'यथार्थ' शब्द दो शब्दों के योग से निर्मित है- 'यथा' और 'अर्थ', जिसका सम्मिलित अर्थ है- जो वस्तु जैसी भी है, उसे उसी रूप में प्रस्तुत करना। यथार्थ का शब्दकोशीय अर्थ है- वास्तविक, निरपेक्ष, खरा, प्रामाणिक, सत्य, विश्वसनीय आदि। यथार्थ को संस्कृत में सत्य, तथ्य, वास्तव आदि शब्दों का पर्याय माना गया है। अंग्रेजी में इसे 'रियलिटी' कहा जाता है। यथार्थ शब्द की संधि करने पर 'यथा + अर्थ' के अनुसार इसके दो अर्थ निकलते हैं- 'यथा' अव्यय है, जिसका हिन्दी में समानार्थी पद है- 'जैसा'। 'अर्थ' के प्रमुख हिन्दी समानार्थी पद हैं- वस्तु, तत्व, द्रव्य, पदार्थ आदि। यथार्थ का सामान्य अर्थ होता है- जैसे होना चाहिए, ठीक वैसा, बाजिब, उचित, सच्चाई, असली इत्यादि। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि जगत में प्रत्यक्ष ज्ञान, वस्तुस्थिति और वास्तविकता ही यथार्थ का प्रतिरूप है। उपर्युक्त सभी तथ्यों का ज्ञान एवं अनुभव इंद्रियों द्वारा किया जाता है, अथवा स्वयं अपने आप देखकर अथवा सुनकर भी हो जाता है। यथार्थ का अर्थ उन स्वानुभूतियों से ग्रहण किया जाता है, जिसको किसी भी प्रकार के दुराव या मोह से अलग होकर स्वीकार किया जा सके।
सामाजिक यथार्थ का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसके अनेक पहलू हैं, पर यहाँ विभूतिनारायण राय के उपन्यासों में अभिव्यक्त पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। इनके उपन्यासों में आज के पारिवारिक जीवन यथार्थ का चित्रण किया गया है। यह विदित है कि हमारे सामाजिक और मानवीय जीवन का आधारभूत चीज परिवार ही होता है। मानव की प्रारंभिक तथा मूलभूत जरूरतों की पूर्ति करने वाले संगठन एवं संस्थाओं में परिवार का स्थान सर्वोपरि है। व्यक्ति का सर्वप्रथम साक्षात्कार अपने परिवार के साथ ही होता है, जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान समय में परिवार में भावनात्मक संबंधों में परिवर्तन हुए हैं। संबंधों में अनेक दरारें भी आई हैं। पिता-पुत्री, पति-पत्नी, माँ-बेटी, माँ-बाप संतान, भाई- भाई, भाई-बहन का प्रेम, आदर व वात्सल्य तथा एक दूसरे में अपनापन परिवार में ही पनपता है। विभूतिनारायण राय ने हमारे परिवार के बदलते जीवन यथार्थ को अपने उपन्यासों में अभिव्यक्ति दी है।
विभूतिनारायण मिश्र के उपन्यास 'घर' में परिवार के लिए संघर्ष करते हुए मुंशजी का सजीव चित्रण किया गया है। वह अपने परिवार के लिए निरंतर संघर्षरत है। वे कलर्क पद से रिटायर होने के बाद भी अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरी करने के लिए कुछ विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ाता है। उपन्यास में दिखाया गया है कि मुंशीजी पेंशन के पैसे को किस प्रकार बचाकर लाते है, ताकि परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके। उपन्यासकार ने लिखा है- "मुंशीजी जेब में पैसे रखकर जल्दी-जल्दी भागना चाहते हैं। अक्सर पैसे मिलने के बाद पेंशन याफ्ता बुड्ढ़े किसी-न-किसी चाय की दुकान पर बैठ जाते हैं। चाय-पकौड़ी के साथ गप्पे लड़ाते हैं। न चाहते हुए भी दो-तीन रूपये खर्च ही जाते हैं। मुंशीजी के लिए दो-तीन रुपये मायने रखते हैं। कनखियों से चारों तरफ देखते हैं। एक दुकान पर धीरे-धीरे लोग इकट्ठे हो रहे हैं। वे लम्बा चक्कर काटकर तेज कदमों से बाहर का रास्ता पकड़ते हैं। एक बार कचहरी के बाहर निकल आने पर फिर वापस भुड़कर नहीं देखते।" (1) एक पिता के रूप में मुंशीजी अपने पुत्र विनोद के आत्मनिर्वासन से आहत है। विनोद एक शिक्षित बेरोजगार है। वह बी.ए. पास है। एम. ए. कराने का सामार्थ्य मुंशीजी में नहीं था। वह सोच रहा था कि विनोद कहीं छोटी-मोटी प्राईवेट नौकरी कर लेगा, तो आगे की पढ़ाई करना सहज हो सकेगा, पंरतु ऐसा कुछ नहीं हो सका।
