समकालीन उपन्यास लेखिकाओं में चन्द्रकांता का महत्त्व

प्रथम अध्याय  :

समकालीन उपन्यास लेखिकाओं में चन्द्रकांता का महत्त्व 

            'समकालीन' शब्द केवल समय वाचक नहीं है। यह ठीक है कि वर्तमान समय में होनेवाली घटनाएँ तथा स्थितियाँ समकालीन कही जाती हैं, जैसा कि शब्दकोश में दिया गया इस शब्द का अर्थ है- "समसामयिक' अर्थात एक ही समय में रहने या होने वाले।"(1) परंतु समकालीनता समकालीन से भिन्न है। समकालीनता वस्तुतः एक दृष्टि है, जिसके माध्यम से सतह के भीतर के सच को समझा अथवा परखा जा सकता है। डॉ० नरेंद्र मोहन इस संदर्भ में समकालीनता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण परिभाषा देते है- "समकालीनता का अर्थ किसी कालखंड या दौर में व्याप्त स्थितियों और समस्याओं का चित्रण, निरूपण या बयान भर नहीं है, अपितु उन्हें ऐतिहासिक अर्थ में समझना, उनके मूल स्रोत, समस्याओं के चित्रण, निरूपण और बयान से कहानी तात्कालिक बन सकती है, आधुनिक और समकालीन नहीं, समकालीनता तात्कालिकता नहीं है।''(2)

            डॉ० नरेंद मोहन द्वारा दी जानेवाली समकालीनता की परिभाषा समकालीनता को एक दृष्टि के रूप में व्याख्यायित करती है। यदि महिला- लेखन को इस दृष्टि के संदर्भ में परखने का प्रयत्न किया जाए तो एक बात स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है कि वर्तमान महिला कथा- लेखन भी अपने आस-पास के परिवेश के प्रति जागरूक होता हुआ लेखन है। वह न केवल वर्तमान परिस्थितियाँ, समस्याओं तथा परिवेश के महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को उसकी ऐतिहासिकता में परखने का प्रयत्न कर रहा है, अपितु बदलते परिदृश्य में स्वयं को व्यवस्थित करके इस बदलाव के भीतर उपस्थित जटिलता की पड़ताल करने की दशा की ओर भी अग्रसर है। अपने समय के यथार्थ का दस्तावेज प्रस्तुत करने की शुरुआत प्रेमचंद के रचनाओं द्वारा ही हो चुकी थी,  परंतु यथार्थपरक दृष्टि रखते हुए भी कहानी तथा उपन्यासों में संवेदनात्मक दृष्टि से भी झकझोरने का पूरा सामर्थ्य अज्ञेय और जैनेंद्र तक आते-आते कथात्मक साहित्य में व्यक्ति और समाज- संबंधी बौद्धिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक उधेड-बुन भी स्थान पाने लगती है। समकालीन महिला कथा लेखन भी इन बौद्धिक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रकट करने की दिशा की ओर अग्रसर है, अपितु घटनाओं के मोटे-मोटे ब्योंरो से बाहर अधिक सूक्ष्म तथा सामंतवाद को चुनौती देता है। डॉ० नरेंद्र मोहन के अनुसार भी, "सातवें दशक की कथा-पीढी ने केवल उन तमाम मूल्यों को चुनौती दी,  जिनके प्रति पूर्व दशक की पीढी ललक से भरी हुई थी और इस हद तक भावुक और रोमानी थी।"(3)

             मन्नू भंडारी की कहानी 'यही सच है', जिसे नामवर सिंह एक महत्त्वपूर्ण कहानी के रूप में देखते हैं, उसमें प्रेम को लेकर भावुक तथा प्लेटानिक वाले भाव को तोड़कर यथार्थ से जोड़न का प्रयत्न है। वस्तुतः यह प्राचीन मूल्यों व नैतिकता को नए संदर्भों के ठोस धरातल पर परखने का आग्रह भी है। यही अनुभव की प्रामाणिकता का बल भी स्पष्ट होता है, जो कथाकार को यह समझ देता है कि प्रत्येक अनुभव अपने ही समाज, समय और परिवेश की उपज होता है, उसे कहीं बाहर से लाकर थोपा नहीं जा सकता। यह सत्य है कि अनुभव की इसी आत्मीयता और प्रामाणिकता पर बल ने कुछ सीमा तक समकालीन महिला कथाकार के क्षेत्र को सीमित कर दिया, परंतु यह भी सच है कि उन्होंने व्यक्तिगत अनुभव को बृहत्तर सामाजिक अर्थों से जोड़ने का  प्रयत्न भी किया।

            समकालीन महिला- लेखन के संदर्भ में समसामयिक परिस्थितियों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि 1965 ई. के पश्चात बदली परिस्थितियों का प्रभाव कहानी तथा उपन्यास पर पड़ रहा था। स्वतंत्र भारत का क्रूर यथार्थ सबके समक्ष उभरकर आ चुका था। उनकी नई दृष्टि मोहभंग के बाद की निराशा व तिलमिलाहट से उदित हुई। इसी मोहभंग के एक आयाम का वर्णन मन्नू भंडारी की कहानी 'बंद दाजों का साथ' की मंजरी कहती है- "इस युग में आशा करना ही मूर्खता है, क्योंकि आज जिंदगी का हर पहलू, हर स्थिति और हर संबंध एक समाधानहीन समस्या होकर ही आता है, जिसे सुलझाया नहीं जा सकता, केवल भोगा जा सकता है, जिसमें आदमी निरंतर बिखरता और टूटता चलता है।"(4) अतएव, समकालीन कहानी कहीं न कहीं अस्तित्ववाद से उभरकर आई। छठे दशक की समाप्ति और सातवें दशक का आरंभ होते-होते वह अस्तित्ववादी संवेदना और गहरी होती गई। 1960 और 1980 के बीच में विभिन्न कहानी आंदोलन चले,  जिनमें अकहानी, सहज कहानी, सचेतन कहानी, समांतर कहानी, सक्रिय कहानी, जनवादी कहानी आदि सम्मिलित हैं।

              हिंदी कथा लेखन का समकालीन परिदृश्य ऐसा परिदृश्य है, जिसमें किसी मुद्दे को महत्व देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। प्रश्न चाहें दलितों की मुक्ति का हो, नारी चेतना के विकास का हो अथवा कथा में कला और विचारधारा के समायोजन का। कथाकार निरपेक्ष होने की स्थिति में नहीं है। दूसरे युवा कथाकारों द्वारा कथा-दृष्टि के अभाव में अमूर्तता और कलावाद को भी कहानी में प्रश्रय मिला है, परंतु यह भी देखा जा सकता है कि यहाँ कलावादी वस्तुपरकता से असंपृक्त रहकर जटिलता को कथा-लेखन का स्वीकृत मूल्य बनाने के प्रयास में लगे हैं, वही दूसरी कोटि के कथाकार वस्तु के साथ-साथ कला को भी साधने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। समकालीन कथा लेखन न केवल अपने, अपितु साहित्य के अस्तित्व की लड़ाई लड़ा  रहा है। समकालीन हिंदी महिला कथा जीवन में कला और विचारधारा के द्वंद्व का स्वरूप भी और अधिक जटिल हुआ है। बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ही समकालीन हिंदी कहानी, उपन्यास में परिवर्तन हुआ है। आज का परिवेश बहुत जटिल तथा तेजी से परिवर्तित हुआ है। इस बदलते परिवेश का महिला- लेखन पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ा है।

            समकालीन हिंदी साहित्य समसामयिक भारतीय समाज की ही उपज है, जिसकी पृष्ठभूमि में स्वातंत्र्योत्तर बदलते जीवन मूल्य, वैयक्तिक अस्मिता का महत्व तथा बदलती सामाजिक तथा आर्थिक संरचना है। हिंदी कथा साहित्य भी इन सब परिवर्तनों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। हिंदी कथा साहित्य का यह युग न केवल व्यक्ति की अस्मिता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों से साक्षात्कार करता है, अपितु आधुनिक जीवन की विडंबनाओं तथा कठिनाइयों से भी जूझता दिखाई देता है। यही वह समय है, जब नारी की स्वयं की सोच और उसके प्रति समाज के दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण परिवर्तन जैसी प्रक्रियाएँ घटित होने लगती हैं। इन सबका सीधा प्रभाव स्त्री के मानसिक व अनुभव जगत पर भी पड़ता है। जिसकी अभिव्यक्ति समकालीन कथा साहित्य में नारी- लेखन में भी स्पष्ट दिखलाई देने लगती है। आरंभ में महिला लेखन यद्यपि केवल स्त्री-पुरुष संबंधों, दाम्पत्य जीवन के तनावों तथा जटिलताओं साथ भी जोड़ता है। परंतु धीरे-धीरे यह इन सब प्रश्नों को स्वातंत्र्योत्तर महिला लेखन में मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा, शिवानी, विजय चौहान, रजनी पन्निकर को नई कहानी आंदोलन के दौरान महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो चुका था। तथापि इनमें से कई का सशक्त लेखन बाद में भी होता रहा। वास्तव में इन लेखिकाओं के उपन्यास जगत में हरित क्रांति, आधुनिक जीवन का सारा बौद्धिक तनाव मूल सत्यों के साथ उजागर हुआ है। समकालीन यथार्थ से रू-ब-रू हो रही विचारोत्तेजक और प्रयोगधर्मी रचनाएँ महिला कथाकारों की महत्वपूर्ण देन है। "इलेक्ट्रानिक मीडिया के इस युग में टी. वी. सीरीयल्स की चुनौती का सामना करते हुए भी महिला उपन्यासकारों के उपन्यास अपनी अद्वितीय पठनीयता के कारण पाठकीय संचेतना को चुंबकीय शक्ति-सा आकर्षित कर रहे हैं।तर्क और तथ्य के आधार पर यह साहित्य पुरूष और स्त्री के समान प्रतिभागिता के लिए है।"(5) समकालीन महिला लेखिकाओं ने आधुनिक नारी की बदलती मनःस्थिति, दाम्पत्य संबंध, कामजन्य प्रेम, नारी मनोविज्ञान की यथार्थ पकड़ के द्वारा नारी के लिए मुक्ति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का श्रेय इन्हीं को प्राप्त है। दाम्पत्य और प्रेम की बारीकियों को सूक्ष्मता से अभिव्यजित करने का श्रेय समकालीन महिला कथा- लेखन को ही है। विभिन्न सामाजिक दबावों में भी नारी जिन अनुभूतियों को अभिव्यक्ति नहीं दे पायी, उन्हें उपन्यासों में अभिव्यक्ति मिली है। समकालीन का अर्थ स्पष्ट होने के बाद यहां समकालीन उपन्यास लेखिकाओं का परिचय अपेक्षित है। तत्पश्चात उन लेखिकाओं में चन्द्रकांता का महत्त्व निर्धारण संभव होगा। 

(1) कृष्णा सोबती :

            समकालीन उपन्यास लेखन में कृष्णा सोबती का नाम सबसे महत्त्वपूर्ण है। इनके अब तक कुल छह उपन्यास- 'सूरजमुखी अँधेरे के' (1972 ई०), 'जिन्दगी-नामा' (1979 ई०), 'दिलो-दानिश' (1993 ई०), 'समय सरगम' (2000 ई०), 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान' (2017 ई०) तथा 'चन्ना' (2019 ई०) विशेष प्रसिद्ध हैं। 'सूरजमुखी अँधेरे के' नामक उपन्यास में नारी- जीवन की एक मनोवैज्ञानिक समस्या को उभारा गया है। 'रत्ती' बचपन में बलात्कार का शिकार होती है। इसका मनोवैज्ञानिक असर होता है। वह असहिष्णु, क्रूर और फ्रिजिड हो जाती है। अन्त में वह दिवाकर के संपर्क में आती है और उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उसे पूर्ण समर्पण कर देती है। इस प्रकार उसे काम-विकृति से मुक्ति मिल जाती है। इस लघु उपन्यास की रचना में कृष्णा सोबती ने परम्परा से हटकर एक साहसिक कदम उठाया है। 'जिन्दगीनामा' एक बड़ा उपन्यास है। इसमें पंजाब की विगत शती की जिन्दगी का पूरा ब्योरा प्रस्तुत किया गया है। डॉ० देवराज उपाध्याय के शब्दों में- "यदि किसी को पंजाब प्रदेश की संस्कृति, रहन-सहन, चाल-ढाल, रीति-रिवाज की जानकारी प्राप्त करनी हो, इतिहास की बात जाननी हो, वहाँ की दन्तकथाओं, प्रचलित लोकोक्तियों तथा 18 वीं, 19 वीं शताब्दी की प्रवृत्तियों से अवगत होने की इच्छा हो, तो 'जिन्दगीनामा' से अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं।"(6) इस उपन्यास की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें सब कुछ बेतरतीब और अनियंत्रित है। कथा-विन्यास में कसावट का नितान्त अभाव है। इसकी भाषा में पंजाबीपन इतना अधिक है कि कहीं-कहीं हिन्दी का सामान्य पाठक विचलित हो जाता है। पूरा उपन्यास, हिन्दी-उपन्यास के वर्तमान ढाँचे के लिए चुनौती बनकर उपस्थित हुआ है। दिलो-दानिश की कहानी तो कुल इतनी ही है कि दिल्ली के कायस्थ परिवार के खानदानी रईस हवेली चारबुर्जी के मालिक कुटुंब प्यारी के पति तीन बच्चों के बाप वकील कृपानारायण नसीम बानो (कलावंत डेरेवाली) का मुकदमा लड़ते-लड़ते उसकी बेटी महकबानो के हुस्न पर फिदा होकर उसे अपनी 'जानम' बना लेते हैं। नसीम-बानो का रेहन पड़ा फराशखाने का मकान छुड़ाकर महकबानो की रिहाइश का इंतजाम कर देते हैं और उसके खान खर्च का भार भी उठा लेते हैं। समय गुजरने के साथ महकबानो बेटे बदरुद्दीन और बेटी मासूमा को जन्म देती है। वकील साहब घर की मालकिन कुटुंब प्यारी के प्रति अपना फर्ज और दिल की मलिका महकबानों की मुहब्बत की कीमत चुकाते हुए जिन्दगी को साधकर चलने की कोशिश करते हैं, किन्तु जिन्दगी सध नहीं पाती। पत्नी कुटुंब प्यारी उन्हें हर तरह से अपना बनाकर रखना चाहती हैं। वकील साहब का महकबानो के यहाँ जाना कम हो जाता है। एक दिन वकील साहब महकबानो को खबर देते हैं कि उनकी विधवा बहन छुन्नो की ससुराल से 'मासूमा' के ब्याह का पैगाम आया है, लेकिन उनकी शर्त यह है कि हम रस्मी तौर पर मासूमा को गोद ले लें, ताकि शादी के बाद हमारा घर ही उसका पीहर माना जाय। महकबानो को यह प्रस्ताव खल जाता है। उसे लगता है कि वकील साहब खानदानी जामा पहनाने के लिए बच्चों को उससे छीने ले रहे हैं। दोनों के बीच गहरी दरार पड़ जाती है। क्षण भर में ही वह उनकी 'जानम' न रहकर उनके मुवक्किल की बेटी बन जाती है। वह तनकर खड़ी हो जाती है और तल्ख आवाज में कहती है- "हमारी माँ के जेवर हमें आज शाम तक मिल जाने चाहिए वकील साहिब।" वकील कृपानारायण घर आते हैं, जेवरात की संदूकची लेते हैं और लौटकर, महकबानो की मौजूदगी में, दोस्ताना अंदाज में खाँ साहब (महकबानो के वकील) को सौंप देते हैं। मासूमा की शादी के दिन, जिस महकबानो को शादी में शरीक होने की मुमानियत थी, वही महकबानो ऐन वक्त पर पूरी सजधज के साथ, अपने वकील खाँ साहब के साथ सलमे सितारे जड़े कई थालपोश, फूलो के जेवर, गोटे के हार, जोड़े-गहने लेकर आती है, मासूमा को सौंपती है, माँ की हैसियत से उसे ससुराल में कायदे से निभाने की सीख देती है और वकील साहब से इजाजत लेकर वापिस लौट जाती है। वकील साहब को लगता है कि महकबानो ने जमाने के सामने उन्हें पछाड़ दिया है। वकील साहब के जीवन का अंतिम दृश्य! वे बीमार हैं! पूरा कुनबा उनके पास इकट्ठा है। महकबानो खाँ साहब के साथ उन्हें देखने आती है। वकील साहब गुजरी हुई मुस्कुराहट से उसकी ओर देखते हैं। लौटते समय महकबानो की आँखों में आँसू हैं। इन आँसुओं में ही उपन्यास का सच छिपा है। उपन्यास उन्नीसवीं शताब्दी की दिल्ली के रईसों के जीवन का रचनात्मक प्रतिबिम्ब ही नहीं है, यह भारतीय नारी की व्यथा-कथा भी है, जो इतिहास के हर दौर में छली और ठगी गई है, चाहे वह घर की मालकिन रही हो, चाहे दिल की मलिका। समय सरगम की कथा के केन्द्र में ईशान और अरण्या दो सयाने (बूढ़े) पात्र हैं। दोनों एक ही फ्लैट के दो ब्लाकों में रहते हैं। अरण्या, लेखिका है, अविवाहित है। ईशान विधुर हैं। अवकाशप्राप्त अधिकारी हैं। अरण्या जीवन को भरपूर जीने में विश्वास करती है। ईशान आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। दोनों अकेलेपन का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। दोनों क्रमशः एक-दूसरे के निकट आते हैं और साथ रहते हुए एक दूसरे के अकेलेपन को बाँटने लगते हैं। पूरा उपन्यास जीवन को जीने, पहचानने और स्वीकारने की कहानी है। लेखिका के शब्दों को उधार लें तो- "उदात्त, अनुदात्त और त्वरित। इस जीवन की अनेकों-अनेक स्वर संज्ञाएँ, स्वरावलियाँ और श्रुतियाँ और हर एक के आलाप में से बहते भक्ति-भाव, राग-विराग, प्रेम-अनुराग, पीड़ा-दर्द, स्मृति-विस्मृति, तृप्ति-तन्मयता, उल्लास, दुःख-सुख, शोक-विषाद, आनन्द आहलाद। संचित जीवन का यही राग।"(7) इस राग को बनाए रखना जीवन का धर्म है। इस जीवन को धारण करने वाली धरती को मनुष्य ही बचा सकता है। अपने प्रत्येक उपन्यास में रचना की एक नई भूमि लेकर उपस्थित होने वाली कृष्णा सोबती निश्चय ही आज के हिन्दी कथा-संसार की अन्यतम विभूति हैं।


(2) शिवानी :

              शिवानी ने संख्या की दृष्टि से सबसे अधिक उपन्यास लिखे हैं। उनके उपन्यासों में 'चौदह फेरे' (1965 ई०), 'कृष्णकली' (1968 ई०), 'भैरवी' (1969 ई०), 'विषकन्या' (1970 ई०), 'करिए छिमा' (1971 ई०), 'श्मशान चंपा' (1972 ई०), 'स्वयंसिद्ध', 'रतिविलाप' (1972 ई०), 'माणिक' (1977 ई०), 'रथ्या' (1977 ई०), 'किशुनलीं' (1979 ई०), 'विवर्त' (1984 ई०) आदि विशेष लोकप्रिय हुए हैं। शिवानी मनोरंजक कथा गढ़ने में सिद्धहस्त हैं। उनके उपन्यासों में रहस्य, रोमांच, भावुकता, स्वच्छन्द कल्पना और मनोरंजन का पुट उन्हें पठनीय बनाता है। शिवानी पर शरत् का विशेष प्रभाव है किन्तु उनकी सहजता का अभाव है। शरत् के नारी पात्र अपनी पीड़ा में अपराजेय हैं। शिवानी के नारी पात्र विद्रोह भी करते हैं और परिस्थितियों से ऊपर उठने की कोशिश भी, किन्तु अपने चारित्रिक संघटन में अविश्वसनीय प्रतीत होते हैं। शिवानी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे अपने उपन्यासों में आधुनिक जीवन के खुरदुरे, जटिल और चुनौती भरे यथार्थ को महत्त्व नहीं देतीं। इसलिए लोकप्रियता के बावजूद प्रथम श्रेणी की लेखिकाओं में उन्हें स्थान नहीं मिल सका।

 (3) मन्नू भंडारी :

