षष्ठ अध्याय :
विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में भाषा एवं शिल्प
प्रस्तावना :
सामान्यतः भाषा मनुष्य की सार्थक व्यक्त वाणी को कहते हैं। भाषा' शब्द संस्कृत के भाष धातु से निर्मित है। इसका अर्थ वाणी को व्यक्त करना है। इसके द्वारा मनुष्य के भावों, विचारों और भावनाओं को व्यक्त किया जाता है। भाषा की परिभाषा देना एक कठिन कार्य है। फिर भी भाषा वैज्ञानिकों ने इसकी अनेक परिभाषाएँ दी हैं, किन्तु ये परिभाषाएँ पूर्ण नहीं हैं। सभी में कुछ न कुछ कमी पाई जाती है। आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा ने भाषा की परिभाषा इस प्रकार बनाई है- 'उच्चरित ध्वनि-संकेतों की सहायता से भाव या विचार की पूर्ण अभिव्यक्ति अथवा, जिसकी सहायता से मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय या सहयोग करते हैं, उसे यादृच्छिक, रुढ़ ध्वनि-संकेत की प्रणाली को भाषा कहते हैं।"(1)
साहित्यिक दृष्टि से अगर भाषा पर विचार करें, तो प्रत्येक रचनाकार की प्रत्येक रचना की अपनी तरह की भाषा होती है, किन्तु यदि वह घटना के अनुरुप है, पात्रानुकूल है, मनोभावों के अनुकूल, हैं और देश, काल और वातावरण के भी अनुकूल है, तो वह पाठक के हृदय के भावों के अनुकूल भी हो जाती है और वातावरण के भी अनुकूल है, तो वह पाठक के चित्त के अनुकूल भी हो जाती है और पाठक उस रचना में डूबता उतराता चला जाता है।
सर्वविदित है कि विचारों अथवा भावों को व्यक्त करने का सर्वोत्तम साधन भाषा है। उपन्यासकार का भाषा पर जितना अच्छा अधिकार होगा, भाषा की सबसे बड़ी विशेषता सरलता ही है। उसमें अलंकारों और मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। उपयुक्त स्थान पर उपयुक्त शब्दों का प्रयोग सूचना के सौन्दर्य में अभिवृद्धि करता है। भाषा का वही रूप श्रेष्ठ माना जाता है, जिसमें सतत प्रवाह है, जो सुबोध है और जिसमें क्लिष्ट और अप्रचलित शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया हो।
(1) विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों की भाषा :
समकालीन उपन्यासकारों में विनोद कुमार शुक्ल किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं। कथ्य की स्पष्टता और विविधता के साथ ही भाषा का नयापन इनके उपन्यासों का रचनात्मक वैशिष्ट्य है। भाषागत ताजगी इनके उपन्यासों को अलग पहचान दिलाती है। लेखक विनोद कुमार शुक्ल की कथाओं में जितनी छोटी-छोटी बातों को वर्णित किया गया है, जो चित्रमयी रूप में प्रस्तुत है, जो उनकी भाषा-शैली की प्रमुख विशेषता है। इनकी भाषा का वाक्य-विन्यास समकालीन उपन्यासकारों के उपन्यासों से भिन्न है। वाक्य छोटे-छोटे हैं, जो वर्तमान समय में, हिन्दी पत्रकारिता की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। यह विनोद कुमार शुक्ल जी की खासियत है कि वे छोटी-सी घटना भी दृश्य को अत्यन्त सहजता और सजगता के साथ छोटे से वाक्यों में अभिव्यक्त कर देते हैं। इनकी भाषा में लोककथा-वाचन का रंग है, जबकि नाटकीय भंगिमा नहीं दिखाई पड़ता है। भाषा पात्र और परिवेश के अनुकूल है। इनके गद्य में भी पद्य का लय और सरसता दृष्टिगत होती है। उनके उपन्यासों का संपूर्ण सामर्थ्य उनकी भाषा में सगुंफित है। शुक्ल जी की औपन्यासिक भाषा के संदर्भ में रमेश यादव जी का मन्तव्य है कि "विनोद कुमार शुक्ल शब्दों के अगर शिल्पी नहीं तो जौहरी अवश्य हैं। वो एक-एक नगीने की तरह जड़ते हैं।"(2)
विनोद कुमार शुक्ल अपने उपन्यासों में चमत्कारिक भाषा की जगह स्वाभाविक भाषा को तरजीह देते हैं। उनके उपन्यास भाषा को भी नवीन स्वरूप प्रदान करते हैं। कहने और सुनने में अंतर को उस समय की वस्तुस्थिति और मनःस्थिति की वास्तविकता और उसके काल्पनिकता के अंतर से उत्पन्न होने की स्थिति को लेखक ने बहुत ही सुंदर तरीके से दिखाया है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में पति-पत्नी के मध्य संवाद होता है। वह इस असलियत को व्यक्त करता है। जैसे पति ने कहा कि पैदल आया था। पलीं सुनी, घोड़े पर आया था। पति ने कहा कि थक गये तो चाय पी। पत्नी ने सुना केसरिया दूध पिया। हम जो देखते हैं. सुनते हैं, सही अर्थों में हम नहीं देखना, सुनना चाहते हैं। इन्हीं सच्चाई को व्यक्त करने के लिए उपन्यास की भाषा की विचित्रता और महत्ता है।
विनोद कुमार शुक्ल जी की रचनाओं में उनकी भाषा के स्तर को जानने और समझने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। शुक्ल जी की औपन्यासिक भाषा की प्रशंसा करते हुए चन्द्रकांत पाटील लिखते हैं- "शुक्ल जी की भाषा साहित्यिक भाषा से बहुत दूर, चार लोगों के बोलचाल की सामान्य या जनसाधारण भाषा है, लेकिन अपने अंदर तीव्र भाव और संवेदना को छिपाने वाले मुख्य रुप से भावगर्व भाषा है। कॅज्युअल आम लोगों की भाषा। कई बार वह सपाटबयानी का खतरा भी मोल लेती है। मुक्तिबोध की भाषा के इस विपरीत ध्रुव पर खड़ी, लेकिन मुक्तिबोध की शक्ति को पचाकर वह धक्का नहीं देती, लेकिन चमत्कृत पैदाकर विचारों व भावों के चक्र में घुमाती-फिराती है। वह अपनी विचित्रता और विक्षितता से ही भिड़ जाती है। विलक्षण तथा अपरिचित भाषा शब्द संयोजन से। हिन्दी कविता की पूर्णतः अपरिचित संसार शुक्ल जी की कविताओं में साकार होती है। यह विचित्रता सुरियालिज्म जैसा प्रतीत होने पर भी आम आदमी के बोले में जो अनजाने में आने वाले सुरिया लिस्ट लगने वाली, लेकिन जो मूलतः सुरियालिस्ट नहीं हैं, ऐसे भाषक ढंग से आने वाली विचित्रता है।"(3)
विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में भाषागत वैविध्य के दर्शन होते हैं। शब्द-संपदा की दृष्टि से इनके उपन्यास अत्यंत समृद्ध प्रतीत होते हैं। अनेक तरह की भाषाओं के साथ मुहावरे और कहावतों का भी प्रयोग लेखक ने बखूबी किया है। साथ ही अनेक प्रकार के बिम्बों, चुटकुलों काव्यमयी लयात्मकता से संपन्न भाषा, चिंतन युक्त भाषा, व्यंग्यात्मक भाषा, दृश्यात्मक भाषा, वातावरण प्रधान भाषा, प्रसंगानुकूल भाषा का प्रयोग इनके उपन्यासों में सरलता और सहजता के साथ किया गया है। भाषागत विविधता के बावजूद इनके उपन्यासों की कथात्मकता प्रभावित नहीं हुई, वरन् यह प्रयोग कथा को और सजीव तथा जीवंत बना दिया है।
सामान्यतः समय के साथ-साथ इस परिवर्तनशील वर्तमान जीवन में अनेक तरह के बदलाव हुए हैं। ऐसे में स्वाभाविक रुप से साहित्य की भाषा में परिवर्तन हुआ है। इस तरह के परिवर्तन शुक्ल जी के उपन्यासों में भी दृष्टिगत होता है। अगर शुक्ल जी के उपन्यासों में प्रयुक्त भाषा पर विचार करें, तो पाएंगे कि इनमें कई सारी विविधताएँ हैं, जिनमें उर्दू, अंग्रेजी, फारसी, तुर्की, देशज, विदेशज भाषा के शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले के साथ किया गया है। इस तरह भाषागत विविधता से विनोद कुमार शुक्ल ने समाज के प्रत्येक वर्ग के पाठकों को सम्मोहित करने का सफल प्रयास किया है।
शब्द संपदा :
शब्द-संपदा कथा-साहित्य का आधार माना जाता है। शब्दों का यथासंभव सही प्रयोग ही साहित्य को सजीव बनाता है। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में इसका प्रयोग व्यापक रुप से देखा गया है। उन्होंने तत्सम, तद्भव, देशज, अंग्रेजी, उर्दू-फारसी आदि भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया है।
(1) तत्सम् शब्दावली :
किसी भाषा के मूल शब्द को तत्सम् कहते हैं। तत्सम्' का अर्थ ही है- 'उसके समाना या ज्यों-का-त्यों (तत्, तस्य-उसके संस्कृत के, सम-समान)। यहाँ संस्कृत के उन तत्समों की सूची है, जो संस्कृत से होते हुए हिन्दी में आए हैं। शुक्ल जी के उपन्यासों में प्रयुक्त तत्सम् शब्द निम्नवत् है-
अनुपस्थिति, पिंड, स्मृतियाँ, पदचाप, निस्तेज, पितृहीन, छात्रावास, पीड़ा, आशंकित, उपयोग, विपरीत, परीक्षा, उदिग्रता, असुरक्षित, साक्षात्कार, क्षोभ, विरुद्ध, जिज्ञासा, असमर्थ, निर्विकार, हृदय-प्रकोष्ठ, भावना, अमानुषिकता, विश्वास, स्वर्गवासी, प्रतिशोध, मानसिकता, आश्वस्त, द्वन्द्व, कुद्ध, रक्तिम, व्यवहार, परिवर्तन प्रकरण, वर्जनाएँ, कल्पना, कामना, व्यग्र, लज्जित, उत्साह, महासागर, आनंदित, संकोच, संदर्भ, कार्यक्रम, निरुपाय, उदासीनता, साधिकार, निरंतर नियंत्रण, अनुशासन, अशिष्ट, अधीर, उपहार, उपहास, असहमति, समाचार, अस्थिरता, सान्तवना, नियुक्ति-पत्र, संभव संभावना, अस्वाभाविक, प्रतिक्रिया, विलंब, आवश्यकता, घोषणा-पत्र, अनुभूति, अभीभूत, भावाकुलता, व्यथा, सम्मान, साधक, साहित्यकार, पक्षधर, विश्वासघात, अर्थहीन, हस्ताक्षर, प्रस्फुटित, आलोड़ित, चिंतित, कार्यालय, प्रेम, दीन-हीन, कठोरता, क्षितिज, पर्वतमाला, एकाग्रता, कोपभाजन, आकार-प्रकार, चेतावनी, अतिरिक्त, नियमानुसार, अनियमित, सावधान, आर्शीवाद, संघर्ष, अंतर्गत, मंत्रणा, प्रयास, निष्फल, सत्य, आलस्य, आत्महत्या, अंतर्जगत, संवादहीनता, निष्क्रियता, असमर्थता, आरोह, अवरोह, सर्वग्राही, आकृति, भाव विभोर, संभावनाएँ, क्षोभ, प्रतीक्षा, विहलता आदि।
(2) तद्भव शब्दावली :-
ऐसे शब्द जो संस्कृत और प्राकृत से विकृत होकर हिन्दी में आए हैं, 'तद्भव कहलाते हैं। तत् + भव का अर्थ है- उससे (संस्कृत से) उत्पन्न। ये शब्द संस्कृत से सीधे न आकर पालि, प्राकृत और अपभ्रंश से होते हुए हिन्दी में आए हैं, परन्तु कुछ शब्द देश-काल के प्रभाव से ऐसे विकृत हो गये हैं कि उनके मूलरूप का पता नहीं चलता। फलतः तद्भव शब्द दो प्रकार के हैं-(क) संस्कृत से आने वाले। (ख) सीधे प्राकृत से आने वाले। हिन्दी भाषा में प्रयुक्त होने वाले बहुसंख्य शब्द ऐसे तद्भव है, जो संस्कृत-प्राकृत से होते हुए हिन्दी में आए हैं। हिन्दी में शब्दों के सरलतम रुप बनाये रखने का पुराना अभ्यास है। श्री विनोद कुमार शुक्ल ने तत्सम् के समान ही तदभव शब्दों का भी प्रयोग अपने उपन्यासों में किया है। जैसे- आग में, बच्चा, बाछा, चौदह, फूल, चौथा, प्रिय, प्रिया, किया, बैन, नौ, चार, अढ़ाई, ढ़ाई, गोबर, घोडा, सौ, सौत, हल्दी, हरदी, पलंग, सलाई, भात, सुई, शत्रु, खौर, लड़की आदि।
(3) देशज शब्दावली :
'देशज' वे शब्द है, जिनकी व्युत्पति का पता नहीं चलता। ये अपने देश में बोलचाल से बने हैं। इसलिए इन्हें 'देशज कहते हैं। हेमचंद ने उन शब्दों को देशी कहा है, जिनकी व्युत्पत्ति किसी संस्कृत धातु या व्याकरण के नियमों से नहीं हुई। लोक भाषाओं में ऐसे शब्दों की अधिकता है। लोक-प्रचलित भाषाओं के प्रयोक्ता होने के कारण विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में देशज शब्दों का आधिक्य मिलता है- यथा-लरिका, मेहरिया, हुलास, एक-दूजे, चुल्लू, दुगना, अनाज-पानी, गंधाता, बाट, जोहना, अपनापा, दुधमुहाँ, अधमरी, खेती-बारी, बदुस, भरभराना, हुलसना, गुजर-बसर, चूँ-चपड, झिकझिक, अधबीच, भेली, पिंडलिया, बरकत, ढोलकिया, हज्जामिए, गिलगिलाए, छूटे-कमाई, रुपिया, फुन्न, अटपटाने, ततैया, काउनो, अटरिया, भुच्च, भाड़ा, किचकिचाकर, पड़सा, भकभकाया, बिलबिलाहट, अकबकाई, टुनटुनाना, टुच्चे, बहस मुवाहसे, भलमनसाहत, धरधराहट, थप्पड़, कोंच कोंचकर किलकारियाँ, हिचकियाँ, मरोरकर, अलसाई, लपलपाती, टुकड़े-टुकड़े कर, दुरियाना, पुलकन, भभुआ-भभुआकर, कुल्ला, किसिम-किसिम, किटकिटाकर, कोर-कसर, गहने-गुड़िया, रिरियाती, बतियाते, परताप, डल्लत, बरगलाना, शिखला-पढ़ेला, मानुस आदि।
(4) विदेशज शब्दावली :
विदेशी भाषाओं से हिन्दी भाषा में आए शब्दों को 'विदेशज' शब्द कहते हैं। इसमें अंग्रेजी, फारसी, उर्दू, अरबी, तुर्की के शब्दों को हिन्दी ने अपनी उच्चारण के अनुरुप या अपभ्रंश रूप में ढाल लिया है। हिन्दी में उनके कुछ हेर-फेर दिखते हैं।
(क) अंग्रेजी शब्दावली :
विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया हैं। उनके उपन्यासों में प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द निम्नवत् हैं-
चैंपियन, चिल्ड, वाइफ, सॉफ्ट, ड्रिंक, वार, मिक्स, माय, गॉड, रिलेशन, सुपरवाइजर, सैकेंड, एक्सीडेंट, एनाउन्स, सर्विस, पार्ट-टाईम, एक्सक्यूज, फर्स्ट क्लास, फ्लैट, अपार्टमेंट, मटन, शॉप, स्टार, स्टूडियों, इंडस्ट्री, प्रोजेक्ट, बिजनेस, मैनेजमेन्ट, ड्रेशिंग, क्लोजअप, मॉडलिंग, क्लाइट, स्क्रीन, स्टैंड, मॉडर्न, स्पेशल, शैम्पू, सेल्फ, इंडियन, कैंटीन, ज्वाइन, डील, ड्राइविंग, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, पेंशन, एक्सपर्ट, ऑपरेशन, किचन, सोसाइटी, पैसेजर, प्लीज, एन्जॉय आदि।
( ख) उर्दू-फारसी-अरबी शब्दावली :
विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में उर्दू-फारसी-अरबी भाषा के प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया है। ये ऐसे शब्द हैं- जो पूरी तरह से हिन्दी भाषा में ढल चुके हैं।
यथा- तकरीबन, वाकिफ, फरमाइस, दलील, हंगामा, बरदास्त, बगैर, तलाकशुदा, दुनिया-जहान, खैर, जबरदस्त, शिद्दत, खैरात, स्वामोशी, खैर, खैरातु मुसाफिर, दिलचस्पी, बंदोबस्त, कब्रगाह, बेतरतीब, मेहनत, निगाह, फसाद, फायदा, मुताबिक, मजबूरी, बेचैन, चुस्त-दुरुस्त, सनसनी, जवाब, जवान, बहाने, खिलाफ, शुरुआत, चुप्पी, काफी, लिहाज, मजबूती, तकरीब, चेहरा, बबंडर, महसूस, राहत, निगरानी, खुश, खबरी, तेवर, समझौता, दर्शाना, तकलीफ, तेज-तर्रार, मरदजात, कोशिश, बावजूद, फरमाइश, मौजूद, मुस्कराहट, जरूरत, लायक, एहसास, गुमसुम, हरगिज, नजरिया, रवैया, चुनौती, रोजी-रोटी, अनायास, हैरानी, फांसी, तरला, शादीशुदा, फासला, जरन, दोस्तों, नशा, जलील, खोज खबर, बहला-फुसला, सही-सलामत, अजीब, अदालत, नसीहत, चौकत्री आदि।
(ग) मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ :
ऐसा वाक्यांश, जो सामान्य अर्थ का बोध न कराकर किसी विलक्षण अर्थ की प्रतीति कराए 'मुहावरा' कहलाता है।"(4) अरबी भाषा का 'मुहावरा शब्द हिन्दी में मुहावरा हो गया है। उर्दू वाले 'मुहाविरा' बोलते हैं। इसका अर्थ 'अभ्यास' या 'बातचीत है। हिन्दी में मुहावरा' एक पारिभाषिक शब्द बन गया है। कुछ लोग मुहावरा को रोजमर्रा' या 'वाग्धारा' भी कहते हैं। मुहावरे के प्रयोग से भाषा में सरलता, सरसता, चमत्कार और प्रवाह उत्पन्न होते हैं। इसका काम है बात इस खूबसूरती से कहना कि सुन्नेवाला उसे समझा, भी जाय और उससे प्रभावित भी हो।
लोकोक्तियों के पीछे कोई कहानी सा घटना होती है। उससे निकली बात बाद में लोगों की जुबान पर जब चल निकलता है, तब लोकोक्ति हो जाती है। कुछ लोको क्तियों का प्रयोग साहित्य को सरस और आकर्षक बना देता है।
