कहानी
उस रात न तो दादी को नींद आयी न मुझे।चाचा जी उधर अलग बार-बार करवट फेर रहे थे।लेकिन दादा जी आराम से खर्राटे ले रहे थे।ले भी क्यों न, वे तो मालिक के घर दिन में अफर कर खाए होंगे। इधर सबके पेट में सादा पानी ढक-ढक कर रहा था, फिर नींद कैसे आ सकती थी ? घर में खाने को एक दाना भी न था !
दादी को उम्मीद थी कि शाम को दादा जी मालिक के घर से सिदहा लेकर जरूर आएंगे ।कम से कम सबको दो-दो कौर खाना तो मिल ही जाएगा।
दादा जी रोज शाम को मालिक के घर से गमछे की खूट में सिदहा बांधकर लाते थे।दादी जब उसे खोलती तो हम सभी भाई-बहन उसी पर टकटकी लगाए रहते।उसमें कम से कम आधा सेर चावल, दो मुट्ठी दाल,दो-तीन आलू, थोड़ा-सा नमक और एकाध हल्दी के टुकड़े होते थे।यह दिन भर काम करने वाले मजदूरों को रात्रि के भोजन के लिए देने की प्रथा थी। देने वालों के लिए भले ही इसका ज्यादा महत्त्व न हो, पर फाकाकशी के दिनों में यह हमारे परिवार के लिए किसी प्राण वायु से कम नहीं था।
मेरे परिवार के लोग सही मायने में उस गाँव के लिए बंधुआ मजदूर थे। हमलोग अपने भोजन के लिए पूरे गाँव पर आश्रित थे।
मेरा गाँव रामनगर किसानों का गाँव था।यहाँ के लोगों ने दादा जी को दूसरे जगह से लाकर इसलिए बसाया था कि वे पूरे गाँव के हल-फार से लेकर हँसुआ-खुरपी, खंती, टेंगारी को दुरुस्त कर सके। और इसके बदले उन्हें नये फसल पर कुछ अनाज मिलते थे। अनाज की मात्रा बैलों की संख्या पर निर्धारित किया जाता था। पर बैल पन्द्रह किलो सालाना।
अगर किसी के दरवाजे पर नये बैल खरीद कर लाये जाते तो दादी जी बहुत प्रसन्न होते, क्योंकि इससे पन्द्रह किलो अनाज की आमद बढ़ जाती थीं।गाँव में कई ऐसे लोग थे, जिनके पास चार-पाँच जोड़ी बैल थे।तब बैलों की संख्या ही किसी की सम्पन्नता या विपन्नता का मानक था। दुखद यह था कि एक या दो जोड़ी बैल वाले किसान तो मेरे दरवाजे पर आकर हल- फार ठीक करवाते थे, परंतु उससे अधिक बैलों के मालिक दादा जी को अपने दरवाजे पर बुलाकर काम करवाते थे। इसके अलावे किसी के घर में शादी-ब्याह हो, मुंडन हो या श्राध, मेरे दादा जी और चाचा जी जलावन फाड़ने के लिए स्थायी रूप से नियुक्त रहते थे।वह भी केवल दो शाम के भोजन पर।
सबसे ज्यादा झंझट हँसुआ कूटने ( धार बनाने ) को लेकर होता था। दादा जी कहते -" हम किसानों से शाली हल-फार ठोकने(बनाने) का लेते हैं, हँसुआ- खुरपी कूटने-पीटने का नहीं।यह काम हम मुफत में क्यों करें? " उनकी इन बातों से मुझे बड़ा सुकून मिलता, क्योंकि उस समय यह काम मेरे ही जिम्मे था।
किसान भी कम हठी नहीं थे। वे तपाक से कह बैठते -"मुठिया जो लेते हो सो मुफत का आता है क्या ?"