          मन्नू भंडारी ने अपने दो उपन्यासों- 'आपका बंटी' (1971 ई०), 'महाभोज' (1979 ई०) के बल पर अक्षय ख्याति अर्जित की है। आपका बंटी अपने ढंग का अकेला उपन्यास है। 'बंटी', 'शकुन' (माता) 'अजय' (पिता) की संतान है। शकुन और अजय दाम्पत्य-जीवन के तनाव के कारण सम्बन्ध- विच्छेद कर लेते हैं। 'अजय', 'मीरा' के साथ रहने लगता है। शकुन, एक डॉक्टर साहब से जुड़ जाती है। 'बंटी' को शकुन अपने साथ ले आती है। पति-पत्नी तो अपनी जिन्दगी के बिरवे को नये सिरे से रोप लेते हैं, लेकिन 'बंटी'? वह कभी भी डॉक्टर को अपना 'पापा' नहीं समझ पाता। वह निरन्तर उपेक्षित अनुभव करता है। उसकी समस्या बेहद जटिल है। वह चिड़-चिड़ा और जिद्दी हो जाता है। मुक्ति के लिए अपने पापा के पास कलकत्ता आता है, किन्तु यहाँ भी वह अपने को अजनबी पाता है। 'मीरा' को वह अपनी ममी नहीं मान पाता। आज के मध्यवर्गीय समाज में तलाक की समस्या ने अनेक आनुषंगिक समस्याएँ उत्पन्न की हैं। इनमें सबसे जटिल समस्या तलाकशुदा दम्पतियों के बच्चों की है। मन्नू भण्डारी ने 'बंटी' के मनोविज्ञान का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है। कुछ आलोचकों को 'बंटी' की मनोवैज्ञानिकता का अंकन बहुत कुछ किताबी प्रतीत हुआ है। हो सकता है, बंटी की मानसिकता का सूक्ष्म विश्लेषण विश्वसनीयता का अतिक्रमण कर गया हो, किन्तु उसकी समस्या, उसका दर्द, उसका अकेलापन, उसका बिखराव क्या हमें झकझोर नहीं देते ? महाभोज एक राजनीतिक उपन्यास माना गया है। इसका परिवेश वैयक्तिक या पारिवारिक न होकर सामाजिक है। 'बिसेसर' नामक एक पिछड़ी जाति के युवक की हत्या हो जाती है। इस 'हत्या' का राजनीतिक लाभ पदासीन मुख्यमंत्री 'दा साहब' और पदच्युत मुख्यमंत्री 'सुकुल बाबू' दोनों उठाना चाहते हैं। हत्या 'दा साहब' के समर्थक और सहयोगी जमींदार 'जोरावर' ने करायी है। इसलिए वे इस मामले को ठंढा करना चाहते हैं। इसके विपरीत सुकुल बाबू इसे उभाड़कर जनता की सहानुभूति प्राप्त करना चाहते हैं। दोनों अपनी-अपनी गोटी फिट करने में लगे हैं। सामान्य जनता के प्रति सच्ची सहानुभूति किसी में नहीं है। लेखिका ने वर्तमान व्यवस्था की खामियों को खुलकर उजागर किया है। 'उपन्यास' में ग्रामीण परिवेश के चित्रण और वहाँ घटित होती हुई परिवर्तन की प्रक्रियाओं के विश्लेषण में खामी हो सकती है, किन्तु व्यवस्था पोषक राजनीति और उसके चलते होने वाले सामाजिक उत्पीड़न को बेनकाब करने में लेखिका ने साहस का परिचय दिया है। 'महाभोज' इस तथ्य का साक्षी है कि अब महिला लेखिकाएँ घर की चहारदीवारी के भीतर उभरी दबी पारिवारिक समस्याओं तक सीमित न रहकर समाज के व्यापक संदर्भों से जुड़कर जनहित में उत्कृष्ट सृजन कर रही हैं।


(4) उषा प्रियंवदा :

           उषा प्रियंवदा के सात उपन्यास- 'पचपन खंभे लाल दीवारें' (1961 ई०), 'रुकोगी नहीं राधिका' (1967 ई०), 'शेषयात्रा' (1984 ई०), 'अन्तर्वशी' (2000 ई०), 'भय कबीर उदास' (2007 ई०), 'नदी' (2013 ई०), 'अल्पविराम' (2020 ई०), - प्रकाशित हैं। आपके उपन्यासों में 'नयी कविता' के दौर की आधुनिकता के सारे तत्त्व- अकेलापन, संत्रास, ऊब, घुटन, अजनबीपन - विद्यमान हैं। अपने पहले उपन्यास 'पचपन खंभे लाल दीवारें' में आपने 'सुषमा' नामक एक मध्यवर्गीय नारी को केन्द्र में रखकर आधुनिक नारी की मानसिक यंत्रणा का सजीव अंकन किया था। 'रुकोगी नहीं राधिका' में इस संत्रास को दूसरे संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। 'राधिका' अपना स्वतंत्र विकास करना चाहती है। वह अपने भारतीय संस्कारों वाले 'पापा' की अवहेलना करके "डैन" से विवाह करके अमेरिका जाना चाहती है। डैन उसे अस्वीकार कर देता है। उसके बाद वह 'अक्षय' और मनीष' के बीच अनिश्चय की स्थिति में भटकती है। 'अक्षय' उसके लिए अधिक उपयुक्त है, किन्तु वह अपने पिता को 'शॉक' देने के लिए 'मनीष' को चुन लेती है। इस प्रकार वह निरन्तर असुरक्षा की स्थिति में रहती है। 'शेष यात्रा' में 'अनु', 'प्रणव' से ब्याह करके अमेरिका चली जाती है। वहाँ उसे शीघ्र ही अहसास हो जाता है कि 'प्रणव' के लिए उसका महत्त्व उपभोग-सामग्री से अधिक नहीं है। ब्याह के बाद साढ़े चार वर्षों के भीतर ही तलाक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। दोनों अलग हो जाते हैं। दस साल बाद 'प्रणव' की भेंट 'अनु' से होती है। अब उसने 'दिव्या' के भाई 'दीपंकर चौधरी' से शादी कर ली है और एक अस्पताल के कैन्सर रिसर्च सेक्शन में जूनियर रिसर्च पैथोलाजिस्ट हो गयी है। 'प्रणव' इसी अस्पताल में 'चेकअप' के लिए आता है। वह हार्ट का मरीज है और 'नमिता' नामक एक विधवा के साथ रहता है। दोनों एक दूसरे को देखते हैं और कतराकर चले जाते हैं। इस उपन्यास में भी आधुनिक नारी की समस्या को ही केन्द्र में रखा गया है, किन्तु यहाँ वह असहाय और असुरक्षित नहीं है। स्वावलम्बन, आत्मगौरव, सम्मान और स्वातंत्र्यभाव के बल पर निखरकर, वह नये जीवन-यथार्थ में नये विश्वास से प्रतिष्ठित हो चुकी है। 'अंतर्वशी' (2000 ई०) को अमेरिका में प्रवास करने वाले भारतीय परिवारों की जीवन-शैली का विश्लेषण करनेवाला उपन्यास कहा गया है, किन्तु इसे पढ़कर प्रवासी भारतीयों की जीवन-स्थितियों, मनः द्वन्द्वों, संघर्षों और आपसी सम्बन्धों का अंतरंग परिचय नहीं मिलता। लेखिका ने मुक्त यौन-सम्बन्धों के स्थूल चित्रण में अधिक रस लिया है। किसी भी दृष्टि से यह लेखिका के पूर्व उपन्यासों से बेहतर नहीं कहा जा सकता। 'भया कबीर उदास' उपन्यास में उषा प्रियंवदा ने नायिका लिली पाण्डेय उर्फ यमन के माध्यम से नारी की छटपटाहट और मृत्यु से उत्पन्न भय का ही मार्मिक अंकन कियाा है। प्रारम्भ में उपन्यास की नायिका कुण्ठाओं का शिकार हो जाती है लेकिन अन्त तक आते-आते स्वयं की वर्जनाओं और कुण्ठाओं को भी समाप्त कर लेती है। नायिका अपने अधूरे शरीर के कारण भयग्रस्त हो जाती है, मृत्युबोध का शिकार हो जाती है, किन्तु अन्त में इन सबसे मुक्ति पाकर मनुष्य के जीने की इच्छा विजय की घोषणा करती है। उपन्यास की नायिका लिली पाण्डेय को भयानक कमांडो नामक ब्रेस्ट कैंसर की बीमारी है। कैंसरग्रस्त लिली पाण्डेय की कथा को उषा प्रियम्वदा ने पाँच डायरियों के माध्यम से चित्रित किया है। कैंसर डायरी परिशिष्ट में रेडियो थेरेपी के बाद लिली पाण्डेय उर्फ यमन के भारत लौटने, वनमालों से मुलाकात, खण्डित रुग्ण शरीर के साथ जिन्दगी का तीखा अहसास और पुनः मिलना, जलती हुई चिता को देखकर मृत्यु के भय से मुक्त होकर वनमाली को स्वीकारने की घटनाओं का वर्णन है। इस प्रकार कथा कभी वर्तमान और कभी अतीत में चलती है। इस उपन्यास में लेखिका ने एक ऐसी युवती का दुःखद वृत्तांत बुना है जो वक्ष कैंसर से ग्रस्त होकर अपने प्रिय अंग को गँवा बैठती है और यह अपूर्णता में न केवल उसे शारीरिक अपूर्णता के रूप में सालती रहती है, बल्कि उसे मन पर अवसाद का घना कोहरा उड़ेल देती है, जो उसके जीवन का शोक गीत बन जाती है। उपन्यास के सम्बन्ध में ओम निश्चल की टिप्पणी ध्यान देने योग्य है- "एक सुखद अन्त के साथ समाप्त, किन्तु असमंजस, अन्तर्द्वन्द्व और अस्वीकार्यता को लेकर पनपते नैराश्य के बारीक से बारीक रेशों को उघेड़ती-बुनती उषा प्रियंवदा की यह कथा सिर्फ लिली पाण्डेय की उर्फ यमन की कथा नहीं है, यह उन तमाम स्त्रियों की कहानी है, जिन्हें प्रकृति ने देवी प्रकोप ने अथवा व्याधियों ने क्षति पहुँचायी है, किन्तु मनुष्यता ने आगे उज्ज्वल प्रतिश्रुति और सफल अनुरक्त भाव से उनका स्वागत किया है।"(8)

           'नदी' (2013 ई०) नामक उपन्यास आकाशगंगा नाम स्त्री के सुख-दुःख के समझौतों से गुजरते जीवन की करुण कहानी है। मानवीय धोखे और छीजते अपनत्व के बावजूद एक नदी की तरह वह अपने मंजिले मकसद की ओर अग्रसर रहती है। इस अहसास के साथ कि वह तो एक नदी की तरह बहने के लिए प्रतिश्रुत और अभिशप्त है।


(5) राजी सेठ :

           कथाकार राजी सेठ ने 'तत्सम' (1983 ई०) लिखकर हिन्दी उपन्यास के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। यों तो तत्सम एक प्रेम-कथा है और इसमें स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का ही विवेचन किया गया है, किन्तु यह सब कुछ इतना सुसंस्कृत, सूक्ष्म और प्रौढ़ है कि पूरी रचना सामान्य प्रेम-कथा से बिल्कुल अलग और विशिष्ट बन गयी है। कथा कुल इतनी ही है कि 'बसुधा' के पति 'निखिल' का एक दुर्घटना में निधन हो जाता है। वह अपने लिए एक ऐसे पुरुष की तलाश करती है, जो मात्र प्रेमी या स्वामी की भूमिका अदा न करके एक सच्चे सहयात्री की भूमिका अदा करे। लम्बी यात्रा के बाद वह 'आनन्द' का वरण करती है। इतनी-सी कथा को माध्यम बनाकर लेखिका ने नारी-जीवन की सार्थकता का गम्भीर विवेचन किया है। इस बिन्दु पर उसने भारतीय और पाश्चात्य जीवन-दृष्टियों की तुलना भी की है। उपन्यास में आनुषंगिक रूप से ही सही वर्तमान विश्वविद्यालयीय व्यवस्था के खोखलेपन को भी बेनकाब किया गया है। पुष्पपाल सिंह के शब्दों में- "विवेच्य उपन्यास व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, नारी- स्वातंत्र्य, की दृष्टि को केन्द्र में रखकर एक अत्यन्त प्रबुद्ध, सुशिक्षिता नारी के पुनर्विवाह के प्रश्न को आधुनिक जीवन-स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का एक सही प्रयत्न है।''(9) पिछले दशक में आपका एक दूसरा महत्त्वपूर्ण उपन्यास- 'निष्कवच' (1995 ई०) प्रकाशित हुआ है। निष्कवच में भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृतियों एवं जीवन-पद्धतियों का संवेदना के सूक्ष्म स्तर पर तुलनात्मक आकलन किया गया है। अब अपने देश में भी एक ऐसी पीढ़ी निर्मित हो चुकी है, जो पश्चिम में रहते हुए दोनों जीवन-पद्धतियों के आधारभूत अंतर को महसूस करने लगी है। पश्चिम में वयस्क होते ही व्यक्ति अकेला हो जाता है। उसे अपना बसेरा ढूँढ़ना पड़ता है। पैसे के लिए जुतना पड़ता है। शिक्षा का अर्थ है- कमाऊ शिक्षा। वहाँ सारे रिश्ते देह के स्तर पर कायम होते हैं, इसलिए बनते-टूटते रहते हैं। अपने देश में ऐसा नहीं है। यहाँ व्यक्ति आजीवन किसी का पुत्र, किसी का भाई, किसी का जेठ, किसी का देवर बना रहता है। रिश्तों की गरमाहट उसके व्यक्तित्व को ताप देती रहती है। यहाँ के रहने वालों को पश्चिम स्वर्ग लगता है, वहाँ रहते हुए, रहने वालों को नर्क प्रतीत होने लगता है। वहाँ 'घर' जैसी चीज होती ही नहीं। प्रस्तुत उपन्यास का कथानायक एक ऐसा ही युवक है। वह अमेरिका से लौटकर घर आया है। यहाँ उसके दर्द को समझने वाला कोई नहीं है। सभी को उससे अपेक्षायें ही अपेक्षाएँ हैं। उसे बेमन से विदेश लौटना पड़ता है। लौटते समय उसके भीतर कितना गहरा द्वन्द्व और दर्द है, इसका अहसास उसके इस कथन से होता है- "लो, जाता हूँ देश ! तुम्हें मैं कभी देख-सुन-छू नहीं सका। मुट्ठी में पा जाने को ललकता रहा। मुट्ठी एक मिली 'मार्था!' लो जाता हूँ मैं।" उसके लौट जाने का एक ही सार्थक तर्क है- 'मार्था' की निगाहों में वह झूठा प्रमाणित नहीं होगा। वह अपने पूरे देश की प्रतिष्ठा की रक्षा कर सकेगा। वह कहेगी- 'इण्डियन आर सो फेथफुल'। निश्चय ही यह प्रत्येक दृष्टि से राजी सेठ की एक उत्कृष्ट रचना है।


(6) मृदुला गर्ग :

              समकालीन लेखिकाओं में मृदुला गर्ग की विशिष्ट पहचान है। अबतक उनके आठ उपन्यास- 'उसके हिस्से की धूप' (1975 ई०), 'वंशज' (1976 ई०), 'चित्तकोबरा' (1979 ई०), 'अनित्य' (1980 ई०), 'मैं और मैं' (1984 ई०), 'कठगुलाब' (1996 ई०), 'मिलजुल मन' (2009 ई०), 'बसु का कुटुम्ब' (2016 ई०) प्रकाशित हैं। मृदुला गर्ग ने अपनी पहचान अभिजातवर्गीय नारी के स्वातंत्र्य, प्रेम-विवाह, वैवाहिक जीवन की एकरसता, ऊब, ताजगी की तलाश में पर पुरुष की ओर झुकाव तथा प्रेम की अनुभूति के सूक्ष्म विश्लेषण के माध्यम से मानव जीवन की सार्थकता की तलाश, द्वारा बनायी थी। उसके हिस्से की धूप से लेकर वसु का कुटुम्ब तक यह तलाश जारी है। उसके हिस्से की धूप (1975 ई०) उपन्यास स्त्री की स्थिति की पड़ताल करता है। बदलते सामाजिक सन्दर्भों में आत्मसंघर्ष द्वारा कर्मठता से अपना मुकाम हासिल करने की रास्ता भी तलाश करता है। इस उपन्यास में तीन प्रमुख पात्र हैं- मनीषा, जितेन, मधुकर। मृदुला जी ने इस पात्रों के माध्यम से स्त्री-पुरुष के वैवाहिक प्रेम तथा विवाहेतर सम्बन्धों की समस्याओं की ओर संकेत किया है। इस उपन्यास की नायिका मनीषा अपने पति जितेन की व्यस्तता के कारण साहचर्य सुख से अतृप्त रहती है, जिसके कारण दाम्पत्य सीमा से बाहर जाकर मधुकर से प्रेम -सम्बन्ध स्थापित करती है। जितेन से तलाक लेकर मधुकर से विवाह करती है। किन्तु भौतिकता के मोहपाश में बँधी मनीषा का जीवन मधुकर के साथ भी मधुर नहीं रह पाता।

            अतः यहाँ लेखिका ने दाम्पत्य जीवन की एकरसता, ऊब, कड़वाहट आदि का यथार्थ चित्रण अत्यन्त ही कलात्मक ढंग से किया है। आज स्त्री पारम्परिक मानदण्डों, प्रेम, विवाह और यौन- सम्बन्धों की सीमा-रेखा से बाहर आकर आपने आत्मसंघर्ष द्वारा अपने अस्तित्व की तलाश करती है। मनीषा अपने जीवन की सार्थकता की तलाश करती है- "वह समझ गयी, अपने जीवन की सार्थकता उसे अपने भीतर खोजनी होगी।"(10) उसे यह समझते देर नहीं लगती की पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री का अस्तित्व सुरक्षित नहीं है, चाहे वह किसी के भी संसर्ग में रहे, उसके स्वतन्त्र व्यक्तित्व का विकास नहीं हो सकता- "जितेन, मधुकर फिर जितेन, ये मनीषा के जीवन में उस ज्वार के समान आये थे, जो जब आता है तो समुद्र को उथल-पुथल, उद्वेलित, मंथित कर उसका रूप-रंग ही बदल डालता है, पर जिसका उतरना उतना अवश्यम्भावी होता है, जितना उसका चढ़ना, फिर भाटा आता है, सागर पीछे धकेल दिया है और बँधे जन्तु- सा धीमे-धीमे सिसकारी भरता रहता है, पर ज्वार या भाटा दोनों में से कोई भी सागर का सम्पूर्ण परिचय नहीं है। उसका सच्चा परिचय उसकी गहराई में उसके विस्तार में, उन असंख्य सीप-शंख, मूँगे-पौधों और जीव-जन्तुओं में, जो उसकी अतल गहराई में पलते हैं। मनीषा को भी अपना सच्चा परिचय अपने मानस तल की गहराइयों में खोजना होगा।"(11) इस प्रकार मनीषा भावनाओं के मकड़जाल से निकलकर लेखन की गहराइयों में अपना सच्चा परिचय खोजने में अपनी सार्थकता मानती है। साधारणतः देखा जाय तो मृदुला गर्ग का यह उपन्यास प्रेम की स्वतन्त्रता पर भी विचार करता है। लेखिका मनीषा के माध्यम से इस प्रश्न पर विचार करती है कि प्रेम बन्धन युक्त होना चाहिए या स्वतन्त्र। अन्ततः वह मानती है कि प्रेम स्वतन्त्र होना चाहिए, क्योंकि स्त्री या पुरुष दोनों को ही उसकी जरूरत है। उसमें किसी प्रकार का आधिपत्य या शोषण नहीं होना चाहिए।

             वंशज (1976 ई०) नामक उपन्यास-अंग्रेजी साम्राज्यवाद के पतन के तुरन्त पहले और आजादी के बाद की मनःस्थितियों में जी रहे, एक संवेदनशील युवक की कथा है। सुधीर कानपुर कोर्ट के जज शुक्ला का बेटा है। वह लीक से हटकर नये रास्ते की तलाश करता है, किन्तु अनुशासनप्रिय पिता जज शुक्ला साहब और पुत्र सुधीर का वैचारिक एवं व्यवहारिक द्वन्द्व उन्हें एक-दूसरे को संवेदनात्मक स्तर पर समीप नहीं ला पाते। सुधीर की पत्नी सविता आदर्श बहू का नकाब ओढ़े ससुर की सम्पत्ति की प्राप्ति ही अपना एकमात्र लक्ष्य मानती है। वह अपने पति की आत्मीय नहीं बन पाती। इस उपन्यास के माध्यम से मृदुला जी यह स्पष्ट करती हैं कि अंग्रेज तो चले गये, किन्तु अपनी अंग्रेजीयत यहीं छोड़ गये। जिस कारण स्वार्थलोलुपता बढ़ती जा रही है और मानवीय संवेदना धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।

             मृदुला जी वंशज उपन्यास के माध्यम से पितृसत्ता के अमानवीय स्वरूप को भी समाज के सामने लाती है। शुक्ला साहब अपने बेटे सुधीर से अधिक सेवा चाहते हैं, किन्तु न्याय करने वाला जज ही अपनी पुत्री के साथ न्याय नहीं कर पाता है। पितृसत्ता में सामाजिक शोषण का सबसे अधिक शिकार स्त्री है, चाहे वह पुत्री के रूप में हो, पत्नी के रूप में हो, इस कड़वे सत्य की अभिव्यक्ति है यह उपन्यास। पैतृक सम्पत्ति का उत्तराधिकारी पितृसत्तात्मक दृष्टि में केवल पुत्र ही हो सकता है, पुत्री नहीं, क्योंकि 'वंशज' की ताजपोशी उसी की होती है। स्त्री भी कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक मूल्यों के पोषक और समर्थक बन जाती है, तभी तो सविता शिक्षित होकर भी 'वंशज' के रूप में पुत्र की ही कामना करती है। वह कहती है- "पहला बच्चा लड़का हो जाता तो अच्छा रहता है, डैडी को वारिस मिल जाता।"(12) अतः इस उपन्यास के द्वारा लेखिका ने पितृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था को भी उजागर किया है।

