तत्पर रहती है। उसकी सोच-आचार-विचार, रहन-सहन अति साधारण है।
संतू बाबू के चेतन मन में सामाजिक यथार्थ के एक हिस्से ने जीवन मूल्य समझौतावादी को स्वीकार किया है, तो दूसरी तरफ संतू बाबू के मन में सपने, इच्छाएँ कल्पनाएँ जगती हैं। संतू बाबू के जीवन में लाचारी, बेवसी, गरीबी, विपन्नता, शोषण आदि ने जकड़ रखा है। ऐसी परिस्थिति में वह विरोध कर भी नहीं सकते। इन तमाम परिस्थितियों के बावजूद कथा नायक संतू बाबू और उसकी पत्नी सुख की तलाश करते हैं।
'नौकर की कमीज' नामक उपन्यास में महावीर नामक चरित्र को सामने लाकर एक निम्नवर्गीय परिवार का चित्रण किया है। महावीर पूरे दिन मूँगफली बेचने का काम करता है। यही उसकी जीविका का आधार है। उसके लिए जीवन में गरीबी, शोषण, उत्पीड़न, आर्थिक अभाव, त्रासदी और अपनी उलझनों के मध्य कड़वा अनुभव है। अनुभवों के संघर्ष से वे उत्प्रेरित है। मूँगफली बेचकर महावीर की पहचान एक व्यापार का चिह्न है। महावीर स्वयं कहता है-"सच में यह मेरा ट्रेडमार्क है। छुपाकर रखूँगा तो लोग पहचानेंगे कैसे? मैंने अपनी पहचान बहुत मजबूत बना ली है, यानी म्युनिसिपल स्कूल के बार नीम के पेड़ के नीचे मूंगफली बेचनेवाला, महावीर जिसके कंधे में रसौली है।"(8)
विनोद कुमार शुक्ल का प्रसिद्ध उपन्यास है- 'दीवार में एक खिड़की रहती थी।' इस उपन्यास में एक ऐसे ही छोटे कस्बे में रहने वाले नव-दंपति रघुवर प्रसाद और सोनसी की कथा है जो निम्नमध्यवर्गीय भारतीय परिवार के सुख-दुख की भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। इस उपन्यास में अभावयुक्त जीवन को भावयुक्त तरीके से जीने की कोशिश दिखाई पड़ती है। इस उपन्यास के बारे में प्रख्यात आलोचक विष्णु खरे लिखते हैं- "विनोद कुमार शुक्ल के इस उपन्यास में कोई महान घटना कोई विराट संघर्ष कोई युग सत्य तथा कोई उद्देश्य या संकेत नहीं है, क्योंकि इसमें वह जीवन, जो इस देश की वह जिंदगी है, जिसे किसी अन्य उपयुक्त शब्द के अभाव में निम्नमध्यवर्गीय कहा जाता है।" (9) इसी उपन्यास के बारे में आलोचक मधु बी० जोशी लिखती हैं- "दीवार में एक खिड़की रहती थी' एक छोटे... मोटे चमत्कार से कम नहीं है। उपन्यास का परिवेश निम्नमध्यवर्गीय है, जहाँ पास-पड़ोस, परिवार, महाविद्यालय उनके छात्र, कर्मचारी और रोजमर्रा जीवन के ब्यौरे अपने पूरे विस्तार से मौजूद है। यहाँ न नायक है न खलनायक, बस जीवन और उसकी जीवंतता है। लोग और उनका जीवन-सादा और निरीह है। बावजूद इसके जीवन में आस्था का स्वर एकदम स्पष्ट है। "(10)
वास्तव में विनोद कुमार शुक्ल का यह उपन्यास एक घरेलू प्रेमाख्यान है। एक ऐसा प्रेमाख्यान जो शुद्ध भारतीय हो। यह एक विवाहित दंपति रघुवर प्रसाद और सोनसी के प्रेम की कथा है। इस प्रेमकथा में कोई बड़ी घटना या घटनाओं की बहुलता नहीं है, बल्कि रोजमर्रा का जीवन है, पर रोजमर्रा के इस जीवन में पल रहें पति-पत्नी के प्रेम में इतना रस, इतनी सांद्रता और गरमाहट है कि कई प्रेम कहानियाँ फीकी लगने लगती हैं। संसार के अधिकांशः प्रेम कहानियाँ अविवाहितों के प्रेम पर है और उनमें वर्णित प्रेम लोकाचार के खिलाफ रहा है। विवाहितों का प्रेम, प्रेम की कोटि में गिना ही नहीं गया, क्योंकि यह लोकाचार की लक्ष्मणरेखा के भीतर रहा। परन्तु विनोद कुमार शुक्ल ने कम से कम हिन्दी में इस उपन्यास के सहारे पहली बार दिखाया है कि वैवाहिक जीवन का घरेलू प्रेम भी इतना उत्कृष्ट और जादू से भरा हो सकता है। परंपरागत भारतीय जीवन के इस अत्यंत जाने-माने तथा अति परिचित संबंध में प्रेम की इतनी विराट दुनिया मौजूद है, इसे दिखाकर विनोद कुमार शुक्ल ने न सिर्फ कथा साहित्य को बल्कि वैवाहिक जीवन के प्रेम को भी नया बना दिया है। इससे हिन्दी उपन्यास में एक नई शुरुआत हो चुकी है।"(11)
