विभूतिनारायण राय के उपन्यासों में राजनीतिक चेतना

               समाज चाहे कोई भी हो छोटा या बड़ा, वह राजनीति से निरपेक्ष नहीं हो सकता। आजकल तो कोई भी कार्य हो,उस कार्य में राजनीति का प्रभाव अवश्य दिखाई पड़ता है। कहते हैं कि समाज राजनीति के द्वारा ही विकसित होता है। लेकिन आजकल के नेता समाज विकास के बजाय व्यक्तिगत विकास को ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं। राजनीति को पैतृक संपति माना जाने लगा है। प्रत्येक नेता आमरण अपने को राजनीति के योग्य समझता है। देखा जाय तो राजनीति किसी एक घराने या व्यक्ति की विरासत नहीं है। वह आम लोगों द्वारा जनता के हित में चलाये जाने वाले नीति हैं। लोगों के हाथ में अधिकार रहे, इसलिए संविधान में यह प्रावधान किया गया हैं। "राज्य की किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, जाति, लिंग, मूल वंश, जन्म स्थान अथवा इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा।"(1)

              राजनीति से ही समाज का विकास संभव होता है। राजनीतिक मूल्यों का प्रभाव समाज में मानवीय आधार पर मूल्यों की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो राजनीतिक मूल्य अन्य मूल्यों की अपेक्षा अधिक प्रभावी होते हैं। इसीलिए इन मूल्यों को सही दिशा की ओर परिवर्तित करना नितांत आवश्यक है, जिससे लोकतंत्र और समाजवाद का सही अर्थों में स्थापना हो सके और वर्गहीन समाज में सबको विकास के समान अवसर उपलब्ध हो सके। आज के राजनेता की वृत्ति इस संदर्भ से स्पष्ट हो जाती है - "आज का सार्वजानिक नेता राष्ट्रसेवी के स्थान पर आत्मसेवी बनकर रह गया।"(2)

              वर्तमान राजनीति की स्थिति अत्यंत दूषित हो गई है। और इस दूषित हालत को सुधारने के लिए या समाज में परिवर्तन लाने के लिए साहित्य तथा साहित्यकारों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाती है, क्योंकि सामाजिक परिवर्तन का अर्थ राजनीतिक सत्ता परिवर्तन ही होता है। विभूतिनारायण राय ने अपने उपन्यासों के माध्यम से इसी तरह की जागृति लाने का प्रयत्न किया है।

            संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर जी ने संविधान में नागरिकों को समान अधिकार दिया है। जिसके कारण व्यक्ति को राजनीति में समान भागीदारी प्राप्त हुई है। आज की राजनीति इतनी चरित्रहीन हो गई है कि सत्ता- प्राप्ति के लिए नेतागत किसी भी हद तक गिर जाते हैं। इसी राजनीतिज्ञों के चरित्र का यथार्थ वर्णन विभूतिनारायण ने अपने उपन्यासों में किया है। 'किस्सा लोकतंत्र' नामक उपन्यास में प्रेमपाल यादव उर्फ पी.पी. का चरित्र-चित्रण किया गया है। पी.पी. अपराध की दुनिया से राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया है। वे प्रख्यात शराब कारोवारी है। भू-माफिया के रूप में ख्यात हैं। अनेक हत्याओं और डकैतियों के अरोपी हैं। लेकिन देश सेवा की ढ़ोग कर राजनीति में अपना पैठ बनाना चाह रहे हैं। एक पत्रकार उनसे पूछता है कि आप तो अच्छे भले धंधे में थे फिर अचानक चुनाव लड़ने की कैसे सूझी? इसके उत्तर में पी.पी. का कहता है- "क्यों, बिजनेस वालों को देश सेवा नहीं करनी चाहिए क्या? हमने सोचा अन्य लोग देश-सेवा कर रहे हैं, हम भी कर लें। पेट के लिए दो रोटी तो मिल ही जाती है। कुछ जनता की सेवा भी हो जाय।"(3)

              भूतिनारायण राय ने पी.पी के चरित्र का उल्लेख करते हुए कहा है- "बैठक में एक आराम कुर्सी पर स्वच्छ शीघ्र धवल कुर्ते-पाजामें में वह मुलाकातियों से घिरा बैठा रहता था और उसकी धैर्ययुक्त स्निग्ध मुस्कान देखकर कोई यह अंदाज नहीं लगा सकता था कि उसे ऊपर तीन बैंक डकैतियों, दर्जना हत्याओं, पचासों लूटपाट के मुकादमें चल चुके हैं और अभी आठ-दस साल पहले वह कुत्तों की तरह पुलिस से भागता फिरता था। "(4)