             'चित्तकोबरा' (1979 ई०) उपन्यास का शीर्षक चित्तकोबरा 'चित्त' की 'चपलता' के अन्तःसूत्र की अभिव्यक्ति अत्यन्त सूक्ष्म रूप से करता है। चित्तकोबरा दो शब्दों के योग से बना है, 'चित्त' और 'कोबरा'। 'चित्त' का अर्थ है 'मन' (मानस, हृदय) और कोबरा का अर्थ है 'कोबरा साँप'। इस पूरे शब्द की व्याख्या 'चित्त का कोबरा' के रूप में मृदुला गर्ग इस प्रकार करती हैं- यदि आप किसी कोबरा को जंगल की हरीतिमा में मदमस्त टहलते, सर्र-सर्र सरकते देखें तो वह अनेक रंगों में चमकता, रोशनी- सा दमकता, अँधेरे- सा लुप्त होता दिखेगा। निकलता-छुपता, सतत बदलती छापाओं, रंगों, स्पन्दनों-सिंहरनों में। उसी प्रकार मेरे विचार से, चित्त अथवा मन की चपल चंचल बहुरंगा, अपने पर चकित होता है। अनेक प्रकार के स्पन्दनों का अहसास करता है। इस प्रकार इस उपन्यास का शीर्षक अत्यन्त सार्थक है। लेखिका मनु और रिचर्ड के माध्यम से प्रेम की सुखद स्पन्दनों का एहसास कराती है। मृदुला गर्ग का उपन्यास 'चित्तकोबरा' भारतीय समाज की पारम्परिक सोच से अलग एक ऐसी प्रेमकथा है, जो व्यक्ति के भीतरी स्पन्दनों और शरीर में गहरे अन्तर को बड़ी ईमानदारी से पाठकों को बताती है। प्रेम केवल स्त्री-पुरुष के आपरी शारीरिक सम्बन्धों से नहीं है, बल्कि प्रेम की अनुभूति, अध्यात्म की अनुभूति है।

            मृदुला जी कहती है- "जीवन को उसके समग्र और उदात्त रूप में जानने पहचानने के लिये 'प्रेम' एक उपयुक्त माध्यम है। प्रेम की अनुभूति अध्यात्म की अनुभूति है, एक से निःस्वार्थ, पूर्ण समर्पित प्रेम करने पर, अहम का जो धीरे-धीरे हनन होता है, वह व्यक्ति को उस बिन्दु पर पहुँचा देता है। जहाँ से बढ़कर मानव से प्रेम के आदर्श तक पहुँचना एक कदम आगे बढ़ाना जैसा रह जाता है। यहीं 'चित्तकोबरा' की प्रेरणा है।"(13)

             इस उपन्यास के प्रमुख पात्रों में मनु, महेश, गोयल, रिचर्ड की भूमिका मुख्य है। मनु उद्योगपति महेश गोयल की पत्नी है। दोनों उत्तरदायित्व के साथ दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करते हैं, लेकिन संवेदनात्मक गहराई के साथ एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं है। मनु की मुलाकात जब रिचर्ड से होती है, तब उसके जीवन में अद्भुत बदलाव आता है। नाटक के रिहर्सल के दौरान एक-दूसरे के नजदीक आते हैं। आत्मिक प्रेम का बीजारोपण हृदय में होता है। जीवन की सुन्दरता का बोध होता है, सत्यता का बोध होता है। मृदुला जी इस उपन्यास के माध्यम से बताती है कि प्रेम के अभाव में शारीरिक सम्बन्ध केवल भोग-लिप्सा है, आत्मा का उत्पीड़न है। प्रेमहीन शरीर सम्बन्ध जो भारतीय विवाह-पद्धति की स्वाभाविक स्थिति है, भयानक आत्मपीड़न के अलावा कुछ नहीं। प्रेम आदर्श रूप तभी प्राप्त कर सकता है, जब तन और मन आत्मनिष्ठ हो।

           मृदुला जी प्रेम की आत्मनिष्ठता पर भी विचार करती है, क्योंकि वही उसे आदर्श तक पहुँचता है। अतः प्रेम की यात्रा उदात्त है। यह उदात्त प्रेम आदर्श रूप में परिणत होकर विश्वजनित प्रेम हो जाता है। अनित्य में उन्होंने अपनी जमीन बदल दी। इसमें उन्होंने गाँधीवाद की व्यर्थता और भगतसिंह के नेतृत्व में संचालित क्रांतिकारी आन्दोलन की सार्थकता प्रमाणित करने की चेष्टा की है। इस उपन्यास में स्वतंत्रता- संग्राम और उसके बाद के भारतीय जीवन के इतिहास को नयी दृष्टि से देखने का आग्रह किया गया है। नये संदर्भ में चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह के देश-प्रेम तथा उनकी प्रगतिशील जीवन-दृष्टि का मूल्यांकन तो ठीक है, किन्तु गाँधी के नेतृत्व में लड़ी गयी स्वतंत्रता की लड़ाई तथा उसके मूल में विद्यमान सत्याग्राही जीवन-दृष्टि को पूरी तरह नकारना उचित नहीं प्रतीत होता। मैं और मैं में मृदुलाजी ने एक ऐसी स्त्री की अस्मिता की खोज की है, जो कथा लेखिका भी है। कथा लेखिका 'माधवी' अपने पति 'राकेश' और दो पुत्रों के साथ सुविधा और शांति का जीवन व्यतीत करती है। एक दिन उसके जीवन में दूसरे लेखक 'कौशल-जो कुरूप और कुंठित, किन्तु प्रभावशाली है- का प्रवेश होता है। कौशल बड़ी सूझ-बूझ के साथ 'माधवी' की रचनाओं की प्रशंसा करता है। माधवी, कौशल को बिल्कुल पसंद नहीं करती, लेकिन उसके द्वारा की गयी प्रशंसा से प्रभावित होकर बहुत दूर तक उसे झेलती चलती है। बाद में वह भी उसके साथ उसी प्रकार खेलने लगती है, जिस प्रकार आरम्भ में झूठ और छद्म के सहारे वह उसे (माधवी को) इस्तेमाल करता था।' मधुरेश के शब्दों में-"मैं और मैं' में एक 'मैं माधवी' का है और एक 'कौशल' का। कौशल के द्वारा बुनी पर्तों को झाड़कर वह जैसे स्वयं को नये सिरे से अन्वेषित करती है।"(14) 'कठगुलाब' पुरुष - प्रधान समाज में नारी के दोहन-शोषण और मुक्ति-संघर्ष की कथा है। इसमें स्मिता, मारियान, नर्मदा, असीमा ये चार नारी पात्र अपनी-अपनी कहानी कहते हैं। कहानियों के विस्तार-क्रम में अन्य नारी पात्र भी सामने आते हैं। पुरुष पात्र केवल एक है- विपिन। उपन्यास से यह स्पष्ट होता है कि, पूरब हो या पश्चिम, नारी सर्वत्र दोहन और शोषण का शिकार है। पुरुष किसी वर्ग का हो, स्त्री के प्रति उसकी पाशविक प्रवृत्ति एक ही तरह की होती है। इस पुरुष प्रधान व्यवस्था से मुक्ति का उपाय क्या है? कथा-लेखिका की नारियाँ पुरुष से सम्पूर्ण मुक्ति नहीं चाहतीं। वे सम्मान के साथ अपनी पहचान कायम रखते हुए, प्रेम, सुरक्षा और सन्तान की कामना करती हैं। कोई स्त्री वंध्या नहीं होना चाहती। इसके लिए पुरुष अनिवार्य है। उपन्यास में आत्मकथा कहने वाला एक ही पुरुष पात्र है- विपिन। वह नारीवाद का समर्थक है। संतान उसे भी चाहिए। वह शरीर, बुद्धि, मन से प्रौढ़ है। मुक्त स्त्री साहचर्य का हिमायती है। वह स्मिता, असीमा, नीरजा सभी से सम्बन्ध रखना चाहता है। स्त्रियाँ भी उसे स्वीकार करती हैं। असीमा भी उसे मर्द मानती है, हरामी नहीं मानती। तो क्या यह मान लिया जाय कि 'विपिन' जैसे पुरुष की तलाश और उपस्थिति ही आज के विवेकनिष्ठ नारी-संघर्ष की अंतिम परिणति है ? इसका उत्तर तो समय ही देगा। जो भी हो, यह निर्विवाद है कि मृदुला गर्ग नारी-विमर्श की एक विशिष्ट लेखिका है। 'मिलजुल मन' (2009 ई०) इस उपन्यास में लेखिका ने आजादी के बाद के दशकों में लोगों के मोहभंग को शिद्दत के साथ उठाया है। एक बेहतर जिन्दगी और समाज की उन्नति का सपना देख रहे लोगों ने आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ तयाग कर संघर्ष में हिस्सा लिया था। आजादी के बाद जब जनता की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं तो आम जनता का वो सपना दरकने लगा। इस सपने के टूटने और विश्वास के दकरने की कहानी है- मिलजुल मन। इस उपन्यास में गुल और मोगरा के बहाने मृदुला गर्ग ने आजादी के बाद के समय में लोगों की जिन्दगी और समाज में आने वाली बदलाव की पड़ताल करने की कोशिश की है। यह उपन्यास दो लड़कियों की कहानी है- एक स्वयं लेखिका और दूसरी उसकी बहन। दोनों एक साथ बड़ी होती हैं, साथ-साथ पढ़ती हैं, साथ-साथ प्रेम करती हैं एक ही व्यक्ति से। एक प्रकट रूप से दूसरी अप्रकट रूप से। इस उपन्यास में मृदुला गर्ग ने स्त्री मन की तहों को खोलने में खासी वोल्डनेस दिखलाई है, विवाह पूर्व के यौन आकर्षणों और अपने वैवाहित रिश्तों का निःसंकोच बिना मर्यादित हुए।


(7) कुसुम कुमार :

           कुसुम कुमार के अब तक चार उपन्यास- 'हीरामन हाईस्कूल' (1989 ई०), 'पर्दाबाड़ी' (2000 ई०), 'पूर्वी द्वार' (2004 ई०) तथा 'मीठी नीम' (2012 ई०) प्रकाशित है। 'हीरामन हाईस्कूल' में एक विधवा, अकेली, असहाय स्त्री (जुगनी) के जीवन-संघर्ष को मूर्त किया है। आज के समाज में दो छोटी लड़कियों की माँ, अकेली प्रौढ़ विधवा का जीवन कितना असुरक्षित है, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। विधवा 'जुगनी' अपनी अदम्य जिजीविषा का परिचय देते हुए सुइटर बुन-बुन कर अपनी दो पुत्रियों को पाल-पोस और पढ़ा-लिखाकर बड़ा करती है। सास उसे अपने पिलपिले मझले लड़के से बाँधना चाहती है, किन्तु स्वाभिमानिनी 'जुगनी' विद्रोह करती है। वह अकेले रहकर अपनी मर्जी का जीवन व्यतीत करती है। एक छोटे से कस्बे में रहने वाली निम्न मध्यवर्गीय नारी का यह 'विद्रोह' महत्त्व रखता है। यह दूसरी बात है कि यही 'जुगनी' अपनी पारिवारिक सीमाओं को शिथिल नहीं होने देतीं और पुत्रियों को अपने से बाँधकर रखना चाहती है। सब मिलाकर इस उपन्यास में नारी की अपराजेय जिजीविषा के प्रति पूरा विश्वास प्रकट किया गया है। आपका दूसरा उपन्यास-परदाबाड़ी (2000 ई०) अपनी सम्यक् जीवन-दृष्टि, मानवीय प्रेम में गहन आस्था, लोक-संस्कृति की सहज उद्रिक्ति और जीवन को पुनर्परिभाषित करते हुए उसे एक नया अर्थ देने की कोशिश के कारण विशेष चर्चित और प्रशंसित हुआ है। आपका तीसरा उपन्यास 'पूर्वी द्वार' (2004 ई०) प्रकाशित हुआ है। इसमें लेखिका ने ऐसे दो परिवारों की कहानियाँ कही हैं, जिनकी गृहणियाँ अवसाद ग्रस्तता से पीड़ित हैं। उन्हें मनोचिकित्सा की आवश्यकता है। महरी बुधवारी का व्यक्तित्व जीवंत है। कैंसरग्रस्त रहते हुए भी वह निरन्तर प्रसन्नचित्त रहती है। उपन्यास में वृद्धों की दुर्दशा तथा बालिकाओं की उत्पत्ति को अभिशाप मानने की प्रथा की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है। सब मिलाकर उपन्यास वर्तमान जीवन की त्रासदियों का ही इजहार करता है।


(8) ममता कालिया :

             ममता कालिया पारिवारिक जीवन परिधि से बाहर व्यापक सामाजिक संदर्भ को भी महत्त्व देती हैं। 'बेघर' (1971 ई०), 'नरक दर नरक' (1975 ई०), 'प्रेम कहानी' (1980 ई०), 'साथी', 'लड़कियाँ' (1987 ई०), 'एक पत्नी के नोट्स' (1997 ई०), 'दौड़' (2000 ई०), 'अँधेरे का ताला' (2009 ई०), 'दुक्खम सुक्खम' (2009 ई०), 'सपनों की होम डिलेवरी' (2016 ई०), 'कल्चर-वल्चर' (2017 ई०) आदि कई उपन्यास लिखकर आपने अच्छी ख्याति अर्जित की है। 'बेघर' में आपने संस्कारबद्ध पुरुषमन पर गहरी चोट की है। आपने यह दिखाना चाहा है कि नारी की पवित्रता की कसौटी उसकी मानसिक एकात्मता और समर्पण है, शारीरिक कुँआरापन नहीं। नरक-दर-नरक में आज की पूरी सामाजिक व्यवस्था को नरक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसके चलते प्रतिभासम्पन्न, श्रमशील और ईमानदार शिक्षित युवकों को आर्थिक असुरक्षा के दबाव को झेलते हुए इधर-उधर भटकना पड़ता है और दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। इसके विपरीत समझौतावादियों और चापलूसों को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की मिलती रहती है। प्रेम कहानी में आपने स्वेच्छा से किये गये प्रेम और सामाजिक स्वीकृति से किये गये विवाह को समानान्तर रखकर दोनों की विडम्बनाओं को उजागर किया है। आनुषंगिक रूप से इस उपन्यास में अस्पतालों में चलने वाली राजनीति और भ्रष्टाचार का भी पर्दाफाश हुआ है। लेखिका ने अस्पताल के कर्मचारियों की मानसिकता के विश्लेषण के साथ-साथ उसके मूल में विद्यमान आर्थिक-सामाजिक कारणों का भी विवेचन किया है। महिला लेखिकाएँ स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के चित्रण के सीमित दायरे से बाहर नहीं जा पातीं, ममता कालिया ने इस आरोप को मिथ्या सिद्ध कर दिया है। 'एक पत्नी के नोट्स' उपन्यास एक आई०ए०एस० अधिकारी (संदीप) और उसकी व्याख्याता पत्नी (कविता) की पारिवारिक जीवन-स्थितियों को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। पति आज भी सामन्तीय संस्कारों से मुक्त नहीं हो पाया है। वह पत्नी पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहता है। छोटी-छोटी बातों पर वह उसे पीड़ित करता है। वह एक मुकम्मल जीवन जीना चाहती है, जो किसी तरह सम्भव नहीं हो पाता। ऊबकर वह घर छोड़ देती है। संदीप चलती ट्रेन से मनाकर उसे वापस लाता है। उपन्यास का अंत कुछ नाटकीय हो गया है। इसके बावजूद संभ्रान्त मध्यवर्गीय परिवारों के अन्तर्विरोधों को उजागर करने की दृष्टि से उपन्यास महत्त्वपूर्ण है। 'दुक्खम-सुक्खम' (2010 ई०) ममता कालिया का मथुरा की बीसवीं शताब्दी की पृष्ठभूमि में रचा गया उपन्यास है। इस उपन्यास के कथा के सूत्र दिल्ली, आगरा और मुम्बई तक फैले हैं। इस उपन्यास के लेखिका ने स्वतन्त्रता के संघर्ष, गाँधी के प्रभाव, चरखा-खादी स्वदेशी से उभरा आत्मबल, देश- विभाजन की त्रासदी और आजादी के बाद का परिदृश्य- इन सबको कथा की आन्तरिकता में शामिल किया है। कवि मोहन के माध्यम से लेखिका ने नये जीवन मूल्यों की तलाश में व्यक्त ऐसे व्यक्ति की कहानी प्रस्तुत की है। जिसका संसार डिग्री कॉलेज, साहित्य और रेडियो स्टेशन तक फैला है। लीला, भगवती, इन्दु प्रतिमा, मनीषा और सर्वोपरिवादी के जीवन संघर्ष के माध्यम से उपन्यास का ताना-बाना बुना गया है। लेखिका ने बेहद संवेदनशीलता के साथ उसके द्वन्द्वों-वयः सन्धि के अनुभवों और वैचारिकता में होने वाले परिवर्तनों को व्यक्त किया है। ब्रजभाषा की मिठास, टीस और अर्थ व्याप्ति का सबसे अधिक सार्थक उपयोग इस उपन्यास में हुआ है। जीवन की विपुल आपाधापी में अस्तित्व के बहुतेरे प्रश्नों की गूंज और उत्तरों की आहट इस उपन्यास में सुनाई पड़ती है। ममता कालिया का उपन्यास दुक्खम-सुक्खम दादी विद्यावती और पौत्री मनीषा के मध्य समाहित सक्रिय समय और समाज की अनूठी गाथा है। इस आख्यान में तीन पीढ़ियों की सहभागिता है। मथुरा में रहने वाले लाला नतथीमल और उनकी पत्नी विद्यावती से यह आख्यान आरम्भ होता है। दूसरी पीढ़ी है लीला, भग्गो, कवि मोहन और कवि की पत्नी इन्दु। कवि इन्दु की दो बेटियाँ प्रतिभा और मनीषा तीसरी पीढ़ी का यथार्थ है। लेखिका ने मथुरा की पृष्ठभूमि में इस उपन्यास की रचना की है। साथ इसके कथासूत्र दिल्ली, आगरा और बम्बई तक फैले हैं। 'अँधेरे का ताला' (2009 ई०) में कॉलेज की अध्यापिकाओं, छात्राओं और अन्य कर्मचारियों के जीवन को चित्रित किया है। निराला की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियों को केन्द्र में रखकर लेखिका ने अँधेरे का ताला खोलने वालों की असलियत को अपने व्यंग्य विनोद शैली में उकेरा है। शिक्षा का क्षेत्र किस तरह की उथल-पुथल का शिकार है, इसका एक दस्तावेजी चित्रण इस उपन्यास में किया है। स्वातंत्र्योत्तर भारत के शिक्षित, संघर्षरत और परिवर्तनशील समाज का सजीव चित्र इस उपन्यास में अपने बहुरंगी आयामों में चित्रित हुआ है। 'कल्चर वल्चर' (2017 ई०) की भूमिका में ममता कालिया ने लिखा है- कला, साहित्य, संस्कृति आज सरोकार न रहकर कारोबार बनते जा रहे हैं और उसके प्रबन्धक कारोबारी। इनके हाथों में संस्कृति विकृति बन रही है और साहित्य- वाहित्य। उपन्यास में लेखिका ने साहित्यकार और साहित्यिक संस्थाओं की पतन गाथा को विशिष्ट में प्रस्तुत किया है। समाज को दिशा देने का दायित्व निर्वहन करने वाली संस्थाएँ आज किस कदर दिशाहीन होकर निजी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ रही हैं, उनका वर्णन उपन्यास में है।


(9) मेहरुन्निसा परवेज :

          मेहरुन्निसा परवेज  के छह उपन्यास- 'आँखों की दहलीज' (1969 ई०), 'उसका घर' (1972 ई०), 'कोरजा' (1977 ई०), 'अकेला पलाश' (1981 ई०), 'समरांगण' (2002 ई०) तथा 'पांसग' (2005 ई०) प्रकाशित हैं। आपके उपन्यासों का केन्द्रीय विषय निम्नमध्यवर्गीय नारी-जीवन की त्रासदी है। प्रेम, विवाह, तलाक, पतियों का निकम्मापन, अवैध सम्बन्ध, सास का अत्याचार, सौतेली माँ का अत्याचार, परित्यक्ता नारी का अकेलापन, जीने के लिए अवांछित स्थितियों का स्वीकार तथा अन्य अनेक संदर्भों में नारी-जीवन की विवशता के अत्यन्त मार्मिक चित्र मेहरुन्निसा परवेज ने अंकित किये हैं। अनादि काल से नारी शोषण का शिकार रही है। आज भी उसकी स्थिति में विशेष परिवर्तन नहीं आया है। आज वह अपने को व्यक्त कर लेती है। कभी-कभी विद्रोह भी करती है, किन्तु अभी भी उसकी निष्कृति का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ है। वह दूसरों को छाया, शीतलता और ऊष्मा दे सकती है, देती है, किन्तु स्वयं मजबूर, असहाय और विवश होकर जीने के लिए अभिशप्त है। मेहरुन्निसा परवेज ने नारी के इसी अभिशप्त जीवन को रेखांकित किया है।


