पंचम अध्याय :
‘चन्द्रकांता के उपन्यासों में नारी मुक्ति की आकांक्षा के नये स्वर’
स्त्री- स्वतन्त्रता की बात जब करते हैं तो सवाल यह उठता है कि कैसी स्वतन्त्रता चाहती है- स्त्री? स्त्री की स्वतन्त्रता की चाह परिवार को तोड़ने की चाह नहीं हो सकती, उसे जोड़ने की होनी चाहिए। जोड़ने के इस कार्य में पुरुष की भागीदारी उतनी है, जितनी स्त्री की है। संवैधानिक रूप में स्त्री बिलकुल पुरुष के बराबर है, लेकिन वास्तविक जीवन में? प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। स्त्री- मुक्ति पर बात करने का, स्त्री की मुक्ति कामना करने का मतलब परिवार से अलग होना या पति से अलग होना नहीं है। विवाह संस्था को बनाये रखने में स्त्री-पुरुष दोनों का समान दायित्व है। माता-पिता के रूप में, पति-पत्नी के रूप में जीवन की सार्थकता तभी संभव है, जहाँ स्त्री और पुरुष एक दूसरे के साथ मिलकर सहयोग दें, परस्पर आत्मसम्मान के साथ जियें। वर्तमान परिवेश में ऐसा सहयोग कहीं कहीं धूमिल- सा हो गया है। कृष्णा सोबती एक ऐसी उपन्यासकार हैं, जिन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से स्त्री समस्याओं का यथार्थ रूप सामने रखा है। 'मित्रो मरजानी' की मित्रो पति से भरपूर प्रेम चाहती है। संतुष्टि चाहती है, जब कि पति उसे काबू में रखना चाहता है। वहाँ मानसिक तनाव पैदा होना स्वाभाविक बात है। मित्रो, मुँह में जो आता है बोलती है-तभी तो "कटोरी-सी दो आँखें नचाकर कहा-सोने से अपनी देह झुर-बुरकर जला लूँ या गुलजारी देवर की घरवाली की न्याई सुई-सिलाई के पीछे जान खपा , सच तो यूं कि खसम का दिया राजपाट छोड़े मैं कोठे पर नहीं जा बैठी।"1 मित्रो नारी- सम्बन्धी सारे बिम्बों को तोड़ती है। अपनी माँ की स्वच्छन्द जिन्दगी के प्रभाव से उपजा खुलापन मित्रो की विशिष्टता है। अपने लिए ही नहीं, परिवार के अन्य सदस्यों के अधिकार के लिए भी वह आवाज उठाती है। मित्रो के जरिए लेखिका नये प्रश्न खड़ा करती है। पुरुष वर्चस्ववाले समाज में आत्मसम्मान के साथ आत्मनिर्भर हो, अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति सतर्क चेतना बरतने वाली नारी का रूप प्रभा खेतान के 'छिन्नमस्ता' की प्रिया में मौजूद है। छिन्नमस्ता के रूप में उभर आयी प्रिया रूढ़िवादी सामन्ती- वृत्ति से ऊपर उठती है। प्रभा खेतान उच्चवर्गीय सामन्ती परिवेश का पर्दाफ़ाश करती है, जहाँ स्त्री कपड़ों पर खर्च कर सकती है, किताबों पर नहीं। प्रिया के लिए आर्थिक तकलीफ नहीं है। परिवार को आर्थिक सहयोग देना उसका उद्देश्य नहीं। पति के मार्फत अपनी पहचान वह पसन्द नहीं करती। अपनी अलग पहचान बनाने की क्षमता उसमें है। स्त्री की महत्त्वाकांक्षा समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता। समाज के सामने वह 'घरफोड़' स्त्री है। व्यवस्था के बाहर पैर रखने से स्त्री को निर्मम सजा भुगतनी पड़ती है। प्रिया को संतोष है कि वह अपनी राह चल रही है। प्रिया की मान्यता इन शब्दों में साफ़ नजर आती है- जैसे- "मैं यदि अपनी नज़रों में सही हूँ, तब किसी और की नज़रों में खुद को स्थापित करने की यह कठिन तपस्या बेकार है। बिल्कुल बेकार। खासकर तब व्यर्थता का एहसास और अधिक कचोटता है, जब आप अच्छी तरह जानते हैं कि सामने वाला आदमी बात सुनने को भी तैयार नहीं।"2 प्रिया ऐसी नारी है जो पति की अहंवादिता की शिकार है, परन्तु उस अहंवादिता का मुकाबला हिम्मत के साथ करती है और अपने ढंग से सही रास्ता खोज निकालती है। स्त्री की कार्यक्षमता को मानने से पुरुष हिचकते हैं। तमाम प्रकार के बंधनों तथा जकड़न के बावजूद अपनी चेतना तथा अधिकार को महसूस करते हुए विवेक के सहारे सोच समझकर कार्य करें तो जीवन में नयी स्फूर्ति ज़रूर संभव है।
विवाह में स्त्री स्वीकृति और सुरक्षा तलाशती है। 'एक पत्नी के नोट्स' का संदीप विवाह के सम्बन्ध में कहता है "विवाह प्रेम नामक फिल्म की इक्कीसवीं रोल है, जिसे आप देखना नहीं चाहते, पर देखनी पड़ती है।”3 अपनी पत्नी कविता की मुहब्बत को वह घरेलू संस्करण मानता है। मायके चली जानेवाली कविता पर वह शक करता है। कविता का मानसिक तनाव यह है कि एक विकृत आदमी से उसने मुहब्बत की, जीवन साथी बनाया और अपनी तमाम ज़िन्दगी के सुख दुख दाँव पर लगाये लिये । स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की, प्रेम की, पहली शर्त विश्वास हैं। परिवार के ताने बाने बनाये रखने के लिए विश्वास के धरातल की जरूरत है। 'दिलो दानिश' में नामी वकील कृपानारायण की पत्नी कुटुंबप्यारी हवेली की शान है। वैवाहिक सूत्र में बंधा पति-पत्नी। दूसरी तरफ़ फ़राशखाने में महकबानो है जो वकील की जायज पत्नी तो नहीं, पर उनके बच्चों की माँ है। कुटुंबप्यारी वकील साहब से गहरी पीड़ा व्यक्त करती है- "हमारे कुछ भी कहने करने से आप खीज उठते हैं। हमारा गुनाह इतना ही कि हम आपकी बीवी हैं।”