दादी को यह सब सहन नहीं हो पाता।वह मुठिया के नाम पर रंज हो जाती थी- "हम मुठिया हँसुआ-खुरपी का नहीं लेते हैं। बियाह- श्राध में जलावन फाड़ने का लेते हैं।मत फड़वाओ जलावन मेरे मरद से।" दादी तब तक चुप नहीं होती , जब तक दादा जी जोड़ से डपट न दें।
मुठिया एक ऐसी प्रथा ,जिसमें किसान फसल काटते समय नाई और कमार के लिए खेत का एक कोना छोड़ दिया करते थे। बस वह उतना ही छोड़ा जाता, जितना कि नाई बाल काटते समय टीक छोड़ता है।
मुठिया काटने के क्रम में दादी अक्सर किसान या नाईन से लड़ जाती थी।उनकी शिकायत रहती कि किसान जान -बूझकर उनके लिए फुटहर कोने को छोड़ देता है। दूसरी ओर नाईन उनके परोक्ष में आधे से ज्यादा काट लेती है। इसी चक्कर में वह न जाने कितनी बार नाईन से झोटा-झोटी कर चुकी थी।शायद ही कोई ऐसा दिन रहा होगा ,जब इन दोनों ने मुठिया काटते समय एक-दूसरे से साईं-बेटे का श्राध न किया हो।
रोज की भाँति आज भी सबकी नजर दादा जी के गमछे पर टिकी थीं, परंतु आज तो उसमें कुछ भी नहीं बंधा था। दादी पूछने ही वाली थी कि दादा जी बोले- "मालकिन घर में नहीं थी, नैहर गयी है।सिदहा कौन देता !"
दादी हताश हो गई।वह वहीं ओसारे पर बैठ गई, मानो प्राण अभी तुरंत निकला हो।उनकी आँख से दो बूँद गरम आँसू टपक गये।वह देर तक शून्य में ताकती रही।हम सभी भाई-बहन उसे को घेरकर बैठे थे। वह शून्य से बाहर तब निकली , जब मेरा छोटा भाई रोटी के लिए रिरियाने लगा।दिन में उसे आधा पेट कौनी(एक प्रकार का घास ) का भात मिला था।उसे अभी चाहिए ! लेकिन रोटी कौन लाकर देता ? माँ के मरने के बाद सबसे बड़ी विपत्ति तो उसी आन पड़ी थी। अभी वह दो साल का भी नहीं था, लेकिन समय ने उसे सूखी रोटी चबाना सिखा दिया था।नमक और भात खाना सिखा दिया था। वह भी भरपेट कहाँ मिलता था ?
मैं भला उस रात को कैसे भूल सकता हू्ँ ,जब अचानक घर में हल्ला हुआ। मेरी आँखें खुलीं, तो बाबूजी माँ को लेकर भगवती -गह्वर की ओर भागे जा रहे थे।माँ को किसी बिषैले साँप ने अभी-अभी काटा था। वह सावन की अंधेरी रात थी।मेघ आज छोड़ कल बरसना नहीं चाहता था। बाबूजी अभी दस कदम भी नहीं बढ़े थे कि माँ अंधी हो गई। फिर वे माँ को कंधे पर लादकर गह्वर पहुँचे, पर कोई लाभ नहीं ,वह हम सबको अनाथ करके जा चुकी थी।
माँ की लाश के साथ ही गाँव भर के लोग आंगन में ऊमर पड़े।घर के लोग छाती पीट रहे थे, परंतु मेरा छोटा भाई माँ का दूध पीने के लिए रो रहा था। उसे कौन समझाए कि अब वह कभी माँ का दूध नहीं पी सकता !