कहा जाता है कि मुहावरें और लोकोक्तियाँ लोक-जीवन की धड़कन होते हैं तथा उनका प्रयोग भाषा को रमणीय और सौष्ठवपूर्ण बना देता है। अपनी अभिव्यक्ति को सजीव और लोकानुकूल बनाने के लिए मुहावरों लोकोक्तियों का प्रयोग विनोद कुमार शुक्ल ने अत्यंत सहज रूप में किया है। उनके, उपन्यासों में प्रयुक्त मुहावरे और लोकोक्तियाँ निम्नवत हैं-
अंधे के हाथ बटेर लगना, चित्त-पट्ट हो जाना, लार टपकाना, छाती पर मूंग दलना, ओखली में सिर देना, फूटी आँख न देखना, बाल सफेद करना, दीया जलाने वाला कोई न होना, हिम्मत न हारना, जान में जान आना, हथेली पर सरसों जमाना, बाल बाँका न कर सकना, बाट जोहना, ईंट का जवाब पत्थर से देना, तिल का तार बनाना, अपने पाँवों पर खड़ा होना, लफड़े पालना, टस से मस न होना, सोने पर सोहागा होना, आकाश-पताल एक करना, मुंह में ताला पड़ना, बात कानों में डालना, आँखों की किरकिरी होना, कहर ढाना, नींद उचटना, जमीन-आसमान का अंतर होना, आसमान छूना, आँख मिचौली खेलना, हाथों-हाथ घर लेना, जीना मुहाल कर देना, फलना-फूलना, खून-पसीने की कमाई, सिर पर चढ़ाना आँखे दिखाना, दिल दहलना, ढेर हो जाना, दूध के दाँत न टूटना, हाथ-पाँव मारना, साफ-साफ मुकुर जाना, आग में घी डालना, दीवारों के कान होना, मुँह मोड़ना, चट कर जाना, तिल का ताड बनाना, नाक रगड़ना, हजम कर जाना, अंगूठा दिखाना, आँखे पटपटाना, आपा खो बैठना, पर लगना, मुँह ताकना ऊँट के मुँह में जीरा, पो फटना, हाथ पीला करना, दिमाग ठिकाने होना, घड़ियाली आँसू बहाना, आँखें लड़ाना, बोलती बंद करना, आपे से बाहर होना, फूटी आँख न सुहाना, आँखें पलटना आदि।
हाथी मरा तो सवा लाख का, उपासे आगे मोदक, खाल उधेड़कर भूसा भरना, अधा क्या मांगे दो आँखें, पाँचों, ऊँगलिया घी में और सिर कराही में, रंग बदलना, बोरिया-बिस्तर बाँधना, दो-दो हाथे करना, तुम डाल-डाल में पात-पात, जिसकी लाठी उसकी भैंस, दान की बछिया के दाँत न गिने जाते, जो मर गया सो तर गया आदि।
इस तरह अपने उपन्यासों में विनोद कुमार शुक्ल ने प्रयाप्त मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग किया है।
(घ) बिम्ब का प्रयोग : -
बिम्ब को कथा-साहित्य की भाषा का केन्द्रीय तत्त्व स्वीकार किया गया है। बिम्बों का प्रयोग कथा-साहित्य को अलंकृत कर देता है। उपनामों तथा बिम्बों का प्रयोग करके कचाकार वर्णन की एकरसता से पाठक को हटाकर दृश्यबोध कराता है। बिम्ब का प्रयोग कचाकार की अतिरिक्त कलात्मक सामर्थ्य का परिचायक माना जाता है। भाषा ही मुख्यतः बिम्ब की आधार शिला है और बिम्ब-विहीन भाषा निष्प्राण और नीरस होती है। बिम्ब ही भाषा का तात्त्विक गुण है। भाषा की संप्रेषण शक्ति बिम्बों पर आधृत है। बिम्बों की क्षमता सबसे अधिक प्रभावशाली व महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थिति को भी बिम्ब-विधान प्रभावी बना देता है। बिम्ब ही एक ऐसा, साधन है जो दृश्य की असीमित गहराईयों में अमिट चित्रों का निर्माण करता है।
वस्तुतः 'बिम्ब' शब्द का प्रयोग छाया, प्रतिच्छाया, अनुकृति आदि के रुप में होता है। बिम्ब को किसी वस्तु की छाया, अनुकृति, सादृश्य अथवा एमानता माना गया है। विश्वकोश में भी बिम्ब को प्रतिच्छाया के रूप में स्वीकार किया गया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया है कि वस्तु या व्यक्ति का प्रतिबिम्ब ही है, तथा साहित्य और अन्य कलाओं में इसका अर्थ किसी सजीव या निर्जीव वस्तु की प्रतिच्छाया किया गया है।"(5)
इस तरह बिम्ब ऐसे शब्द चित्र हैं, जो भाव-चित्र बनकर मानच-मन में प्रतिष्ठित होते हैं और वस्तु-वर्णन को साकार बनाकर उसमें जीवंतता लाने में सहायक होते हैं। इससे न केवल घटना चमत्कार पूर्ण बन जाती है, बल्कि चित्रात्मक भाषिक प्रक्रिया से कथा का विकास भी होता है। इस संदर्भ में स्टीफन जो ब्राउन का मत है- ''साहित्य में बिम्ब से तात्पर्य होता है, कलाकार की उस क्षमता से, जिसके सहारे वह बीती हुई घटनाओं और विषय वस्तु का रंग, ध्वनि, गति, आकार-प्रकार सहित देश, काल, परिस्थिति को ध्यान में रखकर शब्द चित्रों में वर्णन कर देता है और यह शब्द चित्र ठीक उसी प्रकार का होता है, जैसे कि उस घटना या वस्तु का स्वरुप था।"(6)
डॉ० केदारनाथ सिंह बिम्ब का अर्थ समझाते हुए लिखते हैं- "बिम्ब शब्द का अर्थ, जो आज ग्रहण किया जाता है। वह अपेक्षाकृत नया और व्यापक है। पहले इसका अर्थ मात्र चित्रात्मकता अथवा मूर्तिकला के अर्थ में ग्रहण किया जाता था, किन्तु आज वह स्थूल शब्द चित्रमात्र का बोधक न रहकर मनुष्य की संपूर्ण जटिल मानसिक प्रक्रिया का बोधक बन गया है। वह अलंकार-विधान के समान केबल काव्य तक ही सीमित नहीं रह गया, बल्कि उसकी स्थिति काव्य के अतिरिक्त संगीत, चित्रकला और मूर्तिकला में भी मानी जाती है।"(7)
उपर्युक्त परिभाषाओं तथा विवेचनों से स्पष्ट हो जाता है कि समय की मांग के अनुसार बिम्ब ने भी स्वयं के स्वरूप को परिवर्तित कर लिया है। आज मानव की सोच का अनुमान भी इससे लगाया जा सकता है। साहित्य के प्रत्येक विधा में बिम्बों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है। विनोद कुमार शुक्ल ने स्थिति और संदर्भ को देखते हुए अपने कथा साहित्य में बिम्बात्मक भाषिक विधान किया गया है। यथाः- "सड़क एकदम खाली थी। तब भी उन्होंने घंटी बजाई लगातार बजाई कि शायद जो भी सामने था, हटता जाय। हो सकता है कि सड़क के दोनों किनारे के पेड़ पहले सड़क पर रहे हों, रघुवर प्रसाद की बंटी बजाने से दोनों किनारे हो गये और सड़क खाली हो गई।"(8)
बिम्ब प्रमुखतः तीन प्रकार के होते हैं- श्रव्य बिम्ब, स्पर्श बिम्ब और घ्राण बिम्ब। इसका प्रयोग विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में किया है।
(1) श्रव्य बिम्ब :
इस बिम्ब का संबंध हमारे कानों से हैं। इसमें प्रायः ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। विनोद कुमार जी ने अपनी उपन्यासों में बखूबी इसका प्रयोग किया है- "आँख बंद कर फूलडाड़ी की आवाज सुनना, बेमतलब था। फटाके का मतलब उसकी तेजी, आवाज का था। कान बंद कर उसे देखो तो वह फुलझड़ी, से भी बढ़कर लगता है। फुलझड़ी में आवाज नहीं होती, उसे यदि कान बंद कि भी देखे तो भी अच्छी लगती थी।"(9)
(2) स्पर्श बिम्ब :
इसका संबंध हमारे त्वचा से होता है। इस बिम्ब का प्रयोग कहीं-कहीं दिखाई देता है। श्री विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में व्यक्त संवेदना को मुस्वर बनाने में स्पर्श बिम्ब का महत्त्वपूर्ण सहयोग है। देखें एक उदाहरण- "जिंदगी में हर क्षण पच्चीसों लाल चीटियाँ चिपकी रहती थी, शायद पसीना इसका कारण हो, लेकिन उनको सहने की आदत पड़ गयी है, जिंदगी, चीटियाँ, पसीने किसी पूर्व निर्धारित अर्थ की ओर संकेत नहीं करते, बल्कि इसका अर्थ, इसी पाठ में मौजूद है, वह भी अंतिम और स्थिर नहीं।"(10)
विनोद कुमार शुक्ल रचित नौकर की कमीज की पूरी बिम्ब व्यवस्था भारतीय मध्यवर्गीय जीवन के अनेकों चित्र, जीवन छवियाँ, मुद्राएँ सीमित दुनिया के मुहावरें। चीजों की तहों तक इतनी तरह से पहुँचने का सामर्थ्य आश्चर्य चकित करता है। एक उदाहरण- "एक चिड़ियाँ धोखे से पेड़ पर बैठने वाली थी, पर मुझे देखकर चींची करते हुए भाग गयी।"(11)
(3) घ्राण-बिम्ब :-
घ्राण बिम्ब और गंध बिम्ब का संबंध नाक से है। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों की विशेषता है उनमें घ्राण बिम्ब का सौन्दर्य प्रकट हुआ है। इसका प्रयोग ही उनके कथा-साहित्य को और भी सुंदर बनाता है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में इसके कई उदाहरण मिलते हैं-
"हर सिंगार के फूलों से जिन्हें बटोर कर सूई से पिराकर मालाएँ बनाते।"(12)
"खाने का स्वाद बदल गया था। ड्योढ़ी की महक बदल गयी थी, वह जगह जो हमारी घुटन का प्रतीक थी। आद पुकार देती हमें बुला रही थी।"(13)
इस प्रकार विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में बिम्ब के विविध रूपों का प्रयोग मिलता है।
(4) प्रतीक :
प्रतीकात्मक शैली में बहुत बड़े व्यापक आशय को संक्षेप में प्रयुक्त किया जाता है। प्रतीक और संकेत में सूक्ष्म भेद दिखाते हुए कहा गया है- प्रतीक एक प्रकार का संकेत ही है, पर संकेत और प्रतीक दोनों में व्यापकत्व और संकोचन का अंतर है। प्रत्येक प्रतीक संकेत है। सकता है, पर प्रत्येक संकेत प्रतीक नहीं हो सकता। संकेत का साँचा प्रतीक से, अधिक अनिश्चित और अनेकविध होता है। "(14)
प्रतीकों से सुसज्जित भाषा साहित्य के सौन्दर्य को बढ़ाती है, पर सामान्य पाठक शीघ्र ही प्रतीकात्मक अर्थ को समझ नहीं पाता। विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में कतिपय प्रसंगों में प्रतीकों का प्रयोग किया है। इससे उनकी भाषा में एक अलग तरह का सौन्दर्य समाविष्ट हो गया है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' नामक उपन्यास में इसकी बानगी देख सकते हैं-
"जब किसी एक से प्रेम करने का डर गृहस्थी की चौहद्दी को मजबूत बनाता था। इसमें खिड़की होती है, न छोटा-सा रोशनदान। दरवाजा, खिड़की की जगह दीवाल होती।"(15)
इसी प्रकार 'खिलेगा तो देखेंगे नामक उपन्यास में वे लिखते हैं-" खिड़की से आकाश दिखता था, इसलिए खिड़की से झाँकते हुए बच्चे आकाश से झाँकते हुए लगते थे।"(16)
उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि विनोद कुमार शुक्ल जी ने अपने उपन्यासों में प्रतीकों का प्रयोग किया है।
भाषा के विविध रूप :
सभी साहित्यिक विधाओं की जननी भाषा है। सिर्फ साहित्यिक विधाओं की नहीं, वरन् ज्ञान की सभी शाखाओं की जननी भाषा ही है। बिना भाषा के ज्ञान की परिकल्पना असंभव है। साहित्य में भाषा को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। यहाँ भाषा को साहित्य के एक अभिन्न तत्त्व के रूप में स्वीकार किया गया है। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों की भाषा में विविधता दृष्टिगत होती है।
कथाकार विनोद कुमार शुक्ल ने अपने कथा-साहित्य में वस्तु की आंतरिक मांग के अनुरुप काव्यमय भाषा, अलंकारिक भाषा, चिंतन प्रधान भाषा, व्यंग्यात्मक भाषा, संवादात्मक भाषा, प्रसंगानुकूल भाषा आदि का विशेष प्रयोग अपनी अनुभूतियों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति की है। विनोद कुमार शुक्ल जी की सृजनात्मकता का अत्यंत महत्त्वपूर्ण आयाम उनकी भाषा के विविध रुप है। जिनका उपयोग बहुत ही संजीदगी और सहजता के साथ उन्होंने अपने उपन्यासों में किया है।
(क) काव्यात्मक भाषा :
विनोद कुमार शुक्ल जितने प्रसिद्ध कथाकार है, उतने ही, ख्यात् कवि भी। उन्होंने साहित्य के दोनों क्षेत्रों में समान अर्जित किया है। यही कारण है कि उनके कथा साहित्य विशेषकर उपन्यासों में काव्यात्मक भाषा का प्रयोग मिलता है। उनके उपन्यास यासि रासा त में से इसकी बानगी देखिये-
"घर में आने जाने का
बादर को हिसाब दिया
घर को हिसाब दिये बिना
बाहर नहीं गया
घर और बाहर में
बराबर का आना-जाना
घर से गये तो बाहर
घर आये तो बाहर से
इससे अधिक न कहीं गये
और न अधिक वापस आये
नकम गये
न कम आये।"(17)
विनोद कुमार शुक्ल ने 'हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़' नामक उपन्यास में सर्वाधिक काव्यमयी भाषा का प्रयोग किया है। इस उपन्यास को उन्होंने किशोर, बड़ों और बच्चों के लिए लिखा है, इसलिए इस उपन्यास की भाषा को सरस बनाने की चेष्ट की गयी है।
उपन्यासकार कहता है 'हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी' से कुछ दूर वैसी ही घनी हरी घास उग आई। लगता है कि छप्पर उग रही है। कविता के रूप में इसकी प्रस्तुति देखिये-
"मिट्टी से उगती हरी बास की छप्पर
फिर मिट्टी से मिट्टी की दीवारें ऊपर
मिट्टी से उगी दीवार में
बनाएँ दिशाओं के दरवाजे खिड़की
सोच समझकर।"(18)
हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी को किसी ने बनते हुए तो नहीं देखा था। उगते हुए भी नहीं देखा था। जिसने भी सबसे पहले देखा उसने आकाश और बौने पहाड़ के साथ यह बनी बनाई झोपड़ी देखी। इस झोपड़ी का वर्णन उपन्यासकार ने काव्यमयी भाषा में करते हैं-
"सब बना-बनाया सबने देखा
बनते कहीं दिखा आकाश
बना-बनाया पहाड़,
जंगल तरह-तरह की चिड़िया
नदियाँ, समुद्र जीव और जंतु
बनते कहाँ दिस्था सूरज
पत्थर, पेड़, बरसात
ऋतु बसंत और
रंग-बिरंगे फूल
दिन संख्या और रात।"(19)
अतएव, विनोद कुमार शुक्ल ने काव्यमयी भाषा का प्रयोग अपने उपन्यासों में किया है।
(ख) आलंकारिक भाषा :
उपमा, रुपक, उपेक्षा, उपमेय, अलंकार वाणी के आभूषण हैं। इन अलंकारों के प्रयोग से भाषा का सामर्थ्य सौन्दर्य तथा समृद्धि में इजाफा होता है। अप्रस्तुत विधान द्वारा लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभवों की अभिव्यक्ति करता है। भाषा, को आलंकारिकता से सजाकर पेश करने से साहित्य सरस और प्रभावोत्पादक बनाता है।
विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में आलंकारिक भाषा का प्रयोग किया है। इसके कुछ उदाहरण उनके उपन्यासों से देखा जा सकता है-
- "प्रेम से कोई दो शब्द बात कर ले तो पूरी पृथ्वी में कोई दुश्मन नहीं ऐसा लगता था। खुशी जो चारों तरह दिखती उसके परोक्ष में अक्षांश-देशां के तारों की झंकार होती। थोड़ी देर में जलवायु सुखद हो जाती। इस तरह बहुत कम नदियाँ गहरी थीं जो नदी गहरी थी वह अपने बहाव की ताकत से अपने को अंदर से काटती थी। दरअसल काल्पनिक अजगर अक्षांश-देशांश की तरह पृथ्वी से लिपटे थे।" (20)
- "आज की सुबह थी। सूर्योदय पूर्व की दिशा में था। दिशा वही रही आई थी; बदली नहीं थी। ऐसा नहीं था कि सूर्य धोखे से निकलता था, उसके निकलने का सबको विश्वास था। किसी दिन सूर्य बादलों में छुपा हुआ निकला होता, पर निकला हुआ बाहर होता था। उसका उदय और अस्त सत्य था। सूर्य के उदय होने के प्रमाण की तरह दिन था और सूर्यास्त के प्रमाण की तरह रात हो जाती थी।"(21)
-"हरी घास की छप्पर पर उतरने का उसका मन हुआ। हवा को झोंकों के पंख को हलके-से फड़फड़ाकर वह हरी घास के छप्पर पर उतरने लगा। लोग अपने घरों को लौटने लगे थे। बूढ़े- बूढ़ी नहीं लौटे थे। जैसे ही वह धरती पर उतरा, उसने देखा एक बड़ा-सा चन्द्रमा हरी बास की छप्पर से निकला है।"(22)
(ग) चिंतन-प्रधान भाषा :
श्री विनोद कुमार शुक्ल कहीं-कहीं अपने उपन्यासों में चिंतन प्रधान एवं गंभीर भाषा का प्रयोग करते हैं जो रहस्यात्मक प्रतीत होती है। चिंतन-प्रधान भाषा के उदाहरण निम्नवत हैं-
- "जिस तरह तराशे व्यक्ति खनन को अपराध मानते हैं, उसी तरह बाबू लाल महाराज पेड़ को काटने, पत्ती तोड़ने तक को अपराध मानते हैं।" (23)