4 अपने पति का नाजायज सम्बन्ध वह बर्दाश्त नहीं कर सकती। इधर अनवरखाँ के साथ अजमीर शरीफ ख्वाजा साहब की ड्योढ़ी पर महक का जाना वकील को अखरता है। अपनी विवाहिता पत्नी को घर छोड़कर महक के पास मजा उड़ाने में वकील को कुछ अखरता नहीं था। यह पुरुष मानसिकता की खासियत है। अनवरखाँ के संग महक को देखने मात्र से वकील साहब की त्योरियाँ चढ़ गयीं। अपने पास रहने के लिए महक के रोकने पर भी वह नहीं रुकता। 'वह हमारी बीवी है-बानो' कहकर जब वकील लौट जाता है तब महक समझ लेती है कि बीवी का हक होता है, रखैल का नहीं। स्त्री के यथार्थ का यह भी एक पहलू है। छिन्नमस्ता में प्रिया का पति नरेन्द्र के स्वर में अनुरोध के बदले आदेशों की गर्जना रहती है। हर छह महीने में एक से एक हसीन सेक्रेटरी की नियुक्ति करनेवाला नरेन्द्र पत्नी को टुच्चा समझता है। वह इतना कमीना निकला कि एक बार एक लड़की छह महीने के बदले साल डेढ़ साल टिक गयी तब तक नरेन्द्र का बच्चा उसके पेट में पल रहा था। लड़की नरेन्द्र के प्रेम में पागल थी। जालिम ने उसका गर्भ गिरा दिया था। ऐसी परिस्थिति में 'पति परमेश्वर' का मंत्र रटने के लिए आज की आत्मनिर्भर स्त्री तैयार नहीं होती। विश्वासहीन स्थिति में रिश्तों का धागा ढीला और कमज़ोर रह जाता है। खोखले सम्बन्धों में दरार पड़ना स्वाभाविक है। तर्क पेश किया जाता है कि समर्पण तो स्त्री का गुण है। इस गुण को एकपक्षीय मानना नामुमकिन है। जब तक वह एकपक्षीय रूप में सिर्फ स्त्री के लिए लागू होता है तब तक शोषण का स्वरूप बना रहता है। आज की स्त्री दया की या पूजा की माँग नहीं करती। 'छिन्नमस्ता' में प्रिया की रखैल सास की बेटी नीना अपने पिताजी के छिपकर पैसा भेजने की बात से घृणा करती है। प्रिया से वह कहती है- "अपने पैरों पर खड़ी स्त्री का कोई निरादर नहीं कर सकता। भाभी ! पापा का यों महीने का महीने रुपये देना? मुझे नफ़रत होती है उनसे। सच कहती हूँ भाभी, ऐसे बुजदिल इंसान से मुझे सख्त नफ़रत है।"5 यहाँ स्त्री की माँग मानवीय गरिमा और समानता की माँग है। जिमवारिस में एक संवेदनशील पुरुष को तलाशनेवाली 'कठगुलाब' की स्मिता स्त्री नियति की सच्चाई की प्रतीक है। अपने व्यक्तित्व की असीम सामर्थ्य खोजने वाली असीमा, पुरुष शोषण की शिकार होने के बावजूद अपना धैर्य और मन की दृढ़ता के बलबूते सेवा कार्य में लगी आदिवासी अंचल की नर्मदा, आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं से त्रस्त मारियन, विधवा होने पर गणपतशाह के इश्क में सरदारों की दहलीज लाँधकर निकलने वाली 'जिन्दगीनामा' की चाची महरी, शाहों के घर में काम करते करते बड़े शाहजी को अपना दिल दे बैठनेवाली राबयाँ ऐसे ही पात्र हैं जो स्त्री के यथार्थ को विभिन्न कोणों से जी रही हैं।
स्त्री की ऐसी संकट की स्थिति है कि वह अपने परिवार में और बाहर भी सुरक्षा का अहसास करने में अपने को असमर्थ पाती है। 'डार से बिछुड़ी' की पाशो रूढ़िबद्ध परिवार में अपनी उमंगों को दबाती जीती है। खोजों की हवेली में रहनेवाली अपनी माँ के संदिग्ध चरित्र की दोहरी मार उसे झेलनी पड़ती है अपनी नानी के घर में। "अरी कुएँ में डूब मरी थी तेरा बीज डालनेवाली ! अब तू संभलकर साँस भर...!"6 नानी की चेतावनी इतनी तीखी और कटु कि सहम जाती है पाशो। खैर, पति दीवानजी की मृत्यु के बाद पाशो की स्थिति ऐसी हो जाती है कि वह व्यक्ति न होकर कोई ऐसी वस्तु हो जो चाहे सो उठाकर ले जाए। यहाँ अपने परिवार में ही स्त्री चैन से रह नहीं पाती। पारिवारिक परिवेश में नारी मन की बारीकियों का विश्लेषण यहाँ हुआ है। बचपन में बलात्कार का शिकार बनने वाली 'सूरजमुखी अन्धेरे के' उपन्यास की रत्ती मानसिक और शारीरिक जड़ता का शिकार बन गयी। इतनी जड़ता है उसमें कि उसे लगता है- "रत्ती अच्छी लड़की नहीं। रत्ती कोई औरत नहीं। वह सिर्फ गीली लकड़ी है। जब भी जलेगी, धुआँ देगी। सिर्फ धुआँ।"7 कहीं वह 'ठंडी मनहूस औरत', 'पत्थरीली अहल्या' या 'अधूरी' रह जाती है। अन्धेरे अतीत के साथ भयावह वर्तमान में वह डोलती रहती है। 'आवां' उपन्यास की नमिता मेहनत से जी न चुराने वाली लड़की है जो 'श्रमजीवा' संस्था में सौ सवा सौ के करीब पापड़ बेलकर, बाकी समय ट्यूशन लेकर परिवार का सहारा बन गयी है। दस साल की नमिता पर मौसाजी की अप्रत्याशित ओछी हरकत का तीखा असर पड़े बिना कैसे रह सकता था? वह एकदम जड़- सी बन गयी थी। माँ ने शिकायत करने का मौका तक नहीं दिया कि उन्होंने हथेली से उसका मुँह चांप दिया और मौसाजी जैसी ही जल्लादी आँखों से तरेरते हुए उसे चेतावनी दी- "जो हुआ सो पेट में डाल । अपने मगज-फिरे बाबूजी से कहने की कतई ज़रूरत नहीं, वरना मामूली सी बात जीवन-जले बैर हो उठेगी। वैसे ही चिढ़ते रहते हैं- पूँजीपति से कैसी नातेदारी... तिल का ताड़ बनाने में बूढ़ा कम प्रपंची नहीं। बहला-फुसला टोहने की कोशिश करे तो खबरदार जो तू ने विष उगला..."8 माता के लिए बेटी नमिता के साथ हुई हरकत इसलिए तिल भर की बात बन जाती है कि अपनी बहन कुन्ती से मिलने वाली थोड़ी- सी आर्थिक मदद से हाथ धोना वह नहीं चाहती। यह मूल्य का अधःपतन नहीं है तो फिर क्या है?