माँ खाक हो गई, पर वह रोज दादी की गोद में बैठकर उसे खोजने निकल पड़ता था ! दादी कभी इस आंगन तो कभी उस आंगन उसे लिए माँ को खोजती रहती, पर वह कभी न मिली !महिलाएँ दयावश एकाध रोटी जरूर दे दिया करती थीं, जिसपर आधे का हक जमाने सझला भाई पहुँच जाता था।
समय से पहले ही सूखी रोटी चबाने वाला मेरा छोटा भाई तो आज रोटी के लिए ही रो रहा था, लेकिन रोटी कौन लाकर देता उसे ? बाबूजी माँ के मरने के कुछ ही दिनों के बाद गायब हो गए थे।वे कहाँ गये किसी को पता नहीं।दादी कहती कि बाबूजी माँ को लाने गये हैं।
मेरे चाचा जी से जब बच्चे का रोना नहीं देखा गया तो वे दादी से एक बोरी मांगकर मेरा हाथ पकड़े और सीधे चलते हुए बोले- "चलो कहीं से शाली मांगकर लाते हैं।" मेरा चेहरा खिल उठा।मैंने तुरंत उनके हाथ से बोरी लेकर अपने काँख में दबा लिया।
चाचा जी चाहते तो सड़क से होकर जा सकते थे, परंतु इतना धैर्य न उनमें था न मुझमें । हमलोग आड़- धूर के रास्ते दूसरे टोले की ओर चल पड़े थे। रास्ते के दोनों ओर धान की अधपकी फसलें लगी थीं। मैं उसकी बालियाँ नोचकर चूसने लगा।तभी चाचा जी पीछे मुड़े। लगा कि अब मार पड़ी, पर वे चुप रह गए। थोड़ी देर बाद बड़े ही प्यार से बोले- "सतयुग में खेतों में धान नहीं सीधे चावल फलता था।"
"तो फिर ऐसा कब से होने लगा।" मैंने तपाक से पूछ लिया- "कितना अच्छा था ,कूटने -पीसने का झंझट नहीं था।"
चाचा जी थोड़े गंभीर होकर बोले -"यह सब भुक्खड़ ब्राह्मणों के कारण हुआ।" फिर चलते - चलते पूरी कथा सुना गये कि किस तरह एक ब्राह्मण अपने यजमान के घर से छप्पन भोग खाकर आते समय मुट्ठी भर चावल नोचकर फाँक गये। जब यह सब ब्रह्मा जी से नहीं देखा गया तो उन्होंने चावल को धान बनाते हुए ब्राह्मणों को श्राप दिया कि कभी उनका पेट नहीं भरेगा।
उनसे यह ब्राह्मण कथा सुनकर मेरा बालमन खींझ गया- भुक्खड़ कहीं का छप्पन भोग खाने के बाद चावल नोंच कर खाने की क्या जरूरत थी।
हम लोगों के पुरबी टोले पर आते-आते साँझ-बाती का समय हो गया था।चाचा जी जयनारायण यादव के दरवाजे पर पहुँच गये।मैं पीछे से दुबका हुआ बोरी लिए निरीह खड़ा था, जैसे भीख मांगने आया होऊ।वहाँ कुछ मजदूरिन अगहनी धान ओसा रही थीं। धान की बड़ी ढ़ेरी देखकर मेरा मन खिल उठा।चाचा जी उनके दालान में पहुँच गये, लेकिन मैं वही ढ़ेरी को निहारता रहा। देर तक जब वे नहीं आए तो मैं भी वहीं पहुँच गया। फिर उन्होंने मुँह पर अंगुली रखकर मुझे चुप रहने का निर्देश दिया।
यादव जी अभी संध्या सुमिरन में डूबे हुए थे।सफेद धोती ओढ़े हुए वे साक्षात कबीर दिख रहे थे। सुमिरन के बाद वे आरती गाने लगे। रेशम यादव उनका साथ दे रहे थे।
उस समय मेरे गाँव में कबीर पंथ की खूब चलती थी।जिधर देखो उधर लोग देवी - देवताओं की मूर्तियाँ फेंक रहे हैं।पर्व- त्यौहार करने वाले और बकरी पालने वाले पर जुर्माना लगाये जा रहे हैं।गुरु जी सबको भेख(कंठी) दिये जा रहे हैं।हर तरफ सत्तनाम-सत्तनाम ,सत्त कबीर और साहेब बंदगी की होड़ मची है।
आखिरकार जयनारायण यादव संध्या सुमिरन और आरती से निवृत्त हुए।
"हमें साली चाहिए मालिक , घर में खर्चा नहीं है।" चाचा जी ने अवसर देखकर डरते -डरते कहा।
"साले काम पर बुलाते हैं तो पचास बहाने करता .........साली चाहिए.....जा कल आना।"