- "क अक्षर को भी सोचा गया-आने वाले काल का कः जिसके अर्थ में उम्मीद और सुखकी बात थी उसमें किसी ने बीते कल के 'क' को सोच लिया तो कैसे समझाया जाएगा कि बच्चा तो आने वाले कल का 'क' है। "(24)
- "चन्द्रमा, सूरज, तारे, आकाश, घर की चीजों की तरह थे। चन्द्रमा, सूर्ज शाश्वत होने के बाद भी इधर-उधर होते थे। उनके कभी-कभी न दिखने से किसी को फर्क नहीं पड़ता था। गौरेया चिडिया इतनी सारी और एक-सी होती थी; कि उनका साथ कभी नहीं छूटता था।" (25)
इस प्रकार विनोद कुमार शुक्ल जी ने अपने लगभग सभी उपन्यासों में चिंतन-प्रधान भाषा का प्रयोग किया है।
(घ) व्यंग्यात्मक भाषा :
व्यंग्यात्मक भाषा का कथा सृजन का एक अनिवार्य अंग है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक विसंगतियों और विदूपताओं की स्थिति देश में बनी रह गयी। देश की एक बड़ी आबादी यही के मुट्ठी भर लोगों के गुलाम बनकर रह गये। इस पर साहित्यकारों की दृष्टि पड़ना स्वाभाविक था, चूँकि स्वाधीनता केवल सत्ता का हस्तांतरण था। जो शासन अब तक अंग्रेज कर रहे थे, वह अब यहीं के लोग करने लगे। श्री विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यासों में व्यंग्य का प्रयोग करते हुए इस तरह की विसंगतियों पर करारा प्रहार करते हैं। खिलेगा तो देखेंगे' में वे प्रेम पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं- "जब किसी एक से प्रेम करने का डर गृहस्थी की चौहद्दी को मजबूत बनाता था। इसमें न खिड़की होती, न छोटा-सा रोशन-दाना दरवाजा, खिड़की, रोशनदान की जगह दीवाल होती।"(26)
- "शहर फैलते-फूलते नजदीक के गाँव तक पहुँचता तो गाँव शहर का मुहल्ला बन जाता था।"(27)
- "यदि साँप छोड़ने से भगदड़ मच जाये तो साँप नहीं छोड़ना चाहिए।" (28)
अतएव, विनोद कुमार शुक्ल अपने उपन्यासों में व्यंग्यात्मक भाषा का प्रयोग किया है।
(ङ) दृश्यात्मक भाषा :
दृश्यात्मक भाषा के अंतर्गत, ऐसे शब्दों का क्रमानुसार प्रयोग, जिसके माध्यम से किसी स्थान, वस्तु अथवा घटना का दृश्य सजीव रूप में पाठकों के समक्ष उपस्थित हो जाय। विनोद कुमार शुक्ल के पास दृश्य को यथावत चित्रित करने की अद्भुत क्षमता है। उनके द्वारा अनेक दृश्यों का हुबहू वर्णन देखकर लगता है कि हम भी उस दृश्य के दृष्टा हैं। उनके द्वारा प्रयुक्त दृश्यात्मक भाषा की बानगी देखिए-
- "गोल स्कूल की बाहरी दीवालें गोलाई लिए हुए चिकनी थीं। उसी तरह कक्षा की अंदर की दीवालें जो बरामदे की तरफ थीं। गोलाई लिए हुए चिकनी थीं। अंदर की कक्षा की दीवालों में आले बने हुए थे। तरह-तरह के छोटे- छोटे आला आले नीचे से दो-तीन फुट छोड़कर इतनी ऊँचाई तक एक के ऊपर एक बने थे कि सीढ़ी लगाकर ही उन तक पहुँचा जा सकता।"(29)
- "एक दम बिहनिया जब रघुवर प्रसाद की नींद खुली, सोनसी बिस्तर पर सो रही थी। रघुवर प्रसाद उठे। कमरे में अधिक अंधेरा था। रघुवर प्रसाद दरवाजा खोलकर बाहर आए। सड़क की बत्ती गुल थी। रात से नहीं जली थी। रघुवर प्रसाद दरवाजे की देहरी पर बैठ गए। उन्हें लगा कि नीम के पेड़ के नीचे अंधेरा अधिक है।" (30)
(च) वातावरण प्रधान भाषा :
विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी कुशल लेखनी से बाह्य-परिवेश और वातावरण को भी अपनी भाषा द्वारा साकार किया है। पात्रों के मनोभावों को व्यंजित करने के लिए वातावरण के अंकन से काम लिया है। इसके कुछ उदाहरण देखिए-
- "बड़गाँव आ गया था। गाँव में घुसने के पहले कि मौका मिले- न मिले वह पेशाब करने लगा था। थाना जा रहा है यह भी कारण हो सकता था। पेशाब करते-करते उसने बेशरम की पत्ती तोड़ी, उसे कान में लगाया। सामने बबूल का पुराना पेड़ था। नीचे-बड़े-बड़े काँटे बिखरे थे।" (31)
- "बोलू के घर के आगे बजरंग होटल था। जब यहाँ बस्ती नहीं थी, एक भी घर नहीं, बसा था, तब यह होटल बसा था। इसके बाद होटल के चारों तरफ एक-एक कर घर बसे। "(32)
विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी भाषा के माध्यम से ही वातावरण को स्पष्ट करने की सफल कोशिश की है।
(छ) प्रसंगानुकूल भाषा :
विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में प्रसंग के अनुसार भाषा का प्रयोग किया गया है। हर्ष, शोक, संघर्ष, प्रेम, आक्रोश, घृणा, अवज्ञा, दैन्य आदि स्थितियों में और प्रसंगों में भाषा अपने आप परिवर्तित हो जाती है और परिवर्तित भाषा के द्वारा भावों की व्यंजना होती है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' नामक उपन्यास में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। रघुवर प्रसाद का पूरा परिवार गाँव में रहते हैं। सोनसी के साथ वे एक बस्ती में रहते हैं। उनके प्रेम के छोटे संसार में पूरी दुनिया शामिल है। उनको जब समय मिलता प्रेम में बहते हुए दोनों ही अपने घर की खिड़की से कूदकर एक अलग ही दुनिया में चले जाते हैं। वे इस संबंध को सौन्दर्य से संपृक्त कर देते हैं। रघुवर प्रसाद जब भी सोनसी को देखते हैं, हर बार उसमें एक नयापन दिखाई देता है। सोनसी रघुवर प्रसाद के लिए एक नया सबेरा है। वह भी उस अलग दुनिया में रघुवर प्रसाद के साथ जाकर प्रकृति के सौन्दर्य का भरपूर आनंद लेती है। इस उपन्यास में प्रकृति से लगाव का एक बहुत ही मजेदार प्रसंग है। रघुवर प्रसाद सांवले रंग के है। उन्होंने मन ही मन अपने एक हाथ को आगे बढ़ाकर जाते हुए हाथी के रंग से अपने रंग की तुलना की। हाथी की तुलना में उनका रंग साफ था। उनको इस बात की खुशी मिली कि आदमी से आदमी के रंग की तुलना तो सभी करते हैं, परन्तु पशु या पेड़ से शरीर के रंग से कोई तुलना नहीं करता। रघुवर प्रसाद की प्रकृति, पशु-पक्षी के साथ-पूरे पर्यावरण से एक अद्भुत लगाव है। विनोद कुमार शुक्ल रघुवर प्रसाद की इस आदत पर कहते हैं- "कभी-कभी दिख गए काले-साँवले मनुष्यों के पश्चात् किसी एक दिन पेड़ों से उन्होंने तुलना की होगी कि आम के पेड़ के शरीर का रंग बिही के पेड़ के शरीर के रंग से बहुत काला था। बिही के पेड़ का रंग गेहुँआ-चिकना था। आम के पेड़ के शरीर का रंग और नीम के पेड़ के शरीर का रंग एक जैसा काला था।"(33)
विनोद कुमार शुक्ल का चर्चित उपन्यास 'नौकर की कमीज' में इस तरह का भाषागत प्रयोग मिलता है। उपन्यास का एक प्रसंग देखिये, जब संतू बाबू के पास आकर उनकी पत्नी कहती है- "डॉक्टरनी पूरे टाइम कुर्सी पर बैठे मुझे बतलाती जा रही थी। उसको ब्लडप्रेशर रहता है। इसलिए चौके में नहीं घुसती। धुँए और जलते कोयले की गंध से उनको चक्कर आने लगता है। उनके घर के काम में बहुत पंचायत है। डॉक्टरनी बहुत मीन-मेख निकालती है। कम से कम दस बार तो कही होगी कि मेरी साड़ी बहुत गंदी है। साड़ी समेटकर काम करो। उनका चौका बहुत बड़ा और चकाचक साफ है। ढेर सारा सामान है। डॉक्टर की बहन पर मुझे दया आती है। नौकरानी की तरह कामे करती रहती होगी। नौकरानी की तरह रहती है। "(34)
इस प्रकार विनोद कुमार शुक्ल जी प्रसंग के अनुसार भाषा में परिवर्तन लाते रहते हैं, जिससे इनके उपन्यास की पठनीयता में अभिवृद्धि होती है। पाठक के लिए यह प्रयोग रुचिकर होता है।
(ज) पात्रानुकूल भाषा :-
उपन्यास की रचना कई पात्रों के संयोग से होता है। स्त्री-पुरुष बालक-वृद्ध, स्वर्ण-अवर्ण, शिक्षित-अशिक्षित ग्रामीण-शहरी सभी तरह के पात्रों की भाषा भी अलग-अलग होती है। इसलिए कुशल साहित्यकार की रचनाओं में इसका अधिक ध्यान रखा जाता है। विनोद कुमार शुक्ल निः संदेह एक सिद्ध हस्त उपन्यासकार हैं। इन्होंने अपने सभी उपन्यासों में पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग किया है। 'हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़' नामक उपन्यास में अनेक तरह के पात्र हैं। इसमें कुछ बच्चे भी सक्रिय पात्र हैं। इसी कारण इस उपन्यास में अक्सर सामान्य भाषा का प्रयोग किया गया है। उदाहरणार्थ-
- "छुआ- छूआइल का खेल लड़के खेल रहे थे। कूना भी था। बोलू चुपचाप अखाड़े की रेत पर खड़ा था और वह कहीं खो-सा-गया था। मेरा तेज भाग नहीं पाता था। दाम कूना को देना था। वह जानती थी कि वह भैरा को छूलेगी। वह भैरा को छूने को थी कि मेरा कूना से बचकर भोगते हुए बोलू की तरफ भागा। रेत पर भागते हुए लड़खड़ा गया और भारी-भरकम मेरा बोलू से जाकर टकरा गया। "(35)
'दीवार में एक खिड़की रहती थी' नामक उपन्यास का नायक रघुवर प्रसाद जी है, जोकि अत्यंत शिक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी भाषा में शिष्टता और अभिजात्यक स्वाभाविक रूप से मिल जाता है। उनकी भाषा देखिये-
- "तुम तो कई बार कहना भूल जाते हो। दिन के आखिरी में यदि तुम दस बार केवल सर-सर कह दोगे तो मैं कहाँ तक उस सर को क्या-क्या कहे के साथ जोड़कर पूरा करता रहूँगा। अच्छा कल्पना करो, महाविद्यालय का समय समाप्त होने के बाद घर जाने के पहले तुम मेरे पास आए और दस-पन्द्रह बार केवल सर-सर कहकर चले गए। अब मैं घर जाना छोड़कर तुम्हारे सर का हिसाब लगाता बैठा रहूँगा।"(36)
समग्रतः विनोद कुमार शुक्ल ने अपने सभी उपन्यासों में कलात्मक तथा प्रभावोत्पादक भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में हिन्दी के सभी प्रचलित शब्दों, मुहावरों कहावतों, व्यंग्यो, चुटकुलों तथा शैलियों के प्रयोग किये गये हैं। भाषा की दृष्टि से उनके उपन्यास अत्यंत महत्त्वपूर्ण और लोकप्रिय है।
(2) विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में शिल्प :
साहित्य और शिल्प एक-दूसरे के पूरक और अन्योन्याश्रित है। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना ही उनसंभव और निरर्थक है। शिल्प अभिव्यक्ति का ही एक मुख्य अंग है। शिल्प की कमी या दुर्बलता कृति को आकर्षणहीन बना देती है। शिल्प साहित्य का बाह्य पक्ष है, जिसे रचना का शरीर कहते हैं तथा वस्तु या अनुभूति उसकी आत्मा है। जिस प्रकार सूक्ष्म आत्मा के लिए स्थूल और आकर्षक शरीर अति आवश्यक होता है, जिसके अभाव में आत्मा का कोई भौतिक अस्तित्व ही असंभव है, उसी प्रकार अमूर्त, अव्यक्त और सूक्ष्म साहित्यानुभूति और सृजन की आत्मा के लिए भी स्थूल और आकर्षक शिल्प अति आवश्यक होता है।
शिल्प साहित्यिक संवेदना के मूर्तिकरण का अनिवार्य और अविभाज्य माध्यम है। इनमें साध्य और साधन का संबंध माना जा सकता है। जिस प्रकार साधन के बिना साध्य की प्राप्ति असंभव है, उसी प्रकार शिल्प के बिना भी साहित्य की प्राप्ति असंभव है। यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि शिल्प शब्द में सुन्दरता, आकर्षण और प्रभविष्णुता का गुण भी विद्यमान रहता है। 'शिल्प' शब्द केवल अभिव्यक्ति का पर्याय नहीं है, अपितु इसे सुन्दर, आकर्षक और प्रभावशाली अभिव्यक्ति का पर्याय माना जाना चाहिए। शिल्प के माध्यम से साहित्य न केवल रुपाकार ग्रहण करती है, अपितु आकर्षक, मार्मिक, सार्थक, सामाजिक और दीर्घायु बनकर हमारी संस्कृति का अंक भी बनती है। डॉ० सुमन कुँवर के अनुसार, "शिल्प एक कौशल है, काव्य की मूर्त रचना प्रक्रिया है, काव्य के मूर्तिकरण की विशेष कार्य विधि है, अभिव्यंजना पद्धति है, अनुभूतियों का मूर्त कलात्मक संयोजन है, जिसके माध्यम से साहित्यकार की आन्तरिक अनुभूतियाँ संवेदनाएँ, विचार और चिंतन, विशिष्ट रूपाकार में ढलकर गोचर स्थायी, आकर्षक और मूर्त सौन्दर्य ग्रहण करता है।"(37)
डॉ० मंजु गुप्ता के अनुसार- "साहित्यिक कृति के निर्माण में जिन उपादानों द्वारा साहित्य का ढाँचा तैयार किया जाता है, वे सब साहित्य के शिल्प तत्त्व कहे जाते हैं। जिस प्रकार किसी मूर्ति की सुंदर और आकर्षक निर्मिति के बाद ही सामने आती है, उसी प्रकार लेखक की अनुभूति, विचार और अनुभव भी सर्वथा वैयक्तिक, अमूर्त, आन्तरिक और अव्यक्त होते हैं।"(38) वस्तुत: शिल्प विधान साहित्यिक कृति अथवा कलात्मक वस्तु के रचने का ढंग या तरीका है। कला की रचना में जिन तरीकों, रीतियों और विधियों का प्रयोग किया जाता है, वे ही उस रचना की शिल्प विधि के नाम से पुकारी जाती है। यह कहा जा सकता है कि किसी वस्तु को बनाने, रचने का ढंग, तरीका और पद्धति ही शिल्प विधान है। रचना निर्माण की पद्धति ही शिल्प-विधान है।
जैनेन्द्र के अनुसार- "टेकनीक ढाँचे के नियमों का नाम है, पर डाँचे की जानकारी की उपयोगिता इसी में है कि वह सजीव मनुष्य के जीवन में काम आए। वैसे ही टेकनीक, साहित्य-सृजन में योग देने के लिए है।"(39)
'बृहद हिन्दी कोश' के अनुसार, "शिल्प से अभिप्राय हाथ से कोई वस्तु तैयार करने अथवा दस्तकारी या कारीगरी से है।"(40) साधारणतः "शिल्प हाथ से बनने वाली उपयोगी कलाओं, यथा-पत्थर मिट्टी लकड़ी की चीजें बनाना, बर्तन बनाने, गढ़ने के लिए तथा उनके लिए प्रयुक्त कारीगरी या हुनर के लिए प्रयुक्त किया जाता है।"(41) इस प्रकार शिल्प शब्द का अर्थ हुआ 'किसी वस्तु को विशिष्ट रुपाकार देना या देने की पद्धति, ढंग या तरीका। काव्य के संदर्भ में शिल्प अभिव्यंजना कौशल, रचना-प्रक्रिया, कार्यविधि या अमूर्त आन्तरिक अनुभूतियों के विविध उपादानों द्वारा मूर्त, सुंदर आकर्षक रूपाकार देने से है, जिसमें कवि को आन्तरिक अनुभूतियों प्रत्यक्ष और भास्वर हो उठे। अतएव रूप सर्जना की विशिष्ट योजना को शिल्प कहते हैं।
अंग्रेजी में शिल्प शब्द के लिए क्राफ्ट, फार्म, तकनीक आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। फार्म का शाब्दिक अर्थ है- 'किसी वस्तु का प्रारूप अर्थात् खाका या रुप। लेकिन टेकनीक शब्द का अर्थ है- विधि, पद्धति या तरीका। इस प्रकार अंग्रेजी के 'फार्म' शब्द की समता हिन्दी के विधान' शब्द से की जा सकती है। इस प्रकार विभिन्न शब्दकोशों के आधार पर शिल्प का अर्थ वस्तु या कृति को रचने, गढ़ने की प्रक्रिया से सुन्दर कलात्मक रूप से अभिप्रेत हुआ है।
कथाकार विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों का शिल्प अत्यंत कलात्मक और प्रभावोत्पादक है। उनके उपन्यासों के शिल्प को निम्नलिखित बिन्दुओं में देखा जा सकता है:-
* कथानक निर्माण :
साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी एक संवेदनशील व्यक्ति है। उनके उपन्यासों में आम आदमी की त्रासदी विवशता, असहायता निर्धनता, अभावग्रस्तता का सफल चित्रण हुआ है। कहानीकार, उपन्यासकार और कवि के रूप में शुक्ल जी ने विशेष उपलब्धियाँ अर्जित की है। वे किसी विशिष्ट विचारधारा से प्रतिबद्ध नहीं है। वे साहित्य में भारतीय रचनाकर्मी को समाजधर्मिता को अग्र स्थान प्रदान करते हैं। स्वतंत्रता पश्चात जनसाधारण को जीवन जीने में अनेकविध समस्याएँ आई और आज भी वह उन समस्याओं से ग्रस्त हैं। उनका सहानुभूति से निरीक्षण, चिंतन और सार्वजनिक सार्वकालिक अभिव्यक्ति, लंबे आंतरिक संघर्ष की रचनात्मक उपज है। श्री शुक्ल के उपन्यासों के अलावा कविताओं में भी इस संघर्ष की टकराहट, चुनौतियाँ, उनके कथन और कथ्य में आसानी से अनुभूत होती हैं।
