संकाय- मानविकी विषय- हिन्दी
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के पी-एच.डी. (हिन्दी) नामांकन के निमित्त प्रस्तावित शोध-प्रबंध की
रूप-रेखा (2026)
शोध- विषय : “उषाकिरण खान के उपन्यासों में संवेदना और शिल्प”
अध्ययन की समस्या :
लेखक जब तक लेखक है, केवल दर्शाता है, करता नहीं। जब वह करने लगता है तो उसकी क्रिया ही काव्य बन जाती है। क्रिया से काव्य बनने की पूरी प्रक्रिया को उषाकिरण खान के साहित्य-कर्म के अध्ययन से समझा जा सकता है। क्रिया यानी कि 'एक्शन' ही वैयक्तिक अनुभूतियों का सामाजिक अनुभूतियों में रूपान्तरण है। रूपान्तरण की यह प्रक्रिया कई स्तरों-संस्तरों से होकर गुजरती है जिसमें लेखक साहित्य-कर्म के लिए विषय-वस्तु का चयन करता है। उषा जी के यहां उनकी जीवन क्रिया ही साहित्यिक पूर्वपीठिका की निर्मिति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इतिहास से साहित्य तक की यात्रा उनके यहाँ क्रिया का ही बाई प्रोडक्ट है। उषा जी की रचनाधर्मिता लौकिक संवेदना और मनोभावों का जीवन्त इतिहास है। वे लोक के भीतर उपजे सुख-दुःख के बीच प्रसार पाती हैं, जिस कारण उनके साहित्य में लोक की विविध छवियों की अनुगूँज सुनाई पड़ती है। उषाकिरण खान हिन्दी की ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य में आंचलिकता, को पुनर्प्रतिष्ठित किया।
उषाकिरण खान की संवेदना का केन्द्र गाँव है, जहाँ से उनकी चेतना रचना की क्रियाविधि से जुड़ती है। वे लोक का छौंक रचना में डालकर उसकी प्रभावशीलता को अतिमहत्त्वपूर्ण बना देती हैं। उनकी रचना में मनुष्यता को बचाने की ललक और समकालीन आचार-विचार को बूझने की उत्कंठा समान भाव से संचित है। उनकी रचनाएँ बहुआयामी जीवन को निष्कवच और मुक्त भाव से व्यक्त करते हुए आकार ग्रहण करती हैं। उषा जी के सम्पूर्ण रचना संसार में लौकिक भाव अपने मौलिक रूप में मौजूद रहता है, जिससे यह जाहिर होता है कि लेखिका के यहाँ परम्परा का तत्व गौण नहीं है। कथा-साहित्य की अध्येता उषाकिरण खान की पूरी साहित्यिक यात्रा लोक से लोक तक की है। वह कबीर, नागार्जुन और विद्यानिवास मिश्र की परम्परा से जुड़कर 'लोक-संस्कृति' का आख्यान गढ़ती है। उषा जी की लोक-दृष्टि के सहारे उनके रचना संसार को अनेक कोणों से देखने की दृष्टि मिलती है।
हाल में प्रकाशित उपन्यास 'गई झुलनी टूट' में ग्रामीण लोक के बनते-बिगड़ते सम्बन्ध, नारी-मन की व्यथा और पंचायतीराज के ताने-बाने का रेखांकन है। उपन्यास का सम्पूर्ण वातावरण ग्रामीण चित्रों और संवेदनाओं के विलयन से तैयार है। अपने अतीत, इतिहास, मिथक और ग्रामीण जीवन को उकेरता यह उपन्यास सूक्ष्म मानवीय स्पन्दनों की व्यथा का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में स्त्री-चेतना का स्वर तीखा है। उपन्यास के सभी स्त्री पात्र अपने अस्मितागत मूल्यों को जीना चाहते हैं। यह मूल्य ही इस उपन्यास को स्त्री-विमर्श के खाँचे से बाहर निकालकर मनुष्यता के मानवीय सरोकारों से जोड़ता है। उषा जी रेणु की परम्परा को समृद्ध करती हैं। ग्रामीण राजनीति का जीवन्त वर्णन मानो ऐसा है जैसा कि प्रेमचन्द या रेणु के उपन्यास में देखने को मिलता है। यह उपन्यास ग्रामीण समाज के भीतर बन रहे बिम्बों का यथार्थ अंकन है, जहाँ से हम भारतीय ग्रामीण परिवेश की गतिशीलता को समझ सकते हैं।
