तुम पास हो
फिर भी नजरें उदास हैं
हमारी भी तुम्हारी भी
हर सुख और दुख बाँट लेते थे तुमसे
हर तन्हाई में तुम साथ रहते थे मेरे
तुम थे तो मैं टूटकर भी टूट न सका
आज तुम हो पर मैं बिखर रहा हूँ शनै-शनै
जैसे बिखर जाता है रेत अंगुलियों की फाँक से!
तुम कहो तो इस विछोह को नियति मान लूँ मैं
या कहो तो मान लूँ जगत को ही नश्वर और जड़,
पर अंतर्मन की भी कोई नियति होती है
जो प्रेम को शाश्वत,अमिट और चेतन मानता है।
काश! तुम भी मान लेती मेरे प्रेम को शाश्वत, अमिट और......!
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
संपर्क : 6201464897
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