परिवार में पिता अपनी सन्तान की सुरक्षा का केन्द्र बिन्दु है। कितनी दुर्भाग्य की बात है कि आये दिन वही पिता बेटियों के मान छीनने को तुले पड़े हैं। 'आवाँ' में स्त्री का यथार्थ इस रूप में भी है। मदन खत्री या मटका किंग द्वारा अपनी बेटी को निरन्तर बलात्कार करने का रेखांकन चित्रा मुद्गल करती हैं। पुत्री स्मिता के लिए पिता राक्षस है। ऐसी स्थिति में बेटियों का आत्मविश्वास खो जाता है और मानसिक आघात से पीड़ित रह जाती है। स्मिता की बहन इतना आतंकित है कि वह आईने में अपना चेहरा देखने से डरती है। अन्तिम विकल्प के रूप में अपने शराबी पिता को सीढ़ियों से लुढ़काकर मार देती है। परिणाम यह निकलता है कि ये अपने पारिवारिक, वैवाहिक जीवन में सहज नहीं हो पातीं। चित्रा मुद्गल ऐसी माँ की मानसिकता का परिचय देती है जो अपने पति के बलात्कार से गर्भवती हुई बेटी के पेट की सफ़ाई करवाने खुद उसे नर्सिंग होम लेकर आती है। माँ के अनुसार स्त्री परिवार की बाड़ है। परिवार की शान्ति के लिए उसे बहुत कुछ अपने आप पी लेना पड़ेगा। लेकिन स्मिता परिवार के ऐसे कमीने को मौत देने में समस्या का हल ढूँढ़ती है। स्मिता अपना मन अपनी सहेली नमिता के सामने खोलती है और कहती है "मटका किंग पिता नहीं था, राक्षस था। हमेशा ही मैंने उसकी आतंकित करती छवि में पिता को खोजा। लाल डोरे खिंची उसकी आँखों में पिता की निर्भय करती दीठ ! छुअन में वात्सल्य... मुझे मेरे पिता नहीं मिले, कभी नहीं मिले..."9 उपन्यासकार स्मिता के रूप में भविष्य के विकल्पों के संकेत देती है। उपन्यास की नमिता अन्ना साहब की विकृत यौन चेष्टाओं के प्रति तत्काल प्रतिरोध जता नहीं पायी। लेकिन अपने मन में नफ़रत करती है। आर्थिक तंगी की परवाह न करके इसी नफरत की वजह से वह कामगार अघाड़ी की नौकरी छोड़ देती है। उपन्यास की गौतमी दूसरी नारी है जो सौतेले भाई की हवस का शिकार बनती है। शराबी, व्यभिचारी, पुलिस अधिकारी पति के मानसिक, दैहिक उत्पीड़न से त्रस्त गौतमी की माँ को सौतेले पिता के साथ जीवन जीने का मौका मुश्किल से मिला था। सौतेले भाई विनोद की ज़्यादती की शिकार गौतमी, उसकी काली करतूतों से माँ को अवगत कराने की इच्छा रखने के बावजूद इसलिए ठिठक जाती है कि शिल्पकार पिता के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहीं माँ का सौभाग्य नष्ट न हो जाये। गौतमी अपने जीवन का अंत कर देती है।
इस तरह ज़ाहिर है कि स्त्री को बलात्कार के खिलाफ चुप रहने की चेतावनी दी जाती है। छिन्नमस्ता की प्रिया अपने ही घर में बड़े भाई से चुप कैसे रह सकती थी? दाई माँ ने उसे भाई द्वारा होनेवाले बलात्कार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने से मना किया। किसी से कहना नहीं। प्रिया आत्ममंथन करती है- "मैं क्यों इतनी दब्बू ? इतनी कायर? क्या दाई माँ के कारण भय का संस्कार पनपा? या अम्मा की उपेक्षा में या फिर हमारे समाज की हजारों लाखों स्त्रियों के साथ ऐसा ही घटता रहा है। पर हर औरत मुँह खोलने से घबड़ाती है। क्या सबको एक ही निर्देश मिला है अपनी माँ से? अपनी बहन से? मत बोलना बिटिया ! कभी नहीं! क्या घुटती हुई हर माँ ने औरत के जन्म को ही नहीं कोसा?"10 छिन्नमस्ता की प्रिया आक्रोश और नफ़रत व्यक्त करती है कि ये कमीने मासूम नादान बच्चों को भी नहीं छोड़ते। सोचने की बात यह है कि समाज स्त्री की रक्षा कहाँ करता है? उस स्त्री की जिससे घर बनता है। अपनी पढ़ाई के लिए अपनी बहन और जीजा पर निर्भर 'कठगुलाब' की स्मिता के साथ जीजा का भद्दा सा व्यवहार उसे गहरे तनाव में खड़ा करती है। स्मिता को बहन समझाती है- "पर तेरी बात हमारे बीच गुप्त रहनी चाहिए। एक बार इसका पता चल जाए तो उस औरत पर हमला करना, हर आदमी के लिए आसान हो जाता है। पहले कम भूखी नहीं हैं, गिद्धों की नज़रें।"11 उपन्यास की असीमा अपनी नौकरी के पहले चार महीनों की तनख्वाह कराटे सीखने में खर्च करती है। वह समझती है कि मर्दों की दुनिया में रहने के लिए होम साइंस नहीं कराटे की ज़रूरत है। अपने शोषण के विरुद्ध संघर्षरत नारी का यह विचार है। इन उपन्यासों में बलात्कार का परिणाम मानसिक स्तर पर झेलनेवाली स्त्री का यथार्थ विस्तार पाता है।
माना जाता है कि स्त्री जीवन की पूर्णता मातृत्व में है। मातृत्व की आकांक्षा स्त्री को पुरुष से जोड़ती है। नारी के अस्तित्व और आत्मगौरव के प्रति सजग 'ऐ लड़की' की माँ (अम्मु) बेटी को समझाती है कि अपनी स्वतन्त्रता को बनाये रखते हुए परिवार चलाने और माँ बनने में ही स्त्री की सार्थकता है। इसलिए सूसन से वह कहती है- शादी के बाद औरत पूरे परिवार के लिए शिकारे की माँझी बन जाती है। झील में तिरती नाव और शिकारे तो देखे हैं न तुमने ! उन पर सवार मज़े मज़े झूमते हैं और चप्पू चलाती है औरत। उम्र-भर चलाती जाती है। उसका वक्त तब सुधरेगा जब वह अपनी जीविका आप कमाने लगेगी।"12 माँ बेटी को समझाती है- "लड़की, परिवार के बीचो बीच छोटी-मोटी कर्मभूमि बिछी रहती है। यहीं से स्त्री को अपनी और दूसरों की प्रतीति होती है। माँ बनकर तो वह तीनों काल जी लेती है।"13 माता बनना और मातृत्व की जिम्मेदारी संभालना स्त्री का अपना अनुभव है। 'चाक' की दादी का मानना है कि 'जो माता बेटी जनती हैं उसकी साँसें मरते दम तक काँटों में उलझी रहती हैं।'’