भादव की घनघोर अंधेरी रात। आकाश में उमड़ते-घुमड़ते बादल। शीतल बूंदों से नहा रही है प्रकृति। इसी रात भगवान श्रीकृष्ण अवतरित हुए हैं, धरती का समस्त कलेश हरने....दुष्टों का दमन करने, जिसे टोकरी में लिए नदी पार कर रहे हैं मास्टर साहब। कोसी नदी उफनायी है। पार करना सहज नहीं है। कमर भर पानी....छाती तक.....गरदन डूब रही है.....डूब गयी गरदन....माथे पर पानी.......! हाय-हाय कर छाती पीटने लगी मास्टरनी। मेरे लाल को कहाँ लिए जा रहे हो? लौटा दो मेरे लाल को....उसके बिना मैं जी नहीं सकती!
"माँ, तुम तो कहीं भी ऊँघने लगती हो?" लक्ष्मी ने माँ को झकझोरा।
"नहीं....नहीं, आँख लग गई थी।" उसने आँख मलते हुए सफाई दिया।
मास्टरनी माँ बनने वाली है। सबने यही कहा था कि आठवें संतान के रूप में 'कृष्णावतार' होगा। धरती पर पाप का साम्राज्य है। न्याय-अन्याय का भेद मिट गया है। आततायी शक्तियाँ अट्ठहास कर रही हैं, इसलिए देखना इस बार तुम्हारी कोख से प्रभु स्वयं अवतरित होंगे। अपने अठमसुए पेट को सहलाने लगी मास्टरनी........
मास्टर साहब अड़े थे कि अब उसे कोई बच्चा नहीं चाहिए, इसलिए तीसरे माह में ही गर्भपात करवाने की सारी तैयारी हो गयी थी, लेकिन मास्टरनी लटक गयी उनके पैरों में- "जब सात बेटियों को पाल सकते हैं आप तो एक और सही। इस बार कोख बदलेगा। मेरा मन कहता है.........सब लोग कहते हैं।"
सबसे छोटी बेटी कृति अब चार साल की हो गयी है। दोनों निश्चिंत थे कि अब कोई बाल-बच्चा नहीं होगा, पर ईश्वर कुछ और ही मंजूर था। जिसका दाना-पानी लिखा है, उसे आने से कौन रोक सकता है! मुँह चीरने वाला सबको आहार देता है। वह भूखा जगाता है, पर भूखा सुलाता नहीं है। अब तक मास्टर साहब यही मानते थे। ईश्वर पर अटूट विश्वास उन्हें, किन्तु ईश्वर ने उन्हें बहुत छला है।धीरे-धीरे उनकी आस्था डिग गयी!
बहुत मन्नतों के बाद लक्ष्मी पैदा हुई थी। शादी के चार साल हो गये थे। लोगों ने मास्टरनी को बाँझिन कहना शुरू कर दिया था। सास भी उस पर कुपित रहने लगी थी। कुलदीपक जनने में नाकाम हो गयी थी वह। वह कहती कि यह बाँझिन उसे पोते का मुँह नहीं दिखला सकती।
लेकिन अचानक एक दिन जब वह धूप में बैठकर बाल सुखा रही थी तो बहू को चुहल सूझी। उसने जाकर सास के कान में ऐसा क्या कह दिया कि खुशी से नाच गयी बुढ़िया! बार-बार उसका मस्तक चूमने लगी। लाख-लाख दुआएँ देने लगी- "तुम तो लक्ष्मी बनकर मेरे घर में पैर रखी थी। गणेश बी.ए., एम.ए. करके दर-दर भटक रहा था काम की तलाश में, पर तुम्हारे आते ही उसकी नौकरी लग गयी। वह सरकारी स्कूल में मास्टर हो गया। तुम मेरी लक्ष्मीनियाँ बहू हो!"