(10) चित्रा मुद्गल :

           आज की व्यावसायिक उपभोगवादी संस्कृति में नारी के शोषण की नयी-नयी स्थितियाँ उभरने लगी हैं। चित्रा मुद्गल ने विज्ञापन जगत् में होने वाले नारी-शोषण को सार्थक औपन्यासिक परिणति देकर एक सफल उपन्यास लेखिका के रूप में अपने को स्थापित कर लिया है। एक जमीन अपनी (1990 ई०) उनका चर्चित उपन्यास है। 'आब्जर्वेशन एडवर-टाइजिंग' के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मि० मैथ्यू 'अंकिता' जैसी प्रतिभासम्पन्न 'कापीराइटर' को सिर्फ इसलिए अपने यहाँ से निकाल देते हैं, कि वह पार्टियों में उनके क्लाइंट्स द्वारा की गयी अश्लील हरकतों को बरदाश्त नहीं करती। इसके विपरीत 'नीता' हर तरह के समझौते करके उसी कम्पनी में उसकी जगह नियुक्ति पा लेती है। लेकिन इसका मूल्य उसे देना पड़ता है। नित्य के शोषण से ऊबकर अंत में वह आत्महत्या कर लेती है। इस प्रकार पूरे उपन्यास में स्त्री-शोषण के सम्बन्ध में संचार माध्यमों की भोगवादी दृष्टि का पर्दाफाश किया गया है। एक लम्बे अंतराल के बाद लगभग 544 पृष्ठों में समाप्त होने वाला आपका दूसरा उपन्यास आवाँ (1999 ई०) प्रकाशित हुआ है। यह उपन्यास बम्बई के मजदूर संघटनों के जीवन संघर्ष को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। उपन्यास में दो बातें उभरकर सामने आई हैं। एक तो यह कि कभी वर्ग-हीन समाज रचने के महान् उद्देश्य को सामने रखकर संघर्ष करने वाली ट्रेड यूनियनें आज स्वयं सत्ताकांक्षियों की कठपुतली बन गई हैं और उनका संघर्ष लक्ष्यभ्रष्ट हो चुका है। दूसरी यह कि समाज का कोई वर्ग क्यों न हो, आज भी सर्वत्र पुरुष-प्रधान समाज में नारी ही उत्पीड़ित होने के लिए अभिशप्त है। आज की उपभोक्तावादी संस्कृति ने मानवीय संवेदना को कुंठित कर दिया है और सब कुछ बिकाऊ माल बन गया है। खरीद-फरोख्त के रास्ते इतने तिलिस्मी हो गए हैं कि एक बार उनमें फँस जाने के बाद मुक्ति का कोई मार्ग दिखाई नहीं पड़ता। मजदूरों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले पक्षाघात से पीड़ित पाण्डेयजी की अत्यन्त संवेदनशील पुत्री कथा-नायिका 'नमिता' को यह समझाया जाता है कि, "मत भूलो औरत के अस्तित्व का तिलिस्म उसकी देह से ही उपजता है।"(15) और तो और, मजदूर-आन्दोलन के शिखर पुरुष अनिता के पिता-तुल्य अन्ना साहब की यौन-कुण्ठा भी उसके शरीर से फूटती हुई आम्र बौर की बौराने वाली मादक महक से ही उदीप्त होती है। प्रश्न उठता है कि आँवा की आग की तरह झुलसाने वाली आज की इस मानवीय नियति का विकल्प क्या है? 'नमिता' का मोहभंग और उसका अपनी सौतेली माँ किशोरीबाई के पास लौटना दिखाकर कथालेखिका ने एक विकल्प की ओर संकेत किया है। किशोरीबाई एक मजदूर माँ भी है। उसके पास लौटने का अर्थ है-संघर्ष की मूल नैतिक भूमि की ओर वापिसी। उपन्यास के अंत में उद्धृत 'पाश' की यह कविता-

           हम लंड़ेंगे, जब तक दुनिया में 

                       लड़ने की जरूरत बाकी है।

           हम लड़ेंगे कि लड़े बगैर 

                      कुछ नहीं मिलता।

      

             भी इसी दिशा की ओर संकेत कर रही है। आपका तीसरा उपन्यास 'गिलिगडु' (2002 ई०) है। इसमें आज की युवा पीढ़ी द्वारा अपने बुजुर्गों की घोर उपेक्षा और अवमानना का बड़ा ही मार्मिक और सजीव चित्रण किया गया है। आज के भरे-पूरे परिवार में भी बुजुर्गों की स्थिति परिवार के पालतू कुत्तों से भी बदतर है। महानगरों के शिक्षित मध्यवर्गीय परिवारों का समकालीन जीवन किस सीमा तक यांत्रिक, आत्मकेन्द्रित और अमानवीय हो गया है। यह उपन्यास इसका जीवन्त दस्तावेज है। आपका चौथा उपन्यास 'पोस्ट बॉक्स नं० 203 नाला सोपारा' (2016 ई०) प्रकाशित हुआ है। यह उपन्यास विनोद उर्फ बिन्नी उर्फ बिमली के बहाने हमारे समाज में लम्बे समय से चली आ रही उस मानसिकता का विरोध है जो मनुष्य को मनुष्य समझने से बचती रही है। महज शारीरिक कमी के चलते किसी इन्सान को असामाजिक बना देने की क्रूर विडम्बना है।

 

(11) सूर्यबाला :         

           नयी लेखिकाओं में निम्नमध्यवर्गीय जीवन की त्रासदी तथा आर्थिक दबाव से उत्पन्न विवशता एवं द्वन्द्व का चित्रण करने में सूर्यबाला को विशेष सफलता प्राप्त हुई है। वे साठोत्तरी पीढ़ी की प्रमुख उपन्यासकार है। 'मेरे संधिपत्र' (1978 ई०), इस उपन्यास की कथा के केन्द्र में शिवा नाम की स्त्री का किरदार है जो अपने समय की नारी का प्रतिनिधित्व करती है और नारी जीवन को लेकर उठने वाले सतत सवालों की चुनौती को स्वीकार करती है। वह मध्यमवर्गी शिक्षित स्त्री है और उपन्यास में उसके कई रूप दिखाई देते हैं। वह आत्मविश्वास से भरपूर है और स्वाभिमानी है। अपनी पहचान को लेकर सजग है, लेकिन विद्रोह नहीं करती है। न ही अपने आपको परिस्थितियों का दास बनने देती है, बल्कि अपने विवेक से ऐसे निर्णय लेती है जो उसके परिवार और समाज के हित हो, यही उसके सन्धिपत्र है।

            'सुबह के इंतजार तक', (1980 ई०), 'अग्निपंखी' (1984 ई०) आदि लघु उपन्यासों के माध्यम से लेखिका ने नारी-जीवन की त्रासदी का बड़ा ही द्रावक चित्र अंकित किया है। प्रतिष्ठा के झूठे छद्म, रूढ़ियों की जकड़न और आर्थिक दबाव के चलते आज का निम्नमध्यवर्ग किस प्रकार पंगु, निरीह और असहाय बन गया है, इसे लेखिका ने तार्किक एवं संगत प्रसंगों एवं स्थितियों के संघटन द्वारा प्रभावी और विश्वसनीय बनाकर प्रस्तुत किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि लेखिका का स्वर आशावादी है और उसे पूरा विश्वास है कि आज की नारी जिस दिन परम्पराओं और रूढ़ियों के छ‌द्म को तोड़कर श्रमशील जीवन के महत्त्व को समझेगी, उस दिन सबकुछ बदल जायगा और उसका संघर्ष सार्थक हो जायगा। इधर उनका एक बड़ा उपन्यास 'कौन देश को बासी रेणु की डायरी' (2018 ई०) प्रकाशित हुआ है।


(12) मृणाल पाण्डे :

           मृणाल पांडेय के अब तक सात उपन्यास- 'विरुद्ध' (1977 ई०), 'पटरंग पुराण' (1983 ई०), 'रास्तों पर भटकते हुए' (2000 ई०), 'हमको दियो परदेश' (2001 ई०), 'अपनी गवाही' (2003 ई०), 'सहेला रे' (2017 ई०) तथा 'हिंगुली हीरामणि की कथा' (2018 ई०) प्रकाशित हैं, जिसमें पटरंग पुराण (1983 ई०) विशेष रूप से चर्चित हुआ है। इसमें हिमालय के पाददेश में स्थित पहाड़ी अंचल के जीवन-चित्र अंकित किये गये हैं। ये चित्र ग्यारह पीढ़ियों की इतिहास-गाथा से सम्बद्ध हैं। 'पटरंग पुर' के बसने और अनेक परिवर्तनों के बीच से गुजरते हुए उसमे आज तक होने वाले बदलाव को दिखाने के प्रयत्न में लेखिका ने पूरे परिदृश्य को बायस्कोपी बना दिया है। उपन्यास की भाषा की आंचलिकता उसके प्रभाव को कम कर देती है। 'रास्तों पर भटकते हुए' (2000 ई०) आपका दूसरा चर्चित उपन्यास है। इसमें वर्तमान व्यवस्था के घिनौने चेहरे को बेनकाब कर दिया गया है। आज जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसमें भ्रष्टाचार न हो। चिकित्सा के क्षेत्र में घोर व्यावसायिकता व्याप्त है। गरीबों को प्रलोभन देकर धोखे से उनके अंग तक निकालकर बेच दिए जाते हैं। राजनीति अपराधियों की क्रीड़ाभूमि बनती जा रही है। पुलिस एवं सामान्य प्रशासन के क्षेत्र में तो भ्रष्टाचार ही कानून बन गया है। न्यायपालिका पर भी दबाव डाला जाता है, जो प्रायः प्रभावी होता है। पत्रकारिता भी व्यवसाय बन गई है, अब वह जनता की आवाज नहीं, व्यवस्था की वाणी बनती जा रही है। इन सबके बीच आम आदमी अपने को असहाय अनुभव कर रहा है। कथा लेखिका मंजरी ने संस्मरणों के सहारे आत्मकथात्मक शैली में वर्तमान व्यवस्था के इस कड़वे सच को उजागर करके अपने लेखकीय व्यक्तित्व को सार्थक और प्रभावी बना दिया है। लगता है, मंजरी का व्यक्तित्व मृणाल पाण्डेय का ही प्रतिरूप है, जो अपने पत्रकार जीवन के समस्त अनुभवों के साथ यहाँ मूर्त हो गया है।


(13) कमल कुमार :

               कमल कुमार के अब तक छह उपन्यास- 'अपार्थ' (1986 ई०), 'आवर्तन' (1992 ई०), 'हैम्बरगर' (1996 ई०), 'ये खबर नहीं' (2000 ई०), 'पासवर्ड' (2010 ई०), 'मैं घूमर नाँचूँ' (2010 ई०) प्रकाशित हैं। 'अपार्थ' का अर्थ है- व्यर्थ, निष्प्रयोजन। अपार्थ का नायक 'अशोक' ऐसा ही नायक है। बचपन से ही वह "सबसे अलग था, तेजस्वी भाईयों में सबसे हीन, अंकिचन, दुर्बल, मरियल और बीमार-सा, अकेला और नितांत साधारण।"(16) अशोक की माँ भी उसे जब-तब प्रताड़ित करती रहती थी। किसी तरह 'अशोक' एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क हो जाता है। यहाँ भी वह- "तन से शिथिल, मन से खंडित, आत्मा से निस्तेज, थका-थका, बुझा-बुझा-सा, सिर में भयंकर दर्द और दिमाग में तूफान लिये" किसी प्रकार जी रहा था। ऐसे व्यक्ति की पत्नी उसके प्रति समर्पित कैसे रह सकती थी? वह अपने दो बच्चों-निखिल और तारा को छोड़कर पति के बॉस के साथ भाग जाती है। ऐसे निरीह, एकाकी, असहाय व्यक्ति के जीवन-यथार्थ का चित्रण करके लेखिका ने आज के मध्यवर्गीय समाज की उबाऊ, उद्देश्यहीन, घिसटती हुई, एकरस जिन्दगी को मूर्त किया है। आवर्तन का कथा-नायक 'अमर' एक डिग्री कॉलेज में हिन्दी विषय का प्रवक्ता है। वह अपने जीवन में तीन स्त्रियों के सम्पर्क में आता है। पत्नी 'पार्वती', भारतीय और पाश्चात्य समाज व संस्कृति के तुलनात्मक अध्ययन के लिए अमेरिका से भारत आई 'मीरा रामचन्द्रन' और रिश्ते की भांजी 'मिनाली'। पत्नी पार्वती तप्त मरुभूमि में शीतलता और सरसता का संचार करने वाली थी, किन्तु उसमें वह ऊष्मा नहीं थी, जो पुरुष को सम्मोहित किए रहती है। उसके साथ होना अमर के लिए कर्तव्यबोध से प्रेरित एक प्रक्रिया से गुजरना भर था। जीवन की एकरसता से ऊबा अमर अपने को अतृप्त अनुभव करता था। अमर मीरा रामचंद्रन का गांइड था। उसे उसके साहचर्य में सुख मिलता था, किन्तु मीरा रामचंद्रन शारीरिक सम्बन्ध को आत्मीयता का निकृष्टतम रूप मानती थी। उसके उद्दाम आकर्षण से विवश अमर ने उसे शारीरिक स्तर पर पाना चाहा, किन्तु उसने दुत्कार दिया। पार्वती से अतृप्त और मीरा रामचंद्रन से प्रताड़ित अमर ने रिश्ते की मर्यादा तोड़कर मिनाली को अपने आदिम निर्बाध संवेगों की तृप्ति का माध्यम बना लिया। उसे होश तब आया जब वह गर्भवती हो गई। गर्भ-मुक्ति के प्रयत्न में वह किसी तरह मृत्यु के मुख में जाते-जाते बची। पश्चात्ताप की आग में झुलसते हुए अमर को अंततः पार्वती की याद आई। उसने उसके त्याग और समर्पण का मूल्य समझा और उसकी ओर लौट पड़ा। लेखिका ने उपन्यास के माध्यम से स्पष्ट करना चाहा है कि भारतीय जीवन-शैली के अनुसार मर्यादित पति-पत्नी सम्बन्ध ही जीवन में शांति, सुख और मंगल का विधान करने वाला हैं। हैमबरगर में पंजाब के एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की 'रती' (रतीन्द्र) की संघर्ष-कथा कही गई है। रती की शादी कुलवीन्द्र से तय होती है। कुलवीन्द्र शादी से पहले ही रती से बलात् शारीरिक सम्बन्ध बना लेता है। रती, गर्भवती हो जाती है। कुलवीन्द्र शादी से इन्कार कर देता है। वह अपने होने वाले बच्चे को भी स्वीकार नहीं करता। ऐसी विषम अवस्था में रती की विधवा चाची गुरमीत कौर उसे सहारा देती है। गुरमीत विधवा है। उसका अमेरिका में अपना कारोबार है। वह रती को अमेरिका ले जाती है। रती वहीं हरीन्द्र को जन्म देती है। कालान्तर में कुलवीन्द्र की शादी 'रती' की छोटी बहन 'जस्सी' से होती है। कुलवीन्द्र को एक पुत्र की चाह है। जस्सी उसे पुत्र नहीं दे पाती। अंततः कुलवीन्द्र रती के बेटे 'हरीन्द्र' को बेटे के रूप में स्वीकार कर लेता है। 'रती' की इस संघर्ष-गाथा के साथ उपन्यास में आनुषंगिक रूप से अमेरिका में रहने वाले भारतीयों तथा अन्य अश्वेतों की अपमान भरी जिन्दगी के दारुण यथार्थ का चित्रण करते हुए लेखिका ने पश्चिमी एवं भारतीय जीवन-दृष्टियों का अन्तर भी स्पष्ट किया है। लेखिका की दृष्टि में "पश्चिम का विश्वास जड़ वस्तु में है, जो विकार उत्पन्न करती हैं। भारतीय दर्शन चेतना को स्थापित करता है, जो संस्कार की ओर ले जाता है।" भारतीय जीवन शैली के प्रति लेखिका का झुकाव उसके पिछले उपन्यास 'आवर्तन' में भी देखा जा सकता है। इस उपन्यास का अंत कुछ प्रायोजित-सा लगता है, किन्तु कथा-भूमि की नवीनता और जीवन-स्थितियों के चित्रण की विश्वसनीयता के कारण उपन्यास पठनीय और विशिष्ट बन गया है। यह खबर नहीं की कथा भूमि मुख्यतः दिल्ली है। लेखिका ने बड़ी साफगोई के साथ आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अमानवीय चेहरे को बेनकाब कर दिया है। वस्तुतः इसमें सच्ची घटनाएँ वास्तविक पात्रों के नाम बदलकर लिख दी गई हैं। पूरा उपन्यास नित्य घटित और अखबारों में प्रकाशित होने वाली घटनाओं के आधार पर रचा गया है। ये घटनाएँ इतनी सच हैं कि इन्हें खबर न कहकर इतिहास कहना ही उचित होगा। इसलिए उपन्यास का नाम 'यह खबर नहीं' रखा गया है। आज का प्रत्येक जिम्मेदार और महत्त्व प्राप्त व्यक्ति मुखौटा लगाए हुए हैं। महिलाओं के अधिकारों का जोरदार समर्थन करने वाली सांसद अपनी ही बहू के साथ होने वाली ज्यादतियों पर मौन रह जाती है। बलात्कार की रिपोर्ट न बदलने वाले डॉक्टर की हत्या कर दी जाती है। देखते-देखते हत्यारा मंत्री बन जाता है। पुलिस स्टेशन पर युवती के साथ बलात्कार होता है और फिर उसकी हत्या कर दी जाती है। कम्प्यूटर साइंस में पोस्ट ग्रेजुएट 'नेहा' को शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है। सर्वत्र 'सच' का गला घोंटा जा रहा है। आज की जड़, यांत्रिक और घोर व्यावसायिक व्यवस्था के भयावह यथार्थ का चित्रण करने वाला यह उपन्यास समकालीन जीवन का ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया है। पूर्व-दीप्ति शैली के भीतर मदारी का तमाशा, नाटकीय दृश्य-विधान, रिपोर्ताज, अखबारी सूचना आदि कई शैलियों के प्रयोग ने उपन्यास को अतिरिक्त आकर्षण प्रदान किया है। निश्चय ही इस उपन्यास ने लेखिका की रचना शैली को एक नया आयाम प्रदान किया है। 'मैं घूमर नाचूँ' राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास है। कृष्णा नाम की बाल विधवा के बहाने यह किलों, दुर्गों, गढ़ों, स्तूपों, कुओं, बावड़ियों, झरोखों, छतरियों, देवलों और मन्दिरों के प्रदेश का रूमानी वर्णन करता है। इस उपन्यास में बड़े प्रभावशाली तरीके से दिखाया गया है कि लड़कियाँ घर के भीतर चकरी खेल सकती हैं, लेकिन अगर वे कुल का जड़ी खेलने की कोशिश करती हैं तो ताई या बुआ रोकने लगती हैं। किस प्रकार पूर्व निर्धारित खाँचों में फिट कर दिया जाता है या किस प्रकार उनकी नियति पहले से ही तय कर दी जाती है इसका बड़ा ही मार्मिक वर्णन इस उपन्यास में है।


(14) नासिरा शर्मा :