14 ‘आवां' में निर्मला का पति संजय कनोई नमिता से अपनी सन्तान इसलिए चाहता है कि पत्नी निर्मला बच्चा देने में असमर्थ है। नमिता संजय कनोई के प्रेम जाल में फँस जाती है और गर्भवती हो जाती है। संयोग ऐसा बनता है कि गर्भ गिर जाता है और संजय कनोई का असली रूप सामने आता है। उसमें प्रेम का नामोनिशान नहीं, वह स्वार्थ का प्रचण्ड रूप था। संजय के लिए सिर्फ एक वारिस की जरूरत है। नमिता उसके लिए सिर्फ कोख है, उसके आगे कुछ नहीं। आवां का प्रश्न परिवार में पत्नी की यौनशुचिता का प्रश्न न होकर पुरुष के अपने वारिस का प्रश्न हो जाता है। किराये की कोख पर पुरुष के एकाधिकार का प्रश्न इसमें उठाया गया है। आवां की किशोरीबाई की बेटी सुनन्दा विवाह संस्था से बाहर माँ बनती है। अपने प्रेमी मुहैल की मानसिकता सुनन्दा के दिल को तब चोट पहुँचाती है जब वह धर्म परिवर्तन की अनिवार्यता पर जोर देता है। सुनन्दा सवाल करती है- "सुहैल ने प्रेम करते समय तो कोई शर्त नहीं रखी? ब्याह करना होगा तो उससे नहीं, इस्लाम से करना होगा...या हिन्दुत्व से।"15 कुंआरी सुनन्दा को जचकी की सुविधाएँ देने से कानून इनकार करता है। सुनन्दा असुविधाओं से निराश नहीं है। वह मानती है कि माँ बनना उसका निजी मामला है। आत्मनिर्भर सुनन्दा बच्ची की परवरिश खुद करने की सामर्थ्य रखती है। उसका मातृत्व ब्याह के टुच्चे प्रमाण पत्र का मोहताज नहीं। विवाह संस्था के अन्तर्गत मातृत्व की संकल्पना देवी भाव के साथ जुड़ी है। विवाहेतर मातृत्व कलंक और कलुष बन गया है। बेगुनाह सुनन्दा की हत्या की गयी है। पुरुष से धोखा खायी बेटियों की माँ की आक्रोश भरी आवाज आवां में सुनन्दा की माँ किशोरीबाई तथा अपने प्रेमी सुबीर को खोने से ड्रगएडिक्ट बनी युवती ममता की माँ में गूँजती है। 'इदन्नमम' की मन्दाकिनी की माँ एक ऐसी माँ है जो पति महेन्द्र को छोड़कर प्रेमी रतन यादव के साथ रहती है। अपनी बेटी मन्दाकिनी याने मन्दा को अपने साथ रखने के लिए मुकदमा भी चलाती है। इधर महेन्द्र की माँ अपनी पोती मन्दा पर अपना हक मानकर गाँव तक छोड़ देती है और सोनपुरा गाँव से दूर अपने रिश्तेदारों के पास श्यामली आकर ठहरती है। 'कठगुलाब' की स्मिता, मारियन और रुथ मातृत्व की आकांक्षा के साथ जीवन की जटिल परिस्थितियों से जूझनेवाली हैं। जिमवारिस स्मिता के गर्भस्थ शिशु को बेल्ट के प्रहार से नष्ट कर देता है। नये जीवन की संभावना मातृत्व में देखनेवाली मारियन बच्चा पैदा करने के पति द्वारा लालच देते ही अपनी रचना उसे सौंप देती है जब उसको मालूम है कि पति उसे छल रहा है। 'कठगुलाब' की दर्जिनबीबी ऐसी एक माँ हैं जो अपनी सन्तान की परवरिश संस्कार के साथ करने में लगी रही। इसके बावजूद भी सन्तान हरामी निकले तो माँ का क्या कसूर? कठगुलाब की नारीपात्र मानती हैं कि सृजन यदि मातृत्व में हैं तो लेखन में भी है। 'बाँझ कोख' के साथ बंजर धरती को उर्वरा बनाने के प्रयत्न में ये जुड़ती हैं। संगठित शक्ति से ये गोधड योजना के ज़रिए नयी संभावनाओं की तलाश करती हैं।
स्त्री अपनी अस्मिता की तलाश में पुरुषवर्चस्व को चुनौती खड़ा करती है। छिन्नमस्ता की प्रिया हो या आवां की नमिता, अनचाही मेहमान के रूप में आयी लड़कियाँ हैं। बेटे में भविष्य की आशा रखनेवाले माँ-बाप उसे अंग्रेजी स्कूल में भर्ती कराते हैं, बेटी को हिन्दी स्कूल में- आवां में यही हुआ है। लेकिन बेटा आशा की किरणें बुझा देता है और उसकी जगह बेटी ले लेती है। पिता की मृत्यु के बाद बेटी नमिता मुखाग्नि देती है। पूरे घर की जिम्मेदारी नमिता के कन्धों पर आ जाती है। अपने घर और बाहर संघर्ष करने के लिए मजबूर नारी उलझनों से जूझती रहती है और अपनी इयत्ता बनाये रखने में सक्षम निकलती है। घुग्घु सा दिखता ड्राइवर रम्मैया की बदतमीज़ करतूत से तंग आकर करारा थप्पड़ लगानेवाली आवां की नीलुम्मा स्त्री के यथार्थ का अलग रूप है। वह खामोश नहीं रहती। खामोशी तोड़ती है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपना बाज़ार बनाने के लिए सुन्दरियों का शोषण कैसे करती हैं इस ओर आवां में गहरा संकेत किया गया है। ऐसा सन्दर्भ है जहाँ स्त्री ही स्त्री का दुश्मन निकलती है। स्त्रीत्व को बिकाऊ बनाने की जिम्मेदारी यहाँ पुरुष से ज़्यादा खुद स्त्रियों की है जो भौतिक सुविधाओं के चक्कर में, धन की लालच में अपना मान सम्मान खो बैठती हैं। आवां में बाबा ज्वैलर्स की मालकिन अंजना वासवानी स्त्री शोषण की दलाली का काम करनेवाली ऐसी ही नारी है। ऐसी स्वार्थी धन लोलुप नारी सारे स्त्री समूह के लिए अभिशाप है। ये भूल जाती हैं कि स्त्री देह मात्र नहीं है, देह के परे स्त्री का अस्तित्व है, उसकी पहचान है। पुरुषवर्चस्ववाली संस्कृति में स्त्री हमेशा अधीनस्थ है। सामाजिक, आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी कस्बाई ग्रामीण परिवेश की स्त्री का यथार्थ 'चाक' की सारंगी, रेशम या अल्मा कबूतरी में है। स्त्री का शोषण होता रहता है। उसका श्रम सस्ता माना जाता है। अर्से से जारी बाह्य शोषण को शोषित ने सहज मान लिया है। ऐसे माहौल में इन उपन्यासों की नारी शोषण के खिलाफ़ आवाज़ बुलन्द करती है।