ज्ञान संवर्द्धन के सभी अनुशासनों का साहित्य में रूपांकन उषाकिरण खान के रचना-कर्म का शगल है। उषा जी साहित्यिक विधा के सहारे इतिहास, धर्म, दर्शन और विज्ञान की सभी शाखाओं से पाठक को परिचित कराती हैं। वे कथ्य और शिल्प के चयन में बहुत सावधानी बरतती हैं, जिसके कारण उनकी रचनाधर्मिता का विश्लेषण सम्पूर्णता में ही सम्भव हो पाता है। भामती' उषा जी का अप्रतिम उपन्यास है। वे भामती को केन्द्र में स्थापित कर मिथिला के लोकजीवन, इतिहास, क्षेत्रीय विशेषताओं, सामाजिक-राजनैतिक जीवन के साथ ही सम्पूर्ण सांस्कृतिक विरासत को उद्घाटित करती हैं। भामती के नायक वाचस्पति मिश्र सनातन और सातत्य के प्रतीक हैं, जो परिवर्तन के स्थान पर एक धुरी की तरह अटल हैं। उषा जी भामती के सहारे नारी मन की व्यथा को संकेतित करती हैं। वे नारी-विमर्श की आधुनिक स्थापना को निरूपित नहीं करती बल्कि प्राचीन मैथिल समाज में स्त्रियों की दशा और दिशा को लेकर प्रश्न पूछती हैं। वाचस्पति ने अठारह वर्ष के कठिन श्रम और एकांकिक अध्ययन के पश्चात् 'शंकर भाष्य पुस्तिका पूर्ण की, तदुपरान्त पत्नी-प्रेम के प्रतिदान में पुस्तिका का नामकरण भामती रखा गया। इस सम्पूर्ण प्रकरण में स्त्री के दैहिक-विमर्श से इतर उच्च साहित्यिक विमर्श का प्रतिपादन है। यह उपन्यास ऐतिहासिक आख्यान रचकर उस काल की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों का लेखा-जोखा है। गोया कि उसमें सन्निहित मूल्य-प्रतिमान, आदर्श और सामाजिक चेतना उपस्थित हैं।
उषाकिरण खान की रचनाधर्मिता लौकिक मनोभावों का आख्यान रचती हैं। लौकिक संवेदना यथार्थ की कड़ी धूप से निःसृत है। मिथिला ही उनके लिए यथार्थ भूमि है जहाँ की सांस्कृतिक विरासत के साथ वे पली-बढ़ीं हैं। मिथिला की संस्कृति का रूपांकन उनके कथा-संसार के लिए प्रिय है, जिसके सहारे वे सृजन कर्म में अवतरित होती हैं। 'सिरजनहार' उपन्यास मिथिला की उसी सांस्कृतिक विरासत का आधुनिक भावबोध के साथ प्रस्तुतीकरण है। यह ऐतिहासिक जीवनीपरक उपन्यास विद्यापति के जीवन-वृत्त, जीवन संघर्ष और जीवन-द्वन्द्व की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है। विद्यापति के जीवन चरित्र को केन्द्र में रखकर मैथिली की संस्कृति के विभिन्न अंगों-उपांगों का वर्णन है। सृजन एक खोज है, व्यक्ति कभी अपने जीवन सन्दर्भों को खोजता है तो कहीं यह एक अन्तहीन प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत होता है। उषा जी ने 'सिरजनहार' में विद्यापति को सम्पूर्णता से खोजने का प्रयास किया है, क्योंकि लेखिका का लगाव उसी मिथिला की भूमि से है, जहाँ के विद्यापति है। विद्यापति इस उपन्यास के केन्द्रीय पात्र हैं, जिसके इर्द-गिर्द पूरी मिथिला की संस्कृति जीवन्त हो उठती है। 'निजभाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल उक्त वाक्य भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की आवाज है, उसी आवाज की अनुगूँज विद्यापति के लेखन में भी प्रतिध्वनित होती है। यह उपन्यास लोकभाषा के प्रति विद्यापति के वैचारिक आग्रह का प्रस्थान विन्दु है। साथ ही लोक उत्सवों में थर्ड जेंडर की सहभागिता का रेखांकन उस समाज के प्रति सम्मान और आदर भाव का द्योतक है। लेखिका ने इस उपन्यास में विद्यापति के जीवन-चरित्र को बड़े कैनवास पर उकेरा है, जहाँ से मैथिल समाज की सामाजिक-आर्थिक संरचना के साथ ही सांस्कृतिक वैशिष्ट्य की झलक मिल जाती है।