            जनता अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं, इसलिए कि वे उनकी सहायता करेंगे, संकट के समय रक्षा करेंगे। परंतु वही नेता जब चुनाव जीतने के बाद जनता का शोषण करते हैं तो जनता का दुखी होना स्वाभाविक है। 'तबादला' नामक उपन्यास में श्री कमलाकांत वर्मा का उसके कार्यलय से अन्यत्र तबादला इसलिए कर दिया जाता है, क्योंकि वे कायस्थ हैं और ऑफिस के शेष कर्मी ब्राह्मण हैं। अब वे अपने तबादले को रोकने के लिए सिफारिश हेतु मंत्री जी के पास भाग-दौड़ करते हैं, लेकिन मंत्रीजी के पास उनसे मिलने का समय नहीं है। यह बात बाद में सिद्ध होता है कि उनका तबादला मंत्रीजी के ही प्रयास से हो रहा है। वे अपने चमचे को वहाँ लाना चाहते हैं। इस राजनेताओं के चारित्रिक यथार्थ को उपन्यासकार ने सफलतापूर्वक विवेचित किया है।

           आज की राजनीति और राजनेता, मंत्री या बड़े-बड़े व्यापारी धनी आदि के हाथों की कठपुतली बने दिखाई पड़ते हैं। मंत्री व्यापारियों को लाभ पहुंचाने हेतु कई योजनाएँ बनवा रहे हैं। सरकारी कार्यालयों का निजीकरण कर रहे हैं। व्यापारी द्वारा मंत्री तथा उनकी पार्टियों को आर्थिक लाभ मिलता है। अगर हम यूँ कहें कि व्यापारी द्वारा ही पार्टियाँ चलती हैं तो कुछ गलत नहीं होगा। इन दोनों की साँठगाँठ का उदाहरण विभूतिनारायण राय के उपन्यासों में प्राप्त हो जाते हैं। किस प्रकार मंत्रीजी के लिए आम आदमी महत्त्वहीन हो जाता है, इसकी सुंदर बानगी 'तबादला' नामक उपन्यास में प्राप्त होता है। श्री कमलाकांत वर्मा अपने तबादले को लेकर परेशान है, वह मंत्रीजी मे मिलकर अपने लिए शिफारिश करबाना बाहता है, लेकिन मंत्रीजी के पास उनके लिए समय कहाँ? उपन्यासकार लिखते हैं- "आज भी मंत्रीजी भीड़ के बीच से धक्कम-धुक्की करते हुए अपनी बैठक की तरफ बढ़े। चालीस-पचास आदमियों की भीड़ में हर कोई अपना चेहरा दिखाने को बेताव था। लोगों के हाथों में दरख्वास्ते लहरा रही थीं। कुछ के हाथों में मालाएँ भी थीं। कुछ लोग पैर छूने के लिए लपक रहे थे। चपरासियों और सुरक्षाकर्मियों ने कुछ लोगों को कालर पकड़कर पीछे खींचा कुछ को कुहनियों से रगेदा और हाथों का घेरा बनाकर मंत्रीजी को बरामदे की तरफ ले चले। सब कुछ इतना अस्त-व्यस्त था कि मंत्रीजी प्रसन्न हो गए और एक चौड़ी मुस्कान उनके चेहरे पर चिपक गई।" (5)

             न्याय को अपने हिसाब से तय करने का सामर्थ्य केवल नेताओं में होता है। 'किस्सा लोकतंत्र' में एम.पी. के सामने एक निरीह दारोगा को दिखाया गया है, जो गलती न करने पर भी एम.पी के सामने अपराधी की भाँति पेश होता है। उसका अपराध केवल इतना है कि उसने एम. पी. साहब के अपराधी को हवालात में बंद कर दिया है। लेखक का कहना है- "आज एम. पी. आया था। अपने साथ थानेदार को लाया था। माफी मंगवाने के लिए। साले ने परसों चौधरी साहब के आदमी को बंद कर दिया था।" (6)