विनोद कुमार शुक्ल जी मूलतः कवि हैं। इसके बावजूद भी वे कविता और कहानी साथ-साथ रचते दिखाई पड़ते हैं और उनका कवि रुप उनकी कथा पर हावी होता नजर आता है। आधुनिक हिंदी साहित्य का काव्य एवं कथा-जगत दोनों ही शुक्ल जी की चर्चा के बिना पूरा नहीं होता। आधुनिक कथा-साहित्य में इनका योगदान अमूल्य है। उनके उपन्यास-त्रयी भी ने न केवल हिंदी-साहित्य के उपन्यास-संसार को समृद्ध किया, बल्कि कथा कहने की परंम्परा को एक जादुई संसार भी दिया है।
शुक्ल जी के कथा-साहित्य में कथा, सिर्फ कहने के लिए या किसी वर्ग विशेष या केवल मनोरंजन के लिए नहीं है। यही कारण है कि इनकी कथाएँ विस्तार के बजाए संकेतों में आगे बढ़ती है, और उसी की व्याख्या के साथ समाप्त हो जाती हैं। इनके उपन्यास किसी पारंपरिक परिपाटी के उपन्यास की तरह घटना या समस्या के साथ आरंभ नहीं होते, इसीलिए ये उपन्यास किसी विशेष मोड़ पर आकर समाप्त भी नहीं होते या इसका समाधानपरक होना आवश्यक नहीं है। शुक्ल जी अपने उपन्यासों में काव्यात्मफ भाषा और लय को बनाये रखते हैं। उनके उपन्यास की कथा को पढ़ने से ऐसा लगता है- जैसे एक लंबी, स्वप्नमयी, काव्यात्मक संसार से गुजर रहे हों। उपन्यास में हमें कविता के विभिन्न रुपों और पड़ावों को पढ़ने का अनुभव होता है, जहाँ वे कई सूत्र, सूक्तियों और संकेतों के रूप में बिखरे दिखाई देते हैं। इसी वजह से वे अपने उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' की भूमिका में एक कविता, जिसका शीर्षक है, 'उपन्यास में पहले एक कविता रही थी' भी लिखते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास के कथानक को किसी वर्ग, वाद या साहित्यिक विचारधारा के प्रेम में बाँधकर नहीं रखा जा सकता। किसी औपन्यासिक परिभाषा में कथानक निर्माण करते समय वे किसी वाद या नारे का समर्थन नहीं करते, अपितु साधारण मनुष्यों के मनोवेगों, संवेगों अनुभूतियों और स्वप्रों को स्थान देते हैं। कथानक वस्तुतः मानव जगत के प्रतिबिम्ब है, जहाँ यथार्थ के साथ-साथ मनुष्यों के सपनों को भी महत्त्व दिया गया है।
कथानक निर्माण करते समय साधारण मनुष्यों का सामान्य जन-जीवन से अपेक्षाओं को ध्यान रखकर पात्रों को उनके कथा की आवश्यकतानुसार संवाद किया गया, जिसमें वे जीते हैं, छोटी-छोटी खुशियों को महसूस कर इतने सुखी हो जाते हैं कि बड़े से बड़ा दुःख उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ता। अपने संघर्षों और दुविधापूर्ण स्थिति के आधार पर समाज में परिवर्तन लाने की कोशिश करते हैं। इस दृश्य को उनके तीनों उपन्यासों में सहजता से देखा जा सकता है। शारीरिक रूप से दुर्बल, किन्तु सहनशील, समझौते पर अपना जीवन निर्वाह करने वाले निरीह से संतू बाबू (नौकर की कमीज) के मन में जब विद्रोह की आग सुलगती रहती है तो वहीं शांति और समझदारी से अपना जीवन-यापन करने वाले गुरुजी (खिलेगा तो देखेंगे) अहिंसात्मक तरीके से कोटवाल के साथ मिलकर जिवराखन और सिपाहियों की हिंसात्मक कार्यवाहियों को रोकने में सफल होते हैं। बूढ़ी माई (दीवार में एक खिड़की रहती थी) न केवल खिड़की के दूसरे तरफ जादुई दुनिया में आने वाले मेहमानों का ध्यान रखती है, बल्कि उन्हें चाय भी पिलाती है और सोनसी को आज के जमाने में भी सोने के कड़े पहना देने का असाधारण-सा काम कर जाती है। उपन्यास के इन कथानकों के माध्यम से यह अनुभव होता है कि ये पात्र अपनी आर्थिक और भौतिक अभाव भरे जीवन के बाद भी मानसिक और हार्दिक रुप से सम्पन्न है, जिसके दम पर वे सुखपूर्ण जीवन जीते हैं या जीने की कल्पना भी कर सकते हैं। बीड़ी पीने वाले लड़के को उसके पिता से मिलाकर रघुवर प्रसाद अद्भूत मानवता का कार्य करते हैं। नौकर की कमीज' में बड़े बाबू का भागा हुआ लड़का नहीं मिलता, लेकिन 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के राऊत को अपना बेटा सुधरा हुआ मिल जाता है जो अपनी बुराईयों से तौबा कर चुका है। आज के इस व्यस्त समाज में जहाँ लोग स्वार्थ से लबालब भरे हुए हैं। ऐसा कथानक अत्यंत दुर्लभ है कि वे न केवल हमें संतोष दिलाते हैं, अपितु हमारे वर्त्तमान और भविष्य के प्रति सचेत और अशांति भी करते हैं।
शुक्ल जी के उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के विषय में यह उक्ति उचित ही है और, उसके कथानक, कितने महत्त्वपूर्ण हैं- "विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' पर बात करते हुए लोग अक्सर इसकी प्रसिद्धि और सफलता का श्रेय इसकी भाषा और तकनीक को देते हैं, लेकिन बात मात्र इतनी ही नहीं है। यह उपन्यास इसलिए प्रधानतः आकर्षित करता है कि इसमें उल्टे विश्व को रचने की कोशिश की गई है। जहाँ आज करोड़ों और अरबों के अर्थ तंत्र की बात हो रही है, वहाँ इसमें चार आने, आठ आने के अर्थ तंत्र की दुनिया, दिखाई पड़ती है। जहाँ आज सेक्स-मार्केट सामाजिक जीवन में हावी हो रहा है, विश्व सुंदरियों की खान हिन्दुस्तान हो गया है, वहाँ इसमें गृहस्थ जीवन के सौन्दर्य को प्रतिष्ठित किया गया है। यहाँ तक कि जहाँ आज नए-नए कारों के मॉडल और तेज रफ्तार ही मध्यवर्गीय जीवन का प्राण हो गया है, वहीं इसमें टेंपो और उससे भी आगे बढ़कर हाथी संचार के माध्यम है। खुशी की बात है कि उदारीकरण का विरोध करते हुए मध्यवर्गीय जीवन में क्या सचमुच यह ताकत है कि वह उदारीकरण के विरोधी में कोई कारगर स्वप्र रच सके। यथार्थ के कठोर धरातल पर विसंगतियों और विदुपताओं के बीच प्रेम अंकुर को फूटते हुए उन उपन्यासों में देखा जा सकता है।" (42)
शुक्ल जी के उपन्यास के कथानक के निम्नमध्यवर्ग परिवार की कहानियाँ हैं जो घर के आस-पास सिमटी हुई है। नौकर की कमीज' तो शुरु ही इन पंक्तियों से हुई है- "कितना सुख था कि हर बार घर लौटकर आने के लिए मैं घर बार-बार घर से बाहर निकलूँगा।"(43) तीनों उपन्यासों में 'घर' को तीन अलग-अलग तरह से दिखाया गया है। नौकर की कमीज' में एक छोटा शहर है, जहाँ सरकारी दफ्तर, डॉक्टर की बगीचे वाली बड़ी कोठी, बाजार आदि है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में एक छोटा कस्बा, जहाँ साइकिल, स्कूटर और टेम्पो चलते हैं। 'खिलेगा तो देखेंगे' में एक बहुत छोटा-सा गाँव है, झोपड़ियाँ हैं, वहीं पक्के मकान के नाम पर दो मकान हैं, एक थाना और दूसरा ग्राम सेवक का घर। 'नौकर की कमीज' में संतू बाबू एक सरकारी दफ्तर के नौकर हैं। इनका विवाह अभी-अभी हुआ है। संतू बाबू एक डॉक्टर के बंगले में एक छोटे से कमरे में किराए पर रहते हैं। निम्नमध्यवर्गीय परिवार की जरुरत के सामान से भी कम सामान संतू बाबू के घर में है जिसको आसानी से गिना जा सकता है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में भी एक नवदंपति है, वे भी कमरे में किराये से रहते हैं। गौने के बाद बहु को रघुवर प्रसाद के पास छोड़ने उनके ससुरजी आते हैं और इसी समय से उनकी गृहस्थी शुरु हो गई, घर में सोने का कमरा है, रसोई और बैठक एक ही कमरा है। 'खिलेगा तो देखेंगे' में गुरुजी को एक थाने में शरण लेनी पड़ी जो न घर था ही और न ही थाना का था।
शुक्ल जी का घर के प्रति जबरदस्त लगाव हैं जो उनके कथानक में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, लेकिन यह घर जीवन के आस-पास घूमता है जो घर और बाहर की दुनिया से कहीं न कहीं टकराता है। 'नौकर की कमीज' के संतू बाबू के अंतर्मन में घर को लेकर कशमकश की स्थिति है, क्योंकि घर में आने के लिए एक नहीं दो दरवाजे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए वह दूसरे दरवाजे के लिए ताला भी ले आते हैं। एक तरह वह ताला लगाते हैं, दूसरी तरह उनकी पत्नी, क्योंकि अब वह भी डॉक्टरनी के घर जाती है बेगारी के लिए, जिसके कारण उसे बहुत देर तक अपने घर से बाहर रहना पड़ता है, लेकिन उस ताले के कारण दोनों के मन में बड़ी उलझन पैदा हो जाती है। संतू बाबू जब कहते हैं कि अपना-अपना ताला लगाएँ तो दोनों अपनी स्वतंत्रता बनाये रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन पत्नी घर में पीछे से आ भी जाय तो सभी लोग यही समझेंगे की घर, में कोई नहीं है। यह लगभग उन गृहस्थों की उलझन होती है, जहाँ पति-पत्नी दोनों काम से घर के बाहर जाते हैं। इसी प्रकार 'खिलेगा तो देखेंगे' में भी घर के दो हिस्से हैं, छोटा लॉकअप और बड़ा लॉकअप। इसमें भी ग्राम सेवक के घर पर सदैव अलीगढ़ी ताला लटका रहता है। ताले के संबंध में उलझन 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में भी है। जहाँ रघुवर प्रसाद अपने शौचालय के लिए अलग ताला लेते हैं, उस शौचालय का अलग से किराया भी देते हैं, जिससे कि वह उन्हीं का हो जाए, लेकिन उस ताले में रघुवर प्रसाद के पिताजी को फिजूलखर्ची दिखाई देती है और वे ताला ले जाते हैं।
'नौकर की कमीज' में विरोध और असहायता की कथा रची गई है तो 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में उपभोक्तावादी सभ्यता से परे एक स्वच्छ स्वप्रीली रोमानी दुनिया। 'खिलेगा तो देखेंगे' में देशज लोककथा की स्वप्रमयी संसार दिखाई देता है, जहाँ सुख, समृद्धि और संतुष्टि के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं।
उपन्यास के कथानक निर्माण में पारिवारिक रिश्तों को भी बहुत महत्त्त्व दिया गया है। खासकर पिता-पुत्र के संबंध में एक टीस दिखाई पड़ती है। 'नौकर की कमीज', 'दीवार में एक खिड़की रहती थी, खिलेगा तो देखेंगे' सभी उपन्यास में संबंधों की प्रामाणिक और काव्यमयी छवियाँ हैं, जो इस भौतिकतावादी दुनिया में, कहीं लुप्त होती जा रही है। 'नौकर की कमीज' में कहीं बड़े बाबू का बेटा घर से भाग जाता है, किंतु बड़े बाबू को लगता है कि वह जब घर में नहीं होते, तब उनका लड़का घर जाता है, पर उनके सामने नहीं आता। एक प्रसंग में संतू बाबू मूंगफली वाले को एक बच्चे के डूबने का किस्सा सुनाते हैं। जब यह बात बड़े बाबू को पता चलती है तो वे इसकी तह तक जाने के लिए मूंगफली वाले के पास चले जाते हैं, जबकि उनको मालूम है कि यह घटना झूठी है, किन्तु जानने का कारण यह है कि बड़े बाबू को उस बच्चे में अपने पुत्र का आभास होता है।
इसी प्रकार 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में ग्यारह साल का एक लड़का, रघुवर प्रसाद के घर के सामने पेड़ पर हमेशा चढ़ा रहता है। वह अपने पिता से डरकर पेड़ पर बैठकर बीड़ी पीता है। पिता का घर पर होना या ना होना उनका डंडा बतलाता है। घर के बाहर डंडा रहने पर पिता अंदर है और न होने पर घर से कहीं बाहर गए। डंडा बाहर न होने की स्थिति में ही लड़का अपने घर आता है। रघुवर प्रसाद और सोनसी इन पिता-पुत्र को मिलवाते हैं विधुर पिता का अपने पुत्र के प्रति स्नेह तब असीम रुप से दिखाई देता है, जब वह अपने हिस्से की जलेबी पुत्र को देता है।
'खिलेगा तो देखेंगे' में माता पिता अपने नवजात के पति इतने उत्सुक है कि जन्म पर चिड़ियाँ की सीटी सुनते ही अपनी बेटी का नाम चिड़ियाँ रख देते हैं और अपने बेटे मुन्ना (जो भूखे नहीं रह सकता और भूख से बेहोश होकर गिर पड़ता है) के स्वास्थ्य के प्रति चिंतित रहते हैं और भूख से बेहाल बच्चे की रक्षा का उपाय सोचते रहते हैं। पुत्र का पिता के प्रति खेह और चिंता को 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में बखूबी उकेरा गया है। जब रघुवर प्रसाद की इस मजबूरी को मार्मिक रूप से बताया गया है- "उनका वेतन अच्छा होता तो वह बताता कि एक पुत्र अपने पिता की किस तरह परवाह करता है। पिता की छोटी-छोटी अपेक्षाओं के सामने वह असहाय हो जाता था कि वह अच्छा पुत्र नहीं समझा जा रहा है।"(44)
विनोद कुमार शुक्ल जी ने अपने कथानक के केन्द्रों में निम्नमध्यवर्गीय परिवार की रोजमर्रा के संघर्ष, सपने, कल्पनाओं को विभिन्न तरीके से उभारा है। तीनों कथाओं के कथानक में संदर्भ, स्थितियों, घटनाएँ बदले हुए हैं, किन्तु उसकी जिजीविषा और दुर्गम्यता में कोई खास फर्क नहीं है। कथाओं की यही शक्ति कथाकार की रचनात्मक एवं कल्पनात्मक जीवन जीने की इच्छा शक्ति में छिपी हुई है। निम्नमध्यवर्गीय परिवार की पहचान एवं जरुरत में एक छोटी-सी नौकरी, एक सुशील पत्नी जो घर एवं बच्चों को जिम्मेदारी से संभाल सके, एक-दो बच्चे और एक छोटा-सा मकान फिर चाहे वह खुद का हो या किराये का। यही शुक्ल जी के कथानक निर्माण का केन्द्र बिन्दु है। यही परिवार, घर, आस-पास का वातावरण शुक्ल जी की रचनात्मकता के स्त्रोत है जो जीवन के अनुभवीय संघर्ष से प्रेरित होकर लिखे गये हैं। निम्नमध्यवर्ग के विषय में जो यथार्थमयी संसार की रचना शुक्ल जी करते हैं। वह न केवल गद्य में है, अपितु पद्य में भी देखा जा सकता है, किन्तु अंतर यह है कि जिस दर्द को संप्रेषित, कविता में किया जा सकता है, उसके लिए विकल्प के रूप में संसार रखने की सुविधा पद्य में ही संभव है।
उमाशंकर मित्र जी के अनुसार 'नौकर की कमीज का संतू बाबू 'होरी' का वंशज है। वह होरी की चौथी पीढ़ी का है। उसके बाप ने मेहनत-मशक्कत करके किसी तरह उसे कलर्की लायक पढ़ा दिया है। प्रथम प्रधानमंत्री न समावेशी विलास के लिए 'अवसर की समानता' की घोषणा को इसलिए उसके सरकारी तंत्र में शामिल होने में कोई अवरोध न था, किन्तु वह तो मजदूर का ही बेटा ना कितनी तरक्की करता। किरानी बनकर रह गया। सामंतवाद और पूँजीवाद के गठबंधन में नए हुक्मरानों के रूप में गोविंद के वंशजों की नियुक्ति ही सुनिश्चित की, जिनकी रायसाहब अमरपाल सिंह से नातेदारी थी तो टाटा-बिड़ला से भी। पूरे उपन्यास में इस शोषण-चक्र के दुहराव को महसूस किया जा सकता है। संतू साहब की बीवी का बेगार करता है तो उसकी पत्नी उसके मकान मालिक डॉक्टर की बीवी की। दोनों इस आरोपित दायित्व से नाखुश है, यहाँ तक कि उनका परस्पर प्रेम भी प्रभावित होने लगता है, लेकिन फिर भी विविश है इसे निबाहने के लिए क्योंकि व्यावहारिकता का तकाजा यहीं है "जब दूसरों के पाँव तले अपनी गर्दन दबी हो तो उन पाँवों को सहलाने में ही भलाई है।" स्थिति कहाँ बदली है? स्थिति बदली तो है, लेकिन उसके समांतरण शोषण का स्वस्थ तथा हथियार भी बदला गया है। 'नौकर की कमीज' इस बदलाव की पहचान करती है।"(45)