मुंशीजी के सामने सबसे बड़ी समस्या थी बेटी राजकुमारी का विवाह, जिसकी उम्र निकली जा रही थी। पत्नी तारा के मरने के बाद वही राजकुमारी के लिए माँ और पिता दोनों थे। मुंशीजी के बहाने लेखक ने गरीबी का अत्यंत जीवंत चित्र खींचा है- "चलते- चलते वे मन में हिसाब करते जोते हैं। जब में पंचानवे रुपये हैं। शंकर को डेढ़ सौ से कम क्या देना पड़ेगा। अभी तीन ट्यूशनों से एक सौ बीस रूपये और मिलेगा। कुल हो जाएंगे दो सौ पन्द्रह रुपये। गनीमत है कि मकान मालिक को सिर्फ दस रूपये देने पड़ते हैं। कुल किराया है चालीस रुपये। बाकी तीस रूपयों के एवज में वे उसकी लड़की को एक घंटा रोज पढ़ाते हैं। शंकर का बकाया चुकाने के बाद लगभग पैंतालीस रुपये बचेगा। दूध वाले को तीस रुपये देने के बाद बचे पन्द्रह और अखबार वाले को नौ रूपये देने के बाद छह रुपये बचे जाएंगे। महीने भर के लिए चाय, चीनी, तेल, साबुन, सब्जी वगैरह के लिए कमसे-कम चालीस रुपये चाहिए।" (2)
गरीबी और फटेहाली के कारण मुंशीजी अपनी बेटी राजकुमारी का विवाह समय से नहीं कर पाते हैं। विभूतिनारायण राय के दूसरे उपन्यास 'शहर में कर्फ्यू' में भी पारिवारिक जीवन का यथार्थ सामने आता है। इस उपन्यास में एक मुस्लिम परिवार की सच्चाई को सामने लाया गया है। इस उपन्यास की नायिका साईदा है, जो अपने परिवार की स्थिति को सुधारने के लिए दिन- रात संघर्ष करती है। लेकिन कर्फ्यू ने उसके सामान्य दिनचर्या को कैसे प्रभावित किया, इसका जीवंत वर्णन यहाँ मिलता है। वर्णन दृष्टव्य है- "कर्फ्यू का दूसरा दिन था और सईदा की बेटी पूरी तरह पस्त हो गई थी। अगस्त की गर्मी ने लगातार, बंद कमरे को नर्क में तब्दील कर दिया था। इस नर्क से घिरे औरतों और मदों के जिस्मों की गंध के साथ बच्चों के पाखाने की बदबू भी शरीक हो गई थी। तेरह गुणा पाँच फीट के कमरे और उसके साथ लगे आठ गुणा पाँच फुट के बरामदे में लोग कैद थे। इसमें सईदा, उसका शौहर, उसकी सास और ससुर, उसकी एक बड़ी ननद, दो छोटे देवर ऐसे थे, जिन्हें बड़ा कहा जा सकता है। उसकी ननद का सात साल का लड़का और उसकी दो बेटियाँ। तीन ऐसे प्राणी भी थे, जिनकी गिनती छोटें में हो सकती थी।"(3)
वर्तमान समाज में दाम्पत्य जीवन का आधार बेहद कमजोर हो गया है। पति और पत्नी के बीच वे रिश्ते विकृत हो रहे हैं। इसके लिए कहीं न कहीं पति और पत्नी समान रूप से जिम्मेदार होते हैं। पति और पत्नी एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं। अगर दोनों में सामंजस्य नहीं हो तो परिवार को बिखरने में समय नहीं लगता है। 'शहर मे कफ्यू' नामक उपन्यास में सईदा और उसके पति के बहाने लेखक ने आदर्श दांपत्य जीवन का परिचय दिया है। आदर्श दंपति से ही आदर्श परिवार का निर्माण होता है। साईदा अनेक तरह के कष्टों को झेलती है, पर परिवार को छोड़ती नहीं है। उनके मन में घर और परिवार के प्रति अटूट प्रेम हैं। लेखक लिखता है- "इसी बरामदे में सईदा को विवाहित जीवन का शुरुआती आनंद प्राप्त हुआ। पहली रात को छोड़कर जब उसके सास-ससुर सभी को लेकर बाहर गली में नाले पर सोने चले गए थे, बाकी लगभग रोज ही कोई न कोई कमरे में बना रहता, कभी-कभी तो पूरा कुनवा ही अंदर मौजूद रहता। सर्ददा का पति बरामदे में जीवन पर बिस्तर बिछाकर पड़ा रहता और उतावलेपन के साथ सईदा का इंतजार करता। "(4)
