अब बसंत के स्वागत का जमाना नहीं रहा और न ही उनमें रितुराज कहलाने का सामर्थ्य रह गया। अपनी सुसज्जित, सुरभित प्रकृति से लेकर मादक बयार लेकर प्राणियों के जीवन को नवसंचार से तिरोहित करने वाला बसंत अब पतझड़ में बहार लेकर नहीं आता, अब वह प्रकृति और जीवन में उजार लेकर आता है।
उपभोक्तावादी वैश्विक संस्कृति , तेजी से फैलता हुआ बाजार और पाँव पसारता हुआ शहरीकरण ने केवल गाँव को निगलने की चाहत में है, वरन जीवनदायिनी प्रकृति को भी लील लिया है। बहुआयामी प्रदूषण 'वैश्विक तापन' समेत असमय बाढ़ और सुखाड़ इसकी परिणति है। दुखद यह है कि प्रदूषण का सबसे बड़ा उत्पादक शहर है और उसकी परिणति का उपभोक्ता गाँव है। बाढ़ हो या सुखाड़, गर्मी हो या सर्दी, भूखमरी हो या महामारी शहर के लोग चादर तान कर चैन से सो जाते हैं। चूँकि उसके पास चादर भी है, बिस्तर भी है और अच्छी नींद भी। गर्मी हो तो ए.सी. सर्दी हो तो हीटर और बारिश हो तो सिर पर बीते भर मोटी छत। प्रकृति के अनुकूल वे स्वयं को नहीं बनाते, बल्कि अपने अनुकूल प्रकृति को ही पैदा कर लेते हैं।
लगे हाथ एक नज़र हम उपभोक्ता के साथ उत्पादक भी डालें तो पता चलता है कि वही भूखा है जो अनाज पैदा करता है! वही नंगा है जो कपड़े बुनता है! वही बेघर है जो रोज मकान जोड़ता है! आखिरकार यह विषमता क्यों है और कब रहेगी इसका उत्तर किसी के पास नहीं है?
आए दिन प्राकृतिक आपदाएँ भी आती रहती हैं, जिनसे सर्वाधिक प्रभावित गाँव में रहने वाले ही होते हैं। आज भले ही यह कथन अप्रासंगिक हो गया हो कि गाँव में देवता का वास है और शहर में मनुष्य रहते हैं, तथापि यह सोचना लाजिमी है कि अब भी देश के 70 प्रतिशत लोग गाँवों में रहते हैं। उन्हें नज़रअंदाज़ कर भारत के विकास का स्वप्न नहीं देखा जा सकता है। दूसरी बात यह है कि उन 70 प्रतिशत आबादी की जीविका का मुख्य आधार कृषि, पशुपालन तथा छोटे-छोटे कुटीर उद्योग हैं। अतः उनकी जीविकाओं का परिवर्धन भी अनिवार्य है। किन्तु सरकार इस ओर से सदैव उदासीन रहते हैं। वे गाँव के लोगों का स्मरण पाँच साल में एक बार ही करते हैं। तब जबकि उन्हें वोट की जरूरत होती है।
इधर भारतीय किसान तो अनेक तरह की समस्याओं का सामना कर ही रहे हैं। उपर से आसमान ने बेमौसम बरसात तथा तेज ओलावृष्टि कर उनके सारे सपने चूर-चूर कर दिया। यह सब तब हुआ है, जब गेहूँ और सरसों की पकी फसलें खेत में लगी थीं। जब आम और लीची के पेड़ों में फल लगने शुरू हुए थे। जब किसानों को अपने फसल को बेचकर उधार चुकाने का वक्त आ गया था। उन्हें खाद और बीज वाले का हिसाब करना था! उन्हें बैंक का कर्ज चुकाना था! उन्हें बचे हुए पैसे से बेटी की शादी करनी थी! दहेज का रकम जुटाना था!