पति-पत्नी के बीच प्रेम का संबंध विनोद कुमार शुक्ल ने अत्यंत सजीव चित्रण किया है, कि इस प्रेम में कहीं अश्लीलता दिखाई नहीं देती है। इस विषय पर विष्णु खरे ने कहा है-"प्रदर्शनवाद से बचते हुए इसमें उन्होंने ऐन्द्रिकता, मांसलता, रति और श्रृंगार को ऐसे चित्र दिए हैं जो बिना उत्तेजक हुए आत्मा को इस आदिम संबंध के सौन्दर्य से समृद्ध कर देते हैं और वे चस्पाँ किए हुए हैं, बल्कि नितांत स्वाभाविक है- उनके बिना यद उपन्यास अधूरा, अविश्वास, बंध्य होता, बल्कि आश्चर्य यह है कि उनकी कविता में यह शारीरिकता नहीं है। "(12)
वर्तमान समय में प्रेम का स्थान स्वार्थ और शारीरिक लोलुप्ता ने ले लिया है। प्रेम तो वह है, जहाँ एक-दूसरे के प्रति समर्पण का भाव हो, जहाँ 'मैं' का कोई अस्तित्व हीन हो जब तक 'मैं' से 'हम' तक कोई नहीं पहुँचता, तब तक प्रेम केवल मोह है, कुछ पाने का नाम और कुछ हासिल करने की जिद्द है। जहाँ पाने और खोने की बात हो वहाँ प्रेम नहीं व्यवसाय होता है और प्रेम व्यवसाय नहीं है। संवेदना करुणा, समर्पण, त्याग, बलिदान आदि प्रेम के अंग है, परन्तु आज इच्छा, सुख-सुविधा स्वच्छंता अपनी-अपनी 'स्पेस' की मांग आदि प्रेम संबंधों में में सरेआम दिखाई देता है-
"हवा का झोका जो आया था
वह भी था अनगिनत हवा के झोकों का
पहला झोंका कुछ देर।
अनगिन से निकलकर एक लहर भी
पहली, बस कुछ पला
अनगिन का अकेला
अनगिन से अकेले एक
संगिनी जीवन भर।" (13)
यह सर्वविदित है कि वैवाहिक जीवन में दाम्पत्य संबंध का बहुत ही खास महत्त्व है। भारतीय दाम्पत्य जीवन पर बात करे तो एक परिवार के बनने और बिखरने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली होती है, उस परिवार की स्त्री। स्त्री के बिना घर बस एक मकान है। स्त्री ही मकान को घर बनाती है, स्त्री ही अपने संयम और संतोष से परिवार के प्रेम के ठोस सूत्र में बाँधे रखती है। सारे रिश्तों को समेटे कुछ अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को भूल पति बच्चे और अपने परिवार के लिए जीने वाली महिमामयी स्त्रियों की गाथाओं से हमारा इतिहास अच्छादित है। एक लड़की जब अपना घर-परिवार छोड़ किसी अजनबी स्थान, अनजाने व्यक्ति, अनजाने घर-परिवार में पहुँचती है तो उसके लिए यह किसी अग्निपथ में चलने से कमतर नहीं होता। ससुराल में उसके उठने, बैठने, बोलने, चलने, हँसने आदि सब पर कड़ी दृष्टि रखी जाती है कि जैसे वह किसी अन्य लोक से आई हो। माँ बनने का सुख-दुनिया के सभी सुखों में उत्तम माना गया है, परन्तु इस सुख के साथ ही हरेक माँ के लिए यह एक ऐसी परीक्षा है, जिसकी इम्तेहा उसे मरने के पश्चात भी अपने दिये संस्कारों और परवरिश के रुप में देना पड़ता है। एक लड़की मायके से ससुराल तक का सफर घर, परिवार की जिम्मेदारी बच्चों के परवरिश, जीवन के हरेक सुख-दुख, समस्याएँ-उलझने, एक संसार से दूसरे संसार तक का सफर अपने पति के सहारे तय करती है। पति के सहयोग और प्रेम के बल पर ही स्त्रियाँ इस परिवार रुपी सागर को पार कर पाती है। नाव तथा पतवार जैसा अटूट संबंध होता है- पति और पत्नी में। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे होते हैं। दाम्पत्य जीवन में प्रेम का होना अनिवार्य नहीं, बल्कि बाध्यतामूलक है, परन्तु आज वैवाहिक संबंध में ही इसकी कमी दृष्टिगोचर हो रहे हैं। रघुवर प्रसाद तथा पत्नी सोनसी के माध्यम से लेखक ने इस अभाव को दूर करने की चेष्टा की है।
प्रेम-विवाह में जहाँ स्त्री-पुरुष एक-दूसरे का जानने-समझने और एक-दूसरे के करीब आने की उत्सुकता में थोड़ी कमी पाई जाती है, वही सामाजिक विवाह में यह अधिक से अधिक उत्सुकता और एक-दूसरे के प्रति एक अलग आकर्षण लिये रहता है। अपनी शादी के कुछ समय पश्चात ही रघुवर प्रसाद सोनसी को उसके मायके छोड़ शहर चले आते हैं और अपने महाविद्यालय के कार्य में जुट जाते हैं बारिश की फुहारों का इंतजार में मरुभूमि की भाँति रघुवर प्रसाद का मन सोनसी का इंतजार करने लगता है। यहाँ एक पति नहीं, बल्कि एक प्रेमी की भाँति रघुवर प्रसाद अपनी प्रेमिका के वियोग में समय काट रहे हैं। इस प्रकार