उसने कहा था,
हमारा प्रेम है कितना शुभ्र
कितना ठोस, स्फटिक की तरह
कितना टिकाऊ, जैसे पत्थर पर खिंची लकीर।
पर जीवन के एक झोके में
मलिन हो गयी, सारी शुभ्रता
पत्थर, रेत हो ढह गया....
आँखों में उतर आया सावन
कि प्रेम, चंद बूंदों में बह गया........
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार और ब्लाॅगर
संपर्क: 6201464897
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