कोसी डायन नहीं, ममतामयी माँ है!

 कोसी डायन नहीं, ममतामयी माँ है! 


             घर से भागा हुआ सिद्धार्थ,जब बारह वर्ष के बाद 'सत्य' की खोजकर भिक्षाटन के लिए अपनी पत्नी यशोधरा के समक्ष उपस्थित हुआ तो यशोधरा ने उसे भगोड़ा कहा, कायर कहा और घर छोड़कर चले जाने का आरोप लगाते हुए अनेक तरह के उपालंभ दिये। सिद्धार्थ सब कुछ सुनता रहा, सहता रहा और अंत में केवल इतना कहा कि, 'देवी तुम्हें बारह साल पहले जो छोड़कर गया था, वह 'सिद्धार्थ' था और आज जो तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत है, वह 'बुद्ध' है।' यह सुनकर यशोधरा नतमस्तक हो गई और उन्होंने भिक्षा में पुत्र 'राहुल' को देकर अपनी श्रेष्ठता का परिचय दिया। इस कथा का मूल भाव यही है कि सिद्धार्थ की गलती का बदला बुद्ध से नहीं लिया जा सकता।

           ठीक इसी प्रकार हिमालय के हृदय से निकलने वाली 'सप्तकोशिका' में सबसे प्रचंड रूप में प्रवाहित होने वाली 'कोसी' नदी आज बुद्धत्व को धारण करने के बाद भी एक गुनाहगार की भाँति कटघरे में खड़ी हैं। कोई उसे 'बिहार का शोक' कहता है तो कोई 'डायन' कहकर अपमानित करता है। जिस प्रकार सवर्णों के नाम पर लोग केवल 'ब्राह्मण' पर ही लांछन लगाते आ रहे हैं, ठीक उसी प्रकार सप्तकोशिका के नाम पर कोसी ही लांछित होती रही हैं।

            यद्यपि कोसी नदी का अतीत अत्यंत भयावह रहा हो, उसने लाखों ज़िन्दगी बरबाद किया हो, हजारों परिवार को बेघर किया हो, लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन को निगल गयी हों, परन्तु आज दस मास तक दो तटबंधों के बीच प्रवाहमान कोसी ने अवश्य 'संबोधि' को प्राप्त कर लिया है। जिस प्रकार बुद्ध बरसात के मौसम में दो माह के लिये अपने शिष्यों के साथ बस्ती में प्रवेश कर जाते थे, ठीक उसी प्रकार कोसी भी केवल बरसात के दो महीने गुजारने के लिए मानव बस्ती में प्रवेश करती हैं।

           आज कोसी डायन नहीं, ममतामयी मां के रूप में वात्सल्य भाव से लबालब हैं। जल के लिए तरसती हुई भूमि आज माता के आगमन से तृप्त जाती है। इससे धरती की उर्वरा -शक्ति बढ़ जाती है। अब कोसी के गर्भ में रहने वाले जन-समुदाय हर वर्ष पूस की पूर्णिमा के दिन मगरमच्छ पर सवार कोसी माता की प्रतिमा बनाकर भय से नहीं श्रद्धा से पूजते हैं। बाढ़ आने पर स्त्रियाँ पूरे दिन का उपवास रखकर शाम के समय जल में दीप प्रवाहित कर माता का स्वागत करती हैं और हर वर्ष आने के लिए निमंत्रित करती हैं।

           पूरी दुनिया जहाँ भू-तापन की समस्या पर विमर्श कर रही है। कोसी के किनारे बसने वाले लोग इससे बेखबर मस्त होकर आल्हा तथा कारू खिरहर का भक्ति-गीत गा रहे हैं। जहाँ अन्य राज्य के किसान सुखाड़ की समस्या से त्रस्त होकर आत्महत्या कर रहे हैं, वहीं कोसी के गर्भ में बसने वाले किसान नदी में बोरिंग लगाकर धरा की प्यास बुझाकर खेतों से सोना ऊपजा रहे हैं।

        बिहार का शोक कही जानेवाली कोसी अब बिहारवासियों के लिए वरदान सिद्ध हो रही है। कोसी नदी के किनारे जो सफेद रंग का झकझक बालू दिखता है। याद रहे कि वह बंजर भूमि नहीं है। वह फूट, तरबूूज, ककड़ी, खीरा, परबल तथा अल्हुआ के लिए उपयुक्त उपजाऊ भूमि है। वहाँ केे किसानों के लिए यही 'नकदी' फसल है। कोसी के किनारे कास और पटेर बिना किसी खाद और बिना किसी बीज केे उपजते हैं, जिससे पशुुओं को आसानी से चारा मिल जाता है। इसी कास-पटेर से वहाँ के लोग अपने घर पर छप्पर डालते हैं। अतएव, यह कई रूपों में उपयोगी है।

         कोसी नदी से निकाला गया बालू का उपयोग मकान बनाने में किया जाता है, जिसके कारण अब यह व्ययापार का बड़ा रूप ले लिया है। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह बिना पूूँजी का व्यापार है। माता कोसी हर वर्ष खोदी गई जमीन को बाढ के समय भरकर बराबर कर देेती हैं।

           कोसी क्षेेत्र में धान की खेती व्यापक स्तर पर होती है।अब धान की कुछ ऐसी किस्में भी विकसित हो गयी हैं, जो निचली भूमि में जहाँ दो- तीन महीने पानी का जमाव रहता, वहाँ लगायी जाती हैं। गेहूं, मूंंग, चना, आलू, मटर, धनिया, सरसों, गोट, गन्ना, अलसी, बैगन, गोभी, पालक, मैथी, मंगरैैल, कद्दू, कदीमा, करैला, आदी, लहसुन और पटसन इस क्षेत्र की मुुख्य फसलें हैं।

         विरल आबादी और पर्याप्त उपजाऊ भूमि की उपलब्धता के कारण कृृृषि तथा पशुपालन यहाँ का मुख्य व्यवसाय है। गाय और भैंस की अधिकता के कारण यहाँ दूूध की नदियां बहती हैं। दही, घी, पनीर और मक्खन यहां सबसे सस्ता है। 

          सरकारी योजनाओं से बेखबर यहाँ के वासी आत्मनिर्भर और अपनी दुनिया में मस्त हैं। हर साल बाढ़ आने के कारण यहाँ सड़कें नहीं हैं, बिजली नहीं है। यातायात एवं संचार की आधुनिक सुविधाएं नहीं हैं। यहाँ आज भी बैलगाड़ी और भैंसागाड़ी की सवारी होती है, जो यहाँ के लोगों को जमीन सेे जोड़ कर रखती है।

          बहरहाल, कोसी क्षेत्र में बसने वाले लोगों के लिए अब कोसी मातृ- स्वरूपा है। इसेे डायन न कहा जाए। कोसी ममतामयी माँ के रूप में यहाँ के वासियों का पालन करती हैं। माता कोसी पूज्य हैं। यह हमारी पहचान है। हमारे संंस्कार का हिस्सा है। माता को पुनीत चरणों में शत-शत नमन!

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             डाॅ. उमेश कुमार शर्मा

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