कहानी
घूरन की आँखें खुलीं तो धान का दो बोरा गायब था।दो दिनों की माथापच्ची ,चिरौरी और ठेकेदारों तथा खरीदारों की घिनौनी हरकत ने उसे इस कदर थका दिया कि बैठे- बैठे ही उसकी आँख लग गयी।गोनर ने कब राजा शल्हेस का किस्सा खतम किया,उसे कुछ भी पता नहीं।घूरन बोरे की छल्ली पर से नीचे कूद गया।
दोनों बैल अपने गोस्तर का पुआल चट कर गया था।दोनों अपने राग में थूथून घुसेरकर फों-फों कर रहा था।कठही गाड़ी अपनी जगह सलामत थी।
घूरन को कुछ नहीं फुरा रहा था।उसे क्या पता था कि सरकारी रेट से धान बेचना इतना मँहगा पड़ेगा।नहीं तो वह सात कोस जमीन गाड़ी हाँककर क्यों लाता? उसे तो लगा कि गाँव का खुदरा खरीदार किसानों से अनाज औने- पौने दाम पर लेता है -कुछ नगद कुछ उधार। सरकारी रेट से बिकने पर नगद पैसा हाथ आएगा, जिससे वह बाँकी - बकाया चुकाकर रब्बी फसल में समय से खाद - पानी डाल सकेगा,पर दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ा था।
दन दो दिनों में उन्हें पता चल गया था कि निरीह किसानों को लूटने वाले सभी जगह घात लगाये रहते हैं।
सरकार द्वारा प्रत्येक ब्लाक में शिविर लगाकर धान की नगदी खरीद का समाचार पाकर घूरन गदगद था, परंतु यहाँ आते ही पता चला कि सरकारी खजाना खाली हो गया है।माल आने में तीन दिन लगेंगे।घनश्यामपुर ब्लाक का पूरा फिल्ड ट्रैक्टर,टायर गाड़ी और कठही गाड़ी से खचाखच भरा था।इस बीच घूरन ने भी अपने मीता गोनर की गाड़ी से सटाकर कठही लगा दिया था।
किसानों में आक्रोश था-क्या नखरा है।लोग यहाँ कब तक सरकारी माल का इंतजार करते रहेंगे।दूर- दूर से किसान यही सोचकर आये थे कि वह अपना माल बेचकर शाम तक वापस हो जाएगा।परंतु जो कपार में लिखा था वह कौन बाँट लेता।
इस दौरान दलालों ने भी खूब पैतरे आजमाए।सरकारी रेट अठारह सौ का क्विंटल और दलाल किसानों को चकमा देकर तेरह सौ में माल पटाना चाहते थे।'धान में जादे नमी है.....दो आना खखरी है......दो आना धूल है' कहकर उसने कितने किसानों को अब तक उल्लू बना दिया था।लेकिन घूरन अपनी जगह पर खंभा गाड़े हुआ था।वह धान बेचेगा तो अठारह सौ का ही।कोई किराये की गाड़ी नहीं है।
गोनर उसका लंगोटिया यार था, जिसपर अठारह सौ का भूत सवार था।
दो बोरे धान की चोरी होने पर घूरन की हिम्मत पस्त हो गई।अब वह अठारह का भी धान बेचेगा तो हरदर तेरह सौ का रेट हाथ आएगा।
गोनर घूरन को बोल-भरोस देने लगा-"क्या करोगे मीता अपने नसीब में यही सब लिखा था।नसीब अच्छा होता तो हम दोनों भी सरकारी मास्टर होते।"
घूरन चुप था।सरकारी मास्टर तो वह सही में होता, लेकिन कपार में घुरघुरा काटे था।पन्द्रह सौ का वेतन सुनकर मास्टरी को लात मार दिया।आज बीस हजार पाता। दूसरी ही सेखी होती।वह हिम्मत बांधकर कहा-"दो बोरा धान ले गया ,हमारा कपार नहीं ले गया।चोर साला चोर ही रहेगा।"
सरकारी खजाने में माल आ गया।किसानों के चेहरे खिल उठे।दलालों की हिम्मत पस्त हो गयी।दलालों के हाथ माल बेचने वालों का मू लटक गया।
हाकिम के टेबुल तक लोग कतारबद्ध हो गए।मुंशी जी नगदी लेकर बैठे थे।पीछे दो बंदूकधारी तनकर खड़े थे....जरा-सा हिला कि सूट।
धान में धूल,खखरी और नमी के नाम पर यहाँ भी दस परसेंट काटा जा रहा था, जिसके कारण किसान परेशान थे।
घूरन की बारी आ गई।धान का कुल वजन ग्यारह क्विंटल......नमी और खखरी एक क्विंटल बीस कलो ......कुल राशि-17,640रु.......पार्किंग चार्ज-300रु. शेष बचे-17,340रु.।
17,340 रु. हाथ में आते ही घूरन का देह सुन्न हो गया।लगा कि उसे किसी ने उसके कफन की कीमत थमा दिया।क्रोध के कारण उसके त्रिनेत्र खुल गए, जो खिड़की के पार वहाँ जा टिका, जहाँ उसके दोनों बोरे लावारिश पड़े थे।वह कुछ बोलता ,तब तक लाईन में खड़े लोगों ने उसे धकियाकर बाहर कर दिया।
धूरन के भीतर की धधकती हुई आग को परिस्थिति ने शांत कर दिया।वह गाड़ी जोतकर बैलों को पीट दिया।सूरज डूब चुका था।चाँद की किरणें ओस की गहनता को भेदकर धरती को प्रकाशवान कर रखा था ।बैल सरपट घरमुहानी भागे जा रहा था, फिर भी घूरन रह-रह कर उसे पीट देता था।
गाड़ी के घूमते हुए काठ के पहिये के साथ घूरन अपने भविष्य से दूर होता जा रहा था।अधपक्की सड़क पर काठ के पहिये खट-पट की आवाज रात की निर्जनता को भंग कर रहा था।यह आवाज सड़क के खरंजे से आ रही थी या बैलों के खुर से या फिर पहिये पर चढ़े हुए लोहे के हाल से उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।फिर वह बैलों की रस्सी तानकर हाल को टटोलने लगा।सब कुछ ठीक था । हाल तो उनकी तमाम उम्मीदों और आशाओं पर से उतर गया था।।
सूरज की लालिमा के साथ ही वह गाँव की सीमा में प्रवेश कर गया।सड़क के दोनों उसके ही खेत थे,जिसमें गेहूँ और सरसो की फसलें लगी थीं।गेहूँ फूटने ला था तो सरसों पीले- पीले फूलों से लदा था।घूरन का मन खिसिया गया ,वह सिलेबिया की रस्सी तानकर गाड़ी को खेत में उतार दिया।आज वह बैलों के खुर और गाड़ी के पहियों से पूरे खेत को रौंद देना चाहता था, लेकिन अभी गाड़ी दस कदम भी नहीं बढ़ा था कि वह बैलों की रस्सी तान कर गाड़ी से नीचे कूद गया तथा बैलों को गरियाते हुए टूटे-अधटूटे गेहूँ.और सरसो के जड़ में मिट्टी थोपकर सीधा करने लगा।उनकी आँखें नम हो गयीं।मानो वह भूखे प्यासे असंख्य बच्चे का निरीह बाप हो।
उमेश कुमार शर्मा
युवा लेखक एवं ब्लागर
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