उषा जी प्रकृति चेतना से सम्पन्न कथाकार हैं। उनके यहाँ प्रकृति के प्रति लगाव और प्रकृति तथा मानव जीवन के कोमल और सरस पक्ष के प्रति आग्रह समान रूप से अंकित है। मानवीय संवेदनाओं का प्रकृति के प्रति साहचर्यजन्य प्रेम का रूपक है। फागुन के बाद उपन्यास। 'फागुन के बाद' में प्रकृति निर्जीव जड़वस्तु होकर एक साकार और सजीव सत्ता के रूप में उपस्थित हुई है। फागुन का महीना उल्लास और उत्सव का प्रतीक है। इस महीने में प्रकृति का यौवन अपने चरम उत्कर्ष पर होता है। लेखिका ने उपन्यास में मौसम में बदलाव के साथ मानवीय जीवन के बदलते घटनाक्रम को विस्तृत और वैचारिक आग्रह के साथ प्रस्तुत किया है। 'फागुन के बाद' की ही स्थितियाँ जीवन में ज्यादातर बनी रहती हैं। और अगर उसमें धैर्य के साथ मनोयोगपूर्वक, दृढ़ प्रतिज्ञ होकर संघर्ष किया जाये तभी 'फागुन' की पुनर्वापसी सम्भव है। उक्त उपन्यास मौसम के परिवर्तित रूप के साथ ही मानवीय चेतना में परिवर्तनशीलता का आख्यान है।)
साहित्य और इतिहास एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं है बल्कि पूरक हैं। साहित्य का एक गहरा ऐतिहासिक पक्ष होता है तो दूसरा राजनीतिक पक्ष भी। उषा जी का उपन्यास 'अगन हिंडोली' इन्हीं दो पक्षों का समेकित प्रयास है। वे इतिहास की अध्येता रही हैं परन्तु लेखन साहित्यिक विधा में करती हैं। साहित्य और इतिहास का एक गहरा सम्बन्ध है, जिसके माध्यम से सामाजिक मनोवृत्तियों का चित्रण सम्भव हो सका है। 'अगन हिंडोला' सूरी साम्राज्य के संस्थापक शेरशाह को केन्द्रविन्दु में रखकर लिखा गया उपन्यास है। इसके माध्यम से मध्यकालीन भारतीय समाज की संरचना, आर्थिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक पक्ष को उद्घाटित किया गया है। उपन्यास का शीर्षक कई पक्षों को एक साथ उद्घाटित करता है। शेरशाह का ताज कंटकाकीर्ण राहों का सच है, लेखिका ने इन राहों के सहारे भारतीय जीवन-धारा को रेखांकित किया है। शिल्प पक्ष किसी भी कथा के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। 'अगन हिंडोला' में शिल्प पक्ष बेजोड़ है। कथा की प्रवाहमयता में भाषा कहीं बाधक नहीं है बल्कि उसकी अन्विति को बनाये रखती है। यह उपन्यास अपने सम्पूर्ण कलेवर में कालजयी है। मानो मुगल शासन में ही नहीं सूरी राजवंश की भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में भी प्रासंगिकता है। लेखिका ने शेरशाह के जीवन-वृत्त के रेखांकन के बहाने मध्यकालीन भारतीय संस्कृति के अंकन का प्रयास किया है। यहाँ भी लेखिका का संस्कृति के प्रति लोभ-संवरण दृष्टिगत होता है, जिसकी वजह से उनके यहाँ संपूर्ण कथाभूमि लोक से संपृक्त जान पड़ती है।