हमारे भारतीय समाज में विवाह किसी न किसी रूप में विद्यमान दिखाई देता है। यूँ कहें तो यह हमारे समाज की एक सामाजिक प्रथा है। विवाह ही परिवार की मूलभूत इकाई हैं। समाज में रहने वाले व्यक्ति को वैवाहिक बंधन में बंधना पड़ता है। इसे भारतीय परंपरा में एक संस्कार भी माना जाता है। इस संदर्भ डॉ. शील प्रभा का मंतव्य है- "विवाह के संदर्भों में अनेक परिवर्तन हुए हैं, और हो रहे हैं। विवाह जो सात जन्मों का साथ माना जाता था, आज समझौता मात्र माना जाने लगा है। विधवा विवाह, प्रेम-विवाह, अंतरजातीय विवाह, बेमेल विवाह को मान्यता मिलने लगी है।" (5)
विभूतिनारायण राय ने अपने उपन्यास- 'शहर में कर्फ्यू में वैवाहिक जीवन के यथार्थ का वर्णन किया है। 'स्त्री के बारे में कहा गया है कि वह सबसे पहले माँ होती है। इसीलिए सईदा हर हाल में अपनी बेटी को बचाना चाहती है। इसीलिए सईदा के कई बार इशारों से और कई बार साफ-साफ बहने के बावजूद उसके मन में बाहर निकलकर लड़कों के लिए दवा लाने के लिए कोई उत्साह नहीं पैदा हुआ। वह सर झुकाकर अपने काम में लगा रहा।'(6) सईदा के पति के लिए मृत्यु एक बहुत सहज किस्म की चीज थी। उसके अपने घर और पड़ोस में हर साल मौत किसी न किसी को अपने जबड़े में कस लेती थी। मरने वालों में अक्सर छोटे बच्चे होते थे। पर अपने बच्चे की मौत में पता नहीं क्या था कि तटस्थता का सारा नाटक करने के बावजूद सईदा की पहली चीख सुनकर वह हिल गया, जिस बेटी को उसने दो साल में मुश्किल से चार-छह बार गोद में लेकर पिता की तरह प्यार किया था, उसके मरने पर वह कुछ देर तक चुपचाप बैठा शून्य की तरफ ताकता रहा है। माँ-बाप की मौजूदगी उसे रोने से रोक रही थी। रोती हुई सईदा जमीन पर सर पटकने की कोशिश कर रही थी। सास और ननद उसे पूरी तरह से जकड़े हुए थीं, लेकिन फिर भी बीच-बीच में उसका सिर दीवाल या फर्श से लग ही जाता। शायद यह अपने बीमार बच्चे के लिए कुछ न कर पाने का अपराधबोध था, जिसने उसे रोने पर विवश कर दिया।
विभूतिनारायण ने आलोच्य उपन्यास में स्पष्ट करना चाहा है कि विवाह ही वह बंधन है, जिसमें बंधकर लोग अनेक तरह के सुख भी प्राप्त करते हैं और दुख भी। परिवार के निर्माण के विवाह अनिवार्य संस्था है। इसी से समाज में एक तरह की व्यवस्था आती है।- काम भावनाओं की तृप्ति के साथ ही सामाज की मर्यादा कायम रहे, विवाह इसके लिए अनिवार्य है। इसी से समाज में सभ्यता एवं नैतिकता का संचार होता है।
हमारा समाज खासकर दो वर्गों में विभाजित दिखाई पड़ता है- एक गरीबी और दूसरा अमीरी में। आज गरीब दिनानुदिन गरीब होता चला जा रहा है और अमीर अमीर बनता जा रहा है। इसलिए कहते हैं कि भारत देश में दो भारत बसते हैं। एक गरीबों का और दूसरा अमीरों का सही मायनों में देश में गरीबी, भुखमरी आदि समस्याओं के चलते गरीब अपनी प्रगति नहीं कर पाता। गरीबी की वजह से वह अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते। पैसे के अभाव में वह अच्छे कपड़े, अच्छा भोजन तक नहीं कर सकते, तो अमीर अपनी अमीरी के चलते देश में ही नहीं, बल्कि विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उनका रहन-सहन उच्च और प्रगतिशील दिखाई पड़ता है, इसका चित्रण विभूतिनारायण राय ने अपने उपन्यासों में बखूबी किया है। उनके दो उपन्यासों में गरीबी का यथार्थ चित्रण हुआ है- 'घर तथा 'शहर में कर्फ्यू' में।