            नासिरा शर्मा ने एक प्रगतिशील मानवधर्मी लेखिका के रूप में अपनी पहचान बनायी है। उनके बारह उपन्यास- 'सात नदियाँ: एक समुन्दर' (1984 ई०) 'शाल्मली' (1987 ई०) 'ठीकरे की मँगनी' (1989 ई०) 'जिन्दा मुहावरे' (1993 ई०), 'अक्षय वट' (2003 ई०), 'कुइयाँजान' (2005 ई०), 'जीरा रोड' (2008 ई०), 'पारिजात' (2011 ई०), 'अजनबी जजीरा' (2012 ई०), 'कागज की नाव' (2014 ई०), 'शब्द पखेरू' (2017 ई०), 'दूसरी जन्नत' (2018 ई०) प्रकाशित हैं। सात नदियाँ एक समुन्दर में आज के ईरान की कथा कही गयी है। ईरान की जनता ने रजाशाह पहलवी के खिलाफ बगावत करके उनकी तानाशाही से मुक्ति प्राप्त करनी चाही थी, किन्तु इस बगावत से उसे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हुई। शाह के जाने के बाद इस्लामी गणतन्त्र के नाम पर अयातुल्ला खुमैनी ने जनता पर एक दूसरे प्रकार की तानाशाही लाद दी। प्रस्तुत उपन्यास में लेखिका ने इस धार्मिक तानाशाही के दबाव में पिसती हुई जनता का बड़ा ही सजीव चित्र खींचा है। लेखिका ने जनात के दुःख-दर्द को मानवीय दृष्टि से देखा है और उसे पूरी सहानुभूति दी है। शाल्मली में लेखिका ने एक सुशिक्षिता और केन्द्रीय सरकार की सेवा में प्रथम श्रेणी की पदाधिकारी पत्नी और किसी सरकारी दफ्तर में सेक्शनल ऑफिसर के रूप में कार्यरत हीन-भावना-ग्रस्त पति के बीच उभरने वाले पारिवारक तनावों और विसंगतियों का चित्रण किया है। पति की क्रूरता को सहन करती हुई भी पत्नी (शाल्मली) परिवार को टूटने-बिखरने से बचाये रखना चाहती है। वह अपनी विस्तृत दृष्टि को संकुचित नहीं होने देती। चुपचाप निर्लिप्त भाव से पति (नरेश) के अत्याचारों को सहती जाती है। दाम्पत्य जीवन की विसंगतियों का यह समाधान व्यापक सामाजिक स्वीकृति पा सकेगा, इसमे सन्देह है। 'ठीकरे की मंगनी' रूढ़ियों में जकड़े एक मध्यवर्गीय मुसलिम परिवार की शिक्षित और संवेदनशील युवती 'महरूख' की संघर्ष कथा है। महरूख के परिवार में लड़कियाँ नहीं जीती थीं, इसलिए टोटके के रूप में पैदा होते ही उसकी मंगनी मौसेरे भाई रफत से कर दी जाती है। बी०ए० कर लेने के बाद रफत भाई की इच्छानुसार उसका दाखिला जे०एन०यू० (दिल्ली) में करा दिया जाता है। जे०एन०यू० में पढ़ते हुए वह उस प्रख्यात संस्था के अन्तर्विरोधों से परिचित होती है। वह देखती है कि साम्यवाद एक मुखौटा बन गया है, जिसे प्रायः लोग अपने विकास की सीढ़ी बना लेते हैं। रफ़त भाई वजीफा लेकर आगे पढ़ने के लिए अमेरिका चले जाते हैं। वहाँ एक अमेरिकन लड़की से ब्याह रचाते हैं, फिर उसे तलाक देकर भारत लौट आते हैं। उनके इस व्यवहार से महरूख भीतर से टूट जाती है। वह उनसे शादी करने से इन्कार कर देती है। जे०एन०यू० में अपना शोध-कार्य छोड़कर वह एक छोटे से गाँव में पढ़ाने लगती है। वह गाँव के लोगों को साहस के साथ अन्याय से लड़ना सिखाती है। वह अपने जीवन के सारे अनुभव सामने रखकर सोचती है कि सारे संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के बावजूद आज भी स्त्री दासी है और पुरुष स्वामी।

             वह इस निर्णय पर पहुँचती है- "यह लड़ाई एक दो दिन की नहीं, पूरी सदी तक लड़ी जाने वाली है, जब सब बदलकर एकदम नए की बुनियाद डाली जायगी। वरना पैबंद लगाते-लगाते यह खस्ता इमारत कब तक खड़ी रखेंगे? महरूख की यह सोच लेखिका की सोच भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में उसे यह भी सोचना चाहिए था कि बिना किसी संघटन और ठोस वैचारिक आधार के कोई भी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती; आज के समाज को देखते हुए वह वैचारिक आधार क्या होगा? और संघटन का स्वरूप कैसा होगा?"(17) जिन्दा मुहावरे देश के बँटवारे की भयंकर त्रासदी को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। बँटवारे के समय परिवार के लोगों के विरोध के बावजूद निजाम पाकिस्तान (कराची) चला जाता है। वहाँ धीरे-धीरे अपने परिश्रम और लगन के बल पर सम्पन्न तो हो जाता है, किन्तु सुकून प्राप्त नहीं कर पाता। वह अपने घर-परिवार के लोगों के लिए बिसूरता रहता है। बहुत दिनों बाद वह घर लौटता है। पुराने लोग बड़े अपनत्व के साथ मिलते हैं, किन्तु जब वह अपने ही एक खानदानी दोस्त सैफ़उल्लाह से उसकी बेटी का हाथ अपने बेटे अख्तर के लिए माँगता है तो वह कहता है- "कौन अपनी लड़की नेपाल, अफगानिस्तान, ईरान ब्याहता है? फिर पाकिस्तान क्यों हम ब्याहें?" निजाम अनुभव करता है कि अब उसकी हैसियत गैर मुल्क के एक नागरिक की हो गई है। बँटवारे के बयालीस वर्षों बाद एक ही कौम के लोग एक चने की दो दाल न रहकर दो अलग-अलग दरख्त बन गए हैं। धर्म और सम्प्रदाय की राजनीति ने लोगों के मन में जहर घोल दिया है। निजाम दुःखी होकर पाकिस्तान लौट जाता है। उपन्यास लिखते हुए लेखिका ने यह विश्वास प्रकट किया है कि भविष्य में आने वाली नस्लें मानवीय पीड़ा और काले अनुभवों से सबक लेंगी और ऐसी राजनीति से हाथ खींचेगी, जो अभिशाप बन दिलों को काटती, जमीन को बाँटती, घरों को उजाड़ती, बारूद के ढेर पर बैठे इन्सान को रूहानी तौर पर लगातार कमजोर बनाती जा रही है। निश्चय ही नासिरा शर्मा के उपर्युक्त दोनों ही उपन्यासों ने उन्हें एक नई पहचान दी है। 'अक्षयवट' (2003 ई०) की पूरी कथा 'इलाहाबाद' शहर को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। इलाहाबाद का जीवन द्वन्द्वात्मक है। एक ओर तो उसके पास उदात्त मानवीय मूल्यों की विरासत है, दूसरी ओर वर्तमान जीवन-व्यवस्था की विकृतियाँ। लेखिका ने इस द्वन्द्व को पूरी सजगता से अंकित करते हुए 500 पृष्ठों के इस वृहत उपन्यास की रचना की है। 'कुइयाँ जान' (2005 ई०) में लेखिका ने अनेक छोटे-बड़े कथा-सूत्रों के माध्यम से आधुनिक टेकनालॉजी के बढ़ते प्रभाव के कारण क्रमशः निरन्तर छीजते जलस्त्रोतों की समस्या पर गम्भीरता से विचार किया है। पूरे उपन्यास में यह समस्या अन्तर्धारा के रूप में प्रवहमान है। लेखिका ने इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है कि यही स्थिति रही तो एक दिन मानव जीवन घोर संकट में पड़ सकता है।

           'कागज की नाव' (2014 ई०) नासिरा शर्मा का विशिष्ट उपन्यास है। यह उपन्यास बिहार में रहने वाले उन परिवारों का वृत्तान्त है जिनके घर से कोई-न-कोई पुरुष खाड़ी मुल्कों में नौकरी करने गया हुआ है। वतन से दूर रहने वाले यहाँ छोड़ जाते हैं बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक का भरा पूरा संसार। खाड़ी मुल्कों से आने वाले रुपये और रिश्तों के अँधेरे उजाले। 'कागज की नाव' एक रूपक के रूप में उपन्यासकार ने रखा है यानि जरूरतों और जिम्मेदारियों के समन्दर को चन्द रुपयों के सहारे पार करने की कोशिश। उपन्यास महजबो और अमजद की बड़ी बेटी महलमा के पारिवारिक तनाव को केन्द्र में रखकर विकसित हुआ है। मुख्य कथा के साथ भोलानाथ, कैलाश, बिन्दु, सुधा, कांता, राजेश, त्रिसुलिया, क्रान्ति झा और मुक्ति झा आदि चरित्रों की बेहद मानवीय उपकथाएँ हैं। यह उपन्यास जिन्दगी और इन्सानियत के प्रति हमारे यकीन को पुख्ता करने वाला महत्वपूर्ण उपन्यास है।


(15) निरुपमा सेवती :

           निरुपमा सेवती के चार उपन्यास- 'पतझड़ की आवाजें' (1976 ई०), 'बँटता हुआ आदमी' (1977 ई०), 'मेरा नरक अपना है' (1977 ई०), 'दहकन के पार' (1982 ई०) - प्रकाशित हैं। पतझड़ की आवाजें में आपने ऐसी नारियों के जीवन-संघर्ष का चित्रण किया है, जिन्हें एक ओर परिवार की आर्थिक दुर्दशा से जूझना पड़ रहा है, दूसरी ओर अपनी आंतरिक इच्छाओं-आकाक्षांओं से। बँटता हुआ आदमी में लेखिका ने संघर्ष के दूसरे बिन्दु को उभारा है। आज की व्यवस्था में प्रतिभासम्पन्न, मेहनती और ईमानदार आदमी की कद्र नहीं है। मक्कार, खुशामदी, मौकापरस्त और बेईमान आदमी आगे बढ़ जाते हैं और ईमानदार टूटने-बिखरने और खुदकुशी करने के लिए विवश होते हैं। पुरुष हों या स्त्री, दोनों के सामने यह प्रश्न सुरसा की तरह मुँह बाये खड़ा है। लेखिका ने फिल्म जगत् की अमानवीयता और स्वार्थपरता को विषय बनाकर उपर्युक्त सत्य का साक्षात्कार कराया है। दहकन के पार में हिन्दू लड़की 'तुषार' और मुसलमान लड़के 'असलम' के बीच प्रेम का चित्रण करते हुए लेखिका ने धार्मिक-साम्प्रदायिक रुढ़ियों पर प्रहार किया है। 'तुषार' और 'असलम' प्रेम तो करते हैं, किन्तु विवाह नहीं कर पाते। इसमें धर्म बाधक बनकर खड़ा हो जाता है। 'तुषार' को गर्भ रह जाता है। 'असलम' उसे गर्भपात कराने की राय देता है। वह इसके लिए तैयार 'नहीं होती। 'असलम' एक साम्प्रदायिक दंगे में मारा जाता है। दोनों के मित्र डॉक्टर 'इकबाल' 'तुषार' को सान्त्वना देते हैं। कुछ दिनों बाद 'तुषार' एक बच्चे को जन्म देती है। इकबाल उसे और उसके बच्चे दोनों को अपनाकर, न केवल अपनी उदारता का परिचय देते हैं, वरन् नये मानवतावाद का आदर्श भी उपस्थित करते हैं। इस प्रकार निरुपमा सोवती ने आधुनिक सामाजिक व्यवस्था के भीतर घुटती हुई नारी के जीवन-संघर्ष को अनेक बिन्दुओं पर उभारते हुए भविष्य के प्रति आशावादी स्वर मुखरित किया है।


(16) प्रभा खेतान :

          प्रभा खेतान एक संभ्रान्त, सुशिक्षित और प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं। उन्होंने अपने उपन्यासों में नारी- जीवन की त्रासदी को एक संवेदनशील नारी की दृष्टि से देखा है। सीमोन द बोउआर की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'दी सेकेण्ड सेक्स' का हिन्दी रूपान्तर प्रस्तुत करके उन्होंने ख्याति अर्जित की है। आपके पाँच उपन्यास- आओ पेपे घर चलें (1990 ई०), 'तालाबन्दी' (1991 ई०), 'छिन्नमस्ता' (1993 ई०), 'अपने-अपने चेहरे' (1994 ई०), 'पीली आँधी' (1996 ई०) - प्रकाशित हैं। 'आओ पेंपे घर चलें' में आपने अमेरिका के तीन शहरों-लास एंजेल्स, सेंट लुइस और न्यूयार्क में रहते हुए अपने अनुभवों के आधार पर अमेरिकी नारी-जीवन की अन्तर्व्यथा का उद्घाटन किया है। उपन्यास में आइलिन, मिसेज डी, क्लारा ब्राउन, मरील, मिसेज हेल्गा बेरी, कैथी आदि अनेक नारी पात्र हैं। सभी आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न और आत्मनिर्भर हैं, किन्तु सभी अपने सीने में दर्द का दंश दबाए हुए हैं। सभी पुरुषों की स्वार्थपरता और निष्ठुरता का शिकार हैं। आइलिन का अनुभव है- "माई डियर ! औरत कहाँ नहीं रोती और कब नहीं रोती! वह जितना ही रोती है, उतनी ही औरत होती जाती है।" अमेरिका की तेज व्यावसायिक जिन्दगी ने मानवीय संवेदना का क्षय किया है। वहाँ के जानवरों में कहीं अधिक मानवीयता है। आइलिन का कुत्ता 'पे पे' उसकी समाधि पर आँसू बहाता है। लेखिका उससे पुत्र जैसा अपनत्व अनुभव करती है। उपन्यास की अंतिम पंक्तियों में उसे याद करते हुए कहती है- "पे पे क्या तुम्हारे गले में मेरा कढ़ाई वाला कालर अब भी बँधा है?"(18) उपन्यास का नाम 'आओ पे पे घर चलें' उसे केन्द्रीय पात्र की भूमिका प्रदान करता है। अमेरिका जैसे समृद्ध देश की नारी की पीड़ा का उद्घाटन करके यह उपन्यास विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण हो गया है। तालाबंदी में मोमिनपुर इलाके में एक परिश्रमी, साधनहीन, किन्तु व्यवसाय कुशल मारवाड़ी श्याम बाबू द्वारा एक फैक्ट्री के स्थापित, समृद्ध और बन्द होने की कहानी कही गई है। उपन्यास में उस मार्क्सवादी राजनीति को उभारा गया है, जो आज धर्म का रूप ले चुकी है और जिसके चलते बंगाल में एक के बाद एक फैक्ट्रियाँ बन्द होती जा रही हैं। यूनियन के नेता समस्याओं पर मानवीय दृष्टि से विचार नहीं करते। वे एक के बाद दूसरी माँग पेश करते रहते हैं। वे यह नहीं देखते कि आज फैक्ट्री चलाना आसान नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर घोर प्रतिद्वन्द्विता है। अमीर राष्ट्र गरीब राष्ट्रों के उद्योग धन्धों को पनपते नहीं देखना चाहते। यूनियनों में नेतृत्व की लड़ाई अलग चलती रहती है। पुलिस, यूनियन लीडर, लेबर का वकील सब पैसा खाते हैं। इस माहौल में या तो उद्योगपति फैक्ट्री बंद करके दूसरे राज्य में चला जाता है या बंगाल में ही दूसरी जगह दूसरे नाम से फैक्ट्री फिर चालू करता है। पूरे उपन्यास में श्यामबाबू अपनी दृढ़ता, सूझबूझ, श्रमशीलता एवं संवेदनीयता तथा खांटी मार्क्सवादी यूनियन नेता शेखर बाबू अपने विवेक और मानवीयता के कारण हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। इस पूरे फैक्ट्री यथार्थ के बीच उपन्यास इस सत्य को रेखांकित करता है कि क्रांति की लहर अपने सारे उतार-चढ़ाव के बावजूद इतिहास की एक बेदाग सच्चाई है। एक सच्चे मार्क्सवादी नेता का कर्तव्य है कि वह मजदूरों की क्रांति-चेतना को जड़ीभूत न होने दे। 'छिन्नमस्ता' एक ऐसी नारी का जीवन-संघर्ष है, जो पुरुष-प्रधान समाज में पुरुषों के वर्चस्व के विरुद्ध अपनी अलग पहचान और जमीन बनाना चाहती है। पुरुष ने अर्थ और सेक्स इन दोनों स्तरों पर नारी का निरन्तर शोषण किया है। छिन्नमस्ता की कथा-नायिका प्रिया इन दोनों मोर्चे पर उसके शोषण से मुक्त होना चाहती है। वह किसी भी स्थिति में पुरुष का गुलाम बनकर नहीं रहना चाहती। उसकी दृष्टि में संवेदना, दोस्ती, प्यार सब पारस्परिक होते हैं। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध इसी पारस्परिकता की भूमि पर स्थिति होने चाहिए। पूरे उपन्यास को पढ़कर ऐसा लगता है कि प्रिया सिद्धान्त के स्तर पर जो सोचती है और जैसा जीवन वह जीना चाहती है, व्यवहार के स्तर पर उसे उपलब्ध करने के लिए उसके पास कोई सुविचारित मॉडल नहीं है। अपने-अपने चेहरे-में एक समृद्ध मारवाड़ी परिवार की अंतरंग कथा के माध्यम से नारी-जीवन की त्रासदी की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है। परिवार के मुखिया राजेन्द्र गोयनका की पत्नी फूहड़ और गँवार हैं। पत्नी के साथ गोयनकाजी का सम्बन्ध सामाजिक मर्यादा के निर्वाह तक सीमित है। उनके जीवन में एक सुशिक्षित और संभ्रान्त आधुनिक महिला रमा की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। रमा उनके उद्योग-तन्त्र को सँभालने के साथ ही उनकी भावनाओं को भी तुष्ट करती है। विडम्बना यह है कि दोनों में एक भी सुखी नहीं है। एक स्तर पर दोनों अपने को उपेक्षित अनुभव करती हैं। पत्नी की सामाजिक पहचान है, किन्तु गोयनका जी के हृदय में उसके लिए जगह नहीं है, वह घर की उपेक्षित वस्तु मात्र हैं। रमा को वे दिल से चाहते हैं, किन्तु समाज में उसे कोई मर्यादित पहचान नहीं दे पाते। रमा का दर्द है- "मेरा परिचय क्या है इस उम्र में? किसकी पत्नी किसकी माँ ? किस घर की बहू? मैं न सधवा, न विधवा। अपनी तस्वीर इतनी धुँधली क्यों लगती है?"(19) आज की सुशिक्षित विवाहिता भी उपेक्षित और शोषित होने के लिए विवश है। गोयनका साहब की बिटिया 'रीतू' दिल्ली के एक उद्योगपति के बेटे से ब्याही है। उसमें कोई कमी नहीं है। वह सुन्दर और सुशिक्षित है, किन्तु ब्याह के थोड़े ही दिनों बाद उसके पति का सम्बन्ध एक अन्य युवती से हो जाता है। वह अपमानित होकर पिता के पास आ जाती है। गोयनका साहब इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाते। उनकी मृत्यु हो जाती है। अन्ततः 'रमा' रीतू को सहारा देती है और अपने साथ रखती है। उपन्यास इस जीवंत सत्य को रेखांकित करता है कि पुरुष-प्रधान समाज में नारी चाहे जिस वर्ग की हो और चाहे जिस भूमिका में हो, उसे आहत, अपमानित और उपेक्षित होना ही है। पीली आँधी प्रभा खेतान का सर्वाधिक चर्चित और प्रशंसित उपन्यास है। यह कई स्तरों पर प्रभावित करता है। इसमें मारवाड़ की सामन्तीय व्यवस्था के उत्पीड़न और अकाल से त्रस्त मारवाड़ी जाति का कलकत्ता आने और इस बेगानी धरती पर अनेक अवरोधों-विरोधों के बावजूद अपने श्रम एवं व्यापार-कुशलता के बल पर व्यवस्थित और समृद्ध होने का अत्यन्त विश्वसनीय चित्रण किया गया है। यही नहीं, इस पूरे दौर में समय के साथ इस जाति की मानसिकता एवं जीवन-शैली में होने वाले परिवर्तनों तथा आधुनिकता के दबाव से उदीयमान नारी-चेतना का सूक्ष्म-विश्लेषण इस उपन्यास की दूसरी बड़ी उपलब्धि है। उपन्यास के दो नारी-पात्र 'ताई' और 'सोमा' विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। विपरीत परिस्थितियों में परिवार की सारी मर्यादाओं का निर्वाह करते हुए, अपने निजी दर्द को सीने में दबाए हुए, 'ताई' व्यापारिक लेन-देन के साथ ही पूरी व्यवस्था का दायित्व इस साहस और खूबी से निभाती हैं कि परिवार के पुरुष सदस्य उनके सामने बौने प्रतीत होते हैं। उनकी मानवीयता, सोमा के प्रति मूक सहानुभूति और सुराणाजी के प्रति पूजा-भाव का दर्जा प्राप्त कर लेने वाला गूढ़ प्रेम उन्हें एक विरल-विशिष्ट नारी-चरित्र के रूप में उभारकर सामने लाता है। 'सोमा' का संकल्प और साहस उदीयमान नारी शक्ति की ओर संकेत करता है। वह सुजीत को प्यार करती है। उसका गर्भ धारण करती है और अपने पति गौतम से साफ कहती है- "मैंने तुमसे कभी प्यार नहीं किया। नहीं, तुम्हारी कोई स्मृति नहीं; हाँ मैं सुजीत से प्यार करती हूँ। गौतम, मैं जीना चाहती हूँ, मैं जीना चाहती हूँ। यहाँ इस घर में लोग साँस लेते हैं, लेकिन जीते नहीं।"(20) उपन्यास में सुजीत की पत्नी चित्रा का, पति के साथ सोमा के सम्बन्धों को सहज रूप में स्वीकार कर लेना और फिर चुपचाप घर छोड़कर चला जाना कुछ अविश्वसनीय लगता है, किन्तु इससे पूरे उपन्यास की विश्वसनीयता खंडित नहीं होती। सब मिलाकर यह डॉ० खेतान का निश्चय ही श्रेष्ठ उपन्यास है।