राजनीति उषा जी के कथा-संसार का प्रमुख अवयव है। चाहे उपन्यास के विषय-वस्तु के सन्दर्भ सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक ही क्यों न हो, उसके कथातत्त्व में राजनीति का हिस्सा प्रमुख हो जाता है। गोया कि उषा जी राजनैतिक चेतना सम्पन्न कलाकार हैं, प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में सक्रिय नहीं है परन्तु परोक्ष रूप से सीधा सरोकार रखती हैं। लेखिका की राजनैतिक सक्रियता ही कथा बुनने की प्रक्रिया में राजनैतिक पक्षधरता को उजागर करती है। राजनैतिक सक्रियता जीवन्तता का प्रतीक है, जहाँ से जीवन के सभी पहलुओं को समग्रता से देखा जाता है। रतनारे नयन' उपन्यास राजनीति के इन्हीं अर्थ-बिम्बों को चित्रित करता है। बिहार के राजनैतिक परिदृश्य पर केन्द्रित यह उपन्यास जे.पी. आन्दोलन के बाद की स्थितियों का लेखा-जोखा है। लेखिका का कथा-संसार बिहार की सामाजिक-राजनैतिक परिवेश की उपज है। चुनाँचे उनकी रचनाओं का ताना-बाना इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका ने बिहार राज्य में राजनैतिक सक्रियता को दर्शाने का काम किया है। आर्थिक रूप से विपन्न राज्य भी अपनी राजनैतिक सूझ-बूझ की वजह से हमेशा राष्ट्रीय परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण बना रहा है। आजादी के बाद लगभग सभी राजनैतिक आन्दोलन की भूमि विहार ही रही है। उषा जी अपने जीवन-संसार को कथा में पिरोती हैं, जिसे व्यापकता में समझने की जरूरत है। उपन्यास केवल राजनैतिक सक्रियता का अंकन प्रस्तुत नहीं करता बल्कि स्त्री-विमर्श के लिए नये प्रवेश द्वार खोलता है। बिहार की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं को रेखांकित करता यह उपन्यास अनमेल विवाह, प्रेम-विवाह और विजातीय विवाह जैसे अनसुलझे प्रश्नों की भी विवेचना प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास स्त्री-दृष्टि से भी पाठ की मांग करता है। क्योंकि लेखिका की घोषणा 'यह सदी मातृशक्ति की सदी है' केवल घोषणा भर नहीं, बल्कि समाज में हो रहे परिवर्तनों के प्रति विश्वास और आस्था का बोध है। यह उपन्यास उषा जी के जीवन कर्मों का साहित्यिक रूपान्तरण है। उस पीठिका के आधार पर बिहार में हो रहे बदलावों का आकलन भविष्य निर्माण के लिए कर सकते हैं।
रचनात्मक द्वन्द्व पाठ के लिए वैचारिकी का रसायन है। लेखक द्वन्द्व का सृजन केवल रचनात्मक स्तर पर नहीं करता बल्कि जीवन की सम्पूर्णता से उस अनुभव को रचना में पिरोता है। रचना वैचारिक आग्रह के आश्रय में आकार लेती है, जब लेखकीय स्तर पर द्वन्द्व कमजोर होता है, तो उसकी सामाजिक उपादेयता भी कम हो जाती है। उषा जी के लेखन में रचनात्मक स्तर पर द्वन्द्व का अभाव नहीं है, परन्तु कथा तत्व में यह दिखता है। मानो उषा जी का जीवन ही द्वन्द्व से उपजा है, जो कि रचना के स्तर पर विलयन बन जाता है। 'सीमांत कथा' उपन्यास इन्हीं मूल्यों और आदर्शों को समेकित करने का मुकम्मल प्रयास है। इस उपन्यास के पात्र वामपंथ और गांधीवाद के वैचारिक आयामों के प्रतिनिधि हैं। उपन्यास के नायक इन्हीं दर्शनों के मूल्यों को समाज में रूपायित करने के लिए प्रयासरत हैं। लेखिका ने बिहार की कथा-भूमि को जे.पी. आन्दोलन के बाद के परिदृश्य के साथ साकार किया है। उस समय की परिस्थितियों से निष्पन्न यह कथा-संसार जातीय हिंसा, वर्ग-संघर्ष और राजनैतिक आन्दोलन की पृष्ठभूमि को दिखाता है। 'सीमांत कथा' विहार की सामाजिक-राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्षों को सम्पूर्णता के साथ चित्रित करता है।
