भारत आज कई क्षेत्रों में दुनिया से आगे है। उनके पास तमाम साधन, संसाधन, तकनीकी शक्ति, सामरिक -शक्ति तथा पर्याप्त जन- शक्ति है। परंतु वह शैक्षिक दृष्टि से वैश्विक स्तर पर काफी पीछे है।देश की आज़ादी के 72 साल बाद भी यह देश शैक्षिक रूप से समृद्ध नहीं हो सका है। यहाँ अब भी मैकाले की शिक्षा-पद्धति लागू है, जिससे भारतीय छात्रों का अपेक्षित बौद्धिक विकास नहीं हो पा रहा है। उनके भीतर की अधिकांश ऊर्जा अंग्रेजी भाषा को रटने में खर्च हो जाता है, यही कारण है कि हमारे शिक्षण- संस्थानों से कोई टैगोर, गांधी, मार्क्स ,आइन्सटीन या प्रेमचंद निकलकर नहीं आ रहे हैं। ये सब आ रहे हैं तो इन संस्थानों के बाहर से। मतलब यह है कि मैकाले बनाम वर्तमान भारतीय शिक्षा -प्रणाली केवल क्लर्क बनाने में समर्थ है। ये संस्थान बच्चों की मौलिक प्रतिभा पर ध्यान न देकर उनकी प्रकृति के खिलाफ़ शिक्षा दे रहे हैं। यहाँ मछली को पेड़ पर चढ़ने की शिक्षा दी जा रही है, तो बंदरों को समुद्र में तैरना सिखलाया जा रहा है। ओशो ने ठीक ही कहा था कि शिक्षण संस्थानों से एक प्रतिशत लोग ही अपने दिमाग को बचाकर बाहर निकल पाते हैं। और यही एक प्रतिशत लोग संसार में बदलाव लाने का स्वप्न देखते हैं।
बहरहाल, हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात कर रहे हैं, लेकिन हमारा अपना कोई शैक्षिक मानक नहीं है, अपनी कोई पद्धति नहीं है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात बेमानी होगी।पता नहीं, हम कब तक अपनी आँखें फोड़ कर विदेशी चश्में लगाते रहेंगे। अब वह समय आ गया है ,जब भारतीयों को अपनी भाषा में , बच्चों की प्रकृति के अनुरूप,अपने तरीके से ज्ञान देना चाहिए, तभी उनका सर्वांगीण विकास होगा।
वर्तमान समय में अगर हम शिक्षित भारत और समृद्ध भारत का स्वप्न साकार करना चाहते हैं तो,हमें शिक्षकों, स्कूल-कालेजों तथा विश्वविद्यालयों की स्थिति, पाठ्यक्रमों और शिक्षण- पद्धतियों में बदलाव लाना होगा। शिक्षा की ज्योति घर-घर तक पहुँचाने के लिए सर्वप्रथम सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार लाना होगा। प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी तथा नियुक्त शिक्षकों को प्रशिक्षित करना होगा। काॅलेज तथा विश्वविद्यालय स्तर पर भी योग्य तथा आदर्श शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी।
सूचना और संचार तकनीक की बृद्धि के कारण शिक्षण की पद्धतियों में पर्याप्त बदलाव आये हैं, हमें इन बदलावों का स्वागत करना चाहिए तथा उसके अनुरूप शिक्षण की सहायक सामग्रियों को बदलना चाहिए। साथ ही संचार माध्यमों के सहारे शैक्षणिक कार्यक्रमों का निरंतर प्रसारण होना चाहिए। देश के चुने हुए विद्वान् शिक्षकों का विडियो कॉन्फ्रेंसिंग अथवा ऑनलाइन वर्ग की व्यवस्था की जाए तो शिक्षा में गुणवत्ता का समावेश सहज ही संभव हो सकेगा।
आज का समाज एक भयावह स्थिति से गुजर रहा है, क्योंकि जितनी तेज़ी से शिक्षा का विकास हो रहा है, उतनी ही तेजी से मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है! व्यक्ति का नैतिक पतन हो रहा है। हम कह सकते हैं कि यहाँ भी हमारी शिक्षा, शिक्षक और शिक्षण संस्थान ही कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, क्योंकि वे नौकरी पाने के काबिल तो बच्चों को बना लेते हैं, पर उन्हें एक अच्छा आदमी, एक अच्छा नागरिक नहीं बना पाते हैं। अतएव, शैक्षिक संस्थानों को बच्चों के नैतिक विकास की भी जिम्मेदारी लेनी होगी।