दोनों पति-पत्नी के साथ ही प्रेमी और प्रेमिका की भाँति भी जीते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास 'खिलेगा तो देखेंगे' में भारतीय निम्नमध्यवर्गीय परिवार के सहज सादगीपूर्ण जीवन को दिखलाया गया है। यह उपन्यास मुख्य रुप से देहाती जीवन को चित्रित करता है। इस उपन्यास में आंचलिकता भी दृष्टिगत होती है। पिछड़े इलाके वहाँ रहने वाले लोगों का व्यवहार रहन-सहन रीति-रिवाज, संस्कृति आदि का बखूबी चित्रण किया गया है। इसमें समाज के एक विशाल निम्नमध्यवर्ग ने अपना वास्तविक आकार ग्रहण किया है। बड़े-बड़े राष्ट्रीय या वैयक्तिक उद्योगों की छाया में करोड़ो लोगों का ऐसा वर्ग है जो कहीं भी अपने को जुड़ा हुआ नहीं पाता। कोई भी शहर उसका अपना नहीं है, कोई संबंध उनका अपना नहीं है, उनकी जड़े न कहीं पीछे खेत-खलिहानों में हैं, न किसी संयुक्त परिवार में उनका एकमात्र साधन संस्कार, नैतिकता और उनके आपसी संबंधों को सुरक्षा नहीं देते। शिक्षा, स्वास्थ्य का आश्वासन और व्यापक असुरक्षा के जंगल में वह बहुत अकेला, अजनबी, अनसमझा, निर्वासित क्रांतिकारी शहीद सब कुछ है। इसके साथ ही जाल, फरेब, तिकड़म सब है, यहाँ जिसके शिकार आये दिन वहाँ के निम्न मध्यवर्गीय परिवार होते रहते हैं। विनोद कुमार शुक्ल का यह उपन्यास नये उपन्यास नये उपन्यास की भाँति यह परिकल्पना खंडित व्यक्तित्व का अतिक्रमण करके व्यक्ति को संपूर्ण स्थिति में देखती है, जिसमें वह समानता और सहानुभूति के स्वर पर पुनः अपना रिश्ता आसपास की फैली सृष्टि से जोड़ सके। "गाँव का इलाका जमाने से होता हुआ कोई दयनीय कार्यक्रम था। दुख और तकलीफ के कार्यक्रम भी यदि अच्छी तरह से प्रस्तुत होते तो तालियाँ तड़-तड़ बजतीं।"(14)
हमारा समाज खासकर दो वर्गों में बँटा है- गरीब और अमीर। इसी को शोषित और शोषक भी कहा जा सकता है। आज के इस त्रासद युग में गरीब दिनों दिन गरीब ही होता चल जाता है और अमीर, अमीर होता चला जाता है। इसलिए कहा भी जाता है कि एक भारत में दूसरा भी भारत बसता है। एक गरीबों का भारत और दूसरा अमीरों का भारत। भारत की आर्थिक विषमता आजादी के पश्चात और बढ़ ही गयी है। इस पर विचार करते हुए दलित कवि अदम गोंडवी जी लिखते हैं-
"सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नासाद है,
तो दिल पे हाथ रख के कह दो
क्या देश आजाद है।
कोठियों से मुल्क की मे आर को न आँकिये
असली हिन्दुस्तान तो फुट पाथ पर आबाद है,
सहमी-सहमी हर नजर, हर पाँव में जंजीर है
यही मेरे असली हिन्दुस्तान की तस्वीर है।"(15)
कार्ल मार्क्स ने देश और दुनिया के मनुष्य को दो ही कोटि में विभाजित किया- शोषक और शोषित। शोषक वर्ग वह है जो अपनी पूँजी के आधार पर गरीबों का शोषण करता है। इसके अंतर्गत उद्योगपति, जमींदार, राजा, सामंत अधिकारी आदि की गणना होता है। इसके विपरीत शोषित वर्ग वह है जो शोषण का शिकार होता है। इसके अंतर्गत गरीब, दलित कामगार, मजदूर, छोटे किसान, महिलाएँ आती हैं। इन गरीबों को सदैव रोटी, कपड़ा और मकान जैसे मूलभूत जरुरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में गरीबी और अमीरी का यथार्थपूर्ण चित्रण किया है। 'नौकर की कमीज' नामक उपन्यास में महावीर के चरित्र के माध्यम से उपन्यासकार ने गरीबी का यथार्थपूर्ण रेखांकित किया है। महावीर पूरे दिन धूप, शीत, बरसात में मूँगफली बेचने का काम करता है। इसी से वह अपनों और अपने परिवार का पेट पालता है। उसके लिए जीवन में गरीबी, शोषण, उत्पीड़न, आर्थिक विपन्नता, अपमान और अपनी उलझनों के बीच कड़वा अनुभव है। अपने अनुभवों के संघर्ष से वह जीवन की सामान्य बनाने की चेष्टा करता है। महावीर, कहता है- "सच में यह मेरा ट्रेडमार्क है। छुपाकर रखूँगा तो लोग पहचानेंगे कैसे? मैंने अपनी पहचान बहुत मजबूत बना ली है, यानी म्युनिसिपल स्कूल के बाहर नीम के पेड़ के नीचे, मूँगफली बेचने-वाला महावीर जिसके कंधे में रखौली है।"" आर्थिक अभाव के कारण समाज में प्रतिष्ठित होकर वह एक ईमानदार आदमी है। उसमें एक साधारण आदमी के विचार और आदर्श अंतर्निहित है। वयवसाय के प्रति अटूट आस्था है उनमें। वह स्वयं कहता है- "जितना पहले ईमानदार था, उतना अभी भी हूँ। उसी अंदाज में मूँगफली पूँजता हूँ, जिस अंदाज में पहले भूजता था।" (16)