उषाकिरण खान की कहानियाँ संवेदनात्मक ज्ञान का सहज विस्तार हैं। बहुत ही सहजता के साथ उषा जी कहानियाँ बुनते समय यथार्थ की अतल गहराइयों में झाँकने का प्रयास करती हैं। उनकी कहानियाँ यथार्थवादी जीवन के कलात्मक अनुभवों के साथ अनुस्यूत हैं। उनकी कहानियों का फलक बहुत ही व्यापक है, जहाँ से गुजरने के बाद लगातार अनुभव होता है कि हम संवेदनाओं, रिश्तों, स्मृतियों और लोकानुभवों की अपार-अथाह दुनिया में आकर ठिठक गये हैं। उनकी कहानियाँ जीवन के अन्तर्विरोधों से होकर गुजरती मानवीय संवेदना की जाँच-पड़ताल करती एक सशक्त आख्यान हैं। उनकी कहानियों का फ्रेमवर्क एक खास किस्म की पीड़ा, दर्द और तनाव को समेटे हुए हैं, जिस कारण कथा-पात्र के जीवन की सूक्ष्म भावनाएँ यथार्थ से निःसृत मालूम पड़ती हैं। उनकी कथा की संरचनाएँ बहुआयामी और उत्सवधर्मी जीवन को निष्कवच और मुक्त भाव से व्यक्त करते हुए आज भी जीवन्त हैं। ऐसे महत्वपूर्ण उपन्यास लेखिका के उपन्यासों में निहित संवेदना और शिल्प का उद्घाटन अबतक नहीं हो सका है। अतएव, प्रस्तावित विषय पर शोध अपेक्षित है।
अध्ययन का औचित्य :
समकालीन लेखिका उषाकिरण खान के व्यक्तित्व और कृतित्व को आधार बनाकर देश के अनेक विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हो चुके हैं और हो रहे हैं, परंतु उनके उपन्यासों में निहित संवेदना के विविध रूप तथा शिल्पगत वैशिष्ट्य पर विचार- विमर्श करना शेष है। ऐसी स्थिति में प्रस्तावित विषय- ‘उषाकिरण खान के उपन्यासों में संवेदना और शिल्प’ प्रस्तावित शोध करना अपने औचित्य रखता है।
मीमांसात्मक सिद्धान्त :
प्रस्तावित शोध-प्रबंध में उषाकिरण खान के उपन्यासों में निहित संवेदना और शिल्प का उद्घाटन किया जाएगा। इस हेतु उनके सभी मौलिक उपन्यासों का गहन अध्ययन किया जाएगा। अध्ययन के दौरान उनके उपन्यासों पर प्रकाशित समीक्षात्मक ग्रंथों पर भी विचार किया जाएगा। अध्ययन से प्राप्त शोधोपयोगी सामग्रियों का संचयन किया जाएगा तथा उन सामग्रियों का मीमांसात्मक विश्लेषण कर निष्कर्ष तक पहुंचने की चेष्टा की जाएगी।
परिकल्पना :
‘उषाकिरण खान के उपन्यासों में संवेदना और शिल्प’ के माध्यम से समकालीन उपन्यास लेखिकाओं में उषाकिरण खान का स्थान निर्धारण करना, लेखिका के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय देना, उनके उपन्यास-साहित्य की समीक्षात्मक अध्ययन करना, उपन्यासों में निहित संवेदनात्मक संदर्भों का उद्घाटन करना तथा उनके शिल्प-विधान को उजागर करना ही परिकल्पना में शामिल है।
अध्ययन- प्रविधि :
प्रस्तावित शोध-प्रबंध में शोध की आगमन-निगमन प्रविधि का उपयोग किया जाएगा। शोधोपयोगी सामग्री संचयन हेतु लेखिका के औपन्यासिक कृतियों, आलोचनात्मक दृष्टिकोणों के साथ-साथ विषय से संबंधित आलोचना की पुस्तकों का उपयोग किया जाएगा। शोध के क्रम में लेखिका उषाकिरण खान से संबंधित विद्वानों से साक्षात्कार द्वारा विचार संगृहीत करने का प्रयास किया जाएगा। तदुपरान्त संचित सामग्रियों के विश्लेषण से निष्कर्ष तक पहुँचा जा सकेगा।