इस उपन्यास के कथानक में रोजमर्रा के आम जीवन की जानकारी चित्रित है, जिसमें संतू बाबू निम्नमध्यवर्गीय आम आदमी की भूमिका में है, जो व्यक्तिगत चिंता, घरेलू चिंता एवं कार्यालय-संबंधी चिंता से जूझ रहे हैं और यही उसके जीवन-संघर्ष का प्रतिबिंब है। संतू बाबू इस नौकरशाही व्यवस्था की क्रूरता से पीड़ित है, जिससे उनका स्वाभिमान बार-बार आहत होता रहता है। यही विडम्बना इस उपन्यास के कथा का केन्द्र है।
'खिलेगा तो देखेंगे' में कथानक निर्माण करते समय शुक्ल जी ने यथार्थ और कल्पना के बीच के अंतर्द्वन्द्व को बतलाया है, जिसमें उनके पात्र गुरुजी और उनकी पनी हार नहीं मानते, क्योंकि वे अपने बच्चों के सामने दृढता से भय रहित हैं और कोशिश करते हैं, कि बच्चे भी सक्षम और समर्थ बन सके। घर एवं परिवार के अलावा इस कथा में एक नई बात आई है कि पुरुष सत्तात्मक इस समाज में महिलाएँ कुछ भी निर्णय करने के लिए स्वतंत्र नहीं है, फिर चाहे इसके लिए दोषी पुरुष क्यों न हो? डेरहिन और जिवराखन के संदर्भ में कुछ ऐसा ही है। डेरहिन को अपने पति से प्रेम नहीं मिलता, जिसके कारण वह उसे छोड़कर चली जाती है। पत्नी द्वारा छोड़कर चले जाने पर जिवराखन को अपने आप में अपमानित-सा लगता है और बदला लेने के लिए थानेदार से मिलकर अपनी पत्नी डेरहिन को मारने लिए एक रणनीति तैयार करता है। डेरहिन को बचाने के लिए कोटवार और गुरुजी भी एक नए तरकीब को खोज करते हैं, जिसमें किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रहकर आसानी से उसे बचाया जाता है, हाँलाकि इसके लिए उन्हें कुछ दिनों तक गूंगा बने रहना पड़ता है।
स्त्री के प्रति समाज में हो रहे अत्याचार को कथा में रेलगाड़ी के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। सभ्य समाज की सभ्यता पर आक्षेप करते हुए वे प्रश्न उठाते हैं कि- "यह कैसी सभ्यता थी कि भूखा रहकर कपड़े सिलवाना पड़ता था, ताकि नंगे न रहे। कपड़ा पहने हुए आदमी भूखा मर जाता था। औरत कपड़े उतारकर पेर भट लेती है। "(46)
शुक्ल जी की कथा का नाभिकीय बिन्दु है हमारे समाज की जीवित 'सामुदायिक भावना' और इसके प्रति 'समूह की जागृति और यहीं नैतिक मूल्यों को निर्माण करता है। तीनों उपन्यासों के कथानक ग्रामीण समाज के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं जिसमें सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक आवाज की गूंज सुनाई पड़ती है। रवि रंजन जी के अनुसार "इन कृतियों में जो सामाजिक-राजनैतिक एवं सांस्कृतिक अतः स्वर निहित है, वह भूमंडलीकरण के नाम पर वर्चस्व-शाली वर्ग द्वारा भारतीय समाज के अधपश्चिमीकरण या अमरीकीकरण के मौजूदा एवं संभावित दुष्परिणामों को लेकर कलात्मक, प्रतिरोध के भाव से लबालब भरा हुआ है। नौकर की कमीज' में नैरेटर जब कहता है कि 'घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता, जितना लौटने के लिए होता है' तो अनायास उन तथाकथित प्रवासी भारतीयों की याद हो आती है, जो भारत लौटने के लिए विदेश न जाकर विदेश लौटने के लिए भारत आते हैं।" (47)
शुक्ल जी के शब्दों में उनके तीनों उपन्यास-संबंधी विचार कुछ इस प्रकार है- "तीनों उपन्यासों में 'खिलेगा तो देखेंगे' उपन्यास को अपने सबसे अधिक समीप पाता हूँ। तीनों उपन्यास को एक ही उपन्यास माना जाना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' इसको पहला हिस्सा मानना चाहिए और इसी कड़ी का दूसरा हिस्सा नौकर की कमीज' को मान ले और तीसरा 'खिलेगा तो देखेंगे।' 'खिलेगा तो देखेंगे' उपन्यास को सुधीश पचौरी ने उत्तर आधुनिक उपन्यास के रूप में आलोचना की पहल की। इस कारण से वह अधिकांश आलोचकों की दृष्टि से बाहर हो गया, लेकिन ऐसा मेरा मानना नहीं है। मेरा तो हमेशा यही मानना रहता है कि किसी की दृष्टि में आना और नहीं आना यह संयोग अधिक है। आलोचना के रास्ते में ज्यादातर रचनाएँ रोड़े की तरह होती है, लेकिन मुश्किल यह है कि आलोचना के बनाए रास्ते पर पाठक नहीं चलते, लेखक तो चलता है, लेकिन जाने-पहचाने रास्ते पर पड़ा हुआ पत्थर जाना-पहचाना रोड़ा ही होता है, इसलिए लेखक को चोट नहीं लगनी चाहिए और लेखन को तो बिल्कुल ही नहीं। मैं आलोचना में पड़े हुए अपने रोड़े को अपने हाथों से उठाकर किनारे रख देता हूँ, ताकि आँख मूँदकर चलने वालों को भी ठोकर न लगे, पर अपने लेखन के लिए मैंने अपनी आँखें कभी बंद नहीं की।"(48)
लेखक, साहित्य और समाज तीनों का परस्पर संबंध है और इसका प्रत्यक्ष प्रभाव शुक्ल जी के साहित्य में दिखाई देता है। इनकी कविताओं कथाओं में युगीन चेतना की अभिव्यक्ति है। जिसके अंतर्गत इन्होंने अपने युग की पीड़ा, भयावहता, विसंगतियों और सामाजिक विडम्बनाओं को मार्मिक ढंग से उकेरा है। वहीं शुक्ल जी ने प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील के साथ लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है। वे सांस्कृक्तिक मूल्यों के प्रबल समर्थक एवं पक्षधर है। प्रकृति के मुक्त जीवन में और बाजार जैसी व्यवस्था के कारण जो समस्याएँ जन्म लेती हैं, उसे विनोद कुमार शुक्ल जी सहज एवं सरल रूप से हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। साथ ही साथ उनकी रचनाएँ रिश्तों और संबंधों की ऊष्मा को गहरे तक रेखांकित करते हैं। माँ, पिता भाई, चाचा, पत्नी, पड़ोसियों के प्रति आत्मीयता हमें इन रचनाओं में देखने को मिलती है।
पात्र परिकल्पना :
आधुनिक उपन्यासों में चरित्र-चित्रण कथावस्तु के समकक्ष एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। चरित्र-चित्रण में पात्रों के क्रियाकलाप अंतर्बाह्य व्यक्तित्व, भाव, विचार आदि का अंकन होता है। पात्रों के क्रियाकलाप घटनाओं का कारण बनते हैं, और घटनाओं का श्रृंखलाबद्ध नियोजन कथावस्तु का रूप धारण करता है। पात्रों के बाह्य व्यक्तित्व के चित्रण में पात्र की शारीरिक रुपाकृति वेशभूषा रहन-सहन व्यवहार आदि का चित्रण होता है और आंतरिक व्यक्तित्व में पात्रों के भाव-विचार, प्रवृत्तियाँ प्रतिक्रियाएँ आदि का चित्रण होता है। आंतरिकता के आधार पर पात्रों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है- वर्गीय मानसिकता वाले पात्र, विशिष्ट स्वभाव के पात्र, स्थिर मनोवृत्ति के पात्र, गत्यात्मक मनोवृत्ति के पात्र आदि।
डॉ० त्रिभुवननाथ शुक्ल के अनुसार, 'पात्र विधान के अंतर्गत रचनाकार के द्वारा विभिन्न चारित्रिक स्थितियों, मन की विविध द्वंद्वात्मक अवस्थाओं, पात्रों के आवेग, आवरणों को प्रकट करती हुई रोमांचक स्थितियाँ दिखाई देती है। अहं, भय एवं सेक्स की प्रवृत्तियों मानव मन को संचालित करती है। पाना अपने परिवार, समाज और वातावरण के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया करता है। पात्रों के आकृति चित्र, अंतः प्रेरणाओं का प्रकाशन भय, प्रेम, करुणा और विस्मय द्वारा उभरता व उद्घाटित होता है। रचनाकार चरित्र-चित्रण की विविध मनोवैज्ञानिक प्रविधियों का सहारा लेता है।" (49)
'नौकर की कमीज' के पात्र :-
जिस प्रकार भाषा मनोभावों, विचारों की अभिव्यक्ति का सशक्त साधन है, उसी प्रकार उपन्यास में लेखक की अपनी अभिव्यक्ति पात्रों के माध्यम से होती है, जिससे वे होने वाली घटनाओं से पाठकों को जोड़ सके, महसूस करा सके। लेखक द्वारा इन पात्रों की सूचना उनके आस-पास के परिवेश, संबंधित या स्मृति में रहे व्यक्तियों को ध्यान में रखकर कभी कुछ का काल्पनिकता के आधार पर कथा की आवश्यकतानुसार किया जाता है। शुक्ल जी का पहला उपन्यास 'नौकर की कमीज' का मुख्य पात्र है संतू बाबू। इन्हीं के इर्द-गिर्द पूरा उपन्यास चक्कर काटता है। उपन्यास में बहुत कम पात्र है, किन्तु जो भी पात्र है वे महत्त्वपूर्ण है। दूसरा प्रमुख पात्र है- संतू बाबू की पत्नी, जो घरेलू महिला है। तीसरे पात्र में संतू बाबू के दफ्तर के सहाय और डॉक्टर साहय एवं उनकी पत्नी एवं अन्य पात्र दफ्तर के अन्य बाबू-बड़े बाबू, देवांगन बाबू, गौराहा बाबू आदि एवं दुकानदार गुप्ता है।
संतू बाबू प्रस्तुत उपन्यास का मुख्य पात्र है, जो निम्नमध्यवर्गीय है। संतू बाबू सदैव कुंठा और त्रास से घिरे रहते हैं फिर भी अपने ऊपर हो रहे अन्याय के प्रति आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करते। यही घुटन और मजबूरी अधिकांश निम्नमध्यवर्गीय या मध्यवर्गीय आदमी में देखने को मिलती है।
संतू बाबू अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते हैं। अपनी पत्नी को डॉक्टरनी की नौकरानी बनता हुआ देखकर उन्हें अपने में घृणा और चिढ़ महसूस होती है। उनको अपनी पत्नी पर दया आती है और अपने में शर्म भी लगती है। जब उनकी पत्नी बताती है कि उसे बच्चा होने वाला है तो वह कुछ समय के लिए खुश तो होता है, उसके बाद विस्मृत-सा अपनी पत्नी को ध्यान से देखने लगता है- "पत्नी मुझे बहुत स्वस्थ लग रही थी। पेट में बच्चा आ जाने के बाद डॉक्टरनी ने डॉक्टर से उसे कई प्रकार की ताकत की दवाइयाँ दिलवा दी थीं। ताकत की दवाई उस पर जादू की तरह असर डालती थी। उसका लम्बोतरा चेहर भरा हुआ और गोल लग रहा था। उसका पेर बढ़ गया था, पर ध्यान से देखने में समझ में आता था। आँख के नीचे का कालापन नहीं था। शायद उसने हल्का पाउडर भी लगाया था।"(50)
संतू बाबू अपने कर्त्तव्य के प्रति ईमानदार है, इसलिए अपने नैतिक मूल्यों को बचाए रखने हेतु, दफ्तर के अन्य बाबूओं से कटे-कटे से रहते हैं। उनके दफ्तर के गौराहा बाबू देवांगन बाबू और बड़े बाबू आदि समय के साथ-साथ व्यवस्थानुरुप हो चुके हैं। मालखाने में देर रात तक पीने, पिलाने का दौर चलता है तथा जरूरी फाइलों को अचानक चूहे कुतर देते हैं। संतू बाबू इन आयोजनों से दूर रहते हैं, प्रस्ताव मिलने पर भी शामिल नहीं होते। उन्हें कार्यालय के जेन्युइन काम से काम रहता है। संतू बाबू का कथन है- "मेरा वेतन एक कटघरा था, जिसे तोड़ना मेरे बस में नहीं था। यह कटघरा मुझमें कमीज की तरह फिट था।"(51)
संतू बाबू एक आत्मसजग पात्र है, तभी तो इस छल, पाखंड, लूट और असमानता पर टिकी व्यवस्था से चिढ़ते हैं और उसका सामना भी करते हैं। यही आत्मसजगता उन्हें खुशहाल जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है, लेकिन इस प्रयास में वह और ज्यादा दुःखी हो जाता है। संतू बाबू उपन्यास में एक समय यही तक सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं- "आखिर संतू अपने को मंहगू की ही श्रेणी में देखने लगता है, दिल को समझाते हुए कि वह जूते पर पॉलिश करेगा, मैं देने जा सकता हूँ। वह जमीन पर बैठेगा, मैं कुर्सी पर बैठूंगा। संतू को पत्नी के बारे में कभी कभार यह ख्याल तो आता है कि साड़ी गंदी है या फटी है, पर अक्सर ही याद नहीं रहता कि थोड़ी सब्जी पत्नी के लिए बचा देनी चाहिए।" (52)
संतू बाबू की पत्नी मध्यवर्गीय घरेलू पत्नी है। वह अपने घर के कामकाज में व्यस्त व्यस्त रहकर रहकर पूरा समय बिताती है। उपन्यास में इस पात्र को कोई नाम भी नहीं दिया गया है। पति की हाँ में हाँ मिलाकर सफल, सुखद अपना जीवन जी रही है। फटी साड़ी ब्लाउज, पहनकर अभावों से घिरा जीवन जी रही है, जहाँ खाने के समय दाल और सब्जी के लिए भी सोचना पड़ता है। फिर भी एक बार भी शिकायत अपने पति से नहीं करती। वह एक भारतीय नारी है, जो सुख-दुःख सहकर, त्याग करके ममतामयी, करुणामयी जैसे गुणों से परिपूर्ण है। संतू बाबू की पत्नी का चरित्र शांत है, लेकिन समय-समय पर उसका विरोध और क्रोध दिखाई देता है। वह पति की सेवा के लिए हमेशा तत्पर दिखाई पड़ती है, सास के जाने पर दुःखी होती है। जब वह गर्भवती होती है तो प्रसव के समय, निकट आने पर पति से सास को लाने के लिए कहती है और निडरता से अकेली घर में रहती भी है।
संतू बाबू की पत्नी भोलेपन और आत्मविश्वास से परिपूर्ण है। वह भोलेपन के कारण ही डॉक्टरनी के घर का काम नौकरानी की भाँति करती है। मन में केवल एक लालसा कि पति के खाने के लिए सब्जी मिल जाएगी और कभी-कभी डॉक्टरनी द्वारा पुरानी साड़ी दे दी जाएगी। वह आमविश्वास से भरकर बाजार सामान लाने जाती है और खरीदारी करती है। संतू बाबू उसके आत्मविश्वास को देखकर सोचते हैं:- "शाबास! मैंने मन ही मन में उसे शाबासी दी। उसमें मैंने एक आत्मविश्वास देखा। पर मैं सोच रहा था कि उसने जीरे का भाव क्यों नहीं पूछा। पूछने की जरूरत भी नहीं थी। भाव की सूची काले तख्ते में सफेद सुंदर अक्षरों में लिखी गयी थी। वह एक बड़े खानदान की बहू लग रही थी। दुकानदार उसके रौब में था। "(53)
दुकानदार भारतीय समाज के महाजनी पद्धति का प्रतीक है। जो लोगों को उधार देता है। लोगों द्वारा उधार वापसी न करने पर उनका सामान रख लेता है। केरोसीन को अधिक दाम में बेचता है। उसमें चालाकी कूट-कूटकर भरी है, जिसका नजारा तब दिखता है, जब संतू बाबू को देखने के बहाने उनके घर जाता है और उनका राशन कार्ड रख लेता है। कार्ड से सस्ते में सामान खरीदकर अधिक भाव पर बेचता है।
इसके अंतर्गत दफ्तर के साहब, डॉक्टर दंपति आते हैं, जो संतू बाबू और उनकी पत्नी को शोषण करने से नहीं चूकते। दफ्तर के साहब संतू बाबू को जबरदस्ती अपने घर बुलाते हैं और घर के काम करवाते हैं, जबकि संतू बाबू उनके दफ्तर में क्लर्क है। साहब की सोच भी वैसी ही है- "में अपनी कमीज नौकर को कभी देना नहीं चाहूँगा। जो में पहनता हूँ उसे नौकर पहने यह मुझे पसंद नहीं है। मैं घर का बचा खुचा खाना भी नौकरों को देने का हिमायती नहीं हूँ। जो स्वाद हमें मालूम है, उनको कभी नहीं मालूम होना चाहिए। अगर यह हुआ तो असंतोष फैलेगा।"(54 साहब दफ्तर के वेतन में ही अपने घर के काम नौकरों और बाबुओं से करवाता है।
शोषित-वर्ग के अंतर्गत उपन्यास के अधिकांश पात्र है। संतू बाबू उनकी पत्नी, गौराहा बाबू, देवांगन बाबू, चपरासी महंगू बड़े बाबू इसी वर्ग के हैं। ये सभी दफ्तर के साहब के घर के काम करने उनके एक बुलावे में पहुँच जाते हैं, क्योंकि उनको डर है कि न जाने कब साहब के किस निर्णय से प्रभावित हो जाएँ।
संतू बाबू कहते हैं- "साहब के बंगले की घास उखाड़ने का काम करने से मैं यह महसूस कर रहा था कि मुझमें नाजिर, बड़े बाबू बहुत से लोगों से सामना करने की असीम ताकत आ गई है। महंगे को डॉटने की, जोर से बोलने की किसी को हिम्मत नहीं होती थी, बल्कि महंगू थके होने पर बाबू लोगों को झिड़क दिया करता था। बड़े बाबू की हैसियत छोटे-मोटे साहब से कम नहीं थी। माल खाने और नजारत से संबंधित होने के कारण नाजिर की भी बहुत चलती थी। आज मैं फूला नहीं समा रहा था। इसी सोच के कारण वे और भी शोषित होते रहते हैं। गौराहा बाबू कहते हैं- महंगे मरेगा पर महंगे की जगह कभी नहीं मरेगी। "(55)