पर्दों की आड़ में अपना वर्चस्व बनाये रखने के चक्कर में कहीं न कहीं स्त्री दिग्भ्रमित हो भटक भी रही है चाहे वह 'इदन्नमम' की कुसुमा भाभी हो, 'अपने-अपने कोणार्क' की कुन्ती हो या 'समय सरगम' की आरण्या। पुनर्जन्म में विश्वास के साथ आरण्या कहती है- "कोई फ़िक्र नहीं, फिर पैदा होंगे। पैदा होनेवालों की कमी नहीं, हम जैसों को तो आवागमन से छुटकारा नहीं पाना है। इस जन्म की प्रस्तुति का कुछ बेहतर करने के लिए दुबारा जन्म लेना ही होगा।"16 जीवन को सार्थक बनाने की आकांक्षा रखनेवाली आरण्या की यह आवाज़ है। अपनी पहचान की माँग करनेवाली आज की स्त्री में आत्ममंथन करने की क्षमता मौजूद है। 'कथा सतीसर' में मेधावी डाक्टर की भूमिका निभानेवाली कात्या, दंगों में बलात्कृत होकर, सब कुछ खोकर, असहाय खड़ी तुलसी, राज्ञा, नसीम, खुर्शीद और नीलु ऐसे पात्र हैं जो अपनी लड़ाई खुद लड़ती हैं। चन्द्रकान्ता ने इन पात्रों के मानसिक तनाव के सूक्ष्म अंकन के ज़रिए कश्मीरी जीवन का कटु यथार्थ हमारे सामने रखा है। अपने स्वत्व से जुड़ी तमाम समस्याओं के प्रति आज की स्त्री सचेत है। स्त्री से जुड़े बिन्दुओं की बारीकी के साथ तीव्र पहचाल स्त्री ही करा सकती है। स्त्री विमर्श का मतलब स्त्री पुरुष की स्पर्धा की दौड़ नहीं है, स्वी की स्वयं की आलोचना भी है।
पुरुष वर्चस्व वाले समाज में स्त्री की अस्मिता की तलाश में लेखिकाएँ सशक्त लेखन में लगी हुई हैं। स्त्री अस्मिता से जुड़े प्रश्न उठानेवाले उसके स्त्री पात्र, स्त्री के यथार्थ की आवाज बुलन्द करमें में सक्षम हैं। गौरव की बात है कि औरत के हक में सोचने, कहने, लिखने और कार्य करने में समर्थ महिलाएँ हर भाषा में समुचित तरीके से कर्मरत हैं। जीवन की तमाम उलझनों के बीच फैसी नारी के यथार्थ ऐसी रचनाओं में मुखरित है।।
चन्द्रकांता का साहित्य नारी जीवन की बहुआयामी छवियों का साहित्य रहा है। अपनी हर छवि में नारी या तो पीड़ित-शोषित है या अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत । नारी के शोषण के स्वरुपों एवं जिम्मेदार कारकों का एक लंबा इतिहास है। चन्द्रकांता ने अपनी यायावरी वृत्ति एवं नीर-क्षीर विवेकी दृष्टि से नारी जीवन की जिन वैविध्यपूर्ण छवियों की अभिव्यक्ति को संभव बनाया, वह उनकी स्त्री संबंधी चिंतन का परिचायक हैं। वह परिवार और समाज के दो पाटों के बीच पिसती स्त्री की कशमकश और उसकी चाहतों के द्वंद्व को शब्द प्रदान करने में सफल हुई हैं। उनके यहाँ स्त्री शोषण के अलग-अलग पैटर्नी की गहन परख की गयी है और उससे मुक्ति की राह भी सुझाने की कोशिश की गई है।
स्त्री शोषण के संबंध में एक बात यह विशेष रुप से उल्लेखनीय है कि शोषण का स्वरुप हमेशा आक्रामक ही नहीं रहा है, बल्कि उसके अन्य बहुत से मृदु तरीके भी रहे हैं। कहीं घरेलु जिम्मेदारियों में उलझाकर और उसे स्त्री कर्तव्य बताकर तो कहीं अंधविश्वास के नाम पर, कहीं अपनी नाकामियों को छिपाने के बहाने, कहीं पारम्परिक मान्यताओं की आड़ में, कहीं देह के स्तर पर आदि तरह-तरह से शोषण जारी है।
चन्द्रकांता ने स्त्री शोषण के बहुविध पहलुओं की पहचान कर उसके पीछे सक्रिय मान्यताओं की चीरफाड़ की है। उन्होने हर बार यह दिखाया है कि पुरुष और पितृसत्ता का दंभ ही वह मूल कारण है, जो स्त्री शोषण की वजह है। पुरुष सत्ता अपने दंभ को सहलाने और उसे बनाए रखने की खातिर हर तरह के हथकंडे आजमाने को तैयार रहता है। उसने समाज को एक ऐसी पुरूष दृष्टि प्रदान की है, जिससे समाज को भी वही अहं केन्द्रित हित ही दिखें और उसके खिलाफ मुखर होने वाली आवाजों को बंद किया जा सके।
प्राचीन युग से लेकर वर्तमान युग तक नारी का शोषण होता रहा है । नारी पुरुषों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गई है। उसे किसी भी उम्र में स्वतंत्र रहने की स्वीकृति ना ही समाज ने दी है ना ही शास्त्रों ने दी है। 19 वीं सदी से नारी को देखने का दृष्टिकोण बदला गया है। नारी ने विविध क्षेत्रों में प्रवेश कर, सेवा देकर अपनी कार्यक्षमता का परिचय एवं प्रमाण दिया है। लेकिन आज भी नारी का शोषण बंद नहीं हुआ है। शोषण के तरिकों में मात्र बदलाव आया है।
वर्तमान समय में नारी का शोषण हिंसा, दहेज, हत्या या स्त्री-भ्रूण हत्या के नाम पर होने लगा है। इसका स्थान स्वयं नारी ने ले लिया है। नारी शोषण के संदर्भ में डॉ. रमेश नारायण लिखते हैं कि "आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र न रहने के कारण कुँवारी नारियों को पिता पर निर्भर रहना पड़ता है और विवाहिता नारियाँ पति की इच्छाओं पर जीवन यापन करती हैं। अतः वे न तो स्वतंत्र चिंतन कर सकती हैं और न ही स्वतंत्रतापूर्वक किसी कार्य को संपन्न कर सकती हैं।"17
चंद्रकान्ता के अधिकांश उपन्यास स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखे गए हैं। 'बाकी सब खैरियत है' की पारुल 'अपने-अपने कोणार्क' की कुनी, 'ऐलान गली जिंदा है' की रत्नी या फिर 'अंतिम साक्ष्य' की मीना इन सारे स्त्री पात्रों को केन्द्र में रखकर लेखिका ने उपन्यास की रचना की है। इन उपन्यासों की नारी पीड़ा, विडम्बना, दुःख, दर्द से पीड़ित हैं । उनका शोषण किस प्रकार से स्त्री और पुरुष वर्ग द्वारा किया जाता है, यह उनके उपन्यासों में इस प्रकार दृष्टव्य है ।
