स्त्री,
प्रेम नहीं करती किसी से
योजना बनाकर
पुरुषों की भाँति
वह स्वयं बह जाती है
किसी प्यासी नदी की तरह
थोड़ा-सा प्रेम, स्नेह या अपनत्व पाकर।
स्त्री,
परीक्षा नहीं चाहती प्रेम में
वह चाहती है हृदय का प्रतिदान
अपना सर्वस्व देकर।
स्त्री,
नहीं भटकती कभी
मुकम्मल की तलाश में
वह स्वयं को ही खपाकर
किसी को मुकम्मल बना लेती है।
युवा रचनाकार
उमेश कुमार शर्मा
सहरसा, बिहार।
प्रेम नहीं करती किसी से
योजना बनाकर
पुरुषों की भाँति
वह स्वयं बह जाती है
किसी प्यासी नदी की तरह
थोड़ा-सा प्रेम, स्नेह या अपनत्व पाकर।
स्त्री,
परीक्षा नहीं चाहती प्रेम में
वह चाहती है हृदय का प्रतिदान
अपना सर्वस्व देकर।
स्त्री,
नहीं भटकती कभी
मुकम्मल की तलाश में
वह स्वयं को ही खपाकर
किसी को मुकम्मल बना लेती है।
युवा रचनाकार
उमेश कुमार शर्मा
सहरसा, बिहार।
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