            मंत्रियों के सामने आम आदमी कीड़े-मकोड़े की भाँति महत्त्वहीन हो जाते हैं। मंत्री तो मंत्री उसके पी.ए. तक के सामने जानता की यही स्थिति रहती है। पी.ए भी जनता पर उसी तरह धौंस जमाता है, मानों आम आदमी अपराधी हो। 'तबादला' नामक उपन्यास में श्री कमलकांत वर्मा देखते हैं कि मंत्री जी अपने पी.ए. के साथ कानाफूसी कर रहे हैं, तो उसे लगता है कि शायद मंत्री जी उसी के संदर्भ में बात कर रहे हैं। संसद से लेकर डिनर डिप्लोमेसी तक इसकी छटा दिखाई पड़ती है। कानाफूसी हुई और कमलाकांत ने राहत की साँस ली। उन्हें लगा अब मामला तय हो जाएगा और उन्हें कुछ कहने का मौका मिल जाएगा। मामला सचमुच तय होने के कगार पर आ गया था। मंत्रीजी का पी.ए. दोनों पक्षों को अंदर के एक कमरे में ले के चला।" (7) 

            सन् 1960 ई0 के दशक का उत्तरार्द्ध भारतीय राजनीति के इतिहास में नया मोड़ लेकर आया था। प्रधानमंत्री भारतीय राजनीति के इतिहास में नया मोड़ लेकर आया था। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का सोवियत रूप में ताशकंद समझौता पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद हृदय की गति रूक जाने से निधन हो गया था। इंदिरा गांधी ने प्रधान मंत्री की गद्दी पर बैठकर पुनः देश के शासन में नेहरू परिवार का वर्चस्व कायम कर लिया था। विरोधी दल हक्का-बक्का थे। देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव जीतने में अपराधकर्मियों के सहयोग का महत्त्व समझ चुकी थी। अब वे सत्ता हथियाने में अब अप्रयुक्त छात्र- शक्ति का उपयोग करने लगी थी।

             राजनेताओं ने जिगर के टुकड़े भारत के भविष्य सशक्त समाज के सशक्त हाथ जैसी संज्ञाओं से छात्रों को राजनीति में आने के लिए लुभाना शुरू कर दिया था। इसका सर्वाधिक घातक प्रभाव देश के शैक्षिक वातावरण पर पड़ा। छात्रों में अनुशासनहीनता उत्पन्न हुई और अनुशासनहीनता अपराध में बदलने लगी। अपराध की दुनिया से सत्ता में अपना भाग्य आजमाने वाले पी.पी. यादव अपने दबंगई तथा पैसा के बल पर टिकट प्राप्त कर चुनाव जीतने का काम किया, जिसकी कहानी विभूतिनारायण के उपन्यास 'किस्सा लोकतंत्र' में प्राप्त होता है। हत्या, डकैती और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधी पी.पी. के बारे में लेखक ने लिखा है- "अपने जीवन का पहला अपराध उसे आज तक याद है। उसकी मित्र- मंडली में जयकिशन नाम का एक लड़का सबसे दुस्साहसी था। अक्सर वह रास्ता चलते मार-पीट कर लेता था। यद्यपि उस उम्र में उससे काफी बड़ा था फिर थी साथयों का नेतृत्व करने के चक्कर में पी.पी. उससे स्पर्धा करता था, हालाँकि लाख स्पर्धा के बावजूद कहीं भीतर से वह उससे डरता भी था। जय किशन के पास एक देशी पिस्तौल थी, जिसे वह कट्टा कहता था और जिसे ललचाई आँखों से पी.पी. देखा करता था।" (8)

             वर्तमान समय में राजनीतिक पार्टियों का अपना कोई दर्शन नहीं होता। उसका एकमात्र उद्देश्य होता है सत्ता की प्राप्ति के लिए तमाम नैतिक को ताखा पर रखकर साम-दाम-दंड भेद से सत्ता को हस्तगत करना। यही कारण है कि एक पार्टी दूसरी पार्टियों के खिलाफ विरोध जुमले रचते हैं। किस्सा लोकतंत्र में पी.पी यादव के चाटुकार शांतिप्रसाद की प्रेरणा से बागी नेताओं के विरुद्ध उटपटांग नारे लगाए जाते हैं। उपन्यास की पंक्ति देखिये- "पी.पी. और शांति प्रसाद भी कुछ-कुछ थके से बेमन से उन्हें अंदर जाने को कहते रहे, पर वे उछल-उछल कर बागी को चिढ़ाने के लिए उटपटाग नारे लगाते हैं। बागी भी अपनी बची- खुची शक्ति से चिल्लाकर उन्हें ललकार ने लगा। थोड़ी देर में स्थिति यह हुई कि बागी, पी.पी. के समर्थकों और दर्शकों तीनों का मजा आने लगा। जो लोग पी.पी. के आतंक और बागी पर आसन्न संकट को सोचकर खामोश थे, उन्होंने तालियाँ बजा-