यह सुनकर चाचा जी का मुँह लटक गया।मेरा मन रो पड़ा।दादी राह देख रही होगी। भाई रोटी के लिए रो रहा होगा।
चाचा जी गिड़गिड़ाने लगे- "कुछ भी दे दीजिए मालिक रात भर के लिए....... बाल-बच्चा भूखा है।
यादव जी बिगड़कर बोले-"कहा न कल आना।साँझ-बाती के बाद तराजू किलो नहीं उठा सकते।"
"हाँ, हाँ....साँझ पहर तराजू छूने से लक्ष्मी रूठ जाता है।" रेशम यादव ने मोहर लगा दिया।
सुबह आँखें खुलीं तो चाचा जी बोरी लिये खड़े थे और दादी मुझे उठा रही थी।मुझे फिर वहीं जाना था चाचा जी के साथ।
मैं बस मुँह धोकर उनके साथ हो लिया।मन में अनंत कामनाएँ हिलोरें ले रही थीं।मालिक ने दस किलो धान भी दे दिया तो दो- चार दिन भात खाने को मिल जाएगा।अक्सर घर में कौनी या मक्के का भात ही बनता है।कौनी में जिस दिन मुट्ठी भर चावल पड़ जाता, उस दिन सझला भाई अंत में खाता ,क्योंकि पतेली की पेंदी में चावल की मात्रा अधिक जम जाती थी। जिस दिन हमारे घर में पूरे चावल का भात बन जाए ,वह दिन हमारे लिए किसी होली या दीवाली से कम नहीं होता।
सूरज उगते ही हमलोग जयनारायण यादव के दालान पर पहुँच गये।यादव जी बैलों को सानी दे रहे थे और इधर चैता मुसहर मशीन चलाकर कुट्टी काट रहा था।
"मालिक हम आ गये साली लेने।" चाचा जी उनके सामने जाकर बोले।
बस, इतना सुनते ही यादव जी चाचा जी की बेटी-रोटी करने लगे- "साला भोरे-भोर उधरुआ जात ने मुँह दिखा दिया।पूरा दिन खराब कर दिया ससुरे ने।"
मैं बहुत डर गया कि कहीं वे हम दोनों की पिटाई न कर दें।
चाचा जी उलटे पाँव घर की ओर मुड़ गये। उनकी आँखें टप-टप चू रही थीं।मेरा हाल भी वैसा ही था।इसलिए हम दोनों एक -दूसरे से नजर बचाते हुए चुपचाप धान की खेतों के बीच चलते रहे।
जयनारायण यादव की गालियाँ अब भी सुनाई दे रही थीं- "बेटी चोद ई उधरुआ जात का दरसन भोरे-भोर हो गया.......सत्तनाम.....स...त्त...ना....म।"
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
उस रात न तो दादी को नींद आयी न मुझे।चाचा जी उधर अलग बार-बार करवट फेर रहे थे।लेकिन दादा जी आराम से खर्राटे ले रहे थे।ले भी क्यों न, वे तो मालिक के घर दिन में अफर कर खाए होंगे। इधर सबके पेट में सादा पानी ढक-ढक कर रहा था, फिर नींद कैसे आ सकती थी ? घर में खाने को एक दाना भी न था !
दादी को उम्मीद थी कि शाम को दादा जी मालिक के घर से सिदहा लेकर जरूर आएंगे ।कम से कम सबको दो-दो कौर खाना तो मिल ही जाएगा।
दादा जी रोज शाम को मालिक के घर से गमछे की खूट में सिदहा बांधकर लाते थे।दादी जब उसे खोलती तो हम सभी भाई-बहन उसी पर टकटकी लगाए रहते।उसमें कम से कम आधा सेर चावल, दो मुट्ठी दाल,दो-तीन आलू, थोड़ा-सा नमक और एकाध हल्दी के टुकड़े होते थे।यह दिन भर काम करने वाले मजदूरों को रात्रि के भोजन के लिए देने की प्रथा थी। देने वालों के लिए भले ही इसका ज्यादा महत्त्व न हो, पर फाकाकशी के दिनों में यह हमारे परिवार के लिए किसी प्राण वायु से कम नहीं था।
मेरे परिवार के लोग सही मायने में उस गाँव के लिए बंधुआ मजदूर थे। हमलोग अपने भोजन के लिए पूरे गाँव पर आश्रित थे।