इस उपन्यास के ऐसे जितने भी पात्र मौजूद हैं, सबके सब बुनियादी तौर पर उस अमानवीयता के शिकार हैं, जो खास तरह की जिंदगी की एक मात्र नियति है। इसे न तो कम किया जा सकता है और न ही किसी आमूल मूल परिवर्तन के बिना अधिक कारगर क्रियाशीलता में बदला जा सकता है। इसके अतिरिक्त उपन्यास में कुछ और पात्र अम्मा, संतू बाबू की भाभी, भैय्या, भतीजा-भतीजी (किन्त्री-किन्ना) आदि की भी चर्चा हुई है।
'खिलेगा तो देखेंगे' के पात्र :
इस उपन्यास के पात्र गुरुजी, उनकी पत्नी, दोनों बच्चे, कोटवार, थानेदार, जिवखरान, डेरहिन, घासीदास आदि हैं। इसमें जितने चरित्र हैं। बेहद सरल हैं- जैसे बच्चे हों। यह सरलतम मनुष्यों का सरलतम जगत है। उपन्यास की पात्र योजना का स्वरूप सरलता से जटिलता का पैराडॉक्स है। इनमें भी मुख्य पात्र के रूप गुरुजी और कोटवार ही दिखाई पड़ते हैं। इन सभी पात्रों के अलावा जो पात्र दिखाई देते हैं। वे कथा को बढ़ाने में सहायक हैं।
रमेश दुबे जी का विचार भी 'खिलेगा तो देखेंगे' के पात्र के विषय में दृष्टव्य है- "कथा में जितने भी लोग होते हैं, वे नायक, अधिनायक या खलनायक नहीं है, नायकत्व की छवि या चौखट यहाँ पंडित होती है, वे तमाम रुपक बिखर जाते हैं जो नायकत्व को छवि देते हैं। कह नहीं सकते कि अरुधती राय की 'गॉड ऑफ स्माल थिंग्स' लिखते वक्त नायकत्व या ईश्वरत्व के टूटने बिखरने या मूर्तिभंजन होने का वैसा ही आभास हुआ होगा या नहीं। रघुवर प्रसाद, संपत, कोटवार, गुरुजी, डॉक्टर, मुत्रा-मुत्री किसी में भी तो हमें कोई नायक नजर नहीं आता। नायक की चमत्कारिक छवि रचकर उसे अतिमानव ईश्वरत्व की जिस मूर्ति में स्थापित किया गया, वे मूर्तियाँ विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास में खंडित हुई है। इसलिए उनके लोगों का कोई इतिहास नहीं यानी समय नहीं, कालखंड नहीं। वे हर समय में है। ठहरे समय में नहीं, निरंतरता में है। "(56)
गुरु जी एक सहज, सरल आदमी लगते हैं। वे एक शिक्षक है, बड़गाँव की पाठशाला में सेवारत हैं। शिक्षा कार्य एवं शासकीय सेवा होने के कारण सब गाँव वाले उन्हें बहुत आदर एवं सम्मान की नजर से देखते हैं। गुरु जी एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार से हैं। गाँव के अन्य लोगों की तरह वे भी जिवराखन से उधार में जरूरत का सामान लाते हैं। वे अपने परिवेश, घटनाओं और लोगों के प्रति सतर्क एवं सजग है। इसी भय से वे कभी विद्रोही रूप में भी दिखाई देते हैं- "पता नहीं यो गुरुजी ने समतल घेर की जगह को कूदकर पार किया, जबकि उसे चलते हुए पार किया जा सकता था। शायद वे बताना चाहते हो कि वे थाने के घर से भी बाहर निकल गए हैं। एक बार भी (गुरु जी ने, पीछे मुड़कर नहीं देखा, था।) बरामदे में खड़े सब उन्हें देख रहे थे कि यह उनके स्वतंत्र होने का प्रदर्शन है।"(57)
गुरु जी जिस घर में रहते थे, उसकी छत उड़ने के कारण उन्हें वहाँ के थाने जो कि खाली पड़ा था, में शरण लेनी पड़ती है, लेकिन इससे उनके मन में एक प्रकार का भय आ जाता है कि शाला-निरीक्षक उन्हें अपराधी न समझ ले, इसलिए समतल में भी कूदकर जाते हैं। इस तरह से गुरुजी का चरित्र दो भागों में देखने को मिलता है, पहला बाहरी चरित्र, जिसमें उनका परिवार मुत्रा-मुन्त्री, पत्नी और गाँव वालों से किया गया व्यवहार है, जहाँ उनके मन की करुणा और प्रेम दिखाई देता है। दूसरा है आंतरिक चरित्र, जिसमें दुःख डर और विभिन्न प्रकार के संदेह है।
गुरु जी डरे हुए मन से अजब-गजब कल्पना भी करने लगते हैं। इस कल्पना में अपने बच्चे, परिवार की सुरक्षा और उनका उत्तम भविष्य सोचते हैं। रात के थाने के बाहर देर रात तक इस चिंता में घूमते हैं कि कोई आने से रक्षा करेंगे। सर्किल इंस्पेक्टर के आने पर उसे बड़गाँव के थाने भेज सके और कल्पना करने लगते हैं कि सर्किल इंस्पेक्टर मुत्रा को पूछेगा और समझेगा कि गुरु जी थानेदार के पिता है और मुत्रा थानेदार है। रात में सोते समय सोचते हैं कि यदि एस.पी.ने स्कूल से निकलते समय उन्हें देख लिया तो समझेंगे कि वे भाग रहे हैं, वह उनका पीछा करेंगे और गोली चला देंगे, जिससे वे (गुरुजी! घायल हो जाएँगे और अपने घरवालों के लिए संदेश लिखेंगे।
गुरु जी में अन्यमनस्कता भी दिखाई देती है, जब वे और जिवराखन घूमते हुए टार्च से चन्द्रमा देखते हैं- "टार्च दे दो जिवराखन। टार्च छिनते हुए गुरुजी बोले। आकाश की तरह देखने के बाद गुरुजी ने टार्च का उजाला ग्रामसेवक के क्चार्टर की तरह फेंका और कहा, आज चन्द्रमा नहीं दिखेगा चिलो ग्राम सेवक को देख आये उसके घर में ताला बंद है या नहीं।"(58)
गुरुजी एक पिता के रूप में अपने बच्चों की चिंता करते हैं। गुरुजी मुन्ना के भूख की चिंता में है और मुन्नी के बड़े होने के बाद पूरे होने की चिंता में। मुन्ने की भूख के कारण उसका कोई भी शोषण कर लेगा। कोई उसे खाना खिलाकर उससे बोरियाँ उठवाएगा तो कभी कोई कुएँ में गिरी कॉसे की थाली निकलवा सकता है। इसी कारण वे मुन्ने को भूख सहने की आदत डलवाते हैं, ताकि वह अपने आत्माभिमान से समझौता न करें।
दूसरी तरफ मुत्री के बड़े होने और दूर जाने की कल्पना वे बस से करते हैं कि बस के दो हिस्से हो रहे हैं। मुत्री बस के दूसरे हिस्से में है और कहीं चली गई। उसे ढूँढ़ने वे मुत्रा को भेजते हैं और मुन्ना ढूँढ़कर अपनी बहन को लाता है। कोटवार उपन्यास का दूसरा मुख्य पात्र है। इस पूरे गाँव की जिम्मेदारी है। गाँव में किसी भी प्रकार का आयोजन शादी-ब्याह बच्चा आदि होने पर इसकी सूचना कोटवार को देनी पड़ती थी। गाँव में किसी को भी समस्या होने पर वह कोटवार से अपनी, बात कहता है। कोटवार अपनी पत्नी बेटा पासीराम और बहू तथा एक नाती के साथ रहता है। उसके जीवन में एक बहुत बड़ा हादसा हो जाता है, जिसे लेकर वह अपने दूसरे नाती के पति अधिक सजग रहता है। घासीराम नशे में जिबराखन से लड़ाई करता है, जिसकी रिपोर्ट हो जाती है और उसे पकड़ने पुलिसवाले आते हैं। घासीराम अपने बच्चे को यह सोचकर उठा लेता है कि पुलिस उसे नहीं मारेगी। इसी बीच उसका बच्चा मर जाता है। तभी से कोटवार अपने जीवित नाती को अपने साथ रखता है।
कोटवार के पास डंडा और भाला था, लेकिन वह बंदूक रखने का इच्छुक था और इच्छापूर्ति हेतु बढ़ाई से एक बंदूक चनवा भी लेता है गाँववाले के बीच लड़ाई-झगड़ा होने पर समझौता कोटवार ही करवाता था। वह मन का सरल है, लेकिन डरता भी है। इसलिए गुरुजी को अकेले थाने में रहने के लिए सलाह देता है। वह बीड़ी नहीं पीता, लेकिन झूठमूठ का धुआँ जरूर निकालता था।
मुन्ना उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो भूख से छुटकारा पाने, अर्थात् रोटी की व्यवस्था में कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है, जिसे थोड़ा-सा लालच देकर शोषित किया जा सकता है। मुत्रा को बार-बार भूख लगना और खाना न मिलने पर चक्कर खाकर उसी जगह बैठ जाना, उठ न पाना, घर न पहुँच पाना और खाना मिलने पर स्फूरित हो कोई भी काम करने में सक्षम दिखलाया गया है।
जिवराखन ग्रामीण सामाजिक तत्र की व्यवस्था का प्रतीक है। वह साहूकार है। जिवराखन गाँव के लोगों को उधार देता है बदले में कुछ गिरवी भी रखता है, गाँव के लोग उससे डरते हैं, क्योंकि वे उससे उधार लेते है। जिवराखन के पास गाँव को पच्चीस एकड़ की जमीन के अलावा पासा के गाँव में भी जमीन थी। जिवराखना का चरित्र एक शोषक का है। वहीं उसका इतना दबदबा है कि उसके कहने पर रिपोर्ट लिखकर सिपाही गाँव वालों के खिलाफ कार्यवाही भी करते हैं।
डेरहिन गाँव के दुकानदार जिवराखन की पल्ली है। वह सुंदर है। गाँव वालों से सहजता से मिलती-जुलती और बात करती है इसलिए सभी उसे पसंद भी करते हैं। डेरहिन पर उसका पति शक करता है, इसलिए वह स्वतंत्र स्त्री की है। वह जीवन में एक प्रेमपूर्ण सहज खुलापन चाहती है- "जब किसी एक से प्रेम करने का बंधन हो चाहे प्रेम न हो तो दूसरे से प्रेम होने का डर गृहस्थी की चौहद्दी को मजबूत बनाता था। इसमें न खिड़की होती, न छोटा-सा रोशनदान। दरवाजा खिड़की रोशनदार की जगह दीवाल होती।"(59)
वह अपनी गृहस्थी में प्रेमाभाव होने के कारण विवश होकर अपने पति का घर छोड़कर चली जाती है, जो एक दुष्कर्म था गाँव वालों और उसके पति के नजरिये में। इससे जिवराखन अपमानित महसूस करता है और थानेदार से मिलकर इसका बदला लेने के लिए योजना बनाता है, जिसे गुरुजी और कोटवार द्वारा असफल किया जाता है।
'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के प्रमुख पात्रः
इसमें प्रमुख पात्र हैं- रघुवर प्रसाद, पत्नी सोनसी, अम्मा, बाबूजी, भाई, बूढ़ी माई, विभागाध्यक्ष, साधु, हाथी आदि। रघुवर प्रसाद एक किसान का पुत्र है। उनके परिवार में माँ, पिताजी, एक छोटा भाई और उनकी नवविवाहित पत्नी सोनसी भी है। रघुवर प्रसाद एक सीधे सहज व्यक्ति है। अरविंद त्रिपाठी जी इनके चरित्र के बारे में लिखते हैं- "प्रकृति की तरह सीधे, सरल मनुष्य लगते हैं। सरल किन्तु वांछनीय नहीं, कल्पनाशील, किन्तु यथार्थ बोध-सी हीन नहीं। "(60)
इनकी मासिक आय 800 रु0 है, जिससे इन्हें अपना और अपने अम्मा, बाबू जी और भाई का भी ध्यान रखना होता है। अर्थात् वे एक जिम्मेदार पुत्र भी है। महाविद्यालय में वे श्यामपट पर बड़ी निपुणता से दोनों हाथों में एक जैसी रफतार में लिखते हैं।
वे अपने से जुड़े सभी संबंधों में प्रेम रखते हैं। पत्नी की भावनाओं को समझते हैं और उसका सम्मान भी करते हैं। वे जितना अपनी पत्नी से प्रेम करते हैं, उतना ही प्रकृति से भी करते हैं। खिड़की के बाहर की फुल चुक्की चिड़िया, तालाब, नदी, शुद्ध हवा, चट्टान और वहाँ तक जाने के लिए उपयोगी गोबर से लिपी पगडंडी उनके मन को मोह लेती है। पत्नी के बिना उनका मन नहीं लगता और प्रकृति अर्थात् आकाश के तारों के माध्यम से दोनों एक-दूसरे को पत्र लिखते हैं।
रघुवर प्रसाद पेड़ वाले लड़के को खाना खिलाते हैं और बाप-बेटे को मिलाते हैं। साधु और हाथी का भी ख्याल रखते हैं। पहले तो हाथी पर चढ़ने और साधु की मदद लेने में सकुचाते हैं, किन्तु बाद में साधु के न आने पर उनके के लिए चिंतित भी होते हैं। जब साधु हाथी को छोड़कर चला जाता है तो हाथी का ख्याल रखने के लिए रघुवर महाविद्यालय से छुट्टी लेते हैं। हाथी के लिए जंगल से टहनियाँ करवाकर लाते हैं और अंत में हाथी को मुक्त जीवन जीने के लिए उसकी जंजीर खोल देते हैं। हाथी पर बैठने के पहले अपना जूता निकालकर रख लेते हैं। यह उसके प्रति सम्मान को प्रकट करता है।
रघुवर को बच्चों से भी लगाव है। वे बच्चों के लिए आम के बीर तोड़ते है, बच्चों को झाँककर देखने में तकलीफ न हो इसलिए ईंट जमा देते हैं। रघुवर प्रसाद के चरित्र के बारे में विलक्षण बात है कि एक तरफ तो व सरलता, सादगीपूर्ण और अनाड़ी से लगते हैं तो दूसरी तरफ संवेदनशील दार्शनिक और संस्कृति संपन्न है।
तीनों उपन्यासों में एक यही उपन्यास है, जिसमें पत्नी को नाम दिया गया है। रघुवर प्रसाद की पत्नी सोनसी है। यह एक गाँव में रहने वाली किसान की बेटी है। इसका चरित्र सामान्य महिलाओं की तरह है जो बड़ों का सम्मान करती है और छोटों से प्रेम करती है। उसे अपने घर से इतना लगाव है कि न केवल मायके, बल्कि ससुराल वाली को भी याद करती है। नवविवाहित होने के बाद भी उसे अपनी जिम्मेदारियाँ मालूम है और उसे वह पूरा भी करती है। सोनसी के कहने पर पेड़वाला लड़का बीड़ी पीना छोड़ देता है, हाथी के लिए डगाल काटकर देता है।
सोनसी के पास अपने जमा किये हुए 25 रु0 है, जिसे वह खुशी-खुशी अपने पति को उनके पिता (अपने ससुर) के लिए चप्पल लाने के लिए देनी है। सास के द्वारा दी गई भेंट एक फुल्ली को कान में पहन लेती है। सोनसी का पत्नी से ज्यादा प्रेयसी-सा रुप दिखाई पड़ता है।
बूढी अम्मा खिड़की के पार की दुनिया में रहती है। वह बिल्कुल अकेली है और इस दुनिया में आये मेहमानों की देख-रेख करती है। उन्हें चाय मिलती है। बूढ़ी अम्मा नदी की रेत से, सोने के कण छानकर निकालती है और उन्हें सहेजकर रखती है। रघुवर और सोनसी को फल देती है, सोनसी को सोने के कड़े देती है। खिड़की के पार की दुनिया की सफाई की जिम्मेदारी भी इन्हीं की है। झाडू लगाती है और अपनी जिम्मेदारी को जवाबदेही के साथ निभाती भी है।
रघुवर के पिताजी एक किसान है, जिसके पास आय का साधन नहीं है। रघुवर प्रसाद द्वारा भिजवाए पैसों से वे अपना खर्चा चलाते हैं। वे बीमार है और होम्योपेथी इलाज करवाते हैं, क्योंकि एलोपेथी में पैसा ज्यादा लगता है। रघुवर प्रसाद द्वारा शौचालय वह व्यर्थ का खर्च लग रहा था और ताल की जरूरत पैरा कुट्टों में लगाने के लिए ज्यादा थी। वे अपने साथ हमेशा एक थैला लेकर घर से निकलते हैं कि कहीं कोई जरूरत का सामान कम कीमत में मिले तो उसे खरीद कर ला सके बेटे द्वारा चप्पल देने पर खुश हो जाते हैं और उसको पहने बैठे रहते हैं।
रघुवर प्रसाद की अम्मा एक सीधी-सादी महिला है। वह समझदार है और जिम्मेदार भी। इसलिए नई बहू की गृहस्थी देखने उनके पास आती है। और घर के छोटे होने के कारण ज्यादा नहीं रुकती। छोटी-छोटी मर्यादाओं का ध्यान रखती है। सोनसी को अपनी बेटी की तरह समझती है। सोनसी को बुखार होने पर उसकी सेवा करती है। वह सास के समान नहीं, माँ जैसा व्यवहार करती है।
साधु और हाथी हमेशा साथ-साथ दिखाई देते हैं। हालाँकि साधु बाद में हाथी को छोड़कर चला जाता है। कहाँ, क्यों जाता है, इसका उल्लेख उपन्यास में नहीं है। साधु हमेशा रघुवर को लेने हाथी के साथ आ जाता है। उन्हें समय पर महाविद्यालय छोड़ता है। उनके परिवार वालों को भी हाथी की सैर करवाता है। साधु और हाथी से रघुवर का आत्मीय संबंध है। पहले वह उनसे दूर-दूर भागता था, लेकिन बाद में उनका इंतजार करने लगता है। हाथी के पैरों में बंधे जंजीर को खोलकर उसे मुक्त कर लेता है। इससे उन्हें खुशी भी होता है। रघुवर और सोनसी आशा करते हैं कि जंजीर खुलने पर हाथी उनके पीछे-पीछे आएगा, लेकिन ऐसा नहीं होने पर वे दुःखी हो जाते हैं और रात भर सो नहीं पाते। सुबह हाथी को देखने जाते है और खैरागढ़ बाड़ा में हाथी के न मिलने पर जंजीर उठाकर ले आते हैं। हाथी के संबंध में परमानंद श्रीवास्तव जी का मत है- "ऑटो या साइकिल का विकल्प, साधु का हाथी जो उन्हें महाविद्यालय ही नहीं ले जाता है, विडम्बनाओं के अटपटे संसार में भी ले जाता है, पर वह कोई विकल्प नहीं है। वह रघुवर प्रसाद का चुनाव बल्कि विषयांतर है। साइकिल की अपनी खोज पर लौटने के लिए जो अंत में दिख जाती है।"(61)
