बेदख़ल

प्रियतम!

तुमने तन मांगा हमने दे दिया

तुमने मन मांगा हमने दे दिया

तुमने जीवन मांगा हमने दे दिया

तुमने समर्पण मांगा हमने दे दिया।


प्रियतम!

तुम्हारी हर मांग पर कुर्बान हुए हम

तुम्हारी हर याचना पर मर मिटे हम

तुममें खपा दिया हमने स्वयं को

तुम्हारी सेवा को अपनी नियति मान लिया।


प्रियतम!

जब तुमने याचना को अधिकार बना लिया

तो तुम तुम न रहे, न रहा तुम्हारा वह प्रेम 

मेरी सेवा को तुमने मेरी नियति मान लिया

तुम तौलने लगे हमें रोज लिंग के निकष पर

दिखाने लगे तुम औरत और मर्द के फासले।


प्रियतम!

तब चित्कार उठा मेरा अंतस मेरा मन

मेरी अस्मिता को सुलगा दिया तुमने

हम भी खोजने लगे अपनी पहचान

तब साफ झलकने लगी शोषण की कड़ियाँ

जिसका कोई ओर छोर नहीं मिला अब तक


प्रियतम!

लेकिन अब जान गये हम यह राज कि

अपना न कभी कुछ था, न है, न होगा

सबके मुखौटे अलग-अलग हैं, पर चेहरे

सब के एक से हैं, चाहे हो वह पिता, पति या पुत्र

सबने बेदखल किया है हमें,

अब लगा कि सच में छले गये हैं हम।


डॉ. उमेशकुमार शर्मा

युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर

संपर्क- 6201464897

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Milan Tomic

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