रमजान का उनतीसवाँ दिन। मस्जिद में लोगों की अपार भीड़। आदमी पर आदमी। एकदम पिसमपीस। पाँव रखने तक की जगह नहीं। सभी लोग यहाँ शाम का नमाज़ अदा करने पहुंचे थे। इधर सकूर मियां जूते-चप्पलें को ठेलकर किसी तरह अपने लिए थोड़ी -सी जगह बनाने में लगा था। भीड़ की तिरछी नज़र उस पर टिकी थीं।
सकूर मियां कल वाली गलती को आज फिर से दुहराना नहीं चाहता था। उसे अब अपनी औकात और हैसियत का बोध भली- भांति हो चुका था।
दरअसल वह पिछले कुछ दिनों से अजान पड़ते ही मस्जिद की ओर दौड़ पड़ता था और सबसे आगे नवाज पढ़ने के लिए जगह छेक लेता था। मानो वही अल्लाह मियां का सबसे बड़ा मुरीद हो। लेकिन मौलवी गुलाम अली साहब को यह सब रास न आया। वे हाजी थे। कई बार उन्होंने मक्का और मदीने की यात्राएं की थीं। कुरान शरीफ़ तो मानो उन्हीं की जुवान से निकला हो। उन्होंने सकूर मियां को डपटते हुए कहा-"साला ई चमरबा सबसे आगे आके बैठ जाता है। आगे में हाजी-नवाजी बैठेगा कि यही डोम-चमार।"
बस इतना ही कहना था कि सारे लोग मौलवी साहब की हाँ में हाँ मिलाने लगे।
सकूर मियां का मुंह अपने जैसा हो गया।जैसे अभी-अभी उसे किसी ने चार जूते लगा दिये हों। वह बिना कुछ बोले सबसे पीछे जाकर नमाज़ पढ़ने लगा।
आज सकूर मियां कुछ देर से पहुँचा। नमाज़ शुरू हो चुका था। वह भी शुरू हो गया, पर उसका ध्यान आज नमाज़ पर नहीं था। वह बस सबके साथ उठक- बैठक कर रहा था। उनके कानों में अबतक हाजी साहब की फटकार की ध्वनि गूंज रही थी। उसे मौलवी साहब की हर बात दुर्गा-मंदिर के पंडित जी की लतार का दूसरा संस्करण लग रहा था।
सकूर मियां दुर्गा- पूजा की उस नवमी को कैसे भूल सकता है, जब वह सकूर मियां नहीं बुधन चमार हुआ करता था। और जहाँ उसे मंदिर में आरती गाने पर लात-जूते खाने पड़े थे। गालियाँ सुननी पड़ी थीं। पंडित ने गरियाते हुए कहा था-"साला ई चमरबा सबकुछ चौपट कर दिया। सत्यानाश कर दिया मादर.....ने।"
उसी दिन बुधन को भगवान् से नफ़रत हो गया। जिस पंडित को वह देवता मानता था, उसमें दानव दिखाई देने लगा। फिर तो रात भर उसे नींद न आयी। बार-बार वह उठकर बैठ जाता और खुद को टटोलने लगता ! क्या वह आदमी की तरह नहीं दिखता है ! रोजी उसे मन भर गरियाकर कब का सो चुकी थी-" तोरा कोनो जरूरी था, हिन्दुवन के मंदिर में जाय का। हम डोम-चमार हैं, हमरा कोन मतलब है बभना के भगवान् से। कमाते हैं तो पेट भरता है! नहीं कमाते हैं तो कोय देता दू सेर अनाज...दू टाका। काहे खातिर गये थे ईज्जत गमाने।"
बुधन निरूत्तर ताकता रहा और अपने आप से पूछता रहा कि वह कौन है?