7. सूचनाओं का स्रोत :
प्रस्तावित शोध-प्रबंध अपना उपजीव्य सामग्री उषाकिरण खान रचित सभी मौलिक उपन्यासों से प्राप्त करेगा, जो निम्नवत् है :
गई झूलनी टूट : उषाकिरण खान
भामती : उषाकिरण खान
सिरजनहार : उषाकिरण खान
अगन हिंडोला : उषाकिरण खान
फागुन के बाद : उषाकिरण खान
सीमांत कथा : उषाकिरण खान
रतनारे नयन : उषाकिरण खान
शोध- प्रबंध का प्रारूप :
प्रस्तावित अध्याय :
प्रस्तावना / भूमिका
प्रथम अध्याय : उषाकिरण खान : व्यक्तित्व और कृतित्व
द्वितीय अध्याय : समकालीन महिला उपन्यासकारों में उषाकिरण खान का वैशिष्ट्य
तृतीय अध्याय : उषाकिरण खान के उपन्यासों में स्त्री-जीवन का यथार्थ
चतुर्थ अध्याय : उषाकिरण खान के उपन्यासों में संवेदना के विविध आयाम
पंचम अध्याय : उषाकिरण खान के उपन्यासों में शिल्प-विधान
उपसंहार / निष्कर्ष
परिशिष्ट :
(क) सहायक ग्रंथ सूची :
1. हिन्दी साहित्य और संवेदना- डॉ. पुष्पपाल सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1997ई.
2. हिन्दी उपन्यास का इतिहास- डॉ. गोपाल राय, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2005ई.
3. हिन्दी उपन्यास का विकास- मधुरेश, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012 ई.
4. हिन्दी उपन्यास- सुषमा धवन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1991 ई.
5. हिन्दी उपन्यास- शिवनारायण श्रीवास्तव, सरस्वती मंदिर, वाराणसी, 1951 ई.
6. आधुनिकता और हिन्दी उपन्यास- डॉ० इन्द्रनाथ मदान, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, 1981 ई.
7. आधुनिक हिन्दी कविता : सर्जनात्मक संदर्भ-डॉ० रामदरश मिश्र, इन्दप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली, 1986 ई.
8. आधुनिक हिन्दी साहित्य का विकास- डॉ० श्री कृष्णलाल, हिन्दी परिषद प्रयाग, 1965 ई.
9. आधुनिकता और सृजनशीलता - डॉ० रघुवंश - मैकमिलन प्रकाशन,दिल्ली, 1980 ई.
10. आधुनिक हिन्दी उपन्यास - संपा.- भीष्म साहनी, रामजी मिश्र, भगवती प्रसाद निदारिया, जाकिर हुसैन कॉलेज, दिल्ली, 1975 ई.
11. दलित साहित्य का सौन्दर्यशाख- ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2001 ई.
12. दलित साहित्य का सौन्दर्यशाष - शरण कुमार लिम्बाले, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2005 ई.
13. आधुनिकता के आईने में दलित- संपा०- अभय कुमार दूबे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012 ई.
14. उत्तर आधुनिक साहित्यिक विमर्श - सुधीश पचौरी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001 ई.
(ख) सम्भावित पत्र-पत्रिकाएँ :-
1. आजकल सम्पादक- सीमा ओझा
2. वागर्थ : सम्पादक- शम्भूनाथ
3. कथादेश : संपादक - हरिनारायण
4. आलोचना : संपादक- अरुण कमल
5. नया ज्ञानोदय : सम्पादक- लीलाधर मंडलोई
मैं यह घोषणा करती हूँ कि निर्धारित समय- सीमा में अपना शोध-कार्य संपन्न कर लूंगी।
शोधार्थी का हस्ताक्षर
प्रमाणिक किया जाता है कि शोधार्थी समय- सीमा में अपना शोध-कार्य संपन्न कर लेंगी।
शोध-निर्देशक का हस्ताक्षर
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