'घर' नामक उपन्यास में मुंशीजी की गरीबी का वर्णन करते हुए उपन्यासककार लिखते है- "जाड़ा हालाँकि अभी पूरती तरह से आक्रमण नहीं हुआ है, लेकिन जल्दी ही काफी तेजी पकड़ लेगा। मुंशीजी पिछले कई सालों की तरह इस बार भी नई रजाई बनवाने का फैसला करते हैं। नौकरी के दिनों की बनवाई तीन रजाईयाँ घर में थीं। जब तक पप्पू छोटा था। राजकुमारी के साथ एक रजाई में उसका सोना अटपटा नहीं लगता था, लेकिन अब दोनों को एक ही रजाई में सोते देखकर मुंशीजी को घबराहट होने लगती है। इस बार जरूर बनवा लेंगे। मन-ही मन वे हिसाब लगाते हैं। पचास साठ में काम लायक रजाई बन सकती है। अगर दूध लेना दो महीने बन्द कर दे तो रजाई बन जाएगा। लेकिन दूध बंद करवा पाना क्या इतना आसान है? मुंशीजी चाय के पुराने शौकीन रहे हैं। जिंदगी में इसके सिवा कोई शौक भी तो नहीं किया उन्होंने। फिर बच्चों को सुबह चाय के सिवा और देते भी क्या हैं। इसे भी बंद कर देने से कैसे चलेगा.. अखबार वे कई बार बंद कर चुके हैं।"(7)
गरीबी मानव जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। जहाँ मनुष्य दिन-रात खटने के बावजूद अपने लिए, अपने परिवार के लिए रोटी, कपड़ा, मकान तथा दवा- पानी का इंतजाम नहीं कर पाते हैं। हिन्दी उपन्यासों में अनेक रचनाकारों ने गरीबी का जीवंत चित्र खींचा है। विभूतिनारायण राय ने अपने दूसरे उपन्यास 'शहर में कर्फ्यू' में एक मुस्लिम परिवार की दीनता का उल्लेख किया है। उपन्यास की नायिक साईदा है, जिसकी बेटी ईलाज के अभाव में मरी है और वह कुछ न कर सकी। उपन्यास में लिखा गया है- "आज यह बिटिया मर रही थी। जीवन का सबसे बड़ा दुख माँ की गोद में उसके बच्चे की मौत है। सईदा का पोर-पोर माँ बन गया था और विलाप कर रहा था। उसकी एक कमजोर और दरिद्र बेटी उसकी आँखों के सामने मर रही थी और कुछ न कर पाने का अससास उसे बुरी तरह साल रहा था। उसे गर्दन झुकसए निर्विकार भाव से बीड़ी बनाता हुआ अपना पति किसी क्रूर राक्षस की तरह लग रहा था। कई बार उसके मन में आया कि चीख-चीखकर कमरे के सत्न्नाटे को तोड़ डाले और पत्थर की तरह कठोर और संवेदनशून्य अपने पति का सीना अपने पैने नाखूनों से छलनी कर डालें। "(8)
गरीबी की त्रासद स्थिति के साथ ही लेखक ने अमीरी और उससे उत्पन्न एय्याशी का जीवंत चित्रण किया है। 'किस्सा लोकतंत्र' नामक उपन्यास में पी.पी. यादव के माध्यम से लेखक ने अमीरी और एय्यासी का चित्रण किया है। पी.पी. यादव शराब का कारोबारी है, वह भू-माफिया है। अवैध तरीके से अमीर बनकर अपराध के रास्ते राजनीति में प्रवेश कर रह रहा है। प्रेस कांफ्रेस के लिए उपस्थित शहर के सारे पत्रकारों को शराब और कबाब से तो लेकर उसकी नैतिकता को सहजता से खरीद लेता है। वर्णन देखिये - "थोड़ी देर में मेज पर से कप प्लेट गायब हो गये और उनकी जगह बोतले, गिलास, भुने हुए काजू, मुर्गे की टांग, सलाद और तरह-तरह की तमाम दूसरी चीजें आकर लग गईं। पत्रकारों के चेहरे स्निग्ध हो गये। वे एक- दूसरे को देख- देखकर मुस्कुरा रहे थे और आँखें मटका रहे थे। प्रेस कांफ्रेस के दौरान थोड़ी-बहुत जो तल्खी पैदा हुई थी, वह भी दूर हो गई। शांति प्रसाद के अभ्यस्त हाथों ने पेग बनाने शुरू कर दिये और कमरे में मौजूद लोग भुने काजुओं और मुगों की टांगों से जूझने लगे।" (9)