महावीर अपनी अभावग्रस्त जिंदगी की सच्चाई को अभिव्यक्त करते हुए कहता है- "एक परात भर मूँगफली लेकर पाँच किलोमीटर पैदल चलना मुझसे नहीं होता। मैं लगातार घंटों खड़े-खड़े मूँगफली बेच सकता हूँ, चलते-चलते मूँगफली बेचने का रत्ती-भर भी अभ्यास नहीं है। फेरी लगाकर बेचना और भी मजदूरी है। रास्ता चलते हुए लोग रुककर खरीदते-खरीदते रह जाते हैं। घर में बैठे हुए लोगों को सचेत करने के लिए मैं चिल्ला नहीं सकता। चिल्लाते हुए किसी घर के सौ कदम दूर निकल आए तब सचेत हुआ कोई बच्चा या कोई औरत दरवाजा खोलकर वहीं से आवाज देगी। फिर लौटकर उनके पास जाओ। मोल-भाव होगा। ज्यादातार भाव उनको नहीं पटता, क्योंकि आम धारणा है कि फेरीवाले ज्यादा मुनाफा लेते हैं। इसलिए बिना कुछ बेचे एक गुजारी गई दूरी फिर से चलों। गुजारे लिए मजदूरी से मैं बचना चाहता हूँ।" (17) कस्बाई जीवन व्यतीत करने वाले आम आदमी की तरह आंतरिक पीड़ा है।
विनोद कुमार शुक्ल ने मध्यवर्गीय समाज में जिंदगी का दर्शन कुछ इस तरह परिभाषित किये हैं। समाज में आम आदमियों की पीड़ा, घुटन, छटपटाहट को अनदेखा करने वाले मनुष्य हीनता सिर्फ उच्च वर्ग की है। उच्च वर्ग अपने अहंकार, स्वार्थी प्रवृत्ति, दर्शनप्रियता आदि विशेषताओं से युक्त है। उच्चवर्ग के आदर्श के कारण निम्नमध्यवर्ग में असमानता बढ़ती जा रही है। वे निम्नवर्ग का शोषण बहुत ही सहजता से करते हैं, जिससे यह निम्नवर्ग के लोग अनजान रहते हैं।
'खिलेगा तो देखेंगे' में विनोद कुमार शुक्ल ने गुरुजी और उसके परिवार की गरीबी का चित्रण किया है। गुरुजी का एक लड़का है, जिसका नाम मुन्ना है। भूख मुन्ना की समस्या है, उसे जब भूख लगती है, तो वह बेचैन हो जाता है। पेट भर खाने के दो घंटे के बाद ही उसे फिर कुछ खाने की इच्छा होने लगती है, लेकिन गुरुजी उसे खाना देने में असमर्थ हो जाता है। भूख लगने पर मुन्ना भागते हुए घर आता है, उसे रोटी चाहिए। उसके लिए एक छोटी-सी टोकनी में रोटियाँ रखी जातीं। रोटियाँ कम होने से भी मुन्ना के हिस्से की रोटी को कोई नहीं खाता था। मुन्ना घर से बाहर जायें और दो-तीन घंटे के पश्चात भी अगर वह नहीं वापस आता तो घर के लोग यही समझते कि मुन्ना भूख लगने के कारण कमजोरी से गिर गया होगा। तब लोग हाथ में रोटी लिए उसे खोजने निकलते। गुरुजी और मुन्नी ही उसे ढूंढ़कर, रोटी खिलाकर अपने साथ लाया करते। मुन्ना की भूख को लेकर गुरुजी बेहद चिंतित रहा करते हैं, क्योंकि भूख की वजह से मुन्ना की जान भी जा सकती है। मुन्ना की सुरक्षा के लिए गुरुजी ने उसे पचास पैसे का एक सिक्का दिया, ताकि वह भी मुन्ना के लिए निश्चित रह सके। मुन्ना के आवागमन का दायरा भी दूर-दूर तक नहीं थी। अर्थात् मुन्ना घर से अधिक दूर कभी जाता ही नहीं था। वह इतना ही दूर जाता, ताकि भूख लगने पर घर लौट सके। उसे पहुँचने में देर होती तो भूख लगने के पहले पचास पैसे की भुजिया खा लेता था। घर से बाहर निकलते समय अम्मा भी मुन्ना से पूछती-"अठन्नी भूल तो नहीं गया।"(18)
आलोच्य उपन्यास में एक अध्याय मुन्ना को भूखा रहना सिखाने के लिए है। मुन्ना को अधिक भूख लगता है, तब भूख से बेहोश हो जाता है। यह उसकी एक बीमारी है और इस भूख की बीमारी को सहन करने का अभ्यास बनाना चाहते हैं मुन्ना के बाबा। उनका मानना है कि भूखा रहना मतलब अपने स्वाभिमान की रक्षा करना। इस पर लेखक श्री विनोद कुमार शुक्ल जी लिखते हैं- "माँ-बाप का बेटे को भूखा रहना सिखाना भी एक बड़ा कर्तव्य था।"(19) बड़ा कर्त्तव्य इस अर्थ में कि कल कहीं रोटी के लालच में वह भिखारी या किसी का गुलाम न बन जाय।
