लगातार बारिश होने से जगेसर की खेत में घुटना भर पानी लग गया। उसने मेड़ पर और भी मिट्टी चढ़ाकर ऊँचा कर दिया और हल-बैल ले जाकर खेत का छह चास कर डाला। पाटा चलाने के बाद खेत धनरोपनी के लिए पूरी तरह तैयार हो गया था।बारिश अब भी हो ही रही थी। वह अन्य किसानों के साथ धान का बिचड़ा लाने ब्लाॅक पर पहुँच गया। वहाँ सरकार द्वारा अन्य राज्यों से बिचड़े मंगवा कर किसानों को मुफ्त दिये जा रहे थे।
हरे- हरे बिचड़े का ढ़ेर देखकर जगेसर का मन हरिया गया। रब्बी ने तो दगा दे गया! गेहूँ, मक्का दलहन.......पटबंध के अभाव में सब चौपट हो गये! पानी का कोई इंतजाम न हो सका। नदी- नाले सब सूख गए। अबकी भगवान् ने बड़ी कृपा की है। समय से मानसूनी बारिश झमाझम......।धान की फसल अच्छी हो गयी तो साल भर के खाने-पीने की जुगत हो जाएगी।
लाईन में लगे जगेसर की बारी आ गयी। अब वह पुरजा कटवाने के लिए मुंशी जी के टेबल के सामने खड़ा था।
"नाम क्या है?" मुंशी जी ने पूछा।
"जगेसर यादव"
"पेसर ?"
"रामदेव यादव।?
"आपका नाम तो नहीं है सूची में! आॅन-लाईन किया था आपने?"
मुंशी जी की यह बात सुनकर जगेसर का खून सूख गया। कलेजे में कई दरारें पड़ गयीं! जैसी दरारें कभी उनके खेत में पड़ी थीं।
"आॅन-लाईन क्या होता है सरकार?"
"अरे मूर्ख! आॅन-लाईन भी नहीं समझता है।" मुंशी जी झल्ला गये।
जगेसर वहाँ से सीधे मुखिया जी के घर की ओर भागे आए। मुखिया जी भोजन करके पान चबा रहे थे।
"मुखिया जी! आॅन -लाईन क्या होता है?" जगेसर ने पूछा। "आज ब्लॉक पर गये थे धान का बिचड़ा लेने। मुंशी जी कहते हैं कि तुमने आॅन-लाईन नहीं किया है! बिचड़ा नहीं मिलेगा!"
"दुर बुरबक! तूँ इतना भी नहीं समझता है। आॅन-लाईन का मतलब है कि घर में हमेशा लाईन को आॅन करके रखो। बिजली-बत्ती सब चालू। सरकार को अंधेरा बिलकुल पसंद नहीं है।" मुखिया जी अपना सद्ज्ञान देकर मौन धारण कर लिये।
जगेसर घर आकर पत्नी के सामने फरमान जारी कर दिया कि घर में बिजली-बत्ती हमेशा चालू रहेगी। सरकार का यही आदेश है। मुखिया जी कहते हैं कि उन्हें अंधेेरा पसंद नहीं है।
पन्द्रह दिन भर बाद जब उसे किसी सज्जन ने आॅन-लाईन की सही मतलब समझाया। तब उन्हें मालूम हुआ कि मुखिया जी कितना बड़ा गदहा है।
जगेसर ने साईवर जाकर बिचड़े के लिए आॅन-लाईन कर दिया। और पेपर लेकर ब्लॉक पर पहुँचा तो मुंशी जी ने एक सप्ताह में आने का आदेश दिया।
एक सप्ताह बाद जगेसर फिर हाजिर। उन्हें बिचड़े तो मिले, परंतु तब तक खेत में फिर से दरारें पड़ गयी थीं और मेघ भी आॅफ-लाईन हो गया। अब जगेसर हमेशा मेघ की ओर टकटकी लगाए ,उसके आॅन- लाईन होने का इंतजार कर रहे हैं।
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
हरे- हरे बिचड़े का ढ़ेर देखकर जगेसर का मन हरिया गया। रब्बी ने तो दगा दे गया! गेहूँ, मक्का दलहन.......पटबंध के अभाव में सब चौपट हो गये! पानी का कोई इंतजाम न हो सका। नदी- नाले सब सूख गए। अबकी भगवान् ने बड़ी कृपा की है। समय से मानसूनी बारिश झमाझम......।धान की फसल अच्छी हो गयी तो साल भर के खाने-पीने की जुगत हो जाएगी।
लाईन में लगे जगेसर की बारी आ गयी। अब वह पुरजा कटवाने के लिए मुंशी जी के टेबल के सामने खड़ा था।
"नाम क्या है?" मुंशी जी ने पूछा।
"जगेसर यादव"
"पेसर ?"
"रामदेव यादव।?
"आपका नाम तो नहीं है सूची में! आॅन-लाईन किया था आपने?"
मुंशी जी की यह बात सुनकर जगेसर का खून सूख गया। कलेजे में कई दरारें पड़ गयीं! जैसी दरारें कभी उनके खेत में पड़ी थीं।
"आॅन-लाईन क्या होता है सरकार?"
"अरे मूर्ख! आॅन-लाईन भी नहीं समझता है।" मुंशी जी झल्ला गये।
जगेसर वहाँ से सीधे मुखिया जी के घर की ओर भागे आए। मुखिया जी भोजन करके पान चबा रहे थे।
"मुखिया जी! आॅन -लाईन क्या होता है?" जगेसर ने पूछा। "आज ब्लॉक पर गये थे धान का बिचड़ा लेने। मुंशी जी कहते हैं कि तुमने आॅन-लाईन नहीं किया है! बिचड़ा नहीं मिलेगा!"
"दुर बुरबक! तूँ इतना भी नहीं समझता है। आॅन-लाईन का मतलब है कि घर में हमेशा लाईन को आॅन करके रखो। बिजली-बत्ती सब चालू। सरकार को अंधेरा बिलकुल पसंद नहीं है।" मुखिया जी अपना सद्ज्ञान देकर मौन धारण कर लिये।
जगेसर घर आकर पत्नी के सामने फरमान जारी कर दिया कि घर में बिजली-बत्ती हमेशा चालू रहेगी। सरकार का यही आदेश है। मुखिया जी कहते हैं कि उन्हें अंधेेरा पसंद नहीं है।
पन्द्रह दिन भर बाद जब उसे किसी सज्जन ने आॅन-लाईन की सही मतलब समझाया। तब उन्हें मालूम हुआ कि मुखिया जी कितना बड़ा गदहा है।
जगेसर ने साईवर जाकर बिचड़े के लिए आॅन-लाईन कर दिया। और पेपर लेकर ब्लॉक पर पहुँचा तो मुंशी जी ने एक सप्ताह में आने का आदेश दिया।
एक सप्ताह बाद जगेसर फिर हाजिर। उन्हें बिचड़े तो मिले, परंतु तब तक खेत में फिर से दरारें पड़ गयी थीं और मेघ भी आॅफ-लाईन हो गया। अब जगेसर हमेशा मेघ की ओर टकटकी लगाए ,उसके आॅन- लाईन होने का इंतजार कर रहे हैं।
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
0 Comments:
Post a Comment