विनोद कुमार शुक्ल जी पात्र के विषय में कहते हैं कि "मेरे उपन्यास के पात्र गढ़े हुए पात्र होते हैं जो जान-पहचाने पात्रों के समीप होते हैं। एक स्थिति तक पात्र, लेखक की इच्छा से चलता है, जब तक अपने पात्रों के साथ पूरी तरह परिचित नहीं हो जाता। जब लेखक का पात्र के साथ परिचय हो, जाता है, तब पात्र लेखक से स्वतंत्र हो जाता है। इस स्वतंत्रता के बाद पात्र जो पहले लेखक के पीछे-पीछे चलता रहा, बाद में पात्र के पीछे-पीछे इतने तेज पाँव चलता है कि पात्र को पता ही नहीं चलता कि लेखक उसके पीछे हैं। इतनी स्वतंत्रता पात्र को होती है।"(62)
परिवेश-चित्रण :
प्रत्येक रचना का एक परिवेश होता है। रचनाकार किसी न किसी काल परिस्थितियों, वातावरण से प्रभावित होकर ही रचना का सृजन करता है। डॉ० जवाहर सिंह देशकाल, वातावरण के संबंध में लिखते हैं- "वातावरण या परिवेश दो प्रकार के होते हैं- मानवीय तथा प्राकृतिक। माननीय वातावरण सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक परिस्थितियों की ओर संकेत करता है, जबकि प्राकृतिक वातावरण स्थान के भौगोलिक परिवेश की ओर।"(63)
श्री विनोद कुमार शुक्ल जी प्रगतिशील चेतना के रचनाकार हैं। वे रुड़ियों, संस्कारों में बंधे हुए मनुष्यों की विविशता को प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य ग्रामीण तथा शहरी जीवन की स्वार्थी प्रवृत्ति और हीन भावनाओं में हुए ग्रामीण किसान, मजदूर, शहरी मजदूर, मध्यवर्ग, गरीब, सुशिक्षित बेकारों का अभावग्रस्त, शोषित, स्वाभिमानहीन, मजबूर जीवन एवं राजनीतिक पतन के यथार्थ को रुपायित करने की है। वे युग जीवन के संदर्भों में बनते बिगड़ते, जीवन सत्यों को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं।
श्री शुक्ल जी ने व्यक्ति और समाज तथा उनके आपसी संबंध को नई जीवन दृष्टि के प्रकाश में अन्वेषित-विश्लेषित किया है। उन्होंने मानव-चरित्र के भीतर छिपी वास्तविकता को परिवेश के माध्यम से उजागर किया है। उनके उपन्यासों में चित्रित परिवेश स्वातंत्र्योत्तर भारतीय जीवन का यथार्थ है।
साहित्य में प्रकृति को अनेक प्रकार से चित्रित किया गया है। साहित्यकार प्रकृति के मनोरम एवं भीषण दोनों रूपों को दिखाते हैं। पंक्ति को कभी प्रतीकों के माध्यम से भी प्रस्तुत किया जाता है। जैसे- निराशा' के लिए अंधकार, 'दुःख' के लिए रात, 'सुख' के लिए दिन आदि।
विनोद कुमार शुक्ल के शब्दों में- "मेरा लिखा हुआ अगर उसकी कोई पृष्ठभूमि बनती है तो वह छत्तीसगढ़ी ही है। यह राज्य का भौगोलिक सीमा में नहीं है, बल्कि एक छत्तीसगढ़ीपन मुझे बहुत अच्छा लगता है। में कहीं भी कविता लिखूँ पता नहीं कैसे उसकी पृष्ठभूमि में छत्तीसगढ़ी ही होता है। मेरे अनुभव से संसार में जो उपजाऊपन है रचना का, उसकी सार्थकता वह यही जमीन है। कहीं दूसरी जगह की भी बात होती है तो यह दूसरी जगह, इसी जगह में होती है। मुझे नहीं मालूम कि मेरे सामने वह जो नीम का पेड़ है, उसे में सहज पेड़ कह या वह कितना असहज है, लेकिन रचना में वह एक कठिन पेड़ की तरह उगा हुआ होता है। मैं जितनी जिंदगी की धूप में रचना के चाहर पेड़ की छाया में सुस्ताता हूँ, उतना ही रचना के अंदर के पेड़ की छाया में भी। यह मैं अपने ही पेड़ के बारे में नहीं कह रहा हूँ। यह कितना कठिन है कि एक-एक, हरे-भरे पेड़ की एक पत्ती की मैं गिनती लगाता हूँ और असंख्य होने के बावजूद एक पत्ती भी मुझे, अतिरिक्त नहीं मिलती। मुझे जिंदगी के मरुस्थल में रेत के ऊपर पड़ी हुई एक हरी पत्ती नहीं मिलती, परन्तु हरी पत्ती का आश्चर्य मिलता है तो हरे पेड़ का भी आश्चर्य मिलता है।" (64)
इसी विषय में वे यह भी लिखते हैं- "मूल बात बहुत ज्यादा बदलती नहीं है। कारण बदलते हैं। दृष्टि बदलती है। परिदृश्य बदलता है। मूल आदत नहीं बदलती। भूख तो पहले भी लगती थी और अभी भी है। पहले भी मिलता-बिछुड़ना था, आज भी मिलना-बिछुड़ना है। फिर भी यह लगता है कि मनुष्यता पहले अधिक थी अब कम हो गई है। मूल्य मूल्यवान थे अब नहीं। आज राजनीति सबसे बड़ी ताकत है। अब समाजिनीति की ताकत कम हुई है और यह खबर समाज के चलते हुआ। समाज को समाज से बदलना कठिन था। राजनीति से बदलना आसान है। अगर राजनीति खराब होने लगे तो मुश्किल है। इसलिए जो हो रहा है, उसके साथ होती हुई कविता उसी तरह हो रही है, परन्तु कविता अपने होने के पीछे और आगे को भी समेटकर चलती है। "(65)
'नौकर की कमीज' के परिवेश के संदर्भ में परमानंद श्रीवास्तव जी लिखते हैं कि "भारतीय निम्नमध्यवर्ग के यथार्थ की जैसी विलक्षण और गहरी पहचान विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास नौकर की कमीज' में है, वह हिन्दी उपन्यास का एक विरल अनुभव है। ऊपर-ऊपर से सिनिकल और कौतुक-विनोदपूर्ण। भीतर से सार्थक विडम्बना और मार्मिक जिजीविषा की झलक। एकदम साधारण जीवन की कुढ़न। हास्यास्पद स्थिति में भी क्रूर व्यंग्य, मखोल और आत्मभर्त्सना के प्रसंगों तथा व्यर्थताबोध से चलकर उपन्यास जहाँ खत्म होता है वही है, जीवन का साहसपूर्ण स्वीकार।"(66)
'नौकर की कमीज' एक व्यंग्यात्मक उपन्यास है, जिसमें सामंती समाज में विडम्बनाओं से भरे परिवेश को दर्शाया गया है। संतू बाबू और उनके सहकर्मियों के माध्यम से यह हमारा और हमारे समाज की बौद्धिक सीमाओं को भी दर्शाता है। मध्यवर्ग का व्यक्ति जीवन के प्रत्येक क्षण को समेटता और जीने के लिए प्रयास करता है, पर ये सामाजिक व्यवस्था और उसकी आडम्बरों में फंसते जाते हैं। वे दोनों हाथों से उस स्थिति से उबरने की कोशिश में मरते दम तक लगे रहते हैं। इस प्रक्रिया में शोषक कैसे और कितना शोषित करेगा, समझाना मुश्किल है और उससे अधिक मुश्किल शोषित वर्ग का विरोध करना। संतू बाबू कहते हैं- "संघर्ष का दायरा बहुत छोटा था। प्रहार इसलिए चोट बहुत जोर की नहीं लगती। असर डालता था कि विद्रोह करने की किसी की इच्छा नहीं होती थी या विद्रोह भी बहुत मामूली किस्म का होता। यदि सब्जी बहुत मंहगी मिलती थी तो इसका कारण उन सब्जी तोलते समय डपटकर बोलता तोल ठीक होना चाहिए। सड़ा आलू मत डाल देना.. डंडी मारते हो, लूटते हो। यही मेरा विद्रोह था। "(67)
एक समय था, जब गाँव से शहरों की ओर लोग विस्थापित एवं आकर्षित हो रहे थे, जिससे अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुईं, जिसमें मुख्य थी रहने के लिए मकान की समस्या। इस विषय पर संतू बाबू कहते हैं- "मैं किराए के मकान से दुनिया, देखता हूँ। हमारे पच्चीस दिन घरे में पड़े रहते हैं। हमारा महीना टुकड़ा-टुकड़ा होकर तीस दिन होता है।"(68)
उपन्यास में सदर बाजार कोतवाली सर्राफ, दवा दुकान, महाविद्यालय सतनामी मुहल्ला, शराब भट्ठी, गंज, स्टेशन आदि का उल्लेख मिलता है जो उनके परिवेश को दिखाता है- "जिस शहर में मेरा बचपन गुजरा था और जहाँ बड़े भाई, थे, उस शहर में भी सदर बाजार में कोतवाली थी। शहर की बसाहट में यह शुरु से ध्यान दिया जाता था कि सेठ, मारवाड़ियों, व्यापारियों इत्यादि बड़े लोगों के बीच में कोतवाली हो। असुरक्षा उन्हें थी। अंग्रेजों के जमाने में यहाँ कोतवाली थी, वहीं अब भी थी। बड़े सेठ जहीं थे, वहीं अभी भी थे। जहाँ झगड़े ज्यादा होते थे- जैसे सतनामी मुहल्ला और शराब भट्टी, गंज, स्टेशन इत्यादि वहीं छोटी-छोटी पुलिस चौकियाँ बना दी गई थीं। कोतवाली के एक तरफ जही सदर बाजार था ठीक उसकी दूसरी तरफ मुसलमानों का, मुहल्ला था। बहुत से लोगों का सुरक्षा के बिना गुजारा होता मुश्किल था। भले कुछ न हो, शांति हो, पर कोतवाली का आसरा तो रहता है। गाँव की बसाहट भी एक ही तरह की होती थी, यानी गाँव के बीच में मंदिर होगा, यह बसाहट की शुरुआत होगी। मंदिर के पास कुआँ होगा। चौपाल होगा। इसके आसपास ठाकुरों और ब्राह्मणों के मकान होंगे। गाँव के आखिरी छोर पर बाहर ही बाहर चमारों और मेहतरों के घर होंगे। गाँव में मेहतर कम होते थे। चमार बहुत होते थे। शहरों की नई बसाहट में जाति पर कोई खास ध्यान नहीं देता, पर मकान बनाने वाले प्लॉट खरीदते समय पास-पड़ोस की तरह जरूर ध्यान देते थे। गरीबी शहर की बसाहट में बहुत महत्त्वपूर्ण होती थी। इनके मुहल्ले बहुत दूर होते और वह शहर का सबसे गंदा इलाका होता था।"(69)
शुक्ल जी परिवेश में आए बदलाव के बारे में कहते हैं- "आदमी के विचार तेजी से बदल रहे थे, लेकिन उतनी ही तेजी से रछीपन इकट्ठा हो रहा, था। रछीपन देर तक ताजा रहेगा। अच्छाई तुरंत सड़ जाती है। अधिक से अधिक बेटे दो घंटे या एक दो दिन तक ही रहती थी।"(70) महिलाओं पर अत्याचार जैसी बड़ी सामाजिक समस्या भी वैसे ही है। पितृसत्तात्मक इस समाज में नारियों के प्रति अधिकांशतः गंदी मानसिकता का उल्लेख भी लेखक ने किया है। जैसे-संपत की माँ को बाप-बेटे द्वारा पीटना, एक औरत का रो-रोकर, चिल्लाना, क्योंकि उसका पति उसको मारता है, वनस्पति शास्त्र के शिक्षक की पत्नी का मिट्टी का तेल डालकर जल जाना, कुएँ में कूदी यह कह डंडे से ढूंढ़ना, ताकि वह निकलना चाहे तो भी न निकल सके, बहू को जहर देकर कहना कि उसकी मृत्यु है जो कि बीमारी से हुई है।ग्रामीण एवं किसानों की दुर्दशा और दरिद्र को भी उपन्यास में स्थान मिला है। श्यामसुंदर मिश्र इसके बारे में कहते हैं- "उपन्यास का संपूर्ण कथानक औसत निम्नमध्यमवर्गीय जीवन और उसके भीतर पैदा होने वाले संभावित सरोकारों का दस्तावेज है। यह एक विश्वसनीय लेखा-जोखा है जो उस सीमा का अतिक्रमण नहीं करता, जिसके भीतर उसकी कहानी आकार ग्रहण करती है। वर्षा ठीक न होने पर जब फसल नहीं आती तो चावल महंगा हो जाता है और उधार देने वाले गुप्ता चार सौ रुपये की उधारी होते हो कथानायक का राशन कार्ड अपने कब्जे में कर लेता है।"(71) इसी से स्पष्ट है कि महंगाई और सामान्य जन-जीवन का कितना घनिष्ठ संबंध है और इससे अधिक प्रभावित भी यही निम्न मध्यवर्ग है। फसल की बरबादी सुनकर दलाल सक्रिय हो जाते हैं, गाँव के किसान मजदूरी के लिए विवश हो जाते हैं। जो बचा रहता है या तो फिर से खेती के काम में लगते हैं या केवल उससे खाने की पूर्ति ही हो पाती है।
रमेश यादव जी लिखते हैं कि, "शुक्ल जी के उपन्यासों में अपने समय की रिपोटिंग नहीं है। उनमें अपने समय की कथा है, विद्रूपता है, जो लेखक की सर्जनात्मक चेतना से गुजरकर सामने आती है- सूक्ष्म रुप से संकेत रूप में, आहट के रूप में। जिन्हें समय के सरोकारों को नगाड़े की आवाज में सुनने की आदत है, उन्हें इस उपन्यास में निराशा होगी। इस उपन्यास में एक मास्टर के साथ पार्श्व में आदिवासी समाज की व्यथा-कथा भी है। इस समाज के जीवन में विस्थापन का, मुक्ति का सवाल महत्त्वपूर्ण है। बाहरी दुनिया अपनी वस्तुओं, अपनी सभ्यता के साथ दखल देती है। गुरुजी को अक्सर लगता है कि गाँव कभी भी खाली हो सकता है। गाँव के स्टेशन पर जो रेलगाड़ी आती है, उसमें आते बहुत कम लोग और जाते बहुत लोग। जाने वालों के साथ दुःख भी जाता है, वह भी बिना टिकट यह विस्थापन की आहट है। यह सही है कि उपन्यास एक लंबे अंतराल के बाद आया, लेकिन गौर करिये 'नौकर की कमीज' में संतू बाबू की समस्या मकान की छत टपकने से शुरु होती है तो 'खिलेगा तो देखेंगे' में समस्या छत के उड़ जाने से आरंभ होती है। मास्टर जी का परिवार आसरे के लिए थाने में शरण लेता है। वे लॉकअप जहाँ अपराधी भी चौबीस घंटे से ज्यादा नहीं रहना चाहते हैं, वे स्वेच्छा से रहते हैं। लॉकअप में रहना ही अपराध की पूर्व कल्पना करना है। स्वप्र में उन्हें पुलिस की गोली लगती है, स्थिति को करेक्ट करने के लिए।" (72)
विनोद कुमार, शुक्ल जी छत्तीसगढ़ के सीधे-सादे, सरल, रोचक, अभावग्रस्त जीवन और संस्कृति से बंधे हुए हैं। उनके इस उपन्यास में ग्रामीण अचल और समाज का वर्णन देखने को मिलता है। उपन्यास में रीति-रिवाज, रहन-सहन, व्यवहार, समाज ग्रामीण अचल से जुड़े हुए हैं। यहाँ के जीवन और प्रकृति को उन्होंने जिस आत्मीयता और संवेदनशीलता से दिखाया है, यह उपन्यास उसका श्रेष्ठ उदाहरण है। उपन्यास के शुरुआत में ही ग्राम में केवल दो पक्के मकान जो कि झोपड़ी होने की बात कहीं है। पक्के मकान होने के बाद भी दोनों उजाड़ है, क्योंकि एक पुलिस थाना है, जो बड़गाँव में शिफ्ट हो चुका है और दूसरा ग्राम सेवक का क्वार्टर जिसमें हमेशा ताला लगा होता है। यहाँ को आबादी ठीक ही है। यहाँ राईस मिल है, लकड़ी टाल है, आरा मशीन है एवं माध्यमिक स्कूल भी है। थाने के मलबे में भटकटैय्या और धतूरा लगा हुआ है। घेरा नहीं है, लेकिन किनारे में हन्दी की झाड़ी है। घेरे के अंदर बरगद का पेड़ है, जो बहुत विशाल है। ग्रामीण अंचल की सांस्कृतिक मान्यता के बारे में शुक्ल जी लिखते हैं- "घरों के चारों तरह मिट्टी की दीवाल पर गोबर से मुठ्ठी भरकर उंगलियों से गोरइयाँ घेरा बना देते। यह सावन में दुःख से बचने के लिए डाला जाता है। बहुत दुःखों के बाद भी बहुत दुःखों से बचने का यह रिवाज था। दुःख से लबालब भरे हुए को बाँधना कि फूट न जाए। बहकर पड़ोसी के घर न जाए।" (73)
आधुनिक समय में बाजारवाद, पूँजीवाद, भूमंडलीकरण और नई महाजनी सभ्यता के प्रभाव के कारण लोगों में मानवीयता मिटती जा रही है, जिससे आपसी संबंधों में दूरियाँ आ गई है। इसी को व्यंजित करते हुए शुक्ल जी लिखते हैं- "सभी छुपते-छुपते रहेंगे। आना-जाना, काम करते रहेंगे। शुरू-शुरु में तो यह कठिन होगा। उसका चेहरा नहीं दिखेगा हाथ दिखेगा। हाथ अखबार फाड़कर पुड़ियाँ बनाऐंगे। पैसे लेंगे। पचास पैसे को बस इतनी हल्दी। ही। इतनी ही हल्दी। कहीं से आवाज आयेगी। जो आवाज होगी वह भी छुपी हुई, बदली हुई हो। एक बस आयेगी, ड्राइवर अपने केबिन में बिना दिखे होगा। पोस्टमैन रजिस्ट्री की आवाज देकर आड़ में छिप जायेगा। हर घर में आड़ बनी होगी, ताकि लोग छुप सके। छुपने की कला और सभ्यता होगी। एक समाज होगा और छुपते-छुपते लोगों का शासन। छुपना बचने का ही काम होगा!"(74)
उपन्यास में थाने का जो आतंक लोगों में दिखाया गया है, वह वास्तविकता में भारतीय ग्रामीण समाज की मनोदशा है, जिसे शुक्ल जी ने बड़े ही कलात्मकता के साथ वर्णित किया है- "पुलिस थाना करीब डेढ़ दो साल से खाली पड़ा था और उजाड़ था। थाना इतने दिनों से स्वाली था, तब भी गाँव वालों की उस तरह जाने की हिम्मत नहीं होती थी। बकरियों तक भूले-भटके उस तरफ नहीं जाती थी। थाने के अहाते के अंदर मीठे पानी का ही कुआँ था। केवल यहीं कुआँ होता और थाना नहीं होता तो कुएँ के इर्द-गिर्द गाँव और बस गया होता। थाने के इर्द-गिर्द गाँव के बसने का कोई तुक नहीं था। गाँव हमेशा थानों के पीछे रहता आया और थाने इतने दिनों तक खाली रहने के बाद भी उसकी तरफ एक झोपड़ी नहीं बढ़ा।"(75)