'नौकर की कमीज' नामक उपन्यास में संतू बाबू को गरीबी से लड़ते-भिड़ते दिखाया गया है। संतू बाबू का जीवन आर्थिक विपन्नता में गुजरता है। संतू बाबू का मन करता है कि घर में प्रत्येक दिन सब्जी बने, लेकिन जिस दिन सब्जी या कढ़ी बनती है, उस दिन दाल नहीं बनती। संतू बाबू इस बात से बेखबर है कि परिस्थिति के चलते वह मानसिक और आर्थिक शोषण का शिकार है। वह सब कुछ जानकर भी इस पूरी व्यवस्था का विरोध नहीं कर सकते। संतू बाबू कभी घोड़े पर नहीं बैठे, तथापि उनके विचारों से वह पुराना घुड़सवार है। कभी हवाई जहाज में बैठने की हैसियत नहीं थी फिर वह किताबों एवं फिल्मों द्वारा हवाई सफर का अनुभव हुआ। अखबार और विज्ञान देखकर संतू बाबू बहुत-सी चीजों से परिचित है। वह चाहते हैं कि उनकी पत्नी को भी सुख-सुविधाओं की जानकारी हो, तथापि संतू बाबू और उनकी पत्नी को चेहरे पर पाउडर लगाना पसंद नहीं, चूँकि यह सब फालतू का खर्च है। इस संदर्भ में संतू बाबू का कथन बेहद मार्मिक है- "मैं साधारण सस्ती कमीज पतलून पहनता था, पर अच्छे फैशन की मुझमें समझ थी। महिलाओं और गृहस्थी से संबंधित मासिक पत्रिका में पत्नी के लिए कभी-कभी ले आया करता था। इसके बाद भी एक स्वेटर का बनाना बहुत महंगा काम था। अखबार पत्नी के लिए आवश्यक समझता था। होटल में आधी कप चाय पीकर मैं अखबार पढ़ लिया करता था।" (20)
इस प्रकार विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में मुख्य रूप से समाज के गरीबी का यथार्थपूर्ण चित्रण किया है।
कथाकार विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में मुख्य रूप से समाज के निम्नमध्यवर्गीय समाज का चित्रण किया है, जो अक्सर रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्ष करता रहता है। बावजूद इनके उपन्यासों के कतिपय प्रसंगों में अमीरी का भी चित्रण मिलता है। 'खिलेगा तो देखेंगे' नामक उपन्यास में जिवराखन के बहाने अमीरी की बानगी प्रस्तुत की गई है। उपन्यास में जिवराखन नामक एक साहूकार है। गाँव में उनकी एक दुकान है। गाँव के सभी लोग उसकी दुकान से उधार का सामान लेते हैं। जिवराखन की उम्र लगभग तीस साल है। वह गुरुजी का विश्वस्त मित्र है। गुरुजी भी अपनी गृहस्थी का समान उसके दुकान से खरीदते हैं। गाँव के सभी लोग 'दाऊ' कहकर उसे पुकारते है। जिवराखन की पत्नी का नाम डेरहिन है। डेरहिन जबान और सुंदर है। उसका एक लड़का भी है। डेरहिन अपने गाँव के सभी लोगों के साथ सहज व्यवहार करती है, लेकिन गाँव में सुंदर स्त्री का किसी दूसरे के साथ बातचीत करना शक के नजरिये से देखा जाता है। यदि वह किसी की पत्नी है, तब और भी अधिक समस्या उत्पन्न हो जाती है। जिवराखन की मुख्य समस्या उसकी पत्नी डेरहिन की सुंदरता है। वह अपनी पत्नी पर शक करता है। डेरहिन अपने पति के साथ मानसिक तौर पर स्वतंत्र और सुखी नहीं है। वह गाँव की परंपरागत सोच से अलग और मुक्त होने की आकांक्षा करती है। वह स्वतंत्र प्रवृत्ति वाली स्त्री है। पति की संपत्ति की तरह नहीं रहना चाहती।
यहाँ समस्या यह नहीं है कि जिवराखन अपनी पत्नी से परेशान है। बल्कि वह इस मुद्दे को लेकर लोगों का आर्थिक और मानसिक शोषण करता है। उसे जिनके बारे में यह लगता है कि वह डेरहिन को पसंद करता है, तो वह उस आदमी को या तो उधारी सामान नहीं देता है और जब नगद भी दे तो सामान्य से अधिक कीमत बसूलता है। इस प्रकार जिवराखन अपनी पूँजी के आधार पर आम आदमी का भयानक शोषण करता है।
कुल मिलाकर विनोद कुमार शुक्ल जी के उपन्यासों में भारतीय समाज का यथार्थपूर्ण चित्रण किया गया है। लेखक ने उपन्यासों में न केवल तद्युगीन समाज का चित्रण किया है, वरण अतीत और भविष्य के समाज पर भी प्रकाश डाला है। शुक्ल जी का उपन्यास भारत का सामाजिक दस्तावेज है।
