तुम लौट आना
खुले हैं दरवाजे
खुली हैं खिड़कियाँ
घर के.......
मन के.......
टंगी हैं अब भी तुम्हारी ही तस्वीरें
घर में.........
मन में.........
तुम लौट आना दोस्त,
जैसे लौट आती है छोटी-सी चिड़िया
शाम ढलते ही अपने नीड़ों में.....
जैसे लौट आती है बरसाती नदियाँ
प्लावन (बाढ़) के बाद अपने कुलों में......
फैली थी मेरी बाहें तब भी
फैली हैं मेरी बाहें अब भी.....
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार और ब्लाॅगर
संपर्क : 6201464897
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