अस्तु, वर्तमान समय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दशा को सुधारने के लिए उसकी दिशा को सुधारना अनिवार्य है। इसके लिए सर्वप्रथम शिक्षक, शिक्षण- प्रणाली, शिक्षण संस्थान तथा पाठ्यक्रम में अपेक्षित सुधार लाना चाहिए, तभी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का स्वप्न साकार हो सकेगा।
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
बहरहाल, हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात कर रहे हैं, लेकिन हमारा अपना कोई शैक्षिक मानक नहीं है, अपनी कोई पद्धति नहीं है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात बेमानी होगी।पता नहीं, हम कब तक अपनी आँखें फोड़ कर विदेशी चश्में लगाते रहेंगे। अब वह समय आ गया है ,जब भारतीयों को अपनी भाषा में , बच्चों की प्रकृति के अनुरूप,अपने तरीके से ज्ञान देना चाहिए, तभी उनका सर्वांगीण विकास होगा।
वर्तमान समय में अगर हम शिक्षित भारत और समृद्ध भारत का स्वप्न साकार करना चाहते हैं तो,हमें शिक्षकों, स्कूल-कालेजों तथा विश्वविद्यालयों की स्थिति, पाठ्यक्रमों और शिक्षण- पद्धतियों में बदलाव लाना होगा। शिक्षा की ज्योति घर-घर तक पहुँचाने के लिए सर्वप्रथम सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार लाना होगा। प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी तथा नियुक्त शिक्षकों को प्रशिक्षित करना होगा। काॅलेज तथा विश्वविद्यालय स्तर पर भी योग्य तथा आदर्श शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी।
सूचना और संचार तकनीक की बृद्धि के कारण शिक्षण की पद्धतियों में पर्याप्त बदलाव आये हैं, हमें इन बदलावों का स्वागत करना चाहिए तथा उसके अनुरूप शिक्षण की सहायक सामग्रियों को बदलना चाहिए। साथ ही संचार माध्यमों के सहारे शैक्षणिक कार्यक्रमों का निरंतर प्रसारण होना चाहिए। देश के चुने हुए विद्वान् शिक्षकों का विडियो कॉन्फ्रेंसिंग अथवा ऑनलाइन वर्ग की व्यवस्था की जाए तो शिक्षा में गुणवत्ता का समावेश सहज ही संभव हो सकेगा।
आज का समाज एक भयावह स्थिति से गुजर रहा है, क्योंकि जितनी तेज़ी से शिक्षा का विकास हो रहा है, उतनी ही तेजी से मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है! व्यक्ति का नैतिक पतन हो रहा है। हम कह सकते हैं कि यहाँ भी हमारी शिक्षा, शिक्षक और शिक्षण संस्थान ही कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, क्योंकि वे नौकरी पाने के काबिल तो बच्चों को बना लेते हैं, पर उन्हें एक अच्छा आदमी, एक अच्छा नागरिक नहीं बना पाते हैं। अतएव, शैक्षिक संस्थानों को बच्चों के नैतिक विकास की भी जिम्मेदारी लेनी होगी।
अस्तु, वर्तमान समय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दशा को सुधारने के लिए उसकी दिशा को सुधारना अनिवार्य है। इसके लिए सर्वप्रथम शिक्षक, शिक्षण- प्रणाली, शिक्षण संस्थान तथा पाठ्यक्रम में अपेक्षित सुधार लाना चाहिए, तभी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का स्वप्न साकार हो सकेगा।
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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