समाज चाहे कोई भी हो छोटा या बड़ा वह अनिवार्य रुप से राजनीति से संबंध रहता है। आज तो किसी भी प्रकार का कार्य हो, उस पर राजनीति पर प्रभाव दिखता ही है। यह कहावत आम हो गयी है कि समाज के विकास में राजनीतिक की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। तथापि वर्तमान समय में नेतागण राज और समाज का विकास करने के बजाय अपने निजी विकास में ही संलिप्त रहते हैं। वर्तमान समय में तो नेतागण राजनीति को अपनी बपौती समझते हैं। प्रत्येक नेता मृत्युपर्यंत स्वयं को राजनीति और सत्ता के काबिल समझते हैं। गौर से देखा जाय तो राजनीति किसी एक घराने या व्यक्ति की संपत्ति नहीं है। वह आम लोगों के द्वारा जनता के हित में चलाए जाने वाली नीति है। लोगों के हाथ में शक्ति और अधिकार रहे, इसलिए संविधान में यह प्रावधान किया गया है। "राज्य की किसी नागरिक के खिलाफ केवल धर्म जाति, लिंग मूल, वंश, जन्म स्थान अथवा इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं करता। "(21)
राजनीति से ही समाज का चहुँमुखी विकास संभव है। राजनीतिक मूल्यों का प्रभाव समाज में मानवीय आधार पर मूल्यों की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो राजनीति मूल्यों की अपेक्षा अन्य मूल्य अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है। इसीलिए इन मूल्यों की दिशा सही करने की जरूरत है, ताकि लोकतंत्र और समाजवाद सही रूप में स्थापित हो सके। समाज के सभी वर्गों को विकास का समान अवसर प्राप्त हो सके। आज के नेताओं का चरित्र निम्न कथन से स्पष्ट हो जाता है- "आज का सार्वजनिक नेता राष्ट्र सेवी के स्थान पर आत्मसेवी बनकर रह गया है।"(22)
वर्तमान समय में राजनीति की शुचिता अत्यंत धूमिल हो गई है और इस दूषित स्थिति को सुधारना अपरिहार्य है। इसके लिए समाज के लोगों में जागरुकता लाने की आवश्यकता है, और यह जागरुकता साहित्य के माध्यम से ही लाया जा सकता है।
साहित्य में वह सामर्थ्य है कि वह सत्ता को उलट सकता है। राजनीति में भूचाल ला सकता है। श्री विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य में यह सामर्थ्य परिलक्षित होता है। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में अंतर्निहित राजनीतिक यथार्थ का उद्घाटन निम्नलिखित संदर्भों में किया जा सकता है।
संविधान निर्माता डॉ० भीमराव अम्बेदर ने संविधान में देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किया है, जिसके तहत सभी व्यक्ति को राजनीति में समान अधिकार प्राप्त है। वर्तमान दौर की राजनीति इतनी चरित्रहीन हो गई है कि सत्ता प्राप्त करने के लिए लोग किसी भी हद तक जाने से परहेज नहीं करते।
विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास 'खिलेगा तो देखेंगे में कुछ संदर्भ राजनीतिक यथार्थ का उद्घाटन करता है। यूँ तो यह उपन्यास भारतीय निम्न मध्यवर्गीय परिवार के सहज आर सादगीपूर्ण जीवन को दिखाया है, तथापि इस बहाने राजनीति के भी कुछ प्रसंग आ रही गये हैं। इसमें समाज के एक विशाल निम्नमध्यवर्ग ने अपना वास्तविक आकार ग्रहण किया है। बड़े-बड़े राष्ट्रीय या वैयक्तिक उद्योगों की छाया में करोडों लोगों का ऐसा वर्ग है, जो कहीं भी अपने को जुड़ा हुआ नहीं पाते। कोई शहर उनका अपना नहीं है। कोई संबंध उनका अपना नहीं है, उनकी जड़े न कहीं पीछे खेत-खलिहानों में हैं, न किसी भी संयुक्त परिवार में उनका एकमात्र साधन नौकरी है और एकमात्र भय बेकारी। धर्म, संस्कार या राजनीति उसे सुरक्षा प्रदान नहीं करता। शिक्षा प्राप्त करने के बाद जब बेकारी की समस्या आती है, तब उसकी मजबूरी हो जाती है। नेताओं के चुनावी वादे में विश्वास कर लेना। हालाँकि अंततः उसे पछताना ही पड़ता है। इस उपन्यास में मुख्य पात्र है गुरुजी। गुरुजी हमेशा आर्थिक समस्या से जूझते रहते हैं। वह अपने परिवार के सदस्यों के लिए जीवन की मूलभूत आवश्यकता-रोटी, कपड़ा और मकान भी नहीं जुटा पाता है। आखिरकार गुरुजी जैसे श्रमशील व्यक्ति जब अपने परिवार की मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं कर पाते हैं तो प्रश्न उठता है, कि उनकी इस स्थिति में जिम्मेदार कौन हैं?
विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में जड़ होती प्रशासनिक व्यवस्था का भी यथार्थपूर्ण चित्रण किया है। उनका मानना है कि आजादी के बाद भी गाँव की व्यवस्था ऐसी जर्जर है कि थाने के भीतर का उजाला और हवा लॉकअप से बाहर नहीं निकल सकती। अपने छोटे-छोटे वाक्यों में विनोद कुमार शुक्ल उपन्यास में व्यक्त विडंबनाओं और त्रासदी को प्रकट करते हैं- "रात में गाँव के बाहर खुले मैदान की स्वतंत्रता में जितना अंधेरा होता उतना ही अंधेरा अंदर के लॉकअप में भी हो जाता था। यह आश्चर्य की बात लगती थी। लगता था कि आवश्यक न्याय के लिए लॉकअप के अंदर के अंधेरे और बाहर मैदान के अंधेरे में थोड़ा फर्क जरूर होना चाहिए।"(23) यह उक्ति भारतीय समाज में प्रशासन के आतंक के प्रति मार्मिक व्यंग्य है, जिसमें उनकी पीड़ा उभरकर आती है।
थाने में दो कमरे थे एक बड़ा लॉकअप और एक छोटा लॉकअप। गुरुजी थाने में रहने के लिए कोटवार से सलाह लेना चाहते हैं। गुरुजी कोटवार से कहते हैं- "कोटवार दो चार गाँव वालों के साथ में थाने में ठहरने जा रहा हूँ।"(24) कोटवार नामक पात्र गुरुजी को सरकारी आदमी समझकर थाने में रहने की अनुमति प्रदान करता है। गुरुजी भविष्य की चिंता करते हुए वह बड़गाँव जाकर वहाँ के थानेदार से थाने में रहने की अनुमति लेना चाहते हैं। थानेदार से अनुमति लेने के लिए वह अपनी पत्नी से निवेदन करते हैं- "बड़गाँव जाना होगा। यहाँ रहने की अनुमति ले लेंगे नहीं तो बात बिगड़ जाएगी। वो लोग समझेंगे हमने इस थाने पर कब्जा कर लिया है। अचानक रात को गारद लेकर घेर लेंगे। इतनी आसानी से हमारे कब्जे में थोड़ी रहने देंगे। या फिर यहाँ रहना कोई कानूनी अपराध होगा तो सचमुच जल चले जाऐंगे। जल अपने को अजीब नहीं लगेगा। जेल जाना हुआ तो कह देंगे इसी जेल में रहने दो।" (25)
वर्तमान दौर की राजनीति और राजनेता, मंत्री या बड़े-बड़े व्यापारी धनी लोग आदि के हाथों की कठपुतली बनते हुए दिखाई पड़ते हैं। मंत्रीगण समाज के संपन्न वर्गों को सदैव प्रसन्न रखने की चेष्टा करते हैं। ऐसे ही वर्गों को अधिक से अधिक लाभ पहुँचाने की योजनाएँ बनाते हैं। सरकारी कार्यालय निरंतर निजीकरण के शिकार हो रहे हैं, साथ में मौजूद। राजनीति में लगातार अपराधी प्रवृत्ति वाले लोगों का प्रवेश होता जा रहा है। जो जितना बड़ा अपराधी होता है, जिसके नाम पर जितना अधिक हत्या, बलात्कार और डकैती का मामला दर्ज होता है, वह उतना ही बड़ा नेता बन जाता है। इस प्रकार अपराध और राजनीति का साँठ-गाँठ होना कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है।
न्याय को अपने हिसाब से तय करने अथवा व्याख्यायित करने का सामर्थ्य केवल नेताओं में होता है। 'नौकर की कमीज' नामक उपन्यास में एम० पी साहब के सामने निरीह दारोगा को दिखाया गया है। वह उनके सामने अपराधियों की भाँति प्रस्तुत होता है। उसका अपराध बस इतना ही है कि उसने एम० पी० के एक रिश्तेदार जोकि अपराधी था, उसे हवालात में बंदकर दिया था। लेखक का कथन देखिये- "आज एम० पी० साहब आये थे। अपने साथ एक थानेदार को लाये थे। माफी मंगवाने के लिए। साले ने परसों चौधरी साहब के आदमी को बंदकर दिया था।"(26)
आज और हमेशा ऐसी राजनीति के प्रमुख आधार स्तंभ माने जाने वाले युवा नेता और छात्र या दोनों राजनीति में अपनी भूमिका अत्यंत सक्रिय और प्रभावात्मक रूप से निभाते हैं। मंत्री तथा राजनेता इनकी वास्तविक स्थिति को भली-भाँति जानते हैं और इस शक्ति का उपयोग वह राजनेता अपने स्वार्थ के लिए किया करते हैं, या आज भी वह इस शक्ति का उपयोग अपनी राजनैतिक लाभ के लिए करता है।