भारतवर्ष में अनेक धर्म, संप्रदाय, पंथ और जातियाँ हैं। इसी जाति -व्यवस्था में टकराव होती है। यह जाति-व्यवस्था प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। फूले, पेरियार, आंबेडकर की वजह से तथा शिक्षा की वजह से उच्च वर्ग का इन निम्न जाति की तरफ देखने का नजरिया बदलने लगा है, किन्तु जब धार्मिक कार्य, अंतर्जातीय प्रेम विवाह की बात आती है तो यह जातिवाद अपना फन उठाता दिखाई देता है। जातिगत समानता को हमारा समाज पूरी तरह अभी भी आत्मसात नहीं कर पाया है।जातिवाद की भावनाएँ व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की दृष्टि से अहितकर है।
विभूतिनारायण राय के उपन्यासों में भी जातिवाद का परिचय कुछ प्रसंग में प्राप्त होता है। 'तबादला' नामक उपन्यास में लेखक ने स्पष्ट कर दिया है कि जातिवाद हमारे समाज में सर्वत्र व्याप्त है। ऊपर से नीचे तक, मंत्री से लेकर संतरी तक, ऑफिसर से लेकर चपरासी तक में इसकी व्याप्ति देखी जा सकती है। लेखक इसमें कार्यलय के जातिवादी वातावरण का उल्लेख किया है। उपन्यासकार लिखते हैं- "उपाध्याय जी एक नम्बर के जातिवादी थे। उनके आते ही दफ्तर के ब्राहण चपरासियों और बाबुओं का राज हो जाता है। बेचारे ठाकुर कायस्थ एक किनारे कर दिये जाते। पंडितजी मुँह में पान दबाये अपने पैर मेज के बाहर निकालकर दफ्तर में बैठते। उनके कमरे में घुसने पर ठेकेदारों या बाबुओं को उनका पैर छूना पड़ता। अफसरों में भी ज्यादातर पैर छूते। पैर तो लाल बाबू ने भी खूब छुआ, पर बात कुछ बनी नहीं। दोनों बार उपाध्याय ने लाल बाबू का तबादला करा दिया और दोनों बार काफी परेशान होकर वे वापस इस दफ्तर में लौट पाये।"(10)
ब्राह्मण और दलितों के मध्य छूताछूत की भावना एक गंभीर जातीय समस्या है। शिक्षा के प्रसार तथा प्रगतिशील विचारों के बावजूद भी समाज के बीच ऊँच-नीच कर भाव समाप्त नहीं हुआ है। 'किस्सा लोकतंत्र' में बाह्मण तथा शूद्र के बीच की इसी खाई का चित्रण किया गया है, जिसे निम्न प्रसंगों में देखा जा सकता है- "पुराने जमाने में ब्राह्मण चमार के हाथ की रोटी नहीं खाता था, लेकिन उसका पैदा किया हुआ गेहूँ पिसवाकर खुद रोटी बना लेता था।" (11)
निष्कर्षत: विभूतिनारायण राय के लगभग सभी उपन्यासों में भारतीय समाज का बहुआयामी यथार्थ चित्रित हुआ है। लेखक ने अपने समृद्ध जीवनानुभव के सहारे सामाजिक यथार्थ के विविध पहलुओं को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है। एक तरह से विभूतिनारायण राय के उपन्यासों को तद्युगीन समाज का जीवंत दस्तावेज कहा जा सकता है।
संदर्भ - ग्रंथ -सूची :
(1) घर (शहर में कर्फ्यू तथा अन्य चार उपन्यास ) - विभूतिनारायण राय, पृ.-16
(2) वही, पृ.-19
(3) शहर में कर्फ्यू (शहर में कर्फ्यू तथा अन्य चार उपन्यास)- पृष्ठ- 115
(4) वही, पृष्ठ-115
(5) महिला उपन्यासकारों की रचनाओं में बदलते सामाजिक संदर्भ-डॉ. शीलप्रभा वर्मा, पृष्ठ- 54
(6) शहर में कर्फ्यू- पृ.-120
(7) वही, पृष्ठ- 19
(8) शहर में कर्फ्यू - पृष्ठ-121
(9) किस्सा लोकतंत्र (शहर में कर्फ्यू तथा अन्य चार उपन्यास)- पृष्ठ-169-170
(10) तबादला (शहर में कर्फ्यू तथा अन्य चार उपन्यास), पृष्ठ- 281
(11) वही, पृष्ठ- 302
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