'बाकी सब खैरियत है' उपन्यास में पारुल का शोषण उसकी सास द्वारा होता है । एक स्त्री ही स्त्री का शोषण करती है। उसकी सास कोई बहाना बनाकर उसे अपमानित-शोषित करती है। पारुल के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह रेडियों स्टेशन में नौकरी के लिए जाती है। रेडियो स्टेशन में जाने के कारण वहाँ रेडियो में गीत गाना होता है, जिसके कारण उसकी सास उसे कोठेवाली स्त्री की उपमा देती है। इसी संदर्भ में माँ पारुल से कहती है-"अभी तुमने सुना ही क्या है। अब सुनना बहुओं से दादरे और ठुमरियाँ ! स्वर में दुनिया भर की नफरत भरकर उन्होंने पारुल को बेदर्दी से काँचा 'छि-छि ये कोठेवालियों के ढंग !"18
'अंतिम साक्ष्य' उपन्यास की मीना का विवाह जगन से होता है। जगन मीना को एक कोठेवाले को बेच देता है। जगन एक राक्षसी प्रवृत्ति वाला दलाल पति बनता है और मीना को बेच देता है। मीना के माता-पिता नन्हीं सी उम्र में मर जाते हैं तब वह चाचा-चाची के पास रहती है। मीना को उसकी चाची द्वारा छोटी-छोटी भूलों पर जुबान और हाथों में कोड़े मारती है। मीना को अपनी चाची द्वारा शोषित होना पड़ता है। मीना का विवाह अपनी उम्र से अधिक बड़े पति से किया जाता है। वह उसको स्वीकार करती है। लेकिन उसकी अपेक्षा से निर्दयता से उसकी हार होती है। चंद्रकांता ने नारी शोषण का एवं अनमेल विवाह का उत्तम उदारण देते हुए लिखा है- 'आह ! कैसे कसाई होंगे वे चाचा-चाची! बारह वर्ष की लड़की को पचपन साल के रँडुवे के पल्ले बाँध दिया।'19
'अर्थान्तर' उपन्यास में कम्मो भी अपने पति द्वारा शोषित है। कम्मो के पति विजय का दो स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध है। कम्मो विजय के लिए कठपुतली बन गई थी, जिसे हर बार नचाता था । कम्मो विजय के लिए ग्लैमरस वाईफ बनती है। लेकिन वह अपनी पत्नी को प्रेम नहीं दे पाता । समय पर जरूरत पड़ने पर एक साधन के रूप में उसका उपयोग करता है। विजय के लिए पैसा ही सर्वस्व है। विजय की इमेज को प्रमाणित करने के लिए कम्मो मिसेज विजय बनकर रह जाती है। बिखराब, टूटन और अकेलेपन के कारण कम्मो अपने पति द्वारा शोषित होती है। कम्मो की इस स्थिति को उजागर करते हुए चंद्रकांता लिखती हैं 'कम्मो शेड में रुककर विजय को नजर भर देखती है। भीतर ईर्ष्या की अधबुझी-सी लपट भक् से जल उठती है। विवाह के आठ वर्षों में कम्मो कभी वह तरल रोशनी क्यों न देख सकी! कम्मो की जिंदगी को सहारा बनाने वाले इस विजेता पुरुष के भीतर भी रस-स्रोत छिपे हैं। कम्मो इसे एक क्रूर मजाक के अतिरिक्त और क्या समझ सकी। '20
'यहाँ वितस्ता बहती है' उपन्यास का शिवा और जिया पत्नी के रूप में हरिद्वार से एक औरत को खरीदकर लाते हैं और दोनों भाई उसके साथ शारीरिक संबंध रखते हैं। अंत में उसका यौन शोषण करते हैं और खून करके उसकी लाश को नदी में फेंक देते हैं।
'अपने-अपने कोणार्क' उपन्यास में कुनी का डॉ. त्रिपाठी द्वारा यौन शोषण किया जाता है। डॉ. त्रिपाठी शहर का मशहूर डॉक्टर था, जो ट्रीटमेन्ट के नाम पर कुनी के शरीर की जगहों पर जंगली जानवर के पंजों की तरह कुनी की देह पर रेंगते हुए महसूस किया। हाथ के पंजों से कुनी छूटने की कोशिश करती है, तब डॉ. त्रिपाठी कहता है- "चिल्लाओं नहीं! कुनी मैं भेड़िया नहीं हूँ, जो खा जाऊँगा । आई लाईक यू। वह पागलों की तरह जिस्म पर जगह-जगह चिकोटियाँ काटने लगा । उसके पान-रंगे होंठ और जीभ देखकर लार टपकाते-हाँपते भूखे कुत्ते की सूरत सामने आई 'यू आर ब्युटिफुल वोमेन !' उसके शब्द मुझे अश्लील लगे। उसके गंदे होंठ मुझे छुएँ, उससे पहले ही मैंने उसकी कलाई में दाँत गाड़ दिए।"21
इस उपन्यास में कुनी का शोषण एक सुशिक्षित डॉक्टर द्वारा किया जाता है। इस उपन्यास के माध्यम से इतना तो ज्ञात होता है कि नारी का शोषण निम्न वर्ग के अनपढ़ लोग तक सीमित नहीं है। इसमें समाज का सुशिक्षित वर्ग भी शामिल है, जो नारी का शोषण करता है।
'कथा सतीसर' उपन्यास की तुलसी का पति द्वारा शोषण होता है। तुलसी जब बीमार होती है, तब भी उसका पति शोषण करने का मौका नहीं छोड़ता है। पति को सुनाते हुए कहती है- तुलसी स्कूल में पढ़ती थी, तब प्रकाशराम मास्टर द्वारा उसका यौन शोषण किया जाता है प्रकाशराम मास्टर छुट्टी के बाद भी स्कूल में तुलसी को रोके रखता और जो उसकी छोटी-छोटी छातियों पर भींचने से लाल-नीले निशान पड़ गए थे। स्कूल के एक विकृत मनोवृत्ति शिक्षक द्वारा तुलसी का शोषण होता है। इसी संदर्भ में लेखिका लिखती है 'अबोध बालिकाओं के साथ ऐसा अपवित्र काम करने वाले पापी कलयुगी को तो रौरव नरक में ही स्थान मिलता है।” 22 इस उपन्यास के अंतर्गत नसीम का भी शोषण होता है। जेहादी नसीम के जिस्म को नोचते तो कभी नसीम की छातियाँ गरम सलाखों से दाग दिया करते थे।
औरत और जुल्म दोनों का बहुत ही गहरा रिश्ता है। भारत के आज़ाद होने के इतने साल बाद भी औरतों को आज़ादी नहीं मिली। तमाम क्षेत्रों में बुलन्दियों से नाम ऊँचा करने पर भी आज भी नारी का शोषण होता रहता है। चंद्रकान्ता ने उपन्यासों में नारी शोषण का चित्रण कर समाज पर गहरा व्यंग्य किया है।
दहेज- प्रथा प्राचीनकाल से चली आ रही है। दहेज प्रथा इच्छा पर आधारित थी, जिसका समय के साथ स्वरूप बदलकर वर पक्षों की माँगों को पूर्ण करने में हो गया । दहेज के कारण बहुओं पर अत्याचार होते है, हत्याएँ भी होती हैं। चंद्रकान्ता ने उपन्यासों में भी दहेज प्रथा की समस्या का अंकन किया है, जो इस प्रकार है।