दिन और महीने बीतते गये। मास्टरनी के पेट के साथ ही उसका सम्मान भी बढ़ता गया। घर से लेकर बाहर तक उसे बाँझ कहने वाली महिलाओं के मुँह पर कालिख पुत गयी।
महारानी हो गयी मास्टरनी। फल-फूल का भोग लगाने लगी। दूध,दही,घी में नहाने लगी। सास ने फिर से एक बार चूल्हा -चक्की संभाल लिया। वह पलंग तोड़ती रही नौ मास तक। घर में लक्ष्मी आयी......मास्टर साहब ने दिल खोलकर मिठाइयाँ बाटीं। परिवार और समाज से लेकर स्कूल तक अघा गये लोग।
लक्ष्मी क्रमवार अपनी शेष बहनों को बुलाने लगी। हर दो साल पर एक बहन। हालाँकि दूसरी बेटी के बाद ही मास्टर- मास्टरनी ने ठान लिया था कि अबकी बेटे का जन्म होगा, लेकिन बेटियाँ आती रहीं। बेटे की चाहत में.....
लोगों ने कहा कि तीन संतान के बाद कोख बदलता है। इस बार बेटा होना तय है। फिर उम्मीद पर फिर पानी फिरा। मास्टर साहब अब परिवार बढ़ाना नहीं चाह रहे थे, लेकिन माँ रो पड़ी- "खानदान का नाम यहीं से बुत जाएगा।" वह कहने लगी,- "इस बार पांडव आएगा! न आये तो कहना......!"
पांडव नहीं आया! द्रौपदी आ गयी! नाम पड़ा द्रौपदी।
सब फिर हताश हो गये! मास्टर साहब ने माँ पर अपना क्रोध उतारा -"यह सब तुम्हारे कारण हुआ है। बेटा और बेटी में कोई फ़र्क नहीं होता है। बेटियों को भी पढ़ाया-लिखाया जाय तो कुल खानदान का नाम रौशन करती हैं।"
मास्टर साहब विचार से प्रगतिशील थे। वे बेटे और बेटियों में कोई अंतर नहीं मानते थे। लेकिन जब पड़ोस की एक महिला ने मास्टरनी से झगड़ते समय उसे 'निपुत्तर' कह दिया तो उस रात सो नहीं पाये वे। पूरी रात करवट बदलते रहे। भाले के तरह कलेजे में धँस गया था वह शब्द- 'निपुत्तर'..... मास्टरनी से उनकी आँखें मिलती रहीं और बरसती रहीं...रात भर!
-"आप दूसरी शादी कर लीजिए।" मास्टरनी फफक पड़ी, "मेरे कोख से बेटा नहीं जनेगा। बेटे के बिना कुल-खानदान का नाम बुत जाता है। निपुत्तर....."
"दूसरी शादी!" चिहुक गये मास्टर साहब, "ये नहीं हो सकता मुझसे! मुझे नहीं करनी दूसरी शादी!"
दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगे!
मास्टरनी के होते हुए दूसरी शादी। ऐसा सोचना भी पाप है उसके लिए। दु:ख -सुख की साथी है वह। जब कुछ नहीं था उसके पास। न काम, न पैसा, तो संजू ने उसे नहीं छोड़ा। उनके माता-पिता उसकी दूसरी शादी की तैयारी करने लगे थे। गणेश निकम्मा था उसके लिए। लेकिन वह लड़ गयी माँ-बाप से- "करम का लिखा कौन मेट सकता है! मेरे भाग में जो था, सो हुआ! मुझे उन्हीं के साथ रहना है!"
और एक दिन वह सबका संताप लेकर आ गई अपने घर।
सास ने बहुत पूछा- "ऐसे क्यों आ गयी बेटी? ये ठीक नहीं है। आस-पड़ोस के लोग अंटशंट बोल रहे हैं। आना था तो गणेश को बुला लेती।"
"यह हमारा अपना घर है माँ जी। यहाँ आने में शर्मिंदा कैसी? लोग बोलते हैं बोलने दीजिए।" संजू का जवाब सुनकर स्तब्ध रह गयी थी वह। बाद में जब उसे असलियत का पता चला तो संजू को कलेजे से साट कर रो पड़ी- "मैं अबतक कितना बुरा सोचती थी तुम्हारे बारे में। मुझे माफ कर दो बेटी। तुमने कुल की लाज रख ली।"
शब्द मौन हो गये थे! बस दोनों की आँखें बात कर रही थीं। दोनों, दोनों के भावसागर में डूब रहे थे! मास्टर भी मास्टरनी भी......
