बाजार और मीडिया का नाभिनाल संबंध है। मीडिया ने बाजार को बढ़ावा दिया है और बाजार ने मीडिया का संपोषण किया है। मीडिया ने मनमोहिनी विज्ञापन के सहारे उपभोक्ताओं को सम्मोहित किया है। आज उसके प्रभाव से कोई भी बच नहीं सकता है। आधुनिक समाज में तमाम चीजों को बाजार के निकष पर तौलने-परखने की प्रवृत्ति विकसित हो गयी है। विचार ,भाषा, साहित्य, संवेदना सभी चीजें बाजारू हो गयी है। आज जो बिकाऊ नहीं है, वह टिकाऊ नहीं है।
आर्थिक उदारीकरण ने जो वैश्वीकरण को पैदा किया है, उसे व्यापक रूप में प्रचारित करने का काम मीडिया ने किया है। वैसे तो मीडिया के विविध रूपों ने बाजार के विस्तार में अपनी भूमिका निभाई है, पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रूप में टेलीविजन और मोबाइल ने 'कर लो दुनिया मुट्ठी में' जैसी उक्ति को सार्थक कर दिया है। टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के संचालन के लिए विज्ञापन की आवश्यकता होती है और यही विज्ञापन बाजार का विस्तार करता है।
मीडिया के कारण ही 'लोकल को भोकल तथा भोकल को लोकल' बनाने की अवधारणा सार्थक सिद्ध हो रही है। मीडिया के प्रचार-प्रसार के माध्यम से ही किसी वस्तु को लोकल से उठाकर ग्लोबल पर फैला दिया जाता है। मिथिला पेंटिंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जो मिथिला में उत्पादित होकर पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो सकी है। मीडिया ने बाजार के विस्तार के लिए ऐसे लोकलुभावन मुहावरे गढ़े हैं कि हम हैरत में पड़ जाते हैं- जैसे- 'लाईफवाय है जहाँ, तनदुरूस्ति है वहाँ'......... 'कोका कोला है तो ठंडा' ही होगा'.......'अपना लक पहन के चलो'.......आदि।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि मीडिया ने बाजार को विस्तारित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। आज ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि हमारा समाज बाजार के मकड़जाल में उलझ चुका है, जिसके ताने-बाने का निर्माण मीडिया ने किया है।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार और ब्लाॅगर
संपर्क : 8877462692
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