बुधन तो अपने घर में सोया था, परंतु यह बात पूरे गांव में फैल गई। सुबह ही चमारों की बैठक हुई और सबने हिन्दू -धर्म का त्याग कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। घर में रखी हुई भगवान् की तस्वीरें और मूर्तियाँ तोड़-फोड़ कर नाले में फेंक दी गयीं। उधर बभनटोली में लोग विजयादशमी का जश्न मना रहे थे और इधर चमारों ने मस्जिद में जाकर पहला नमाज़ अदा किया। बुधन इसमें सबसे आगे था।
मौलवी साहब ने सबका नया नामकरण किया था। बुधन राम मोहम्मद सकूर हो गया। उसकी पत्नी रोजी से रूकसाना हो गई। बेटा नरेश नूरो हो गया तो बेटी हेमा हलीमा हो गई।
बुधन नमाज़ के बहाने उठक-बैठक करके उठा तो उसका शरीर शुन्न हो गया था। अब किधर जाए, क्या करे कुछ समझ में नहीं आ रहा था! वह अनमने भाव से मियां टोली की ओर चल पड़ा। उसके हृदय को पंडित और मौलवी की बातें छेदती जा रही थीं ! बुधन सोच नहीं पा रहा था कि वह हिन्दू है या मुसलमान! उसका मंदिर है या मस्जिद ! वह सड़क पर अनमने भाव से चलता जा रहा था। तभी गफूर मियां ने उसे बुलाते हुए रोज़ा खोलने का आग्रह किया। मन किया कि उसे मना कर दें, परंतु भूख ने उसके सिद्धांत पर अपना ध्वज लहरा दिया।
सकूर मियां गफूर की चौकी पर जा बैठा। अनेक प्रकार के फल, सलाद, खजूर के साथ मनमोहक पकवान ने उसका मन मोह लिया। आज मुसलमान होने का सच्चा उसे मिला था। हिन्दुओं ने तो उसे कभी ओसारे पर भी न चढ़ने दिया।साथ खाने की बात तो दूर है।
सकूर मियां मन ही मन एक ओर गफूर के प्रति कृतज्ञ हो रहा था तो दूसरी ओर इस्लाम के प्रति। वह इस्लाम की नेमतों की तह में उतरता ही जा रहा था कि गफूर की बीबी आकर छाती पीटने लगी-"अल्ला हो अल्ला ....ई त' चमरबा के साथ खा रहले हे.....तौबा-तौबा।"
गफूर मियां सकपका गया। सकूर का खून सूख गया। मुंह अपने जैसा हो गया। मानो फिर किसी ने उसे चार जूते लगा दिया हो। उसका मन ओकियाने लगा। हो रहा था कि कैसे कर दें वहीं गफूर मियां की रोजखोल्ली पर।
उसने पोखर पर जाकर दो अंगुलियों को अपने हलक़ तक उतार दिया। फिर तो सबका सब बाहर ! उन्होंने कई बार आँखों पर पानी के छींटे मारें; कुल्ला किया, परंतु मन अब भी ओकिया रहा था। पोखर के झिलमिलाते हुए जल कई आकृतियाँ बन रही थीं। वह अपनी दाढ़ी को सहेज कर बार- बार अपने को परखने की कोशिश करने लगा कि वह सकूर मियां है या बुधन चमार.....मियां है या चमार है ...हिन्दू है या चमार है।
आज रमजान का अंतिम रोज़ा था।मस्जिद के स्पीकर से बार-बार 4:22 बजे सुबह सेहरी खाने के निर्देश दिये जा रहे थे। रूकसाना उठा कर तरह-तरह का पकवान बना रही थी। खीर...सेबईयाँ....मछलियां आदि- आदि।
वह सब कुछ बनाकर जब सकूर को उठाने गयी तो वह दालान पर नहीं था। रूकसाना घबरा गयी- कहाँ गया होगा, अभी तो बाहर अंधेरा है? तभी उसने देखा कि सड़क पर कुछ खटर- पटर हो रहा है। नजदीक जाने पर लगा कि कोई अंधेरे में रिक्शा धो रहा है।
"कौन है .....कौन है वहाँ?" रूकसाना डरते-डरते बोली।
"बुधन चमार ......बुधन चमार हैं हम।" जबाब मिला।
रूकसाना अचरज में पड़ गई, क्योंकि वह सकूर मियां नहीं था। उसने अपनी दाढ़ी कटवा ली थी। मुसलमानी टोपी फेंक कर सिर पर पगड़ी बांध ली थी।
रूकसाना जब तक कुछ बोलती कि उससे पहले बुधन ने रिक्शे की सीट पर बैठ कर बीड़ी सुलगायी और स्टेशन की ओर चल पड़ा।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