मास्टर साहब ने अंतिम फैसला सुना दिया कि चाहे जो हो जाए, वह दूसरी शादी नहीं कर सकता। फिर सर्वसम्मति से छठे संतान के रूप में भगवान कार्तिक का इंतजार होने लगा। अभाग से इस बार फिर धरती सवा हाथ नीचे धँस गयी।
सातवीं संतान का ठेका संजू की माँ ने ले लिया -"मेहमान जी सातवें संतान के रूप में बेटा लिखा है अंजू के लिलार पर।" उसने कई दंपत्तियों को उद्धृत किया, जिन्हें सातवें संतान के रूप में बेटे की प्राप्ति हुई थीं। निपुत्तर होने के लांछन से मुक्ति हेतु सातवें संतान का भार ग्रहण करने के लिए तैयार हो गये वे। लेकिन संजू के कोख से सच में बेटा होना नहीं लिखा था!
चार साल बाद फिर से कोख हरियाया मास्टरनी का। जिसकी कोई उम्मीद नहीं थी उन्हें। सब यही कहने लगे कि आठवें संतान के रूप में देवकी ने श्रीकृष्ण को जन्म दिया था। संसार की पीड़ा हरने प्रभु स्वयं अवतरित हुए थे। देवकी-वासुदेव के कारागार के सारे फाटक खुल गये थे। जोड़कर देखो, इस बालक का जन्म कृष्णाष्टमी के आसपास होने वाला है। कुछ तो सोचो।
सोच लिया मास्टरनी ने। वह श्रीकृष्ण को जन्म देगी।
ठीक कृष्णाष्टमी के दिन, जब सभी कृष्ण -जन्मोत्सव में डूबे थे। उसने एक अत्यंत रूपवती बालिका को जन्म दिया।
दिन महीने साल बीतते गये। समय के साथ बेटियों ने उनका नाम आकाश में लहरा दिया। बड़ी बेटी लक्ष्मी एम.ए. में गोल्डमेडलिस्ट हुई। वह अपने इलाके की लड़कियों के लिए इंटरमीडिएट तक कोचिंग चलाती है। दो सौ छात्राएँ पढ़ती हैं उसके कोचिंग में। दूसरी बेटी रूपा कबड्डी की राज्य स्तरीय खिलाड़ी है,उसे अबतक कई पुरस्कार मिल चुके हैं। तीसरी बेटी है गीता, जिसने मिथिला पेंटिंग और फाईन आर्ट को मिलाकर एक नया क्रियेशन किया है। 'बिहार दिवस' पर मुख्यमंत्री के हाथों वह सम्मानित हो चुकी है। चौथी बेटी पुष्पा गायन के क्षेत्र में अपना नाम कर रही है। पाँचवीं बेटी द्रौपदी नृत्य में कमाल कर रही है। मास्टर साहब की शेष बेटियाँ भी अपने-अपने वर्ग में अव्वल हैं।
उनकी सभी बेटियाँ एक से एक सुन्दर, सुशील, शिक्षित और सुसंस्कृत......। लोग खुद चलकर उनके यहाँ रिश्ते के लिए गुहार लगाते हैं। लेकिन मास्टर साहब इतराते हैं अपनी बेटियों पर। वह क्यों न इतराए! ऐसी एक बेटी किसी के हो तो वह नेहाल हो जाए........
मास्टर साहब अब धन-धान्य से सम्पन्न हैं। वह दस बीघे जमीन का मालिक है। आलीशान घर है। दरबाजे पर ट्रेक्टर है। बोलेरो है..... ड्राइवर है....नौकर है। अपनी खेती -पथारी है। तीन-तीन दुधारू गायें बंधी हैं। अधिकतर दिन उसके चूल्हे पर दूध का ही अदहन चढ़ता है। बेटियों की किलकारी और ठहाकों से उनका घर-आँगन हमेशा गुलजार रहता है। मास्टर - मास्टरनी राजा- रानी के तरह सुख भोग रहे हैं! फिर भी कुछ लोग हैं कि उन्हें 'निपुत्तर' कहने से बाज नहीं आते!
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
सहरसा, बिहार
संपर्क : 6201464897
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