(17) मैत्रेयी पुष्पा :

             महिला कथा-लेखिकाओं में मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी रचनाओं की ताजगी और ऊष्मा से सहसा हिन्दी-जगत् का ध्यान आकृष्ट कर लिया है। आपके अब तक बारह उपन्यास -'स्मृति दंश' (1990 ई०), 'बेतवा बहती रही' (1993 ई०), 'इदन्नमम' (1994 ई०), 'चाक' (1997 ई०), 'झूला नट' (1999 ई०), 'अल्मा कबूतरी' (2000 ई०), 'अगन पाखी' (2001 ई०), 'विजन' (2002), 'कहे ईसुरीफाग' (2004 ई०), 'त्रिया हठ' (2005 ई०), 'गुनाह बेगुनाह' (2011 ई०), 'फरिश्ते निकले' (2014 ई०) प्रकाशित हैं। 'स्मृतिदंश' आपका पहला उपन्यास है। अपने दूसरे उपन्यास 'बेतवा बहती रही' से आपने अपनी पहचान कायम की और 'इदन्नमम' से आपको व्यापक ख्याति प्राप्त हुई। 'बेतवा बहती रही' एक गरीब परिवार में जन्मी, बहुत कम पढ़ी-लिखी स्त्री 'उर्वशी' की संघर्ष-गाथा है। उर्वशी का ब्याह सर्वदमन से होता है। सर्वदमन नई रोशनी का सुशिक्षित युवक है। पेशे से वकील है। उसका भरपूर प्यार उर्वशी को मिलता है, किन्तु भाग्य की विडम्बना कि वह बहुत कम उम्र में विधवा हो जाती है। इसके बाद से ही उसकी जीवन-दिशा बदल जाती है। उसका सगा भाई दस बीघा जमीन लेकर उसका ब्याह एक नर-राक्षस बरजोर सिंह से कर देता है। बरजोर सिंह उसकी सखी मीरा का बाप है और उसकी पिता की उम्र का है। उर्वशी अपने दुधमुँहे बच्चे को अपने जेठ के संरक्षण में छोड़कर आई थी। उसके लिए उसके मन में हूक उठती रहती है। वह जिन्दा लाश बनकर जीती है। उसका मूक विद्रोह उसकी प्रत्येक चेष्टा से झलकता है, किन्तु वह बिना कुछ बोले साँस ढोती रहती है। वह बस एकबार अपनी जबान तब खोलती है, जब बरजोर सिंह अपने बड़े बेटे विजय की मृत्यु के बाद साल भीतर पैसे के लोभ में अपने दूसरे बेटे उदय की शादी बिना उसकी मर्जी के मनमाना दहेज लेकर करना चाहते हैं। वह कहती है- "उदय की शादी के लिए जो लोग आए हैं, पइसा वाले हैं, अपनी बिटिया के लिए आसानी से उदय जैसा वर खोज लेंगे; लेकिन हमारे विजय की बहू, कहाँ जायगी वह ? कौन ब्याहने आयेगा उसे? तुमने कबहुँ सोची जे बात।"(21) वह उदय की सहमति से उसका ब्याह विजय की विधवा से करा देती है। बरजोर सिंह चुप नहीं बैठते। वे वैद्य को मिलाकर उर्वशी की धीमी गति से असर करने वाला जहर दिलवा देते हैं। सूचना पाकर उसके जेठ उसे देखने आते हैं और उसकी अंतिम इच्छा को मान देते हुए उसका दाह बेतवा के किनारे सम्पन्न कराते हैं। उपन्यास का अंतिम वाक्य उर्वशी के अन्तर्दाह की कथा बन गया है-"आसमान जल उठा, जल उठी धरती और सारे दाह को स्वयं में समेटे आग की लपटों के साथ-साथ धधकती बेतवा क्रुद्ध भाव से बहती रही।"(22) उर्वशी की कथा के साथ-साथ लेखिका ने स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद नेताओं की टुच्ची राजनीति, अनैतिक आचरण, विकास के नाम पर जनता का शोषण, सरकारी कर्मचारियों की घूसखोरी, पैसे का बढ़ता प्रभाव, अमानवीयता, अराजकता, आदि का भी प्रभावी चित्रण किया है। उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है- गाँव की नारी का जागृत होना। सदियों से गाय की तरह जड़ता के खूंटे से बँधी असहाय नारी अब पुरुष वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अपना कदम बढ़ा चुकी है। इदन्नमम की कथा-भूमि विस्तृत है। इसमें नारी चेतना को व्यापक सामाजिक परिवेश में उभारा गया है। यहाँ देश के स्वतंत्र होने के बाद का पूरा सामाजिक यथार्थ अपने अन्तर्विरोधों के साथ विद्यमान है। सामन्तीय संस्कारों में रचे-बसे परिवार, आर्थिक प्रलोभनों के चलते, दरकते हुए पारिवारिक रिश्ते, भ्रष्ट राजनीति, नौकरशाही का अमानवीय चरित्र, नये नेता और शोषण के नये तरीके, वोट की राजनीति, जातीय समीकरण, हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों में खटास, आरक्षण की राजनीति, असन्तुलित विकास योजनायें और चरित्र के संकट के चलते उनकी विफलता इन सारे जीवन-संदर्भों की सघनता उपन्यास को समृद्ध करती है। नारी-पात्रों का शोषण यहाँ भी है, किन्तु यहाँ वे अपेक्षाकृत सक्रिय हैं और अपने ढंग से पुरुष वर्चस्व को चुनौती देती हैं। उपन्यास का केन्द्रीय नारी पात्र 'मंदा' है। वह महेन्दर सिंह की बेटी है। महेन्दर स्वप्नदर्शी नेता थे। उनकी राजनीतिक हत्या के बाद 'मंदा' उनके सपनों को साकार करने का व्रत लेती है। कच्ची उम्र में ही उसके साथ बलात्कार हुआ है, किन्तु उसके मन में किसी प्रकार का अपराधबोध नहीं है। मकरन्द उसका प्रेमी है, किन्तु उससे उसका ब्याह नहीं हो पाता। मकरन्द का प्रेम उसे शक्ति देता है। महाराज जैसे नैतिक, विवेकनिष्ठ और सर्वमान्य व्यक्ति से वह प्रेरणा लेती रहती है। वह सामूहिक संघर्ष में विश्वास करती है और इसके लिए लोकशक्ति जागृत करती है। वह मजदूरों को उनकी मेहनत का महत्त्व और मूल्य समझाती है और आगे बढ़कर अभिलाष सिंह जैसे शक्तिशाली ठेकेदार को चुनौती देती है। उपन्यास यह प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह सफल रहा है कि आज भी पुरुष-सत्ता का प्राधान्य है। वह सब कुछ करके मूँछों पर ताव देता रहता है और नारी का जरा-सा स्खलन उसकी बरबादी का कारण बन जाता है, किन्तु अब नारी शक्ति जाग उठी है। अब सामाजिक ढाँचे को तोड़ती हुई न केवल वह अपने अधिकारों को सुरक्षित करेगी, वरन् समाज को नई दिशा में आगे भी बढ़ायेगी।

           'चाक' में कथा लेखिका ने बुन्देलखण्ड से बाहर आकर व्रज-क्षेत्र के जीवन-यथार्थ को चित्रित किया है। यहाँ अलीगढ़ की इगलास तहसील का अतरपुर गाँव कथा के केन्द्र में है। गाँव में अनेक जातियाँ हैं, किन्तु वर्चस्व जाटों का है। गाँव पिछड़ा हुआ है। विकास के नाम पर कुल इतना ही किया गया है कि गाँव को एक चकरोड के द्वारा मुख्य सड़क से जोड़ दिया गया है। सिंचाई के लिए एक सरकारी ट्यूबवेल है। वहाँ से दो-एक घरों में बिजली आ गई है और गाँव में एक प्राइमरी स्कूल भी चालू हो गया है। गाँव का मुख्य धंधा खेती है। यहाँ भी नारी का शोषण बरक़रार है और गाँव की नारी अपनी लड़ाई लड़ने के लिए आगे बढ़कर अपनी शक्ति का अहसास करा रही है। कथा-नायिका सारंग गुरुकुल में रह चुकी है। उसने 'शाकुंतलम्' और 'कुमारसंभव' पढ़ रखा है। 'सत्यार्थप्रकाश' के सत्य से भी वह परिचित है। उसे वर्तमान सामाजिक ढाँचे के अन्तर्गत स्त्री और पुरुष में विभाजक रेखा खींचने वाले दुहरे नैतिक मानदण्ड से चिढ़ है। उसका पति रंजीत कृषि से एम०एस-सी० है, किन्तु घर पर रहते हुए खेती का काम देखता है। सारंग की फुफेरी बहन रेशम भी उसी गाँव में ब्याही है। वह विधवा हो गई है, किन्तु उसके पेट में उसके प्रेमी का बच्चा पल रहा है। बदनामी के डर से उसका जेठ उसकी हत्या कर देता है। सारंग अपराधी को सजा दिलाना चाहती है। वह रेशम के ससुराल वालों पर मुकदमा कर देती है। गवाही के अभाव में रेशम का जेठ डोरिया टूट जाता है। सारंग की कठिनाइयाँ बढ़ जाती हैं। अपहरण के डर से वह अपने बेटे चंदन को आगरा भेज देती है। गाँव की पाठशाला में आए हुए श्रीधर मास्टर जाति से प्रजापति हैं। नई रोशनी के पढ़े-लिखे व्यक्ति है। सारंग उनके संपर्क में आती है और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होती है। श्रीधर भी सारंग के भीतर की विद्रोहिणी नारी को पहचान जाता है। दोनों एक दूसरे के और निकट आते हैं। सारंग का पति रंजीत इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता। श्रीधर गाँव की राजनीति में न्याय का पक्ष लेता है। गाँव के गुण्डे उसके विरुद्ध हो जाते हैं। रंजीत गुंडों का साथ देता है। श्रीधर को रात में बुरी तरह पीट दिया जाता है। सारंग जानती है कि इस काण्ड में रंजीत का हाथ है। सारंग की अथक सेवा से श्रीधर ठीक हो जाता है। 'श्रीधर' सारंग का कल्पना-पुरुष है। वहीं वह 'चाक' है, जिस पर गढ़ी जाकर सारंग एक तेजस्विनी नारी के रूप में प्रकट होती है। वह गाँव की स्त्रियों का संघटन करती है। ग्राम-प्रधान का चुनाव लड़ती है और विरोधियों के चक्रव्यूह को तोड़कर विजय प्राप्त करती है। सारंग के नेतृत्व में धरती की बेटियाँ लौह जंजीरों को काट फेंकती हैं। लेखिका ने अपनी संपूर्ण रचनात्मक प्रतिभा का उपयोग इसी नारी शक्ति को जगाने में किया है। उसके परवर्ती उपन्यासों में भी यही रचना-दृष्टि लक्षित की जा सकती है।

           'झूलानट' अपेक्षाकृत छोटा उपन्यास है। इसमे बुन्देलखण्ड के एक ग्रामीण परिवार की कथा है। परिवार में विधवा माँ, दो बेटे-सुमेर और बालकिशन-और सुमेर की बहू शीलो यही चार प्राणी हैं। सुमेर पुलिस में है। बालकिशुन गाँव में खेती देखता है। सुमेर को शीलो पसंद नहीं है। वह शहर में दूसरी औरत रख लेता है। शीलो अपनी सास की इच्छा से बालकिशुन के साथ बैठ जाती है, लेकिन 'बछिया' की रस्म नहीं होने देती। इसके बाद सुमेर का आना-जाना बढ़ जाता है। वह सीलों के प्रति मेहरबान होने लगता है। वह शीलो को पटाकर अपने हिस्से की जमीन बेचना चाहता है। शीलो उसकी मंशा भाँप जाती है। वह सुमेर से साफ कह देती है- "बालकिशन तो ऐसे ही है हमारे लिए, जैसे तुम्हारे लिए तुम्हारी दूसरी औरत।"(23) सुमेर लौट जाता है। पूरी जमीन बालकिशुन के कब्जे में बनी रहती है। शीलो और उसकी सास में नहीं पटती। दोनों के बीच बालकिशन पिसता रहता है। अन्ततः वह घर छोड़कर भाग जाता है। पूरे उपन्यास में बालकिशुन की स्थिति तनी हुई रस्सी पर झूलते हुए नट की है। वह माँ और शीलो, घर और खेत तथा राग और विराग के बीच तनी हुई रस्सी पर झूलता रहता है। उपन्यास का सबसे सशक्त पात्र है-शीलो। शीलो के रूप में लेखिका ने 'मणिधारिणी नागिन' को प्रस्तुत किया है। शीलो का चरित्र नारी-चेतना को एक नया आयाम देता है।

            'अल्मा कबूतरी' कबूतरा जाति में जन्मी 'अल्मा' की संघर्ष-गाथा है। कबूतरा एक जनजाति है। अंग्रेजों ने इस जाति को जरायमपेशा घोषित किया था, किन्तु यह लोग अपना सम्बन्ध रानी पद्मिनी, राणाप्रताप और झाँसी की रानी की प्रिय सखी झलकारी बाई से जोड़ते हैं। अल्मा का पिता रामसिंह पढ़ा लिखा है, अध्यापक है, किन्तु नियतिवश पुलिस का एजेण्ट बन गया है। उसने 'अल्मा' को पढ़ाया-लिखाया है। उसे सभ्य समाज के लायक बनाया है। उसे लेकर उसके मन में सुनहले सपने भी रहे होंगे। मंसाराम माते और कदमाबाई कबूतरी का बेटा 'राणा' भी रामसिंह के संरक्षण में पढ़ता-लिखता है। वह 'अल्मा' से प्यार करता है। दोनों का ब्याह होने वाला है। किन्तु पुलिस रामसिंह को डाकू क़रार करके मार डालती है। रामसिंह की मृत्यु के बाद सबकुछ उलट जाता है। अल्मा सूरजभान जैसे डाकू राजनेता के चंगुल में फँस जाती है। सूरजभान सर्किट हाउस में मंत्रियों और साहब लोगों को लड़कियाँ पेश करता था। इसी रास्ते चलकर वह राजनीति के शिखर तक आया था। मंसामाते का भानजा धीरज सूरजभान की नौकरी में है। वह नयी रोशनी का सुशिक्षित युवक है। बेकारी से घबराकर सूरजभान की शरण में आया है। सूरजभान ने उसका एक लाख रुपया दबाकर उसे अपनी सेवा में रख लिया है। उसे 'अल्मा' पर निगरानी रखने का काम सौंपा गया है। धीरज को अल्मा से प्रेम हो जाता है। वह उसे भगा देता है। अल्मा किसी तरह सूरजभान के राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वी समाज कल्याण मंत्रीश्री राम शास्त्री के यहाँ पहुँच जाती है। इधर खिसियाया हुआ सूरजभान धीरज को अमानवीय यंत्रणा दिलवाकर बधिया करा देता है। वह हताश होकर घर लौटता है। उसे कबूतरा लोगों की सहानुभूति मिलती है। वह अल्मा को भूल नहीं पाता। उससे मिलने को छटपटाता रहता है। एक बार साहस करके अपने पुराने मित्र हरी सिंह के माध्यम से वह अल्मा तक पहुँच जाता है। दो पलों का मिलना। धीरज इतना ही कह पाता है- "अपमान हुआ, उसी पर मुग्ध... यहाँ तक चला आया। अपमान बड़ी ताकत पैदा कर देता है अल्मा।"(24) चलते समय अल्मा को एक छोटा-सा पत्र पकड़ा देता है। पत्र में कबूतरा बस्ती की सारी कहानी थोड़े से शब्दों में कह दी गई थी। पत्र पढ़कर अल्मा की स्मृति सजग हो उठती है। सारा भोगा और दर्द से भींगा अतीत उसके सामने साकार हो उठता है। वह अपनो से मिलने के लिए तड़प उठती है, किन्तु असहाय तड़प कभी यथार्थ नहीं बन पाती। धीरे-धीरे वह श्री रामशास्त्री की मंत्री, दासी, माता और प्रेयसी सबकुछ एक साथ बन जाती है। किन्तु उसका यह सुख भी शीघ्र ही छिन जाता है। श्री शास्त्री की हत्या कर दी जाती है। परम्परा को चुनौती देती हुई अल्मा उन्हें मुखाग्नि देती है। उसे श्री शास्त्री की खाली सीट पर विधानसभा के लिए प्रत्याशी घोषित किया जाता है। 'अल्मा कबूतरी', कबूतरा जाति की कथा मात्र नहीं है वह समकालीन राजनीति की दिशाहीनता, अपराधीकरण, सत्ता-संघर्ष, बेरोजगारी, तथा जीवन-मूल्यों के घोर पतन की यथार्थ गाथा भी है। सामाजिक जड़ता को तोड़ती और पारम्परिक रूढ़ियों को चुनौती देती हुई अल्मा जैसी दलित नारी की अपराजेय जिजीविषा समकालीन नारी- चेतना को शक्ति और प्रेरणा देने वाली है। वैसे यदि इसे अल्मा कबूतरी की व्यथा-कथा के रूप में ही देखा जाय तो भी इसमें दर्द की एक-एक रेखा हमारे मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश उत्पन्न करने में समर्थ है। इसे भी उपन्यास की शक्ति माना जायगा। 'अगनपाखी' उनके पूर्व प्रकाशित छोटे से उपन्यास 'स्मृतिदंश' का विस्तार प्रतीत होता है, किन्तु इसका कथ्य सर्वथा नया है। इसमें भी मैत्रेयी ने बुन्देलखण्ड के ग्रामीण जीवन के अन्तर्विरोधों को ही उजागर किया है। डॉ० नामवर सिंह के अनुसार-" यह एक साथ स्त्री-विमर्श, सम्पत्ति-विमर्श और सती-विमर्श तीनों का उपन्यास है।"(25) इन तीनों विमर्शों के केन्द्र में इसकी नायिका 'भुवन' है, जो अपने जेठ द्वारा मृत घोषित किए जाने के बाद भी 'अगन पाखी' की भाँति सहसा एक दिन जी उठती है और कचहरी में हाजिर होकर अपने पति के हक के लिए अपना हलफनामा पेश करती है। भुवन का अदम्य व्यक्तित्व ही इस उपन्यास का सबसे बड़ा आकर्षण है। विजन में मैत्रेयी ने गाँव से हटकर महानगरों में नेत्र-चिकित्सा के पेशे से जुड़े डाक्टरों की जिन्दगी का सच उजागर किया है। उन्होंने इस रहस्य का पर्दाफाश किया है कि किस प्रकार यहाँ भी पेइंग पेशेंट को घेर कर अस्पताल के बाड़े में हाँका जाता है और फिर उसका शिकार किया जाता है। 'नेहा' जैसी प्रतिभा सम्पन्न डॉक्टर को केन्द्र में रखकर लेखिका ने इस उपन्यास में, आज मानवीय संवेदना के विरुद्ध क्रमशः घनीभूत होते व्यावसायिकता के अँधेरे के विरुद्ध रोशनी तलाशने की कोशिश की है। 'कही ईसुरी फाग' ईसुरी के फाग बुन्देलखण्ड में प्रसिद्ध हैं। इनमें ईसुरी की रजऊ की प्रेम कथा वर्णित है। लोक मर्यादा इस कथा को समर्थन नहीं देती। मैत्रेयी पुष्पा ने इस कथा को आधार बनाकर 340 पृष्ठों का बड़ा उपन्यास लिखा है। उपन्यास का नाम उन्होंने 'कही ईसुरी फाग' रखा है। प्रकारान्तर से इस उपन्यास में पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर सदियों से किए जाने वाले अत्याचारों का पर्दाफाश किया गया है। उपन्यास में जगह-जगह ईसुरी के फाग उद्धृत हैं। ऐसा लगता है कि मैत्रेयी पुष्पा को ईसुरी के रूप में अपनी सोत्त और भावनाओं का समर्थक मिल गया है। उपन्यास में इतिहास और वर्तमान के संश्लेष ने कथा को आकर्ष और सार्थक बना दिया है। 'त्रिया हठ' उपन्यास के केन्द्र में 'उर्वशी' नामक विधवा लड़की की कहानी है। उर्वशी का अपराध कुल इतना ही है कि वह अपनी जिन्दगी अपने ढंग से जीना चाहती है। यही उसका हठ है। देवेश उसका बेटा है। उसे किसी सूत्र से यह जानकारी प्राप्त हुई है कि उसकी माँ को दवा के रूप में धीरे-धीरे असर करने वाला जहर देकर मार डाला गया था। वह सच्चाई जानने के लिए तत्पर है। इसी अन्वेषण क्रम में कथा को विस्तार दिया गया है। मैत्रेयी पुष्पा ने 'बेतवा बहती रही' में आए पात्रों को ही माध्यम बनाकर इस उपन्यास की रचना की है। उपन्यास के बने-बनाए ढाँचे को तोड़कर उन्होंने इसे शिल्पगत नवीनता प्रदान की है।