'अपने-अपने कोणार्क' में कुनी का परिवार इस समस्या से पीड़ित है। कुनी को प्रभाकर विवाह के लिए देखने आता है, तब उसको कुनी पसंद आती है। लेकिन प्रभाकर को दहेज चाहिए था। इसलिए वह शादी के लिए मना करता है। कुनी के पिता चिंतित होकर कहते हैं-"स्कूटर तक तो चलो ठीक था। पहलौटी की बेटी है। थोड़ा इधर-उधर से ले-देकर रकम पूरी कर लेंगे। प्रॉविडेंट फंड का पैसा रखा है अभी। लेकिन कार ? कहाँ से आएगी कार ? बप्पा ने राधेनाथ मौसा से चिरौरी की, तुम जरा समझा दो भाई। मैं चार बेटियों का पिता रिटायर्ड कहाँ से लाऊँगा कार ?"23 कुनी का विवाह दहेज के कारण टूट जाता है। कुनी की बहन मति के विवाह में यह समस्या उत्पन्न होती है। लेकिन कुनी मति के विवाह के लिए दहेज में स्कूटर, टी.वी., फ्रिज आदि देने के लिए तैयार हो जाती है। वह मति के लिए इस लड़के को खोना नहीं चाहती और कुँवारीपन का दुःख अपनी बहन को देना नहीं चाहती है।
'यहाँ वितस्ता बहती है' उपन्यास में राजनाथ दहेज प्रथा के विरोधी थे। उन्होंने अपने बेटे की शादियों में दहेज लेने से मना किया था। दहेज लेने और देने वालों पर वह व्यंग्य करते थे । भाषण में दहेज देनेवाले लोगों की पोल भी खोलते थे। मुकुंदराम की अधेड़ लड़की की शादी के दौरान लड़के वालों द्वारा दहेज की माँग की जाती है, तब राजनाथ उनका विरोध करते हैं, तब मुकुंदराम अपनी व्यथा को व्यक्त करके कहता है- "हम गरीब लोगों से यह बड़े लोगों के चोंचले ? दान दहेज न दे तो लड़की को कौंच कौंचकर खत्म न कर दें सास-ससुर ? जीना मुहाल न कर दें? बिना दहेज की लड़की को वो क्या कहते हैं 'कच्ची मछली' कहाँ जावे, गले उतरेगी वह बिना बघार-मसाले ? फिर सदियों पुरानी रीत है हमारे बुजुगों ने मानी, हम न मानेंगे ?"24
राजनाथ ने दहेज प्रथा का खूब विरोध किया लेकिन उसकी बेटी मिन्ना को दहेज न देने के कारण ससुराल में जलाकर मार दिया जाता है। पति द्वारा कहा जाता है कि स्टोव से जलकर मिन्ना की मृत्यु हो गई। लेकिन असल में राजनाथ की ओर से दहेज न मिलने पर ससुराल वाले उसको जलाकर मार दिया जाता है। राजनाथ के द्वारा दहेज न देने के कारण उसकी बेटी मिन्ना को अपनी जान गंवानी पड़ती है। राजनाथ द्वारा अपनी बेटी की हत्या के ठोस प्रमाण और चश्मदीद गवाह न जुटा पाने के कारण उनका दामाद इस घटना से निर्दोष छूट जाता है।
'कथा सतीसर' उपन्यास में वसंता को भी दहेज प्रथा का सामना करना पड़ता है । इस समस्या का वसंता तीव्र विरोध करती है- "हमारे माता-पिता घर के खिड़की-दरवाजे भी निकालकर हमारे ससुराल वालों को भेज दें, तो भी उन्हें लगेगा कि देने में कंजूसी कर गए। हमारे यहाँ भी बनियों की तरह दहेज प्रथा होती। कम से कम कोई निश्चित रकम तो तय हो पाती ! यहाँ तो दहेज प्रथा नहीं है, बेअंत उम्मीदें हैं। मायके वालों को नेग-शगुन में लड़की को आजीवन कुछ-न-कुछ देना पड़ता है। माँ-बाप के पश्चात भाई-संबंधियों को यह ऋण चुकाना पड़ता है ।"25
दहेज की प्रथा आज सभी समाजों में व्याप्त है। समाज विकसित हो रहा है। लेकिन इस प्रथा का विरोध सुशिक्षित वर्ग द्वारा नहीं हो रहा है। इस दहेज प्रथा की समस्या के कारण कई लड़कियों को जान कुर्बान करनी पड़ती है। चंद्रकान्ता ने दहेज को समर्थन देनेवाले एवं करनेवाले लोगों का विरोध किया है। इस दहेज रूपी दानव को काबू में नहीं किया गया तो वह कितनी ही मासूम लड़कियों को निगल जायेगा। इसे दूर करने के लिए सख्त कानून व्यवस्था बनानी होगी और उसका अमल भी करना होगा ।
अनमेल विवाह की समस्या अधिकांश संयुक्त परिवारों में देखने को मिलती है। भारतीय समाज में लोगों की यह मान्यताएँ रूढ़ हो गई हैं कि पत्नी से पति की उम्र अधिक होनी चाहिए । परिणामस्वरूप अनमेल विवाह का प्रमाण बढ़ता जा रहा है। अनमेल विवाह के कारण पिता की आर्थिक स्थिति, दहेज न दे पाना, लड़की में कोई खामी या खोट, पुरुष का लोभवश कन्या से आकर्षण या फिर सामाजिक रूढ़िगत मान्यताओं के कारण अनमेल विवाह को आज बढ़ावा मिल रहा है। अविकसित समाज में ये समस्या अधिक देखने को मिलती है।
‘अंतिम साक्ष्य' उपन्यास में लेखिका ने अनमेल विवाह की समस्या का चित्रण किया है। मीना के माता-पिता की मृत्यु होने के बाद वह चाचा-चाची के पास रहती है। मीना का विवाह कुछ रुपयों के लालच में पचास साल के लाला रडुवे के साथ करा दिया जाता है। लाला के दो लड़के हैं। वह भी मीना से बड़े हैं। लाला का छोटा बेटा मीना से संबंध रखना चाहता है। लाला मीना पर तरस खाकर उसे वापस चाचा-चाची के पास छोड़ने जाता है। तब वहाँ जाकर गुस्से में चाची से कहता है कि- "मीनू को लौटा रहा हूँ। उसका विवाह कहीं और कर दो । पोती की उम्र की लड़की को घर में न रखूँगा। बिलकुल होश-हवास में हूँ। तुमने लड़की की उम्र बीसेक साल बताई थी। वह तो बारह साल से ऊपर नहीं लगती।"26
'ऐलान गली जिंदा है' उपन्यास की द्वारिका दस साल तक रण्डापा भोगने के बाद सोलह वर्षीय कुँवारी शांता से विवाह करने का निश्चय करते हैं। शांता को घर में सास बनाकर लाते हैं और शांता पति की सेवा करती है।
