आज देश और दुनिया अनेकानेक समस्याओं से ग्रसित है। जिसमें सबसे बड़ी समस्या है - साम्प्रदायिकता। धर्म जहाँ मानव समाज को जोड़ता है, इसलिए धर्म के बारे में कहा गया है कि 'मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना.....!' लेकिन यही बात संप्रदाय के बारे में नहीं कह सकते हैं। धर्म के विपरीत साम्प्रदाय उसकी शुचिता का सर्वनाश कर देता है! यह अलग सवाल है कि धर्म के गर्भ से ही संप्रदाय की उत्पत्ति होती। किन्तु इसमें सहज ही कट्टरता की भावना आ जाती है। प्रचार- प्रसार ध्येय बन जाता है और दूसरे धर्म अथवा संप्रदाय के प्रति अपने धर्म अथवा संप्रदाय को श्रेष्ठ समझने की भावना नियति बन जाती है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य में कट्टरता और हिंसात्मक भावना आ जाती है और यह भावना कहीं से भी राज और समाज के लिए हितकर नहीं होता।
साम्प्रदायिक उन्माद के इस दौर में हमारे सामने एक ही समाधान है और वह है- गाँधीवाद। महात्मा गाँधी ने सर्वधर्म समभाव का प्रचार किया। उसने उपदेश दिया कि सभी धर्म ऊपरी तौर पर अलग हो सकता है, परंतु आंतरिक तौर पर सभी एक ही है। ये परमात्मा तक पहुँचने के अलग-अगल मार्ग है बस। इसीलिए जहाँ उन्होंने 'हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख ईसाई, सब आपस में भाई-भाई' का नारा दिया तथा 'सर्वधर्म प्रार्थना सभा' की स्थापना की।
महात्मा गाँधी ने किसी धर्म- संप्रदाय अथवा दर्शन की स्थापना नहीं की। उन्होंने सभी धर्मों के उत्तम अंश को अपने प्रयोग से सिद्ध किया। उनके विचारों पर भारतीय वेदांत, उपनिषद, गीता, रामायण तथा महाभारत समेत सभी धर्म-ग्रंथों का गहन अध्ययन तथा मनन किया। वे जिस पावन भाव से हिन्दू धर्म- ग्रंथ का अध्ययन किया था, उसी पावन भाव से कुरान, बाईबल तथा गुरुग्रंथ साहब का भी। महात्मा गाँधी के विचारों पर सबका सम्यक प्रभा है। यह चीज बताता है कि महात्मा गाँधी पूर्णत: संप्रदाय- निरपेक्ष थे। उनके विचारों की सबसे बड़ी शक्ति का प्रयोगशीलता। वे जो भी कहते थे, वह प्रयोग से सिद्ध था। इसी कारण लोगों पर गाँधीवाद का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक पड़ा है।
आज के दौर में जब खासकर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय साम्प्रदायिकता का कारण एक-दूसरे के खून के प्यासे है, हिंसा और रक्तपात पर उतारू है, वैसे में गाँधीवाद की प्रासंगिकता अक्षुण्ण है।
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा साहित्यकार
संपर्क : 6201464897
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