उपन्यास में जिवराखन महाजनी प्रथा का प्रतीक है, जो गाँव वालों को उधार देकर उन्हें शोषित करने का मौका, ताकत रहता है। वहाँ, हाडू जो दस-बारह साल का लड़का है, शोषण के खिलाफ अपने मालिक के विरोध में दिखता है, लेकिन अपनी, माँ के शांत करने पर शांत हो जाता है। यहाँ भी अन्याय अत्याचार का खुलकर विरोध नहीं हो पाता। शुक्ल जी जीवन सौन्दर्य के रचनाकार अधिक लगते हैं जो दुःखों में भी सुख के क्षण को ढूंढ़ निकालते हैं, जिससे दुःख कम या सहने योग्य हो जाते हैं- "मेले-ठेले में काली साँवली लड़कियों की भीड़ होती जो चूड़ी, टिकुली, फुंदेरा कुछ नहीं खरीदती थी। लौटते समय उनका सामूहिक गीत होता। रास्ते में जंगली फूल मिल जाते तो बालों में खोंस लेती। जूड़ा बनाकर पेड़ की पतली टहनी खोस लेती एक हरी पत्ती लगा लेती। टहनी में एक-दो हरी पत्ती जुड़े में खुसी हुई सुंदर लगती थी। इस सौन्दर्य को देखकर लगता था कि जुड़े में खुसी टहनी में घर पहुँचते-पहुँचते दो-एक फूल भी निकल आएंगे। "(76)
शुक्ल जी जीवन के दुःख को स्वीकारते हैं। फुलेसर दाई के पैरों में बिवाइयों की गहरी दरारें थीं, गीली जमीन पर चलो तो धूल चिपक जाती है। ऐसे साधारण दुख को लेखक प्राकृतिक मान लेते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे किसी पेड़, नदी या तालाब का होना। उपन्यास में मुत्रा का प्रसंग गांधीवादी ढंग से लड़ाई लड़ने की है, जिसमें अपने स्वाभिमान से समझौता किए बगैर जीने के लिए गुरुजी अपने बेटे को प्रेरित करते हैं। लेखक गुरुजी के माध्यम से कहते हैं-"मुत्रा तुमको भूखा रहना सीखना होगा। भर्राई आवाज से उन्होंने कहा था। उन्होंने मुत्रा के सिर पर अपना दूसरा हाथ फेरा। बस्ते पर रखे हुए हाथ को उन्होंने उठाया नहीं था कि पाठ का बस्ता यही नहीं है, इसके अलावा भी है, दुनिया है। स्वाभिमान से जीते रहने का पाठ। भूखा रहने की जितनी आदत होगी स्वाभिमान से जीना उतना आसान होता होगा। स्वाभिमान को खत्म करने का जहर भूख की जड़ या जड़ी से बनाया जाता होगा।"(77)
रमेश, यादव जी 'दीवार में एक, खिड़की रहती थी' उपन्यास के परिवेश के बारे में लिखते हैं कि- "इस कल्पना का मोहक रुप पाठक को बहुत आकर्षित करता है। इसकी सशक्त और जीवंत अभिव्यक्ति के कारण भी कुछ होने चाहिए। 'नौकर की कमीज' उपन्यास में मध्यवर्ग के आगे एक दीवार थी। वह उनके आगे बढ़ने की संभावना को बंद कर देती थी, लेकिन नब्बे के दशक में अर्थव्यवस्था विश्व की अर्थव्यवस्था से जुड़ती है। सिंगल विंडो सिस्टम के द्वारा। इस खिड़की से भारतीय जीवन में वस्तुओं का बाजार का प्रवेश होता है। समाजवादी आदर्श की समझ को खत्म हुआ माना गया और वस्तुओं तथा बाजार को समझकर। इस खिड़की ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया भारतीय मध्यवर्ग को। उसमें एक चाहत पैदा हुई, कल्पना को परख लग गए। रघुवर प्रसाद कस्बे के हैं, हाथी को साधन के रूप में चुनते हैं, लेकिन उन्हें भी लगता है कि हाथी बैठता है तो मानों कार का दरवाजा खुल गया हो। कार की चाहत सोनसी के साथ वो खिड़की के मोहक संसार में प्रवेश करते हैं, प्रकृति के आदिम रुप का साथ मिलता है, तो सोने का कड़ा भी। सोने की चाहत। अकारण नहीं है कि एक ठेठ मध्यवर्गीय भारतीय की आकांक्षाओं की सूची बनाई जाए तो इन दोनों वस्तुओं की चाहत शायद टॉप में हो। "(78)
इस उपन्यास में पुरानी सामाजिक संस्कृति की झलक है। इसकी कहानी सामान्य जीवन की घटनाओं की भाँति है। नायक (रघुवर प्रसाद) का आना, पिता के पैर छूना, आपस में समाचार पूछना सामान्य है। उपन्यास में परिवेश, लेखक के आसपास के परिवेश से जुड़ा है।
विष्णु खरेजी इस उपन्यास के लिए लिखते हैं कि, "विनोद कुमार शुक्ल के इस उपन्यास में कोई महान घटना, कोई विराट संघर्ष, कोई युग-सत्य कोई उद्देश्य या संदेश नहीं है, क्योंकि इसमें वह जीवन, जो इस देश की वह जिंदगी है, जिसे किसी अन्य उपयुक्त शब्द के अभाव में निम्न मध्यवर्गीय कहा जाता है, इतने खालिस रूप में मौजूद है कि उन्हें किसी पृष्ठकथ्य की जरूरत नहीं है। यहाँ खलनायक नहीं है, किन्तु मुख्य पात्रों के अस्तित्व की सादगी, उनकी निरीहता, उनके रहने आने-जाने, जीवन-यापन के वे विरल ब्योरे हैं, जिनसे अपने-आप उस क्रूर संसार का अहसास हो जाता है, जिसके कारण इस देश के बहुसंख्यक लोगों का जीवन वैसा है जैसा कि है। विनोद कुमार शुक्ल इस जीवन में बहुत गहरे पैठकर दाम्पत्य परिवार, आस-पड़ोस काम करने की जगह, नेहिल गैर-संबंधियों के साथ रिश्तों के जरिए एक इतनी अदम्य आस्था स्थापित करते हैं कि उसके आगे सारी अनुपस्थित मानव-विरोधी ताकते कुरुप ही नहीं, खोखली लगने लगती है। एक सुखदतम अपना यह है कि इस उपन्यास में अपने जल, चट्टान, पर्वत, वन वृक्ष, पशुओं पक्षियों, सूर्योदय सूर्यास्त, चन्द्र, हवा, रंग, गंध और ध्वनियों के साथ प्रकृति इतनी उपस्थिति है, जितनी फणीश्वरनाथ रेणु के गल्प के बाद कभी नहीं रही और जो यह समझते थे कि विनोद कुमार शुक्ल में मानव स्रहिलता कितनी भी हो, स्त्री-पुरुष प्रेम से वे परहेज करते हैं, क्योंकि वह उनके बूते से बाहर है, उनके लिए तो यह उपन्यास एक सदमा साबित होगा। प्रदर्शनवाद से बचते हुए इसमें उन्होंने ऐन्द्रिकता, मासलता, रति और श्रृंगार के ऐसे चित्र दिए हैं, जो बगैर उत्तेजक हुए आत्मा को इस आदिम संबंध के सौन्दर्य से समृद्ध कर देते हैं और वे चस्पा किए हुए नहीं है, बल्कि नितांत स्वाभाविक है- उनके बिना यह उपन्यास अधूरा, अविश्वसनीय, बंध्य होता, बल्कि आश्चर्य यह है कि उनकी कविता में यह शारीरिकता नहीं है।"(79)
उपन्यास के परिवेश के विषय में परमानंद श्रीवास्तव जी की उक्ति उचित है- "यहाँ साधारण का वह वृत्तांत है जो वृत्तांत होने से इंकार करता है। अपने अटपटे पन में भी इस उपन्यास की अंतर्वस्तु इतनी सहज ठेठ निष्कवच और देशी है कि सादगी या मामूलीपन ही रहस्यमय लगने लगे। जीवन का साधारण का यह अटपटा राग कोई लीला-विनोद नहीं हैं। दुःख सहने का यह भी एक ढंग है जो मनुष्य की प्रकृति के गहरे सानिध्य में अपने जीवत और कौतुकपूर्ण कुढ़ंग से अर्जित किया है। मार्मिक जीवन विनोद ही उपन्यास के मूल में है।"(80)
इस प्रकार उपन्यास में भारतीय समाज के सामान्यजन तो सादगीपूर्ण भोलेपन से अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनके क्रियाकलाप, उनसे जुड़ी सामग्रियों तथ्यों, रीति-रिवाजो खासकर छत्तीसगढ़ी संदर्भ में देखने को मिलता है। इस उपन्यास में प्रकृति का चित्रण प्रचुरता से और सुंदरता से किया गया है। इसमें प्रक्ति और मनुष्य सुंदरता को एक-दूसरे का पूरक बताया गया है।
अतः स्पष्ट है कि शुक्ल जी की रचनाओं में प्राकृतिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवेश का चित्रण किया गया है। इसमें पात्रों की मानसिकता का चित्रण करने के लिए, कथ्य को सजीव और विश्वसनी बनाने के लिए प्राकृतिक परिवेश का सहारा लिया गया है। राजनीति के क्षेत्र में पूँजीपतियों का वर्चस्व, महात्मा गांधी के सिद्धांत, अवसरवाद की राजनीति धोखाधड़ी, को दिखाया गया है। सामाजिक परिवेश के अंतर्गत ग्रामीण एवं शहरी परिवेश, शोषक एवं शोषित वर्ग, गाँवों का पिछाड़ापन, ग्रामीण जीवन की दासता, किसानों की दुर्दशा सामाजिक असमानता, शहरों की भीड़ भरा जीवन, अपराध के क्षेत्र में चढ़ाव, महंगाई की भीषणता, निवास की समस्या मजदूरों का आर्थिक शोषण परिवार में स्त्री की भूमिका एवं महत्त्व व्यवहार में सर्तकता की आवश्यकता को बहुत ही अच्छे तरीके से उपन्यासत्रयी में चित्रित किया गया है।
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संदर्भ-ग्रंथ-सूची :-
1. 'भाषा विज्ञान की भूमिका'- देवेन्द्र नाथ शर्मा, राधा कृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली- 1995, पृ०- 19-20
2. सापेक्ष, जनवरी, 2012, पृ०-51
3. वही, पृ०- 51
4. हिन्दी व्याकरण- डॉ. वासुदेव नंदन प्रसाद, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद- 1986, पृ०- 271
5. कविता का मूल्यांकन : परंपरा और प्रगति की भूमिका - डॉ. हरिचरण शर्मा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली- 1997, पृ०- 210
6. वर्ल्ड ऑफ इमेजरी-स्टीफन जे. बाउन, पृ०- 12
7. हिन्दी कविता में बिम्ब-विधान- डॉ. केदारनाथ सिंह, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली- 1959, पृ०- 21
8. 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1959, पृ०-39
9. 'खिलेगा तो देखेंगे'- विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, हरियाणा- 2003, पृ०- 41
10. वही, पृ०- 68
11. नौकर की कमीज- विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली- 1994, पृ० - 69
12. दीवार में एक खिड़की रहती थी- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2004, पृ०- 210
13. वही, पृ०-27
14. नयी कविता में विविध प्रयोग- पांडेय शशि भूषण शीतांशु, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली- 1997, पृ०- 142-143
15. दीवार में एक खिड़की रहती थी- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2004, पृ० 73
16. 'खिलेगा तो देखेंगे- विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, हरियाणा, 2003, पृ० 22
17. 'यासि रास त'- विनोद कुमार शुक्ल, हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स, नोएडा, यू० पी०, 2017, पृ० 109
18. हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़- विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली- 2011, पृ० 23
19. वही, पृ० 23
20. खिलेगा तो देखेंगे- विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, हरियाणा- 2003, पृ० 43
21 'दीवार में एक खिड़की रहती थी'- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2011, पृ० 11
22. 'हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़ -विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली- 2011, पृ० 41
23. 'एक चुप्पी जगह' विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली- 1997, पृ० 102
24. 'यासि रासा त- विनोद कुमार शुक्ल, हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स, नोएडा, यू० पी०-2017, पृ० 125
25. 'खिलेगा तो देखेंगे'- विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, हरियाणा- 2003, पृ० 43
26. वही, पृ० 74
27. 'दीवार में एक खिड़की रहती थी'- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2004, पृ० 112
28. 'यासि रासा त'- विनोद कुमार शुक्ल, हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स, नोएडा, यू०पी०-2017, पृ० 79
29. 'हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़' विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली- 2011, पृ० 12
30. 'दीवार में एक खिड़की रहती थी'- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2004, पृ० 108
31. खिलेगा तो देखेंगे- विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, हरियाणा- 2003, पृ० 71
32. हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़- विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली- 2011, पृ० 10
33. दीवार में एक खिड़की रहती थी- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2004, पृ० 14
34. नौकर की कमीज- विनोद कुमार कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली- 1994, पृ० 68-69
35. 'हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़'- विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली- 2011, पृ० 32
36. 'दीवार में एक खिड़की रहती थी- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2004, पृ० 115
37. समकालीन कविता का शैल्पिक परिप्रेक्ष्य- सुमन कंवर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2010, पृ० 2
38. आधुनिक गीति काव्य का शिल्प-विधान- मंजु गुप्ता, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली- 1984, पृ० 4
39. हिन्दी उपन्यास की शिल्प-विधि का विकास- श्रीमती ओम शुक्ल, हिन्दी परिषद, प्रयाग - 2001, पृ० 9
40. साहित्य का श्रेय और प्रेय-जैनेन्द्र, पूर्वोदय प्रकाशन, दिल्ली- 1964, पृ० 360
41. वृहद हिन्दी कोश- सं. कालिका प्रसाद सहाय, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली-1986, पृ० 1334
42. पंत का काव्य शिल्प- शिवपाल सिंह, नीलाभ प्रकाशन, इलाहाबाद- 1971, पृ० 22
43. वही, पृ. 23
44. दीवार में एक खिड़की रहती थी- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2004, पृ० 3
45 सापेक्ष-51 ,पृ० 171
46. वही, पृ. 172
47. खिलेगा तो देखेंगे, विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, हरियाणा- 2003, पृ० 171
48. वही, पृ० 180
49. वही, पृ० 706
50. नौकर की कमीज, विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली- 1994, पृ०
51. वही, पृ० 207
52. वही, पृ० 20
53. वही, पृ० 54
54. वही, पृ० 208
55. आकाशवाणी- श्यामसुंदर मित्र-1-15 अप्रैल-1984 ई0
56. पूर्वाग्रह (पत्रिका)- प्रमोद वर्मा, अंक-39-40, जुलाई-अक्टूबर, 1980
57. आलोचना-रमेश दबे, अक्टूबर-दिसम्बर, 2001
58. खिलेगा तो देखेंगे, विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, हरियाणा - 2003, पृ० 25
59. वही, पृ० 80
60. कथाक्रम, अप्रैल-जून-2000, पृ० 95
61. कथाक्रम, जनवरी-1999, पृ० 81
62. सापेक्ष- 51, पृ० 699
63. हिन्दी के आंचलिक उपन्यासों का शिल्प- डॉ० जवाहर सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली- 1998, पृ०-24
64. सापेक्ष-51-पृ० 636
65. वही, पृ० 635
66. उपन्यास का पुनर्जन्म-परमानंद श्रीवास्तव, नैशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली-1986, पृ० 117
67. नौकर की कमीज, विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली- 1944, पृ०
68. वही, पृ० 67
69. वही, पृ० 87
70. वही, पृ० 18
71. नौकर की कमीज-विनोद कुमार शुक्ल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली- 1994, पृ०
72. सापेक्ष-51, पृ० 36
73. खिलेगा तो देखेंगे, विनोद कुमार शुक्ल, आधार प्रकाशन, हरियाणा- 2003, पृ० 114
74. वही, पृ० 62
75. वही, पृ० 10
76. वही, पृ० 115
77. वही, पृ० 182
78. सापेक्ष-51-पृ०-38
79. दीवार में एक खिड़की रहती थी- विनोद कुमार शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2004, पृ० 169
80. कथाक्रम, जनवरी-1999, पृ० 37
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