'कथा सतीसर' उपन्यास में तुलसी का विवाह पचास साल के बूढ़े के साथ कराया जाता है। विवाह के विषय में कात्या तुलसी से प्रश्न पूछती है कि इस विवाह से तू खुश नहीं लग रही है ? तब तुलसी दर्द भरे स्वर में कहती है- "मैं क्या खुश होऊँगी कात्या वह बुड्डा है। पहली बीवी मर गई है, उसके दो बच्चे हैं। बड़ा वाला तो मेरी उम्र का होगा ।"27
आर्थिक रूप से संपन्न न होने के कारण एवं पिता द्वारा दहेज न दे पाने के कारण उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग का फायदा उठाते हैं। अपनी जरूरतें पूर्ण करने के कारण कई ऐसी लड़कियों से विवाह करते हैं जिनके कारण अनमेल विवाह को गति मिलती है। जिसे चंद्रकान्ता ने उपन्यासों में प्रस्तुत किया है ।
विवाह के पश्चात् अगर पति-पत्नी के बीच में प्रेम का अभाव तथा आपसी मन-मुटाव होता है, तो उनके सफल दाम्पत्य जीवन में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है। दाम्पत्य-जीवन की समस्या समकालीन समय में अधिक देखने को मिलती है। चंद्रकान्ता ने उपन्यासों में इस समस्या का निरूपण किया है जो इस प्रकार है।
'अर्थान्तर' उपन्यास में कम्मो अपने पति विजय और अपनी बहन के अवैध संबंधों को विवाह की पहली रात में देख लेती है, जिसके कारण वह तनाव में रहती है। कॉलेज में सहअध्यापक सत्य की ओर आकर्षित होती है। पति से प्रेम न मिलने पर प्रशांत की ओर आकृष्ट होती है, लेकिन प्रशांत उसे छोड़कर चला जाता है। दाम्पत्य संबंध के प्रारंभ में पति द्वारा विश्वास टूटने पर और विजय के अपने बिजनेस में अधिक कार्यरत रहने के कारण दोनों के संबंधों में अंतर आ जाता है। विजय उसे आवश्यकता अनुसार संबंध रखता है, जिसके कारण कम्मो तनावग्रस्त जीवन-यापन करती है। दोनों का संबंध मात्र नाम का रह जाता है जो एक दूसरे के पास होकर भी दूर होते महसूस करते हैं। दोनों का दाम्पत्य-जीवन टूटने के कगार पर आ जाता है ।
'अंतिम साक्ष्य' उपन्यास में बाऊजी और बीजी का संबंध सुमधुर था। लेकिन बीजी एक बार बाऊजी को मीना की बाँहों में लेटे देख लेती है, तब बीजी टूट जाती हैं। उसके बाद बाऊजी भी तनाब में रहते हैं। इस घटना के बाद बीजी बीमार हो जाती हैं और दोनों के बीच टकराव शुरू हो जाता है। दोनों के दाम्पत्य जीवन में दरार पड़ना शुरू हो जाती है।
'यहाँ वितस्ता बहती है' उपन्यास में राजनाथ की तीन शादियाँ होने पर भी उनको दाम्पत्य सुख की प्राप्ति नहीं होती है। राजनाथ की पहले सुभद्रा से विवाह करते हैं। लेकिन बीमार होने के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है। राजनाथ दूसरी शादी गौरी से करते हैं। उसकी भी अकारण मृत्यु हो जाती है। तब तीसरी शादी देवकी से करते हैं। लेकिन उसकी भी मृत्यु हो जाती है। तीन स्त्रियों से शादी के बंधन में बंधने पर भी राजनाथ को दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त नहीं होता है। लेखिका ने प्रस्तुत उपन्यास में दाम्पत्य जीवन से पीड़ित राजनाथ की इस समस्या को वर्णित किया गया है।
'कथा सतीसर' उपन्यास में विमल और राज्ञा के असफल दाम्पत्य जीवन को लेखिका ने प्रस्तुत किया है। विमल राज्ञा को सिर्फ भोग्या वस्तु समझता है। वह राज्ञा से इच्छा के विरुद्ध शरीर संबंध रखता है। वह उस पर बलात्कार करता है, जिसके कारण बेटी के रहते हुए पति से अलग होने का निर्णय लेती और दोनों का दाम्पत्य जीवन बिखर जाता है ।
चंद्रकान्ता ने अपने उपन्यासों में दाम्पत्य जीवन की समस्या का वर्णन उपन्यास के पात्रों के माध्यम से किया है जो समकालीन समय की एक विकट समस्या है।
समग्रत: समकालीन लेखिका चन्द्रकांता के उपन्यासों में स्त्री मुक्ति के सवालों को मुखर रूप से उठाया गया है। उनके उपन्यासों की स्त्री पात्र पुरुषसत्तात्मक सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था में अपनी पहचान के लिए अनवरत संघर्ष करती नजर आती हैं। ये स्त्रियां स्त्री- संबंधी परंपरागत खाँचे को तोड़कर अपनी अस्मिता को तलाश करती हैं।
संदर्भ ग्रंथ- सूची :
मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती, 2004, पृ.36
2. छिन्नमस्ता, प्रभा खेतान 2004, पृ. 170-171
3. एक पत्नी के नोट्स, ममता कालिया, 2003, पृ. 16
4. दिलोदानिश, कृष्णा सोबती - 1999, पृ. 35
5. छिन्नमस्ता, प्रभा खेतान - 2004, पृ.145
6. डार से बिछुड़ी, कृष्णा सोबती, 2001, पृ.17
7. सूरजमुखी अन्धेरे के, कृष्णा सोबती -2004, पृ.17
8. आवां, 2005, चित्रा मुद्गल, पृ.303
9. आवां, चित्रा मुद्गल, 2005, पृ.372
10. छिन्नमस्ता, प्रभा खेतान, 2004, पृ. 120
11. कठगुलाब,मृदुला गर्ग, 2004, पृ.22
12. ऐ लड़की,कृष्णा सोबती, 2001, पृ.65
13. ऐ लड़की, कृष्णा सोबती, 2001, पृ.65
14. चाक, मैत्रेयी पुष्पा, 1999, पृ.10
15. आवां, चित्रा मुद्गल -2005, पृ. 112
16. समय सरगम, कृष्णा सोबती, 2001, पृ. 127
17. हिंदी साहित्य में नारीः विविध संदर्भ- डॉ. रमेश, नारायण, पृ. 14
18. बाकी सब खैरियत है- चन्द्रकान्ता, पृ, 103
19. अंतिम साक्ष्य- चंद्रकान्ता, पृ. 9
20. अर्थातर- चंद्रकान्ता, पृ. 27
21. अपने-अपने कोणार्क- चंद्रकान्ता, पृ. 70
22. कथा सतीसर- चंद्रकान्ता, पृ. 118
23. अपने-अपने कोणार्क -चंद्रकान्ता, पृ. 47
24. यहाँ वितस्ता बहती है- चंद्रकान्ता, पृ. 47-48
25. कथा सतीसर- चंद्रकान्ता, पृ. 142
26. अंतिम साक्ष्य- चंद्रकान्ता, पृ. 10
27. कथा सतीसर- चंद्रकान्ता, पृ. 142
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