बुधन तो अपने घर में सोया था, परंतु यह बात पूरे गांव में फैल गई। सुबह ही चमारों की बैठक हुई और सबने हिन्दू -धर्म का त्याग कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। घर में रखी हुई भगवान् की तस्वीरें और मूर्तियाँ तोड़-फोड़ कर नाले में फेंक दी गयीं। उधर बभनटोली में लोग विजयादशमी का जश्न मना रहे थे और इधर चमारों ने मस्जिद में जाकर पहला नमाज़ अदा किया। बुधन इसमें सबसे आगे था।
मौलवी साहब ने सबका नया नामकरण किया था। बुधन राम मोहम्मद सकूर हो गया। उसकी पत्नी रोजी से रूकसाना हो गई। बेटा नरेश नूरो हो गया तो बेटी हेमा हलीमा हो गई।
बुधन नमाज़ के बहाने उठक-बैठक करके उठा तो उसका शरीर शुन्न हो गया था। अब किधर जाए, क्या करे कुछ समझ में नहीं आ रहा था! वह अनमने भाव से मियां टोली की ओर चल पड़ा। उसके हृदय को पंडित और मौलवी की बातें छेदती जा रही थीं ! बुधन सोच नहीं पा रहा था कि वह हिन्दू है या मुसलमान! उसका मंदिर है या मस्जिद ! वह सड़क पर अनमने भाव से चलता जा रहा था। तभी गफूर मियां ने उसे बुलाते हुए रोज़ा खोलने का आग्रह किया। मन किया कि उसे मना कर दें, परंतु भूख ने उसके सिद्धांत पर अपना ध्वज लहरा दिया।
सकूर मियां गफूर की चौकी पर जा बैठा। अनेक प्रकार के फल, सलाद, खजूर के साथ मनमोहक पकवान ने उसका मन मोह लिया। आज मुसलमान होने का सच्चा उसे मिला था। हिन्दुओं ने तो उसे कभी ओसारे पर भी न चढ़ने दिया।साथ खाने की बात तो दूर है।
सकूर मियां मन ही मन एक ओर गफूर के प्रति कृतज्ञ हो रहा था तो दूसरी ओर इस्लाम के प्रति। वह इस्लाम की नेमतों की तह में उतरता ही जा रहा था कि गफूर की बीबी आकर छाती पीटने लगी-"अल्ला हो अल्ला ....ई त' चमरबा के साथ खा रहले हे.....तौबा-तौबा।"
गफूर मियां सकपका गया। सकूर का खून सूख गया। मुंह अपने जैसा हो गया। मानो फिर किसी ने उसे चार जूते लगा दिया हो। उसका मन ओकियाने लगा। हो रहा था कि कैसे कर दें वहीं गफूर मियां की रोजखोल्ली पर।
उसने पोखर पर जाकर दो अंगुलियों को अपने हलक़ तक उतार दिया। फिर तो सबका सब बाहर ! उन्होंने कई बार आँखों पर पानी के छींटे मारें; कुल्ला किया, परंतु मन अब भी ओकिया रहा था। पोखर के झिलमिलाते हुए जल कई आकृतियाँ बन रही थीं। वह अपनी दाढ़ी को सहेज कर बार- बार अपने को परखने की कोशिश करने लगा कि वह सकूर मियां है या बुधन चमार.....मियां है या चमार है ...हिन्दू है या चमार है।
आज रमजान का अंतिम रोज़ा था।मस्जिद के स्पीकर से बार-बार 4:22 बजे सुबह सेहरी खाने के निर्देश दिये जा रहे थे। रूकसाना उठा कर तरह-तरह का पकवान बना रही थी। खीर...सेबईयाँ....मछलियां आदि- आदि।
वह सब कुछ बनाकर जब सकूर को उठाने गयी तो वह दालान पर नहीं था। रूकसाना घबरा गयी- कहाँ गया होगा, अभी तो बाहर अंधेरा है? तभी उसने देखा कि सड़क पर कुछ खटर- पटर हो रहा है। नजदीक जाने पर लगा कि कोई अंधेरे में रिक्शा धो रहा है।
"कौन है .....कौन है वहाँ?" रूकसाना डरते-डरते बोली।
"बुधन चमार ......बुधन चमार हैं हम।" जबाब मिला।
रूकसाना अचरज में पड़ गई, क्योंकि वह सकूर मियां नहीं था। उसने अपनी दाढ़ी कटवा ली थी। मुसलमानी टोपी फेंक कर सिर पर पगड़ी बांध ली थी।
रूकसाना जब तक कुछ बोलती कि उससे पहले बुधन ने रिक्शे की सीट पर बैठ कर बीड़ी सुलगायी और स्टेशन की ओर चल पड़ा।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
जय हो
ReplyDelete