सन् 1960 ई० आसपास भारतीय राजनैतिक के इतिहास में नया मोड़ लेकर आया था। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का सोवियत रूप में ताशकंद समझौता पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद हृदय की गति रुक जाने से निर्धन हो गया था। इंदिरा गांधी ने प्रधान मंत्री की गद्दी पर बैठकर पुनः देश के शासन में नेहरु परिवार का वर्चस्व कायम कर लिया था। विरोधी दल हैरत में थे। देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव जीतने में अपराधकर्मियों के सहयोग का महत्त्व समझ चुकी थी। अब वे सत्ता हथियाने में अप्रयुक्त छात्र-शक्ति का उपयोग करने लगी थी।
राजनेताओं ने हृदय के टुकड़े भारत के भविष्य सशक्त समाज के सशक्त हाथ जैसी संज्ञाओं से छात्रों को राजनीति में आने के लिए लुभाना शुरु कर दिया था। इसका सर्वाधिक घातक प्रभाव देश के शैक्षिक वातावरण पर पड़ा। छात्रों में अनुशासन हीनता उत्पन्न हुई और अनुशासनहीनता अपराध में तब्दील होने लगी।
वर्तमान समय में राजनीतिक पार्टियों का अपना कोई जीवन दर्शन नहीं होता। उसका एक मात्र उद्देश्य होता है सत्ता की प्राप्ति के लिए तमाम नैतिकता को ताख पर रखकर साम-दाम-दंड-भेद से सत्ता को हस्तगत करना। यही कारण है कि प्रजातंत्र बनाम लोकतंत्र प्रच्छन्न राजतंत्र में तब्दील होता जा रहा है। विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में बखूबी इस राजनीतिक दुर्दशा को रेखांकित करता है, जहाँ उनके आधुनिकता बोध का परिचय मिलता है।
संदर्भ ग्रंथ-सूची :-
(1) हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली - डाॅ. अमरनाथ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012 ई, पृष्ठ- 59
(2) वही, पृष्ठ- 59
(3) आधुनिकता बोध और आधुनिकीकरण- रमेश कुंतल मेघ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001 ई., पृष्ठ- 137
(4) वही, पृष्ठ- 138
(5) साहित्य और आधुनिक युग-बोध- देवेन्द्र इस्सर, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2005 ई, पृष्ठ- 186
(6) हिन्दी आलोचना के बीज शब्द- डाॅ. बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996 ई., पृष्ठ-31
(7) इतिहासबोध- संपादक- लालबहादुर वर्मा, इलाहाबाद, अप्रैल- जून, 2003 ई., पृष्ठ- 11-12
(8) यथार्थवाद- शिवकुमार मिश्र, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009 ई., पृष्ठ- 57
(9) वही, पृ० 89-90
(10) विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में युवा-वर्ग- डॉ० सन्मुख नागनाथ मुच्छटे, अमन प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण-2016, पृ० 47
(11) वही, पृ० 48
(12) दीवार में एक खिड़की रहती थी- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2004, फलैप पर
(13) वही, पृ० 16
(14) खिलेगा तो देखेंगे'- विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, प्रथम संस्करण- 2003, पृ० 11
(15) 'नौकर की कमीज' विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 1994 ई०, पृ० 157
(16) वही, पृ० 162
(17) वही, पृ० 156
(18) खिलेगा तो देखेंगे'- विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, प्रथम संस्करण - 2003 ई०, पृ० 42
(19) वही, पृ० 182
(20) 'नौकर की कमीज'- विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 1994 ई०, पृ० 15
(21) 'देवकी नंदन खत्री'- प्रो० सुस्मिता सेन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण - 1996 ई०, पृ० 110
(22) वही, पृ० 113
(23) 'खिलेगा तो देखेंगे'- विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा-2003, पृ० 13
(24) वही, पृ० 16
(25) वही, पृ० 32
(26) 'नौकर की कमीज'- विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली प्रथम सं०-1994, पृ० 82
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