मेरा देश महान् है, जैसा कि किसी का देश उसके लिए होता है। भारत की महानता के अनगिनत कारण हैं, यथा- सामाजिकता, विश्व- बंधुत्व, सर्वधर्म समभाव, सांस्कृतिक बहुलता, समरसता, अहिंसावादिता, सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता तथा मानवतावाद आदि। आर्य और अनार्य के संघर्ष से भारतीय संस्कृति के विकास की जो परंपरा शुरू होती है, वह ईरानियों, अफगानों, शकों, हूणों, मंगोलों, यूनानियों, मुगलों तथा अंग्रेजों के आगमन तथा संघर्ष से समृद्ध होती रही है। भारतीय समाज तथा संस्कृति इन सभी के सम्मिलन से निर्मित है। इक़बाल ने ठीक ही कहा है -"कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।" यह कुछ बात हमारी समन्वयवादी सांस्कृति है, 'विरूद्धों के सामंजस्य', जिसका केन्द्रीय तत्त्व है। प्रसाद ने अच्छा कहा है- "अरुण यह मधुमय देश हमारा। जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।" यह वहीं देश है जहाँ यवन सिकंदर तलवार खींचे हुए आता है और हृदय देकर चला जाता है। यह वही देश है, जहाँ राम और कृष्ण हुए, महात्मा बुद्ध और वर्द्धमान महावीर हुए, गांधी और तिलक हुए, बाल्मीकि और व्यास हुए, चाणक्य और चंद्रगुप्त हुए, टैगोर और प्रेमचंद हुए, इक़बाल और प्रसाद हुए, जिनके विचारों ने भारत को रचा है। हमारी संस्कृति जिस पर हम गर्व करते हैं, वह चार पड़ाव के रूप में हमारे सामने उपस्थित हुआ है। यह पड़ाव क्रमशः अनार्य- आर्य संघर्ष, रूढ़िग्रस्त सनातन धर्म के खिलाफ़ बुद्ध का धर्म-प्रवर्तन, इस्लाम का आगमन तथा अंग्रेजों का आगमन है। इन पड़ावों से न केवल समाज के नव स्वरूप का सृजन होता गया, वरन् धार्मिक-सांस्कृतिक स्वरूप का भी नवस्थापन हुआ। यही कारण है कि हम हिन्दुस्तान को भूल से भी हिन्दू या हिन्दूत्व का पर्याय नहीं मान सकते। यह उन सभी का देश है जो यहाँ चाहे जिस भी उद्देश्य से आए और यही के होकर रह गए।
इन गौरवशाली अतीत के मध्य धार्मिक कट्टरता ने देश के दो टुकड़े किये। दुखद यह है कि बावजूद इसके शांति नहीं मिल सकी। जब-जब हम शांति की बात करते हैं, तब-तब धार्मिक कट्टरता आड़े आ जाती है। हम इस्लाम की उग्रता को टक्कर देने के लिए उग्र हिन्दूत्व को पैदा कर लिए। जबकि धार्मिक कट्टरता सदैव मानवता का विरोधी होता है। दूसरी और हिन्दुओं में भी सवर्ण- अवर्ण की लड़ाई जारी है। दलितों ने जब अंबेडकर को अपना महानायक मानते हुए 'जय भीम' का नारा लगाया तो ब्राह्मणों ने भी उसे टक्कर देने के लिए 'जय परसुराम' का सूत्र वाक्य खोज निकाला। भूमंडलीकरण के इस दौर में हमें समझना होगा कि भारत की महानता न तो 'जय भीम' के उदघोष में है और न ही 'जय परसुराम' के उदघोष में। भारत की महानता का आधार है-मानवतावाद। और उससे जुड़े तमाम वे रास्ते जो विश्व -बंधुत्व की और जाती है। ज्ञान के चरम उत्कर्ष के मौजूदा दौर में हम सभी को जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद और लिंगवाद से उपर उठकर भारत की श्रेष्ठता की तलाश करनी चाहिए तथा तमाम असामाजिक तत्वों से मिलकर मुकाबला करना चाहिए।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार।
इन गौरवशाली अतीत के मध्य धार्मिक कट्टरता ने देश के दो टुकड़े किये। दुखद यह है कि बावजूद इसके शांति नहीं मिल सकी। जब-जब हम शांति की बात करते हैं, तब-तब धार्मिक कट्टरता आड़े आ जाती है। हम इस्लाम की उग्रता को टक्कर देने के लिए उग्र हिन्दूत्व को पैदा कर लिए। जबकि धार्मिक कट्टरता सदैव मानवता का विरोधी होता है। दूसरी और हिन्दुओं में भी सवर्ण- अवर्ण की लड़ाई जारी है। दलितों ने जब अंबेडकर को अपना महानायक मानते हुए 'जय भीम' का नारा लगाया तो ब्राह्मणों ने भी उसे टक्कर देने के लिए 'जय परसुराम' का सूत्र वाक्य खोज निकाला। भूमंडलीकरण के इस दौर में हमें समझना होगा कि भारत की महानता न तो 'जय भीम' के उदघोष में है और न ही 'जय परसुराम' के उदघोष में। भारत की महानता का आधार है-मानवतावाद। और उससे जुड़े तमाम वे रास्ते जो विश्व -बंधुत्व की और जाती है। ज्ञान के चरम उत्कर्ष के मौजूदा दौर में हम सभी को जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद और लिंगवाद से उपर उठकर भारत की श्रेष्ठता की तलाश करनी चाहिए तथा तमाम असामाजिक तत्वों से मिलकर मुकाबला करना चाहिए।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार।
मानवतावाद अब केवल ........
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