बजाकर और अपने गलों में से किस्म किस्म की आवाजें निकालकर बागी का हौसला बढ़ाना शुरू किया।"(9)

             विभूतिनारायण राय स्वयं प्रशासनिक पद पर रह चुके हैं। इसलिए उन्हें मंत्री राजनेता आदि से प्रशासनिक अधिकारी किस तरह से अपने हित संबंध रखते हैं और अपना काम निकाल लेते हैं और जो पदाधिकारी इनकी बात मानते नहीं तो वह उनका तबादला करवा देते हैं। राय जी ने अपने उपन्यास 'तबादला' में इसी प्रकार के संदर्भों को उजागर किया है। 'तबादला' के नायक हैं श्री कमलाकांत वर्मा वे अधिशासी अभियंता है, सार्वजनिक निर्माण-विभाग में कार्यरत हैं। वे अत्यंत श्रमपूर्वक या यूँ उहें कि ऊपरी अधिकारियों को घूस देकर यहाँ अपनी पद स्थापना करवाया है, लेकिन अचानक तबादले की सूचना से वे आहत होते हैं। उपन्यासकार ने लिखा है- "सर पर कुंभ और तबादला। अगर मुहावरे की भाषा में कहा जाय तो श्री कमलाकांत वर्मा के लिए यह किसी वज्राघात से कम नही थी। अक्टूबर खत्म हो रहा था और कुंभ का काम धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा था। ज्यादातर कामों के टेंडर हो चुके थे।"(10)

             श्री कमलाकांत वर्मा जी अपना तबादला रुकवाने के लिए मंत्रियों की खुशामद करने रोज-रोज जाता है। लेकिन वहीं ऐसे आम आदमी का कोई महत्व नहीं है। लेखक ने उसका वर्णन इस तरह किया है- "कमलाकांत ऐसे स्थान की तलाश में लग गए, जहाँ खड़े होने पर मंत्रीजी से उसकी आँखें टकरा सकें। जल्दी ही उन्हें ऐसी जगह मिल गई। वे खुश हो गए, पर उनकी खुशी इस नखर संसार की तरह क्षणभंगुर रही। किसी निष्पुर नायिक की तरह मंत्रीजी की आँखें उनकी आँखों से टकरायी जरूर और उन्होंने हर बाद दिलफेंक नायक की तरह अपने पूरे दाँत दिखा दिये पर निर्दयी आँखों में पचियन की कौंध एक बार भी नहीं लपकी। वे दुखी हो गये।"(11)

            मंत्रीजी के लिए पी.ए. की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। यह सर्वविदित्त है। पी.ए. मंत्रीजी के लिए किचन से लेकर बेड रूम तक का इंतजाम करता है। वर्णन देखिये- "उसने तो इस पी.डब्ल्यू.डी. मंत्री के बेडरूम में घुसपैठ कर रखी है। अरे आप नहीं जानते उस कौशिक के बच्चे को ? वही कौशिकवा जो आपके मंत्री का पी.ए. है। साला मंत्री के किचन से लेकर बेडरूम तक का इंतजाम करता है।"(12)

             इस तरह विभूतिनारायण राय के उपन्यासों में राजनीति के बहुआयामी यथार्थ का चित्रण हुआ है। उपन्यासकार समकालीन भारतीय राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार का भी यथार्थपरक उद्घाटन किया है। 


संदर्भ ग्रंथ सूची :


(1) पंथ और परिणति - देवकीनंदन शुक्ल, पृष्ठ-25

(2) किस्सा लोकतंत्र (शहर में कर्फ्यू)- विभूतिनारायण राय, पृ.-163

(3) वहीं, पृष्ठ-221

(4) तबादला (शहर में कर्फ्यू) - विभूतिनारायण राय, पृष्ठ-374

(5) किस्सा लोकतंत्र (शहर में कर्फ्यू)-विभूतिनारायण राय, पृष्ठ-219

(6) तबादला (शहर में कर्फ्यू) -विभूतिनारायण राय, पृष्ठ-358

(7) किस्सा लोकतंत्र (शहर में कर्फ्यू)- विभूतिनारायण राय, पृष्ठ-185

(8) वही- पृष्ठ- 277

(9) वही- पृष्ठ-281

(10) वही- पृष्ठ-375

(11) वही, पृष्ठ-408

(12) वही, पृष्ठ- 409


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Milan Tomic

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