मेरा गाँव रामनगर किसानों का गाँव था।यहाँ के लोगों ने दादा जी को दूसरे जगह से लाकर इसलिए बसाया था कि वे पूरे गाँव के हल-फार से लेकर हँसुआ-खुरपी, खंती, टेंगारी को दुरुस्त कर सके। और इसके बदले उन्हें नये फसल पर कुछ अनाज मिलते थे। अनाज की मात्रा बैलों की संख्या पर निर्धारित किया जाता था। पर बैल पन्द्रह किलो सालाना।
अगर किसी के दरवाजे पर नये बैल खरीद कर लाये जाते तो दादी जी बहुत प्रसन्न होते, क्योंकि इससे पन्द्रह किलो अनाज की आमद बढ़ जाती थीं।गाँव में कई ऐसे लोग थे, जिनके पास चार-पाँच जोड़ी बैल थे।तब बैलों की संख्या ही किसी की सम्पन्नता या विपन्नता का मानक था। दुखद यह था कि एक या दो जोड़ी बैल वाले किसान तो मेरे दरवाजे पर आकर हल- फार ठीक करवाते थे, परंतु उससे अधिक बैलों के मालिक दादा जी को अपने दरवाजे पर बुलाकर काम करवाते थे। इसके अलावे किसी के घर में शादी-ब्याह हो, मुंडन हो या श्राध, मेरे दादा जी और चाचा जी जलावन फाड़ने के लिए स्थायी रूप से नियुक्त रहते थे।वह भी केवल दो शाम के भोजन पर।
सबसे ज्यादा झंझट हँसुआ कूटने ( धार बनाने ) को लेकर होता था। दादा जी कहते -" हम किसानों से शाली हल-फार ठोकने(बनाने) का लेते हैं, हँसुआ- खुरपी कूटने-पीटने का नहीं।यह काम हम मुफत में क्यों करें? " उनकी इन बातों से मुझे बड़ा सुकून मिलता, क्योंकि उस समय यह काम मेरे ही जिम्मे था।
किसान भी कम हठी नहीं थे। वे तपाक से कह बैठते -"मुठिया जो लेते हो सो मुफत का आता है क्या ?"
दादी को यह सब सहन नहीं हो पाता।वह मुठिया के नाम पर रंज हो जाती थी- "हम मुठिया हँसुआ-खुरपी का नहीं लेते हैं। बियाह- श्राध में जलावन फाड़ने का लेते हैं।मत फड़वाओ जलावन मेरे मरद से।" दादी तब तक चुप नहीं होती , जब तक दादा जी जोड़ से डपट न दें।
मुठिया एक ऐसी प्रथा ,जिसमें किसान फसल काटते समय नाई और कमार के लिए खेत का एक कोना छोड़ दिया करते थे। बस वह उतना ही छोड़ा जाता, जितना कि नाई बाल काटते समय टीक छोड़ता है।
मुठिया काटने के क्रम में दादी अक्सर किसान या नाईन से लड़ जाती थी।उनकी शिकायत रहती कि किसान जान -बूझकर उनके लिए फुटहर कोने को छोड़ देता है। दूसरी ओर नाईन उनके परोक्ष में आधे से ज्यादा काट लेती है। इसी चक्कर में वह न जाने कितनी बार नाईन से झोटा-झोटी कर चुकी थी।शायद ही कोई ऐसा दिन रहा होगा ,जब इन दोनों ने मुठिया काटते समय एक-दूसरे से साईं-बेटे का श्राध न किया हो।
रोज की भाँति आज भी सबकी नजर दादा जी के गमछे पर टिकी थीं, परंतु आज तो उसमें कुछ भी नहीं बंधा था। दादी पूछने ही वाली थी कि दादा जी बोले- "मालकिन घर में नहीं थी, नैहर गयी है।सिदहा कौन देता !"
दादी हताश हो गई।वह वहीं ओसारे पर बैठ गई, मानो प्राण अभी तुरंत निकला हो।उनकी आँख से दो बूँद गरम आँसू टपक गये।वह देर तक शून्य में ताकती रही।हम सभी भाई-बहन उसे को घेरकर बैठे थे। वह शून्य से बाहर तब निकली , जब मेरा छोटा भाई रोटी के लिए रिरियाने लगा।दिन में उसे आधा पेट कौनी(एक प्रकार का घास ) का भात मिला था।उसे अभी चाहिए ! लेकिन रोटी कौन लाकर देता ? माँ के मरने के बाद सबसे बड़ी विपत्ति तो उसी आन पड़ी थी। अभी वह दो साल का भी नहीं था, लेकिन समय ने उसे सूखी रोटी चबाना सिखा दिया था।नमक और भात खाना सिखा दिया था। वह भी भरपेट कहाँ मिलता था ?
