'बाजारवाद' का अर्थ है- दुनिया की तमाम चीजों को नफे और नुकसान की कसौटी पर तौलना। बाजारवाद भूमंडलीकरण तथा आर्थिक उदारीकरण की परिणति है। बाजारवाद की अवधारणा है कि जो बिकता है, वही टिकता है। समाज की उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों ने बाजारवाद को बढ़ावा दिया है। आज के इस दौर में जब सबकुछ बिकाऊ हो गया हो तब हिन्दी भाषा भी इससे अछूता नहीं रह गया है। कहने के लिये तो हिन्दी भारत की स्वयं सिद्ध राष्ट्रभाषा,राजभाषा, संपर्क भाषा, संचार भाषा एवं माध्यम भाषा और न जाने क्या-क्या है, पर सही में कहें तो हिन्दी भाषा के ये सभी रूप उसके बाजार की भाषा होने पर आधृत है।
हिन्दी को जो संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, उसके खोखलेपन से हम सभी बखूबी अवगत हैं। ऐसी स्थिति में अगर हिन्दी भाषा जीवित है और निरंतर विश्व भाषा बनने की ओर सधे कदमों से बढ़ रही है तो केवल बाजार के बल पर।
आर्थिक उदारीकरण के कारण विश्व के सभी बड़े देशों ने अपने बाजार की समृद्धि के लिए भारत की ओर रूख किया है,क्योंकि भारत में पर्याप्त उपभोक्ता हैं। मतलब उत्पादित वस्तुओं के खरीदार हैं। और इन उपभोक्ताओं अथवा खरीदारों की भाषा हिन्दी है। इसलिए तमाम कार्पोरेट कंपनियां यद्यपि व्यापार की सारी योजनाएँ अंग्रेजी अथवा किसी अन्य भाषाओं में बनाती हो, पर उनके समान बेचने की भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी के प्रभाव को समझकर ही वह अपने उत्पादों का विज्ञापन हिन्दी में करता है।
बाजार में हिन्दी भाषा की शक्ति और सामर्थ्य को पहचान कर ही तमाम हॉलीवुड फिल्में हिन्दी में डब होकर आ रही है तथा दुनिया के बड़े से बड़े रचनाकार अपनी रचनाएँ हिन्दी में अनुवाद करवा कर भारतीय बाजार में ला रहे हैं। तमाम विदेशी टी वी चैनल हिन्दी में कार्यक्रम का प्रसारण कर रहे हैं। भारत में सबसे अधिक बिकने वाली दस पत्र-पत्रिकाओं में टाॅप फ़ाइव हिन्दी की हैं।
बहरहाल सरकार की लाख बेरूखी के बावजूद भी हिन्दी दिन दूनी, रात चौगुनी समृद्ध हो रही है तो केवल इसलिए कि वह बाजार की भाषा है। बाजारवाद की कसौटी पर खरी उतर चुकी है- हिन्दी।
भारत एक ऐसा देश है, जहाँ भीख भी मांगना हो तो हिन्दी जाननी होगी, सीखनी होगी, क्योंकि भीख देने वाले की भाषा हिन्दी है। अतएव बाजारवाद और हिन्दी भाषा के बीच गहरा अंत:संबंध है। आज 'हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान' का नारा सर्वत्र चरितार्थ होता हुआ प्रतीत हो रहा है।
जय हिंद! जय हिन्दी!
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
हिन्दी को जो संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, उसके खोखलेपन से हम सभी बखूबी अवगत हैं। ऐसी स्थिति में अगर हिन्दी भाषा जीवित है और निरंतर विश्व भाषा बनने की ओर सधे कदमों से बढ़ रही है तो केवल बाजार के बल पर।
आर्थिक उदारीकरण के कारण विश्व के सभी बड़े देशों ने अपने बाजार की समृद्धि के लिए भारत की ओर रूख किया है,क्योंकि भारत में पर्याप्त उपभोक्ता हैं। मतलब उत्पादित वस्तुओं के खरीदार हैं। और इन उपभोक्ताओं अथवा खरीदारों की भाषा हिन्दी है। इसलिए तमाम कार्पोरेट कंपनियां यद्यपि व्यापार की सारी योजनाएँ अंग्रेजी अथवा किसी अन्य भाषाओं में बनाती हो, पर उनके समान बेचने की भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी के प्रभाव को समझकर ही वह अपने उत्पादों का विज्ञापन हिन्दी में करता है।
बाजार में हिन्दी भाषा की शक्ति और सामर्थ्य को पहचान कर ही तमाम हॉलीवुड फिल्में हिन्दी में डब होकर आ रही है तथा दुनिया के बड़े से बड़े रचनाकार अपनी रचनाएँ हिन्दी में अनुवाद करवा कर भारतीय बाजार में ला रहे हैं। तमाम विदेशी टी वी चैनल हिन्दी में कार्यक्रम का प्रसारण कर रहे हैं। भारत में सबसे अधिक बिकने वाली दस पत्र-पत्रिकाओं में टाॅप फ़ाइव हिन्दी की हैं।
बहरहाल सरकार की लाख बेरूखी के बावजूद भी हिन्दी दिन दूनी, रात चौगुनी समृद्ध हो रही है तो केवल इसलिए कि वह बाजार की भाषा है। बाजारवाद की कसौटी पर खरी उतर चुकी है- हिन्दी।
भारत एक ऐसा देश है, जहाँ भीख भी मांगना हो तो हिन्दी जाननी होगी, सीखनी होगी, क्योंकि भीख देने वाले की भाषा हिन्दी है। अतएव बाजारवाद और हिन्दी भाषा के बीच गहरा अंत:संबंध है। आज 'हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान' का नारा सर्वत्र चरितार्थ होता हुआ प्रतीत हो रहा है।
जय हिंद! जय हिन्दी!
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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