           'फरिश्ते निकले' (2014 ई०) उपन्यास ग्रामीण स्त्री पर हो रहे अत्याचार और दमन को कथा का आधार बनाया है। उपन्यास की नायिका बेला बहू एक सीमा तक तो सब कुछ बर्दाश्त करती है पर एक दिन सभी अत्याचारियों को घर में जला कर संघर्ष के अन्तहीन रास्ते पर निकल पड़ती है। यह एक कमजोर स्त्री के ताकतवर स्त्री के रूप में तब्दील होने की कथा है। मैत्रेयी पुष्पा अपने उपन्यासों के माध्यम से ग्रामीण स्त्री को नायकत्व प्रदान करती हैं और स्त्री-विमर्श को एक नया अर्थ देती हैं।

           मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों पर विचार करते हुए हमारा ध्यान उनकी कुछ सामान्य विशेषताओं की ओर बरबस चला जाता है। उनके उपन्यास अंचल-विशेष के रंग में रंगे होने पर भी आंचलिक नहीं है। उनमें गाँव का मनुष्य अकेला नहीं है। उसके साथ प्रकृति है, पारम्परिक संस्कार हैं, लोक-देवता हैं, जातीय स्मृतियाँ हैं और पूरी लोक-संस्कृति है। उनके नारी-पात्र अधिक सक्रिय, सजग और प्रभावी हैं। उनकी नारी चेतना मूक विद्रोह से चलकर मुखर सामूहिक संघर्ष की दिशा में अग्रसर हुई है। और सबसे बड़ी बात यह कि उनमें सच कहने का साहस है और उनकी क्रांति-चेतना किसी विचारधारा के दायरे में कैद न होकर अनुभव की आँच और अनुभूति के ताप से प्रेरित है। निश्चय ही समकालीन हिन्दी उपन्यासकारों में वे प्रथम पंक्ति की हकदार हैं। कभी-कभी उनके उपन्यासों में सेक्स का कुछ असंगत प्रयोग अवश्य खटकता है।


(18) डॉ० कुसुम खेमानी :

          कुसुम खेमानी के चार उपन्यास- 'लावण्य देवी' (2013 ई०), 'जड़िया बाई' (2016 ई०), 'गाथा राम भतेरी' (2017 ई०), 'लालबत्ती की कन्याएँ' (2019 ई०) प्रकाशित हैं। लावण्य देवी उपन्यास में एक कुटुम्ब की पाँच पीढ़ियों की गाथा समाहित है। इसमें प्रभावती, ज्योतिमर्या देवी, लावण्य देवी तथा उनकी सन्तति तथा नाती-पोतों की दास्तान के साथ-साथ ही एक पूरे युग को और काल के प्रवाह को भाषा में बाँधने की कोशिश की गयी है। इस उपन्यास में बंगला और राजस्थानी के शब्दों का प्रयोग बहुत ही खूबसूरती से किया गया है। इस दृष्टि से यह हिन्दी का विलक्षण उपन्यास है। जीवन के उत्तरार्ध में लावण्य देवी मुक्ति के प्रश्न से टकराती हैं, किन्तु यह मुक्ति स्वयं तक या अपने प्रियजनों तक सीमित नहीं रहती। बल्कि आगे चलकर मानव मात्र की मुक्ति में बदलती दिखायी देती है। एकांत श्रीवास्तव का यह कथन बहुत सही है कि, "लावण्य देवी का व्यक्तित्व कर्म और संघर्ष के धातुओं से बना है किन्तु ये धातुएँ ठोस और जड़ न होकर उच्चतम मूल्यों के ताप में पिघलती दिखायी देती हैं। वे अपनी संतति को भी निरन्तर संघर्ष और कर्म का ही सन्देश देती हैं। यह कर्म का स्वीकार ही है कि जिसके चलते लावण्य देवी प्रारब्ध को खारिज करती हैं और जहाँ खारित नहीं कर पातीं वहाँ उसके सामने घुटने भी नहीं टेकतीं। लावण्य देवी का कर्मशील जीवन और उनके सारे फैसले जनहित में किये जाते हैं। इसमें सन्देह नहीं है कि उच्च वर्ण की पृष्ठभूमि होने के बावजूद यह उपन्यास इन्हीं मूल्यों के कारण व्यापक पाठक समाज में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखेगा।"(26) लालबत्ती की अमृत कथाएँ (2019 ई०) उपन्यास कोलकाता के सोनागाछी पर केन्द्रित है। लेकिन यह लालबतती गली हर शहर और हर कस्बे में होती है और अन्तःसलिला की तरह समाज के अन्तर में बहती रहती है। समाज इन स्त्रियों को विष कन्याएँ मानता है पर दरअसल ये समाज के भीतर छिपी गन्दगी को फैलने से रोकने के साथ ही उसका परिष्करण भी करती है और इस बिन्दु पर आकर ये विष कन्याएँ अमृत कन्याओं में बदल जाती हैं। उपन्यास में इ स्त्रियों की रोज-रोज की प्रताड़ना, अपमान और हत्या जैसे रोंगटे खड़े कर देने वाले प्रसंगों का चित्रण इस उपन्यास में कुसुम खेमानी ने जिस भाषाई कौशल और शिल्पगत दक्षता से किया है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है।

           

(19) गीतांजलि श्री :

            पिछले दशक की कथा लेखिकाओं में गीतांजलि श्री ने कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर अपनी अलग पहचान बनाई है। उनके पाँच उपन्यास 'माई' (1993 ई०), 'हमारा शहर उस बरस' (1998 ई०), 'तिरोहित' (2001 ई०), 'खाली जगह' (2006 ई०) और 'रेत समाधि' (2018 ई०) प्रकाशित हैं। 'माई' सामन्तीय ढाँचे के एक सम्पन्न परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी है। परिवार में 'दादा', दादी, बाबू, माई तथा भाई-बहन (सुबोध-सुनैना) कुल छः प्राणी हैं। बाहर दादा और भीतर दादी का हुक्म चलता है। माई सबकी आज्ञाकारिणी हैं। सबकी सेवा करते और सबका बोझ ढोते उनकी कमर झुक गई है। बाबू अपने में सीमित स्वत्वविहीन व्यक्ति हैं। जैसे-तैसे इंजीनियरिंग में डिप्लोमा लेकर शहर के नामी इण्डस्ट्रियल काम्पलेक्स में नौकर हो गए थे। कथा-लेखिका सुनैना ने स्मृति के सहारे माई को केन्द्र में रखकर अपने परिवार की अंतरंग कथा कही है। एक प्रकार से इसे एक सामन्तीय परिवार की तीन पीढ़ियों की नारी-चेतना की कथा भी कह सकते हैं। पहली पीढ़ी ड्योढ़ी की सीमाओं में कैद अपने में संतुष्ट है। दूसरी पीढ़ी ऊपर से शांत, शीतल किन्तु भीतर सुलग रही है। तीसरी बाहर निकलकर भी घुटनभरी निजता में कैद है। सुनैना इस तीसरी पीढ़ी की नारी है। वह निजता कै कैद से उबरने के लिए बेचैन है। वह अनुभव करती है कि 'माई में भी आग थी, जिसका दूसरों के लिए जलना हमने देखा पर, जिसका अपना जलना, अपने लिए हमने नहीं देखा।' यह आग संक्रमित होकर सुनैना के भीतर भी जल रही है। यही उसे बेचैन रखती है। यही उसे मुक्ति-पथ पर अग्रसर करेगी। हमारा शहर उस बरस की कथा-भूमि विस्तृत है। कहने के लिए इसकी कथा किसी खास शहर और किसी खास समय की है, लेकिन कथा की अन्तर्वस्तु देशकाल की सीमा का अतिक्रमण करती है। यह साम्प्रदायिक-धार्मिक कट्टरता और उदार मानवीयता की द्वन्द्व-कथा है। यह मनुष्यता के क्षितिज पर घनीभूत होते अंधेरे और उसे चीरकर निकलते उजाले की त्रासद कथा है। कथा लेखिका श्रुति अपने दहू के साथ ऊपर फ्लैट में रहती है। उसने हनीफ जैदी से शादी की है। दहू बेटी और बेटे में फर्क नहीं करते। हिन्दू-मुसलमान दोनों को मनुष्य मानते हैं। हनीफ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर है। उसी विभाग के शरद उसके मित्र हैं। दोनों समान विचारों के बुद्धिजीवी हैं। शहर में एक मठ है। 'मठ' एक प्रतीक है- साम्प्रदायिक शक्ति केन्द्र का। शहर में साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने के लिए सारे गुप्त सूत्रों का चलन यहीं से होता है। शहर में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ता है। भय का वातावरण व्याप्त हो जाता है। दंगे होने लगते हैं। विश्वविद्यालय का समाजशास्त्र विभाग दंगों के कारणों की जाँच करके रिपोर्ट पेश करता है। रिपोर्ट अखबारों में छपती है। साम्प्रदायिक ताकतों का सारा आक्रोश हनीफ को अपना लक्ष्य बनाता है। शरद को हिन्दू होने के कारण बख्श दिया जाता है। उसे तरह-तरह से आतंकित किया जाता है। समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो० नन्दन भी इस अवसर का लाभ उठाते हैं। विश्वविद्यालय में अध्यक्ष पद के लिए रोटेशन पद्धति लागू हो गई है। उनके बाद हनीफ का नम्बर है। वे नहीं चाहते कोई दूसरा अध्यक्ष हो। वे छात्रों को भीतर-भीतर भड़काते हैं।

           छात्र हनीफ की कक्षाओं का बहिष्कार करने लगते हैं। हनीफ अकेला पड़ने लगता है। उसे संरक्षण देने के लिए मुसलमान नेता आगे आते हैं। सारा शहर हिन्दुओं और मुसलमानों में बँट जाता है। सारी संचार-व्यवस्था मुसलमान मात्र को साम्प्रदायिक सिद्ध करने में जुट जाती है। मठ के बूढ़े महंत की हत्या कर दी जाती है। यह मठ की अन्दरूनी राजनीति का नतीजा भी हो सकता है, किन्तु इसे गौरवान्वित किया जाता है। राजधानी की हस्तियाँ महंत के शव पर फूल चढ़ाने आती है। महंत को शहीद बना दिया जाता है। पूरी घटना को राजनीतिक रंग दे दिया जाता है। शहर में तनाव चरम पर है। पुलिस हनीफ को सँभलकर रहने की ताकीद करती है। श्रुति के दहू के फ्लैट पर सांप्रदायिक तत्त्व हमला कर देते हैं। दद्दू सामने आ जाते हैं। किसी तरह उनके प्राणों की रक्षा होती है। पूरा उपन्यास इस दिशा में संकेत करता हुआ प्रतीत होता है कि आज साम्प्रदायिक उन्माद के सामने मनुष्यता की आवाज एक चीख बन गई है। मनुष्यता पर बार-बार हमले हो रहे हैं। सारा आकाश दमघोंटू हो जाता है। न कहीं जनतंत्र है, न मानवीय मूल्य। अनुगूँजों, सूचनाओं, एलानों, बहसों, संवादों, नारों और प्रतीकों के सम्मिलित उपयोग से कथासूत्रों की सघन संरचना करता हुआ यह उपन्यास नैरेशन की सामान्य धारा से अपने को अलग करता है। 

            'तिरोहित' नये किस्म का उपन्यास है। एक कस्बे में एक छत के नीचे दो युवा स्त्रियाँ रहती हैं। 'बच्चो' घर की मालकिन है। 'ललना' उसके आश्रय में है। दोनों के बीच तटस्थ अनुराग है। यह अनुराग काम-प्रेरित है। वे मन और शरीर की माँग को स्थगित नहीं करतीं। सीमायें लाँघती हैं और एक दूसरे में समा जाती हैं। वे सीमा लाँघने के सुख को सहजता से लेती हैं। दोनों एक दूसरे से इस सीमा तक बँधी हैं कि बच्चो की मृत्यु के बाद ललना भी तिरोहित होने को तत्पर हो जाती है। संभवतः हिन्दी में स्त्री समलैंगिकता को अकुण्ठ भाव से चित्रित करनेवाला यह पहला उपन्यास है। युद्ध और आतंक आज के जीवन की गम्भीर समस्याएँ हैं। लेखिका ने अपने इस चौथे उपन्यास 'खाली जगह' में कथाहीन उपन्यास में मनुष्य के लिए घातक इन स्थितियों की भयावहता की ओर इशारा किया है। समय की नब्ज को टटोलते हुए उसने आज की इस दारुण अमानवीय मानसिकता के खतरे की ओर संकेत किया है। शिल्प और भाषा की नवीनता के लिए भी यह उपन्यास याद किया जायगा। गीतांजलि श्री ने अपने उपन्यासों में आधुनिक जीवन के अलग-अलग आयामों के भीतर से कथ्य और अन्तर्वस्तु का चयन किया है। उनकी रचना-भूमि बदलती रही है और उसी के अनुसार भाषा और शिल्प में भी परिवर्तन होता रहा है। इस दृष्टि से हिन्दी उपन्यास लेखिकाओं में उनका स्थान विरल और विशिष्ट है।


(20) मधु काँकरिया :

           मधु काँकरिया के अब तक छह उपन्यास- 'खुले गगन के लाल सितारे' (2000 ई०), 'सलाम आखिरी' (2002 ई०), 'पत्ताखोर' (2005 ई०), 'सेज पर संस्कृत' (2008 ई०), 'सूखते चिनार' (2012 ई०) तथा 'हम यहाँ थे' (2018 ई०) प्रकाशित हो चुके हैं। 'खुले गगन के लाल सितारे' उपन्यास नक्सलवादी आन्दोलन को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। उपन्यास की केन्द्रीय पात्र 'मणि' है। 'इन्द्र' उसका कल्पना-पुरुष है। वह कलकत्ता के समीपवर्ती मध्यम ग्राम के पुराने जमींदार परिवार का लड़का है। 'मणि' निम्नमध्यवर्गीय जैन परिवार की लड़की है। 'इन्द्र' उसे वेद की ऋचाओं की तरह पवित्र, दिव्य एवं रहस्यमय लगता है। वह माओ भक्त है और नक्सल आन्दोलन से जुड़ा है। पुलिस इन्द्र को पकड़कर ले जाती है और लाल बाजार लॉकअप में यंत्रणा देकर मार डालती है। आधिकारिक तौर पर उसके विषय में कुछ भी पता नहीं है। 'मणि' लम्बी उम्र तक उसकी तलाश में भटकती रहती है। नक्सल आन्दोलन और क्रूरतापूर्वक उसके दमन की कथा के साथ उपन्यास निम्न मध्यवर्गीय मारवाड़ी जैन परिवार के अन्तर्विरोधों से भी हमारा परिचय कराता है। अपने लम्बे भटकाव में मणि जीवन के अन्य अनेक संदर्भों एवं उनकी विसंगतियों से परिचित होती है। संन्यासियों एवं साध्वियों के जीवन का सच, अस्पतालों की दुर्दशा, डॉक्टरों की अमानवीयता, स्त्रियों की घुटन, स्नेह की कोमल छाया देने वाली बहन पारसी के जीवन की त्रासदी और इस तरह की जाने कितनी सचाइयों से वह समृद्ध होती गई थी। जीवन के पैंतालीसवें वर्ष में 'मणि' के जीवन में आलोक जी प्रौढ़ प्रेमी के रूप में आते हैं। वह उनकी आँखों में इन्द्र की आँखों की झिलमिलाहट देखती है। वे उसे इन्द्र के 'ऑल्टर ईगो' प्रतीत होते हैं। इन्द्र अब भी मणि की चेतना का अंग बना रहता है। दूसरे दिन वह उस क्रांतिकारी कवि का आखिरी साक्षात्कार लेने जाती है, जिसके साथ इन्द्र ने एक ही सेल में आखिरी दिन गुजारे थे, शायद अकेले। स्मृति, डायरी, पूर्वदीप्ति और हस्तक्षेप के सहारे लिखे गए इस उपन्यास में अनेक अवसरों पर लेखिका ने अपनी मान्यताओं और निष्कर्षों को सीधे प्रस्तुत करते हुए महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का सामान्यीकरण कर दिया है। फिर भी आम आदमी के लिए एक बेहतर स्वप्न देखने की आकांक्षा से दीप्त यह उपन्यास स्वागत योग्य है। 'सलाम आखिरी' उपन्यास में वेश्याओं की जीवन-कथा कही गई है। इसकी सफलता इस बात में है कि इसे पढ़कर पाठक के मन में वेश्याओं के प्रति करुणा उत्पन्न होती है तथा 'पत्ताखोर' उपन्यास में आज के युवा वर्ग में बढ़ती नशाखोरी के भीषण और घातक परिणाम की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है। 'सेज पर संस्कृत' (2008 ई०) रोचक शैली में जैन साध्वियों के जीवन के अन्तर्बाध्य में झाँकता हुआ, अनेक सामाजिक और स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को उठाता है। शोधपरक दृष्टि जैनधर्म और समाज की विसंगतियों को पर्दाफाश करती हुई बताती है कि किस प्रकार महावीर के निर्वाण के 843 वर्षों के बाद जैन धर्म की आचार संहिता लिखकर धर्म की मनमानी व्याख्या की गयी है। 'सूखते चिनार' (2012 ई०) एक ऐसे युवक की कथा है जो परिवार से बगावत करके फौज़ में सिर्फ इसलिए भर्ती हो जाता है कि उसने एक सुबह अखबार में 'नेशन नीड्स यू' का भावुक विज्ञान पढ़ लिया था और उसने इस बात की कसम खा ली थी कि सोल्जर आई ऐम बर्न सोल्जर आई शैल डाई। एक ऐसा मारवाड़ी युवक जिसके पुरखों के हाथों में सदा तराजू हुआ करता था आज उसके हाथों में बन्दूक है। लाला के घर में लेफ्टिनेंट। कलकत्ते के सुखद गर्म वासे से काश्मीर के दुःखद ठंडे बेस कैम्प तक। फौजी जीवन की तमाम त्रासदियों को जमीन स्तर पर रू-ब-रू करता यह उपन्यास पाठकों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है। 'हम यहाँ थे' (2018 ई०) उपन्यास विकास की मरीचिका के दौर में एक स्त्री के व्यक्तिगत पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक संघर्षों के आम आदमी के अस्तित्व की लड़ाई में बदले जाने की गाथा है। जीवन की निरन्तरता दैन्य गरीबी लाचारी में भी रुकती नहीं-यातनाओं के अँधेरों में बीती हुई जिन्दगी आने वाली जिन्दगी की खिड़की बनती है। उपन्यास इसी आने वाली दुनिया की काली सफेद परछाइयों को एक संघर्षरत स्त्री की नजरों से देखने की कोशिश है।


(21) अलका सरावगी :