मैं भला उस रात को कैसे भूल सकता हू्ँ ,जब अचानक घर में हल्ला हुआ। मेरी आँखें खुलीं, तो बाबूजी माँ को लेकर भगवती -गह्वर की ओर भागे जा रहे थे।माँ को किसी बिषैले साँप ने अभी-अभी काटा था। वह सावन की अंधेरी रात थी।मेघ आज छोड़ कल बरसना नहीं चाहता था। बाबूजी अभी दस कदम भी नहीं बढ़े थे कि माँ अंधी हो गई। फिर वे माँ को कंधे पर लादकर गह्वर पहुँचे, पर कोई लाभ नहीं ,वह हम सबको अनाथ करके जा चुकी थी।
माँ की लाश के साथ ही गाँव भर के लोग आंगन में ऊमर पड़े।घर के लोग छाती पीट रहे थे, परंतु मेरा छोटा भाई माँ का दूध पीने के लिए रो रहा था। उसे कौन समझाए कि अब वह कभी माँ का दूध नहीं पी सकता !
माँ खाक हो गई, पर वह रोज दादी की गोद में बैठकर उसे खोजने निकल पड़ता था ! दादी कभी इस आंगन तो कभी उस आंगन उसे लिए माँ को खोजती रहती, पर वह कभी न मिली !महिलाएँ दयावश एकाध रोटी जरूर दे दिया करती थीं, जिसपर आधे का हक जमाने सझला भाई पहुँच जाता था।
समय से पहले ही सूखी रोटी चबाने वाला मेरा छोटा भाई तो आज रोटी के लिए ही रो रहा था, लेकिन रोटी कौन लाकर देता उसे ? बाबूजी माँ के मरने के कुछ ही दिनों के बाद गायब हो गए थे।वे कहाँ गये किसी को पता नहीं।दादी कहती कि बाबूजी माँ को लाने गये हैं।
मेरे चाचा जी से जब बच्चे का रोना नहीं देखा गया तो वे दादी से एक बोरी मांगकर मेरा हाथ पकड़े और सीधे चलते हुए बोले- "चलो कहीं से शाली मांगकर लाते हैं।" मेरा चेहरा खिल उठा।मैंने तुरंत उनके हाथ से बोरी लेकर अपने काँख में दबा लिया।
चाचा जी चाहते तो सड़क से होकर जा सकते थे, परंतु इतना धैर्य न उनमें था न मुझमें । हमलोग आड़- धूर के रास्ते दूसरे टोले की ओर चल पड़े थे। रास्ते के दोनों ओर धान की अधपकी फसलें लगी थीं। मैं उसकी बालियाँ नोचकर चूसने लगा।तभी चाचा जी पीछे मुड़े। लगा कि अब मार पड़ी, पर वे चुप रह गए। थोड़ी देर बाद बड़े ही प्यार से बोले- "सतयुग में खेतों में धान नहीं सीधे चावल फलता था।"
"तो फिर ऐसा कब से होने लगा।" मैंने तपाक से पूछ लिया- "कितना अच्छा था ,कूटने -पीसने का झंझट नहीं था।"
चाचा जी थोड़े गंभीर होकर बोले -"यह सब भुक्खड़ ब्राह्मणों के कारण हुआ।" फिर चलते - चलते पूरी कथा सुना गये कि किस तरह एक ब्राह्मण अपने यजमान के घर से छप्पन भोग खाकर आते समय मुट्ठी भर चावल नोचकर फाँक गये। जब यह सब ब्रह्मा जी से नहीं देखा गया तो उन्होंने चावल को धान बनाते हुए ब्राह्मणों को श्राप दिया कि कभी उनका पेट नहीं भरेगा।
उनसे यह ब्राह्मण कथा सुनकर मेरा बालमन खींझ गया- भुक्खड़ कहीं का छप्पन भोग खाने के बाद चावल नोंच कर खाने की क्या जरूरत थी।
हम लोगों के पुरबी टोले पर आते-आते साँझ-बाती का समय हो गया था।चाचा जी जयनारायण यादव के दरवाजे पर पहुँच गये।मैं पीछे से दुबका हुआ बोरी लिए निरीह खड़ा था, जैसे भीख मांगने आया होऊ।वहाँ कुछ मजदूरिन अगहनी धान ओसा रही थीं। धान की बड़ी ढ़ेरी देखकर मेरा मन खिल उठा।चाचा जी उनके दालान में पहुँच गये, लेकिन मैं वही ढ़ेरी को निहारता रहा। देर तक जब वे नहीं आए तो मैं भी वहीं पहुँच गया। फिर उन्होंने मुँह पर अंगुली रखकर मुझे चुप रहने का निर्देश दिया।
