अभिशाप

कितना क्लांत, कितना व्यस्त !

चिर- द्रवित, पीड़ित अनन्त

श्रम का फिर भी कितना उपहास!

कर अट्टहास सुख उन्मूलित

जीवन है कितना उदास !


कैसा अखंड, कैसा वीभत्स

दारुण! कैसा यह अभिशाप?

इस शून्य सृष्टि में खोज रहा

कब से महिमा को ले त्रास!


मन चंचल, ले दृग विह्वल

नर कहता अथक कहानी,

शांति मौन में कब मिलता है?

कहता है निर्झर का पानी।

फिर भी नर जीवन ढोता है

निर्झर की गति पाकर,

गिरती है सही रूकती है कहाँ?

ठोकर खाकर जीवन की साँस।


जीवन निर्झर पर ढूँढ़ रहा है

अतल में खोई निधियाँ सारी

युग-युग से नर खोज रहा,

पर थक कर कहता......

जीना है ऐसा बेकार।


दिन भर श्रम करने पर भी

संध्या बीत जाती है,

तारे गिन-गिन रैन बिताकर

राही को उषा जगा जाती है।


फिर दिन का वही श्रम

रात में लाता है जागरण,

भूखा पेट दबाकर कहता

क्या बुझ सकता है आँसू से प्यास?


दिन-दिन की अथक कहानी से

जब नर इतिहास बनाता है,

तभी अनीति की सीमा से

स्वयं क्रांति रच जाती है।


मनुज तब तोड़ अभिनय का द्वार

न्याय खोज में चल पड़ता है,

शांति बिचरती खड़ी क्रांति में

न्याय खड्ग को चूम लेता है।


सदियों के अन्याय कार्य से

नर का धैर्य विदकता है,

तभी नृत्य कर पापी जन का

प्रायश्चित रचाता है।


इसी अग्नि की ज्वालाओं में

धू-धू जलता अनय का बंधन

घूम-घूम कर न्याय चक्र भी

दमन चलाता, सुनता क्रंदन।


इस क्रंदन में रोता है वह

चीख मारता है प्रलापी,

युग-युग का जो दस्यु बना है

सुख का वह निर्जन पापी।


युग-युग का भूखा नर

जब करता है नर का भक्षण

युग-युग का प्रयासा से

करता है रूधिरों का इंधन,

अत्याचारी कहो कहाँ?

करते हैं विश्राम अकिंचन।


दस्यु बना था वह रोता है

किन्तु मनुज हँसता है,

चिरकाल का भूला-भटका

अपना अधिकार छुड़ा लेता है।


युग का खोया अधिकार चिरंतन

पाकर आज कहता है......

खोज रहा था जिसको, वन ही वन

वही हाथ आया है।


युग का वैभव, छिपा-छिपा कर

सोता था जो शांति महल में,

वही बिचरता लुक-छिप करके

ढहता महल सिहर कर तल में।


मान सृष्टि के आदिकाल से

विषमता की दीवार खड़ी थी,

हहर-हहर कर गिरती है नभ से

नर की छाती पर आन पड़ी थी।


ऊपर से इठला-इठला कर

नर भाग्यों पर हँसते थे तारे,

आज उतरते दीख पड़ हैं

नभ से आते हैं, अधमारे।


आज कहाँ रोते हैं मानव,

आज कहाँ इठलाते तारे!

आज अगर हँसते हैं वे तो

करने आए जग को उजियारे।


देख, साम्य की सृष्टि हुई है

देख, विभा भी फूट पड़ी है,

आज उषा लोहित किरणों से

नयी सृष्टि देने आई है।


आज ध्वंस के नये राग से

नये कल्प का जन्म हुआ है,

नयी रागिनी की तानों से 

जीवन का संगीत हुआ है।


नर जाग! उठाकर ले वीणा

सोये कब तक जी सकता है,

प्रलय राग की पल- ध्वनियों से

अगर चाहते हो जीना।


उठ, रण-ज्वाला से तिमिर भगा

कर ठोस क्रांति आलोक फैला,

कब तक ढोना है रे कायर !

अभिशाप जला! अभिशाप जला!!


यह अभिशाप देवों का नहीं

और न अभिशापित हो ॠषियों से

तुम अभिशापित कायरता से

स्वर आता यही गगन से।


श्रम का संग्राम जहाँ निष्फल

दम भर भी काम अभिशाप जहाँ,

नर का संग्राम बुलाकर ही,

लाता निश्चय वरदान वहाँ।


यह वरदान श्रमिकों का है

नर जहाँ सभी सुखी होते,

यह अधिकार मनुज का है

वे दुनिया नयी बसाते।


अभिशापित जीवन थककर ही

करता नर का है कल्याण,

द्वन्द्व मचाकर चिर द्रोही से

रचता है जीवन उद्यान।


कैसा अभिशाप! कैसा संग्राम!

रे नर! दिखला दे उठकर,

रच दे रक्त की स्याही से,

इस जीवन का इतिहास अमर।


अमर रहेगा इतिहास तुम्हारा

अमर रहोगे तुम किरणों में,

मर कर भी अपने युग में तुम

अमर बनोगे नर वंशों में।।


संपादन - डाॅ. उमेश कुमार शर्मा ,

             (युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर)

             संपर्क- 6201464897


संकलन- श्री चिरंजीव ठाकुर, मधुबनी, बिहार

 

मूल रचनाकार - जयचन्द्र झा 'अरुण'

        

         ( प्रिय पाठकों! मुझे श्री चिरंजीव ठाकुर के सौजन्य से कुछ हस्तलिखित पांडुलिपियां अत्यंत जीर्ण-शीर्ण अवस्था में प्राप्त हुई, जिसमें कवि का नाम- जयचन्द्र झा 'अरुण' अंकित है। साथ ही 1953 ई. का रचनाकाल अंकित है। कवि ने अपने पते के रूप में लिखा है- 'स्कॉटिश काॅलेज, कलकत्ता, बी.ए., तृतीय वर्ष - कला'। श्री ठाकुर से जब मैंने पूछा कि यह पांडुलिपियां आपको कहाँ से मिलीं? तो उन्होंने बताया कि इसके बारे में उन्हें भी ठीक से याद नहीं है। वे इन्हें करीब 30 वर्षों से संभाल कर रखे हैं। सुधी पाठकों! मुझे लगा कि साहित्य की यह सामग्री जिस रूप में है, उसे उसी रूप में आप तक पहुँचा दूँ। )

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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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