           अलका सरावगी के सात उपन्यास 'कलि-कथा वाया बाईपास' (1998 ई०), 'शेष कादम्बरी' (2001 ई०), 'कोई बात नहीं' (2004 ई०), 'एक ब्रेक के बाद' (2008 ई०), 'जानकीदास तेजपाल मैनशन' (2015 ई०) 'एक सच्ची झूठी गाथा' (2018 ई०) तथा 'कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए' (2020 ई०) प्रकाशित है। कलि कथा : वाया बाईपास की विशेष चर्चा हुई है। इसके कथानायक किशोर बाबू की बाईपास सर्जरी कराई गई है। ऑपरेशन के बाद स्ट्रेचर पर वार्ड में ले जाने के क्रम में उनके सिर के पिछले हिस्से में लोहे की किसी चीज से चोट लग गई है। इसका असर उनके दिमाग पर पड़ा है। उनमें विचित्र परिवर्तन हो गया है। वे प्रायः कलकत्ता की सड़कों पर पैदल घूमते रहते हैं। कभी-कभी किसी अलक्षित व्यक्ति से बात करते रहते हैं। बातों में संगति नहीं होती। उनमें पागलपन, आत्मविस्मृति, बदहवासी, और व्यक्तित्वारोपण के लक्षण एक साथ दिखाई देते हैं। इसी मनोदशा में वे कथा कहते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसा व्यक्ति अतीत की चर्चा करते-करते वर्तमान पर आ जायगा। वर्तमान की बात के साथ अतीत को जोड़ देगा। पात्र-विशेष के संदर्भके साथ किसी दूसरे पात्र का संदर्भ संग्रथित कर देगा। इस प्रकार कथा-लेखिका ने यथार्थ और फैटेंसी को जोड़कर नये शिल्प का आविष्कार कर लिया है और किशोर बाबू की एक जिन्दगी के भीतर तीन जिन्दगियों की कथा कहने तथा कलकत्ता की कथा को कलियुग की कथा बना देने की छूट ले ली है। किशोर बाबू की पहली जिन्दगी उनके बचपन से लेकर देश के आजाद होने तक, दूसरी आजादी की स्वर्ण जयंती अर्थात् 1997 ई० तक और तीसरी उसके बाद जनवरी सन् 2000 ई० तक मान्य है। उनकी पहली जिन्दगी में उनके पूर्वजों का सारा अतीत ऊपर की पर्तों की तह में विद्यमान है। उसकी जड़ें अठारहवीं शती के आरम्भ तक जाती हैं। कलकत्ता शहर का बसना, राजपूताने से रोजी-रोटी की तलाश में मारवाड़ियों का यहाँ आना, कलकत्ते के विकास में उनकी भूमिका, अंग्रेजों और बंगालियों के रिश्ते, उत्तर कलकत्ता में कालों और दक्षिण में गोरों का आबाद होना, दोनों के बीच में मिश्रित रक्त वाले यूरेशियन लोगों का बसना और अमीरी-गरीबी को एक साथ साधने वाले एक नये किस्म के महानगर का उदय, यह सब उनकी जिन्दगी के पहले हिस्से के विस्तार में समाहित है। यह सारा इतिहास किशोर बाबू ने अपने परदादा रामविलास की बेतरतीब डायरियों और कलकत्ता में सबसे पहले आकर बसने वाले संभ्रान्त बंगालियों की विरासत के दावेदार अपने मित्र शांतनु से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर रचा है। इसके बाद के इतिहास - स्वाधीनता आन्दोलन, सुभाष बाबू और गाँधी की टकराहट, द्वितीय महायुद्ध, बंगाल का भीषण अकाल, साम्प्रदायिक दंगे, देश के साथ बंगाल का विभाजन, स्वाधीनता के बाद का कलकत्ता, स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का बिखरना, जीवन के सभी क्षेत्रों में नैतिक मूल्यों का ह्रास-को किशोर बाबू ने स्वयं देखा और भोगा है। बाईपास सर्जरी के बाद की उनकी सनकीपन की तीसरी जिन्दगी पुराने और नये जमाने को एक साथ देखने और उनके अन्तर्विरोधों को महसूस करने की दर्द भरी जिन्दगी है। सिर की चोट के कारण वे अपने भीतर की दुनिया में झाँकने में समर्थ हो गए थे। उन्हें लग रहा था कि चालू मापदण्डों को निर्णायक मानकर नई पीढ़ी ने जो संसार बनाया है, वह उथला और रिक्त है। इसी जिन्दगी में वे आधुनिक कलियुग को देखने और महसूस करने लगे थे-जिसमें सोनिया, लालू, राबड़ी, धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, चन्द्रास्वामी, जैसी हस्तियों के साथ विदेशी कंपनियों और पैसों के प्रवेश से पूरी संस्कृति फैशन और बिकाऊ माल बनती जा रही थी। उपन्यास में इस बाहरी दुनिया के साथ मारवाड़ी परिवार की स्त्रियों की घुटनभरी जिन्दगी की एक भीतरी दुनिया भी है। यहाँ अँधेरा ही अँधेरा है। इस अँधेरे की एक ही लकीर हमें विचलित करने के लिए पर्याप्त है। यह लकीर है किशोर बाबू की विधवा भाभी। किसी राजा की रानी होने लायक यह नारी अपने वेश्यागामी पति के प्रतिरोध में कुल इतना ही कर पाती है कि राज्यक्ष्मा से पीड़ित होने पर दवा खाने से इन्कार कर देती है। मारवाड़ी परिवारों के ऊपरी तामझाम के भीतर कितना गहरा और घना अँधेरा था, इसे विस्तार न देना ही अच्छा होगा।

            उपन्यास का अंत बड़ा ही नाटकीय और जादुई है। एक जनवरी 2000 ई० के दिन सुबह-सुबह किशोर बाबू सबेरे नहा धोकर विक्टोरिया पार्क में महारानी विक्टोरिया की विशालकाय मूर्ति की जगह महर्षि अरविन्द की दुबली-पतली छोटी-सी मूर्ति के पूर्व की ओर खड़े हो जाते हैं। थोड़ी देर बाद उनका छात्र जीवन का मित्र शांतनु अपनी पुरानी बग्धी से उतरकर उनके पास आता है और उन्हें गले लगा लेता है; किशोर बाबू उससे कहते हैं-"तुम आ गए शांतनु ? मैंने तो सोचा ही नहीं था कि तुम्हें आज की बात याद होगी।" शांतनु उनका उत्तर देता है- "मैं तुम्हें बाईपास करके कैसे आगे की जिन्दगी की तरफ बढ़ता किशोर ? जब हमारी दुनिया के सारे बाईपास के रास्ते बंद हो गए, तो फिर मेरे पास यहाँ आने के सिवाय और क्या चारा था?" किशोर बाबू को उसकी बात समझ में नहीं आती। वह समझाता है- "देखो, एक रास्ता जाम होता था, तो हम दूसरा रास्ता बना लेते थे। हमने किसी समस्या के कारणों को मिटाने की कभी कोशिश नहीं की। हर समस्या को बाईपास करने के रास्ते ढूँढ़ते रहे। पर अब तो कोई बाइपास काम नहीं कर सकता।" तभी किशोर बाबू के छात्र-जीवन का दूसरा मित्र अमोलक सहसा प्रकट होता है और शांतनु की पीठ पर हाथ रखकर कहता है-"तुम एकदम ठीक कह रहे हो, शांतनु। अब तुम्हें मेरी बात समझ में आई है? मैंने यही तो कहा था तुमसे "अपने देश के स्रोतों को बाइपास कर विदेशी फंड से तुम कुछ नहीं कर सकोगे। तुम्हें जो करना है वह अपने बूते पर करना होगा।" किशोर बाबू और शांतनु दोनों अमोलक को देखकर भौंचक थे, क्योंकि यह प्रचारित था कि बाबरी मस्जिद काण्ड में उसकी मौत हो चुकी है। अमोलक कहता है- "नहीं मैं नहीं मरा था, जो मरा था वह मेरा डुप्लीकेट था।" किशोर बाबू यह नहीं समझ पा रहे थे कि वे फिल्म देख रहे हैं या जो घटित हो रहा है, वह यथार्थ है। प्रश्न है कि इस अंत को हम किस रूप में लें। क्या छात्र-जीवन में गाँधी भक्त रहे अमोलक के अपने स्रोतों की ओर लौटने के इस संकेत को हम फिर से गाँधी की ओर लौटने का संकेत माने? और वादे के अनुसार तीन मित्रों का यह जादुई मिलन ? क्या इसे उत्तर आधुनिक शिल्प के स्वीकार के रूप में लें? इस संदर्भ में इसके 'अतिरेकी स्वागत' पर ध्यान देना भी जरूरी है। शेष कादम्बरी में अलका सरावगी ने फिर उपन्यास के परिचित ढाँचे को तोड़ा है। इसकी कथानायिका 'रूबी दी' एक सुशिक्षित, संभ्रान्त और संपन्न महिला हैं। सतपीढ़िया शाह परिवार की आखिरी तस्वीर। उनका अतीत कुहासे से ढँका है। जिन्होंने उन्हें पाला-पोसा, बड़ा किया, ब्याह किया, शिक्षा दी, वे उनके सगे माँ-बाप नहीं थे। उनके दूसरे मामा देवीदत्त ने अपनी विदेशी प्रेमिका की याद में उनका नाम 'रूबी' रखा था। देवीदत्त मामा ने जर्मनी में रहकर फोटोग्राफी सीखी थी। प्रथम महायुद्ध में शामिल हुए थे। स्वतंत्रता संग्राम के सभी बड़े नेताओं से परिचित और संग्राम के प्रत्येक मोड़ पर उपस्थित रहने के बावजूद इतिहास में कहीं नहीं थे। उनकी दोनों बेटियाँ विदेश में थीं। उनकी नातिन कादम्बरी दिल्ली में रहकर 'देवीदत्त' जी पर खोज कर रही थी और अपनी नानी रूबी दी को उनकी 'कथा' (फिक्शन) लिखने के लिए उकसाती रहती थी। रूबी दी विधवा थीं और अपने को अकेला अनुभव करती थीं। जमाने की मारी औरतों से उन्हें हमदर्दी थी और उनके लिए वे 'परामर्श' संस्था चलाती थीं। रूबी दी की दुनिया में एक मिस्टर वियेना कभी ट्यूटर बनकर आए थे। उनसे उनकी दोस्ती हो चली थी। वे रूबी दी को उनके परिवार से जुड़ी कुछ बातें भी बताते थे। उन्होंने ही बताया था कि रूबी दी की बुआ ने एक अंग्रेज के प्रेम में पड़कर अपने को जला डाला था। बाद को रूबी दी ने जाना कि वह अंग्रेज और कोई नहीं, मिस्टर वियेना ही थे। रूबी दी की कुहासे से ढंकी जिन्दगी सचमुच एक फिक्शन थी। इस फिक्शन में उनके जीवन का दर्द और उनका अकेलापन ही एकमात्र सच था। 'परामर्श' के माध्यम से उनका संपर्क जिन महिलाओं और लड़कियाँ से हुआ था, वे सभी पुरुष-प्रधान समाज में सताई और कुचली हुई थीं। सविता, मायाबोस, सायरा, आभा जैन की बेटी, फरहा, सभी को उनके जीवन ने छला था। 'सविता' में तो वे अपनी छाया ही देखती थीं। इसका प्रमाण उनकी अंतिम वसीयत की ये पंक्तियाँ हैं- "यदि कष्ट की कोई जाति होती है, तो उस नाते मैं सविता के इतने करीबी रिश्ते की हूँ, जितना दुनिया में शायद ही कोई किसी का होता है।" इसी रिश्ते के नाते वे अपनी एकमात्र वारिस कादम्बरी से सविता को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उस नकद धनराशि का पच्चीस प्रतिशत देने की प्रार्थना करती हैं, जो उसे मिलने वाली है। 'उनके फिक्सन का शेष भाग कादम्बरी लिखे', यह प्रार्थना भी वसीयत में की गई है। रूबी दी की स्मृतियों और सपनों तथा कादम्बरी से एस०टी०डी० पर की गई वार्ताओं, उसके पत्रों और रपटों के माध्यम से रचे गए इस उपन्यास में अतीत से वर्तमान को जोड़ने वाला प्रमुख तत्त्व है- नारी उत्पीड़न। इस अर्थ में इस उपन्यास को नारी-विमर्श से भी जोड़ा जा सकता है। कुछ भी हो, इस उपन्यास का वैसा स्वागत नहीं हुआ जैसा 'कलिकथा वाया बाईपास' का हुआ था। अपने तीसरे उपन्यास 'कोई बात नहीं' में अलका सरावगी ने आज के अर्थ केन्द्रित क्षय शील मूल्यों का प्रत्याख्यान करके पुनः मानवीय मूल्यों की सार्थकता पर बल दिया है। शशांक को केन्द्र में रखकर उन्होंने प्रमाणित किया है कि आज भी सरल, निश्छल, प्रेम, सहयोग और सौहार्द्र जैसे मूल्य प्रासंगिक और सार्थक हैं।


(22) समकालीन उपन्यास लेखिकाओं में चन्द्रकान्ता का महत्त्व :

              समकालीन कथा लेखिका चन्द्रकांता के 'अर्थान्तर' (1981 ई०), 'अंतिमसाक्ष्य', (1981 ई०), 'बाकी सब खैरियत है' (1983 ई०), 'ऐलान गली जिन्दा है' (1984 ई०), 'यहाँ वितस्ता बहती है' (1992 ई०), 'अपने- अपने कोणार्क' (1995 ई०), 'कथासतीसर' (2001 ई०) आदि कई उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। चन्द्रकान्ता ने अपने उपन्यासों में आधुनिक मध्यवर्गीय परिवारों के विघटन तथा पारम्परिक मूल्यों एवं नयी मानसिकता के बीच उभरने वाले अन्तर्विरोधों का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है। बाकी सब खैरियत है में लेखिका ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि किस प्रकार एक संयुक्त परिवार में छोटा भाई विदेश जाकर आज की उपभोगवादी संस्कृति में इतना रँग जाता है कि सारे पारिवारिक मूल्यों को ताक पर रखकर अपने माँ-बाप, भाई-भाभी सभी से भावनात्मक स्तर पर अपने को अलग कर लेता है। ऐलान गली जिन्दा है में लेखिका ने कश्मीर की 'एक गली' के जीवन को चित्रित किया है। आज भी इस गली के जीवन में प्रकाश की किसी रेखा के दर्शन नहीं होते; सदियों पुरानी मान्यताएँ, सड़े-गले विश्वास, कचरा, दुःख-दर्द, सीलन और कीचड़ विद्यमान है। नयी पीढ़ी के लड़के बदलाव लाना चाहते हैं, अँधेरे से बाहर निकलना चाहते हैं, इसके लिए प्रयत्न भी करते हैं, किन्तु कुछ खास नहीं कर पाते। पूरे उपन्यास में पीढ़ियों का अन्तर्विरोध और द्वन्द्व देखा जा सता है। आनुषंगिक रूप से स्वातंत्र्योत्तर कश्मीर के कुछ और मुद्दे भी उठाये गये हैं, किन्तु वे उभर नहीं पाये हैं। बाद के दो उपन्यासों- 'यहाँ वितस्ता बहती है' और 'कथा सतीसर'- में भी लेखिका ने कश्मीर को ही केन्द्र में रखा है। यहाँ वितस्ता बहती है में एक शिक्षाविद् और आदर्शवादी नागरिक राजनाथ कौल के जीवन को केन्द्र में रखकर कश्मीर के उस गरिमामय जीवन-प्रवाह को अंकित किया गया है, जो परिवर्तन के क्रम में क्रमशः उन पारम्परिक जीवन-मूल्यों से दूर हटता गया है, जिनके आलोक से प्रेरणा लेकर हम भविष्य को भी महनीय बना सकते हैं। वर्तमान पीढ़ी की सोच और जीवन-शैली पर टिप्पणी करते हुए लेखिका ने कहा है-"पुरातन को एक बीमारी की तरह छोड़ने की पक्षधर और आस्था शब्द से बिदकने वाली पीढ़ी क्या पलभर रुककर सोचेगी कि कुछ चीजें रोशनियों से छनकर आती हैं और काल का अतिक्रण करती हैं।"(27) यह टिप्पणी लेखकीय दृष्टि को स्पष्ट कर देती है। लेखिका ने इसी दृष्टि से कश्मीर के जीवन को देखा परखा है। अप्रतिम प्राकृतिक वैभव की छाया में वितस्ता की तरह प्रवहमान कश्मीर के सुख-दुःखमय लोक जीवन के अनेक रंगों के सघन चित्रण ने उपन्यास को काव्यात्मक गरिमा प्रदान की है। कथा सतीसर की मूल कथा तो 1931 ई० से 2000 ई० की कालावधि तक सीमित है, किन्तु अपने पूरे विस्तार में यह उपन्यास कश्मीर को उसके समस्त पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भ में उपस्थित करता है। लेखिका के अनुसार इतिहास के हर दौर में यह प्रदेश राक्षसी उत्पीड़न का शिकार रहा है, किन्तु यहाँ की जनता मिल-जुलकर रहना जानती है। ईसा की पन्द्रहवीं सदी में सुलतान जैनुल आब्दीन (जिसे प्यार से बड़शाह कहा जाता था) ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों को आदरपूर्वक बुलाकर फिर से आबाद किया था। कश्मीर की जनता को आज ऐसे ही किसी बड़शाह की प्रतीक्षा है। उपन्यास में पिछले 10 वर्षों से आंतक की छाया में घुटते हुए कश्मीर का बड़ा ही प्रामाणिक और सजीव चित्रण किया गया है। उपन्यास के अंतिम दृश्य में आशा की झलक दिखाई गई है। आतंक के इस दौर में भी डॉ० कार्तिकेय और उनकी पत्नी डॉ० काव्या दोनों कश्मीर में बने रहकर एक चैरिटेबुल अस्पताल चलाते हैं। आतंकवादियों के बलात्कार की शिकार यूसुफ की लड़की विक्षिप्त हो चुकी है। उसे गर्भ है। डॉ० कात्या मेजर ऑपरेशन करके माँ और बच्ची दोनों को बचा लेती हैं। बच्ची की तेज आवाज अस्पताल में गूंज उठती है। अपमान और अजाब की कोख से आतंकवाद के विरुद्ध उठी यह तेज आवाज उम्मीदों, स्वप्नों और इरादों को जिन्दा रखने वाली आवाज है। काश, लेखिका का यह सपना साकार हो पाता ! कश्मीर की जनता सुख-शांति के वातावरण में चैन की साँस लेते हुए अपन सहज जीवन की लय प्राप्त कर पाती। अपने-अपने कोणार्क कुनी नाम की एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो पेशे से शिक्षिका है, आधुनिक जीवन-मूल्यों से अपरिचित नहीं है, किन्तु पारम्परिक रक्षण-शील संस्कृति की मर्यादा में कैद, पर-पुरुष से प्रेम को पाप समझती है। ढलती जवानी के दिनों में वह मन की चाह को नहीं रोक पाती और सिद्धार्थ नामक एक डिजाइनर को प्यार करने लगती है। सिद्धार्थ आगे पढ़ाई के लिए यू०एस०ए० जाता है। वहाँ से अपने एक मित्र के साथ ईराक पहुँचता है। ईराक में बहुराष्ट्रीय हमले में घायल होता है और अस्पताल में सेवा करने वाली एक नर्स से शादी कर लेता है। यह समाचार पाकर कुनी भीतर से टूट जाती है। अन्ततः प्रभा मौसी का प्रस्ताव मानकर वह दो बच्चों के पिता विधुर डॉ० अनिरुद्ध से ब्याह कर लेती है। दोनों हनीमून के लिए पुरी और कोणार्क की यात्रा करते हैं। 'कुनी' की इस अंतरंग गाथा के साथ लेखिका ने उड़ीसा की संस्कृति, धर्म, विश्वास, आदिवासियों की जीवन-शैली तथा ऐतिहासिक भौगोलिक परिदृश्य के सघन चित्रण से उपन्यास को देश-काल-गत समृद्धि प्रदान की है। सब मिलाकर नारी-जीवन के अंतरंग संवेदन, प्यार और उजास से बना यह 'कोणार्क' इस सच को उजागर करता रहेगा कि नारी जड़-मूल्यों की पाषाण शिला नहीं, प्यार की नदी है, रजनीगंधा के फूलों की महक है और अंतरिक्ष की लहरों में गूँजती हुई बाँसुरी की मधुर ध्वनि है।

            'चन्द्रकान्ता' को मृदुला गर्ग, राजी सेठ और मंजुल भगत की परम्परा में रखा गया है, किन्तु देखा जाय तो वे इस परम्परा से थोड़ा अलग हैं। चन्द्रकान्ता ने मध्यवर्गीय मानसिकता के विश्लेषण-क्रम में आर्थिक-सामाजिक कारणों को उपस्थित करके अपनी रचना-भूमि को विस्तृत करने की चेष्टा की है। परम्परागत मूल्यों के प्रति उनकी दृष्टि भी अन्यों से भिन्न है।


संदर्भ ग्रंथ-सूची :

(1) इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका- 10-20, पृष्ठ- 646

(2) समकालीन कहानी की पहचान- डाॅ. नरेंद्र मोहन, अभिधा प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996 ई., पृष्ठ- प्रस्तावना

(3) आधुनिकता और समकालीन रचना संदर्भ- डाॅ. नरेन्द्र मोहन, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2003 ई., पृष्ठ- 84

(4) मेरी प्रिय कहानियां- मन्नू भंडारी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001ई., पृष्ठ- 55

(5) महिला उपन्यासकार- मधु संधु, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1999 ई., पृष्ठ- 7

(6) हिन्दी साहित्य कोश, भाग-1, संपादक- धीरेन्द्र वर्मा, ज्ञानमंडल प्रकाशन, वाराणसी, 1956 ई., पृष्ठ- 360

(7) हिन्दी गद्य साहित्य- रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1956 ई., पृष्ठ- 330

(8) वही, पृष्ठ- 333

(9) आलोचना, वर्ष- 34, अंक-75, अक्टूबर- दिसम्बर- 1985 ई., पृष्ठ- 96

(10) हिन्दी गद्य साहित्य- रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1956 ई., पृष्ठ- 335

(11) वही, पृष्ठ- 335

(12) वही, पृष्ठ- 336

(13) चितकोबरा- मृदुला गर्ग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1999 ई. , पृष्ठ- 93

(14) आलोचना, वर्ष- 33, अंक-72, जनवरी- मार्च- 1985 ई., पृष्ठ- 78

(15) हिन्दी गद्य साहित्य- रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1956 ई., पृष्ठ- 346

(16) अपार्थ- कमल कुमार, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1999 ई., पृष्ठ- 3

(17) हिन्दी उपन्यास : पहचान और परख- इन्द्रनाथ मदान, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1999 ई., पृष्ठ- 99

(18) हिन्दी गद्य साहित्य- रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1956 ई., पृष्ठ- 350

(19) वही, पृष्ठ- 351

(20) वही, पृष्ठ- 352

(21) बेतवा बहती रही- मैत्रेयी पुष्पा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 2007 ई., पृष्ठ- 134

(22) वही, पृष्ठ- 135

(23) झूलानट- मैत्रेयी पुष्पा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 2009 ई., पृष्ठ-57

(24) अल्मा कबूतरी- मैत्रेयी पुष्पा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011 ई., पृष्ठ- 206

(25) हिन्दी गद्य साहित्य- रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1956 ई., पृष्ठ- 356

(26) वही, पृष्ठ- 358

(27) वही, पृष्ठ- 339


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Milan Tomic

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