यादव जी अभी संध्या सुमिरन में डूबे हुए थे।सफेद धोती ओढ़े हुए वे साक्षात कबीर दिख रहे थे। सुमिरन के बाद वे आरती गाने लगे। रेशम यादव उनका साथ दे रहे थे।
उस समय मेरे गाँव में कबीर पंथ की खूब चलती थी।जिधर देखो उधर लोग देवी - देवताओं की मूर्तियाँ फेंक रहे हैं।पर्व- त्यौहार करने वाले और बकरी पालने वाले पर जुर्माना लगाये जा रहे हैं।गुरु जी सबको भेख(कंठी) दिये जा रहे हैं।हर तरफ सत्तनाम-सत्तनाम ,सत्त कबीर और साहेब बंदगी की होड़ मची है।
आखिरकार जयनारायण यादव संध्या सुमिरन और आरती से निवृत्त हुए।
"हमें साली चाहिए मालिक , घर में खर्चा नहीं है।" चाचा जी ने अवसर देखकर डरते -डरते कहा।
"साले काम पर बुलाते हैं तो पचास बहाने करता .........साली चाहिए.....जा कल आना।"
यह सुनकर चाचा जी का मुँह लटक गया।मेरा मन रो पड़ा।दादी राह देख रही होगी। भाई रोटी के लिए रो रहा होगा।
चाचा जी गिड़गिड़ाने लगे- "कुछ भी दे दीजिए मालिक रात भर के लिए....... बाल-बच्चा भूखा है।
यादव जी बिगड़कर बोले-"कहा न कल आना।साँझ-बाती के बाद तराजू किलो नहीं उठा सकते।"
"हाँ, हाँ....साँझ पहर तराजू छूने से लक्ष्मी रूठ जाता है।" रेशम यादव ने मोहर लगा दिया।
सुबह आँखें खुलीं तो चाचा जी बोरी लिये खड़े थे और दादी मुझे उठा रही थी।मुझे फिर वहीं जाना था चाचा जी के साथ।
मैं बस मुँह धोकर उनके साथ हो लिया।मन में अनंत कामनाएँ हिलोरें ले रही थीं।मालिक ने दस किलो धान भी दे दिया तो दो- चार दिन भात खाने को मिल जाएगा।अक्सर घर में कौनी या मक्के का भात ही बनता है।कौनी में जिस दिन मुट्ठी भर चावल पड़ जाता, उस दिन सझला भाई अंत में खाता ,क्योंकि पतेली की पेंदी में चावल की मात्रा अधिक जम जाती थी। जिस दिन हमारे घर में पूरे चावल का भात बन जाए ,वह दिन हमारे लिए किसी होली या दीवाली से कम नहीं होता।
सूरज उगते ही हमलोग जयनारायण यादव के दालान पर पहुँच गये।यादव जी बैलों को सानी दे रहे थे और इधर चैता मुसहर मशीन चलाकर कुट्टी काट रहा था।
"मालिक हम आ गये साली लेने।" चाचा जी उनके सामने जाकर बोले।
बस, इतना सुनते ही यादव जी चाचा जी की बेटी-रोटी करने लगे- "साला भोरे-भोर उधरुआ जात ने मुँह दिखा दिया।पूरा दिन खराब कर दिया ससुरे ने।"
मैं बहुत डर गया कि कहीं वे हम दोनों की पिटाई न कर दें।
चाचा जी उलटे पाँव घर की ओर मुड़ गये। उनकी आँखें टप-टप चू रही थीं।मेरा हाल भी वैसा ही था।इसलिए हम दोनों एक -दूसरे से नजर बचाते हुए चुपचाप धान की खेतों के बीच चलते रहे।
जयनारायण यादव की गालियाँ अब भी सुनाई दे रही थीं- "बेटी चोद ई उधरुआ जात का दरसन भोरे-भोर हो गया.......सत्तनाम.....स...त्त...ना....म।"
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
Bahut Sarahniye kahani hai
ReplyDeleteजी
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