शहर वासियों को गर्मी से राहत मिली। सूखे हुए नल में पानी आ गया। पर उनका क्या जिनके सारे सपने बह गये। उनके लिए तो आसमान ने मौत बरसाया है। फिर न जाने कितने किसान आत्महत्या करेंगे। कितने हताश भाव खेती छोड़कर परदेश जाएंगे।ट्रेन में जानवरों की भांति, पर वहाँ भी उन्हें लूटने वाले तैयार बैठे हैं। किसान न तो घर के रह जाते हैं न घाट के!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
उपभोक्तावादी वैश्विक संस्कृति , तेजी से फैलता हुआ बाजार और पाँव पसारता हुआ शहरीकरण ने केवल गाँव को निगलने की चाहत में है, वरन जीवनदायिनी प्रकृति को भी लील लिया है। बहुआयामी प्रदूषण 'वैश्विक तापन' समेत असमय बाढ़ और सुखाड़ इसकी परिणति है। दुखद यह है कि प्रदूषण का सबसे बड़ा उत्पादक शहर है और उसकी परिणति का उपभोक्ता गाँव है। बाढ़ हो या सुखाड़, गर्मी हो या सर्दी, भूखमरी हो या महामारी शहर के लोग चादर तान कर चैन से सो जाते हैं। चूँकि उसके पास चादर भी है, बिस्तर भी है और अच्छी नींद भी। गर्मी हो तो ए.सी. सर्दी हो तो हीटर और बारिश हो तो सिर पर बीते भर मोटी छत। प्रकृति के अनुकूल वे स्वयं को नहीं बनाते, बल्कि अपने अनुकूल प्रकृति को ही पैदा कर लेते हैं।
लगे हाथ एक नज़र हम उपभोक्ता के साथ उत्पादक भी डालें तो पता चलता है कि वही भूखा है जो अनाज पैदा करता है! वही नंगा है जो कपड़े बुनता है! वही बेघर है जो रोज मकान जोड़ता है! आखिरकार यह विषमता क्यों है और कब रहेगी इसका उत्तर किसी के पास नहीं है?
आए दिन प्राकृतिक आपदाएँ भी आती रहती हैं, जिनसे सर्वाधिक प्रभावित गाँव में रहने वाले ही होते हैं। आज भले ही यह कथन अप्रासंगिक हो गया हो कि गाँव में देवता का वास है और शहर में मनुष्य रहते हैं, तथापि यह सोचना लाजिमी है कि अब भी देश के 70 प्रतिशत लोग गाँवों में रहते हैं। उन्हें नज़रअंदाज़ कर भारत के विकास का स्वप्न नहीं देखा जा सकता है। दूसरी बात यह है कि उन 70 प्रतिशत आबादी की जीविका का मुख्य आधार कृषि, पशुपालन तथा छोटे-छोटे कुटीर उद्योग हैं। अतः उनकी जीविकाओं का परिवर्धन भी अनिवार्य है। किन्तु सरकार इस ओर से सदैव उदासीन रहते हैं। वे गाँव के लोगों का स्मरण पाँच साल में एक बार ही करते हैं। तब जबकि उन्हें वोट की जरूरत होती है।
इधर भारतीय किसान तो अनेक तरह की समस्याओं का सामना कर ही रहे हैं। उपर से आसमान ने बेमौसम बरसात तथा तेज ओलावृष्टि कर उनके सारे सपने चूर-चूर कर दिया। यह सब तब हुआ है, जब गेहूँ और सरसों की पकी फसलें खेत में लगी थीं। जब आम और लीची के पेड़ों में फल लगने शुरू हुए थे। जब किसानों को अपने फसल को बेचकर उधार चुकाने का वक्त आ गया था। उन्हें खाद और बीज वाले का हिसाब करना था! उन्हें बैंक का कर्ज चुकाना था! उन्हें बचे हुए पैसे से बेटी की शादी करनी थी! दहेज का रकम जुटाना था!
शहर वासियों को गर्मी से राहत मिली। सूखे हुए नल में पानी आ गया। पर उनका क्या जिनके सारे सपने बह गये। उनके लिए तो आसमान ने मौत बरसाया है। फिर न जाने कितने किसान आत्महत्या करेंगे। कितने हताश भाव खेती छोड़कर परदेश जाएंगे।ट्रेन में जानवरों की भांति, पर वहाँ भी उन्हें लूटने वाले तैयार बैठे हैं। किसान न तो घर के रह जाते हैं न घाट के!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सही कहे है सर
ReplyDeleteगाँव भी इसकी चपेट मे आ चुका है।